रक्षा बंधन कहानी का सारांश, समीक्षा, उद्देश्य और प्रश्न उत्तर विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक कहानी न केवल मानवीय संवेदनाओं को गहराई से छूती है, बल्कि जाति
रक्षा बंधन कहानी का सारांश, समीक्षा, उद्देश्य और प्रश्न उत्तर | विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक
रक्षा बंधन कहानी का सारांश विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक
रक्षा बंधन कहानी की समीक्षा
रक्षा बंधन कहानी के प्रमुख पात्र घनश्याम दास का चरित्र चित्रण
- भावुक : घनश्यामदास एक भावुक प्रवृत्ति का व्यक्ति है। बहुत चिंतामग्न होकर कानपुर में बीच रास्ते से गुज़रते समय वह सुरसति थी करूणाव्यवस्था को देखकर भावविह्वल हो उठता है। उसके पास जाकर पूछता है और कारण जानकर पूरी भावमयता से अपना बायां हाथ आगे बढ़ा देता है। घनश्यामदास जितना सरस्वती के प्रति भावुक है, उतना ही अपने परिवार को लेकर चिंतित भी है- “कुछ नहीं, यह सब मेरे ही कर्मों का फल है। यदि मैं उन्हें छोड़कर न जाता ; यदि गया था, तो भी उनकी खोज-ख़बर लेता रहता। परन्तु मैं तो दक्षिण जाकर रूपया कमाने में इतना व्यस्त था कि कभी याद ही न आयी।"
- सरल : सरलता व्यक्ति का सहज गुण हैं। घनश्यामदास सरल स्वभाव का व्यक्ति है। अमरनाथ और अपने मित्रों के कहने पर वह विवाह के लिए तैयार हो जाता है। सरस्वती और उसकी माँ के लिए लगाव भी उसके सरल स्वभाव का ही अंग है।
- सहृदयता : घनश्यामदास अंतरंग व्यक्तित्व का धनी है। वह अपने संपर्क में आने वाले सभी व्यक्तियों से सहज संबंध बनाता। अमरनाथ, सरस्वती, सरस्वती की माँ सभी घनश्याम के मिलनसार पूर्ण व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित होते हैं।
- संस्कारवान : घनश्याम के हृदय में बड़ो के लिए आदर, समव्यस्कों के लिए स्नेह है। वह पर्व की गरिमा और उदारता का अनुभव करता है। उसके हृदय का सम्मान भाव ही उसके चरित्र को उदात्त बनाता है।
- अपनत्व : परिवारजनों के प्रति अपनत्व होने के कारण ही, उसके हृदय में सभी के लिए मोह है। अपने परिवार के प्रति अपनी आत्मीयता प्रकट करते हुए वह कहता है—“तुम तो जानते ही हो कि मुझे लखनऊ आकर रहे, एक वर्ष हो गया और जब से यहाँ आया हूँ, उन्हें ढूंढने में कुछ भी कसर न उठा रखी। इसी प्रकार यह कथन भी घनश्याम के इसी व्यक्तित्व को निरूपित करता है- “घनश्याम ने दो अशर्फियाँ उसके हाथ में धर दी और मुस्कराकर बोले क्या पैसे भी देने होगें ?"
रक्षा बंधन कहानी के शीर्षक की सार्थकता
- श्रावणी मास का उत्सव ; नगर में चहल पहल और सरस्वती का उदास चेहरा। युवक का आगे बढ़कर सरस्वती से राखी का डोरा बंधवाना ।
- घनश्याम दास का परिवार के प्रति मोह और धन (व्यावहारिता) से अधिक भावना को पश्रुय देना ।
- अमरनाथ आदि मित्रों के कहने पर घनश्याम का विवाह के लिए राजी होना। विवाह हेतु एक लड़की को देखने जाना। वहाँ अकस्मात् ही सरस्वती और उसकी माँ से भेंट। कहानी का इतिवृत्त और उसमें वर्णित घटनाएँ सभी कहानी को अभिधा शक्ति से संपन्न मानती हैं। कहानी की ध्वनि उतनी ही अधिक मार्मिक है। रक्षाबंधन सिर्फ पर्व का प्रतीक नहीं है, अपितु यह हृदय की पावन भावना है।
रक्षा बंधन कहानी का उद्देश्य विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक
रक्षा बंधन कहानी की भाषा शैली
- शब्द भंडार : कौशिक जी के गद्य में शब्दगत विविधता मिलती है, श्रावण, स्त्री-पुरुष, आनंद, उत्साह, श्रावण, उत्सव, यजमान, नेत्र, अश्रुपूर्ण, कुद्ध आदि तत्सम् शब्द बाहुल्य में मिलते है। साथ ही काम-काज, इठलान, मुस्कराना, निदला, रट लगाना जैसे शब्द भी मिलते है, जो भाषा को सहजता प्रदान करते है। अपने शब्द की विपुलता से इनकी भाषा प्रवाहमयी और सेप्रेषणीय है—“अंत को बालिका निराश होकर घर के भीतर लौट जाने को उद्धत ही हुई थी कि एक सुंदर युवक की दृष्टि, जो कुछ सोचता हुआ धीरे-धीरे जा रहा था, बालिका पर पड़ी।"
- संवाद-योजना : कौशिक जी के संवाद संक्षिप्त, एवं चुस्त है। संवाद भावों के गंथन और घर्षण का कार्य करते हैं। इनसे पात्रों के सभी भाव सहन रूप से अभिव्यक्ति पाते हैं।भाव की मनोरमता और पद की सहजता दोनों का सामान्य संप्रेषक कौशिक जी की भाषा की विशेषता है।
- वर्णनात्मकता : कहानीकार किन्हीं स्थलों पर वर्णन भी करता चलता है। ये स्थल नीरस था बोझिल नहीं है, अपितु कहानी के विकास में सहायक हैं। इनसे घटना का संकेत मिलता है और कहानी के विकास को गति मिलती है “गोलागंज (लखनऊ) की एक बड़ी तथा सुंदर अट्टालिका के एक सुसज्जित कमरे में एक युवक चिंता सागर में निमग्न बैठा है। कभी वह ठंडी सांस भरता है, कभी रूमाल से आंखे पोंछता है।"
- चित्रात्मकता: कौशिक जी की भाषा चित्र-प्रधान है। कहानी की चित्र योजना घटनाओं को घटित होते हुए दिखाती हैं - 'तुझे दोनो लेने होंगे यह कहकर युवक ने बल-पूर्वक पैसे तथा रूपये बालिका के हाथ पर रख दिये।
- अभिधार्थता: कौशिक जी ने अभिधा शब्दशक्ति का प्रयोग कर के भाषा की शक्ति को उद्दघाटित किया है जो भई वाह! अच्छी राखी है। लाली डोरे को राखी बताते हो। यह किसने बांधी है ? किसी बड़े कंजूस ब्राह्मण ने बांधी होगी। दुष्ट ने एक पैसा तक खरचना पाप समझा। डोरे ही से काम निकाला। भाषा की धन्यात्मथता, अभिधार्थता और शब्द भंडर सभी कुछ कौशिक जी भाषा के सौंदर्य को बढ़ाते हैं।
रक्षा बंधन कहानी में सामाजिक यथार्थ निरूपण
इस कहानी की नायिका सरस्वती, नायक घनश्यामदास और सहायक पात्र अमरकांत कहानी को चरम विकास की ओर उन्मुख करते हैं। कहानी में चरित्र से अधिक महत्वपूर्ण कथानक का घटना वैचित्र्य है। कहानीकार इसी घटना-वैचित्र्य के आधार को लेकर ताना-बाना बुनता। कहानी की उपर्युक्त पंक्तियाँ घटना-व्यापार की इसी महत्ता को स्थापित करती हैं। कहानी का आरंभ भी 'श्रावण की धुम-धाम है। नगरवासी स्त्री-पुरुष बड़ें आनंद तथा उत्साह से श्रावणी का उत्सव मना रहे हैं।' इस कहानी का अंत भी इसी श्रावणी उत्सव से होता है। 'श्रावण का महीना है और श्रावणी का महोत्सव।घनश्यामदास की कोठी खूब सजायी गयी है।' इस तरह कहानी की उपर्युक्त पंक्तियाँ भी रक्षाबंधन के सूत्र बिंदु को ही स्पष्ट करती है।


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