शहर चमकता है, गाँव दम तोड़ता है – स्वास्थ्य की यह क्रूर सच्चाई

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गाँव तक क्यों नहीं पहुंचती है बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था? हमारे ग्रामीण क्षेत्रों को वैसे तो कई बुनियादी आवश्यकताओं की जरूरत है। लेकिन सबसे अधिक जिस

गाँव तक क्यों नहीं पहुंचती है बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था?


मारे ग्रामीण क्षेत्रों को वैसे तो कई बुनियादी आवश्यकताओं की जरूरत है। लेकिन सबसे अधिक जिस मुद्दे पर ध्यान देने की आवश्यकता है, वह है स्वास्थ्य का मुद्दा। जो आज भी इससे वंचित रह जाता है। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी की रिपोर्ट के अनुसार देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है, लेकिन डॉक्टरों का बड़ा हिस्सा शहरों तक ही केंद्रित होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की भारी कमी है। डॉक्टरों, नर्सों और लैब-टेक्नीशियनों के हजारों पद खाली पड़े हैं। कई जगह अस्पताल भवन बने हुए हैं, पर नियमित डॉक्टर नहीं हैं, उपकरण अधूरे हैं और रात की आपात सेवा लगभग नहीं के बराबर है। इसका सीधा असर उन लोगों पर पड़ता है जिनके पास निजी अस्पताल या शहर तक पहुँचने के साधन नहीं होते हैं। 

मैदानी क्षेत्रों की अपेक्षा पहाड़ी राज्यों के दूर दराज गांवों की स्थिति इससे भी अधिक कठिन है, क्योंकि यहाँ अस्पताल तक पहुँचना ही अपने-आप में एक चुनौती है। उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकांश गांवों से नजदीकी बड़े अस्पताल की दूरी कम से कम 20 से 50 किमी तक होना आम बात है। जहां पहुँचने के लिए न केवल जर्जर सड़क बल्कि मौसम और अक्सर परिवहन की कमी के कारण समय पर इलाज मिल पाना मुश्किल हो जाता है।

मोना खलझूनिया
वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए लगभग 95 हजार करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान किया गया, जिसमें आयुष्मान भारत, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ और अस्पताल ढांचे को मजबूत करने की बात कही गई। राज्य स्तर पर भी स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार की घोषणाएँ होती रहती हैं, पर पहाड़ के छोटे गांवों तक इनका असर बहुत धीमी गति से पहुंचता है। इसका एक उदाहरण उत्तराखंड के बागेश्वर जिला स्थित गरुड़ ब्लॉक का जखेड़ा गाँव है। जहां संचालित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सुविधाओं के अभाव में चल रहा है। यह अस्पताल केवल जखेड़ा गांव ही नहीं बल्कि आसपास के कई गांव जैसे गनीगांव, सैलानी, और लमचूला के लोगों का भी सहारा है। 

जखेड़ा की आबादी लगभग 1500, गनीगांव की 1600, सैलानी की 1200 और लमचूला की लगभग 1500 है. यानी करीब 5,800 लोग इस एक प्राथमिक अस्पताल पर निर्भर हैं। इतनी आबादी होने के बावजूद अस्पताल में मूलभूत सुविधाओं का अभाव यहां के निवासियों के जीवन को खतरे में डालता हैं। इस संबंध में जखेड़ा गांव के 55 वर्षीय रघुवीर सिंह परिहार बताते हैं, “अस्पताल तो और भी हैं, लेकिन जरूरत पूरी नहीं होती। डॉक्टर भी केवल एक है, साथ में एक वार्ड बॉय और फार्मासिस्ट हैं। एक आयुर्वेदिक अस्पताल करीब 30 साल पहले (1991-92) बना था, लेकिन सुविधा कोई खास नहीं है।” 

आशा कार्यकर्ता कांता परिहार कहती हैं, “यहाँ सिर्फ बुखार या जुकाम जैसी मामूली बीमारियों से जुड़ी दवाइयाँ ही मिलती हैं और सामान्य जाँच तक ही इलाज सीमित है।" वह बताती हैं कि अस्पताल में स्टाफ सुबह 10 बजे आते हैं और दोपहर 2 बजे तक चले जाते हैं। ऐसे में रात में जरूरत पड़ने पर ग्रामीणों को बहुत परेशानी होती है। एंबुलेंस तक समय पर नहीं पहुंच पाती है। मरीज को निजी परिवहन की व्यवस्था कर 33 किमी दूर गरुड़ या बैजनाथ के सदर अस्पताल ले जाना पड़ता है पहुँचते-पहुँचते कई बार मरीज की हालत गंभीर हो जाती है।”

स्वास्थ्य सेवा का एक पहलू ऐसा भी है जिसके बारे में अक्सर कोई नहीं बोलता है। सैलानी की 20 वर्षीय प्रीति बताती है, “माहवारी के दौरान पेट दर्द जैसी समस्या होने पर अस्पताल में खुलकर बात नहीं कर पाती, क्योंकि डॉक्टर पुरुष हैं। अगर महिला डॉक्टर होती तो हम खुलकर अपनी बात कह पाते।” स्थानीय पोस्ट ऑफिस कर्मचारी उम्मेद सिंह कहते हैं, “यहाँ की जनसंख्या के हिसाब से अस्पताल तो है, लेकिन सुविधाएँ नहीं हैं। एएनएम का पद है, पर वे अक्सर मौजूद नहीं रहतीं और रात में डॉक्टर भी नहीं होते हैं।” 66 वर्षीय गोविंद परिहार की चिंता दवाइयों को लेकर है, कहते हैं कि “दवाइयाँ कम हैं और कई बार पुरानी हो जाती हैं। प्राथमिक उपचार भी पूरा नहीं मिल पाता। गंभीर मरीज को तुरंत रेफर कर दिया जाता है, लेकिन यह निश्चित नहीं होता कि वह रास्ते में बच पाएगा या नहीं।”

लमचूला की रहने वाली माया कहती है, “अगर अस्पताल में सुविधाएं होती तो हमें दूर नहीं जाना पड़ता। खासकर महिलाओं के लिए महिला डॉक्टर होती तो बात करना आसान होता और जीवन थोड़ा आसान लगने लगता।” गनीगांव के 33 वर्षीय धीरज बिष्ट बच्चों और गर्भवती महिलाओं की कठिनाई बताते हुए कहते हैं, “यहाँ मेडिकल स्टोर भी नहीं है और अस्पताल में जरूरी दवाइयां नहीं मिलती हैं, यहां तक कि एंबुलेंस जैसी जरूरी सुविधा की व्यवस्था तक नहीं है। रात में स्टाफ की जरूरत है, जो नहीं है। कई बार बच्चों को गंभीर बीमारी में अस्पताल पहुँचाने तक जान चली जाती है। गर्भवती महिलाओं को एंबुलेंस आने तक दर्द सहना पड़ता है। अगर यही सुविधा गांव में होती तो हमारी बहू-बेटियों, बच्चों और बुजुर्गों को इतनी परेशानी नहीं होती।” 60 वर्षीय माधव सिंह कहते हैं, “भवन है, सामग्री है, लेकिन सुविधा नहीं है। कई बार अधिकारियों से बात की, पर सुधार नहीं हुआ।”

दरअसल, स्वास्थ्य सुविधा केवल एक सेवा नहीं, बल्कि लोगों की ज़िंदगी से जुड़ा विषय है। जब कोई गर्भवती महिला रात में दर्द सहते हुए वाहन का इंतजार करती है, जब कोई युवती अपनी तकलीफ बताने में संकोच करती है, या जब बुजुर्ग को दवा के बजाय रेफर-स्लिप मिलती है, तब समस्या सिर्फ अस्पताल की नहीं रहती बल्कि हाशिये पर रहने वाले लोगों तक सुविधा नहीं पहुंचाने की कमी को दर्शाता है। 

सरकारी बजट, योजनाएं और घोषणाएं तभी सार्थक होंगी जब अस्पताल केवल दीवारों का ढाँचा न रह जाए, बल्कि वहां डॉक्टर हों, दवा हो, रात की सेवा हो और मरीज को यह भरोसा हो कि संकट की घड़ी में उसे इलाज के लिए अपने गांव से बाहर जाना नहीं पड़ेगा। पहाड़ के इन गांवों की मांग बहुत बड़ी नहीं है बस इतना है कि बीमार पड़ने पर उन्हें इलाज की सभी सुविधाएं जल्द उपलब्ध हो जाएं। (यह लेखिका के निजी विचार हैं)



- मोना खलझूनिया
जखेड़ा, उत्तराखंड

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