रक्षा बंधन कहानी का सारांश, समीक्षा, उद्देश्य और प्रश्न उत्तर | विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक

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रक्षा बंधन कहानी का सारांश, समीक्षा, उद्देश्य और प्रश्न उत्तर विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक कहानी न केवल मानवीय संवेदनाओं को गहराई से छूती है, बल्कि जाति

रक्षा बंधन कहानी का सारांश, समीक्षा, उद्देश्य और प्रश्न उत्तर | विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक


विश्वम्भरनाथ शर्मा 'कौशिक' द्वारा रचित 'रक्षाबंधन' हिंदी कहानी साहित्य की एक कालजयी रचना है। यह कहानी न केवल मानवीय संवेदनाओं को गहराई से छूती है, बल्कि जाति-पाति और संकीर्णता से ऊपर उठकर प्रेम और कर्तव्य के आदर्श को भी स्थापित करती है।

रक्षा बंधन कहानी का सारांश विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक

कहानी श्रावण मास की धूमधाम से आरंभ होती है। नगरवासी बड़ी धूम-धाम से राखी का उत्सव मना रहे हैं। बहने भाइयों से और ग्रह्मण जजमानों से राखी बंधवा रहे हैं। एक छोटी सी बालिका कहती है- 'माँ मैं भी राखी बांधूगी।' ठंडी सांस लेते हुए मां ने पूछा 'किसे राखी बांधेगी बेटी ।' बालिका अबोध थी कहने लगी—'तो क्या भइया के ही राखी बांधी जाती है। और किसी के नहीं।' बालिका ने फिर कहा-'भइया नहीं है', तो अम्मा तुम्हारे ही राखी बांधूगी। मां और बेटी लगातार इसी तरह बातचीत करते रहे। बेटी के भोले-भाले प्रश्न और मां का गंभीर उत्तर। बच्ची के मासूम से प्रश्न सुनकर मां क्रुद्ध हो उठीं, कहने लगी। 'बड़ी राखी बांधने वाली बनी हैं। ऐसी ही होती तो आज यह दिन नही देखना पड़ता'।
 
रक्षा बंधन कहानी का सारांश, समीक्षा, उद्देश्य और प्रश्न उत्तर | विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक
बालिका चुपचाप आँखों में आसूँ भरे हुए नहाने के लिए तैयार हो गयी। एक घंटे बाद बालिका द्वार पर खड़ी हुई दिखाई देती है। वह बड़ी उत्सुकता से आने-जाने वाले की ओर ताकने लगती। मानो वह अपनी इच्छा-शक्ति से आने-जाने वालों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करना चाहती हो। जब किसी का ध्यान न जाता, तो वह उदास हो जाती। निराश होकर वह घर के भीतर जाने लगी। तभी एक युवक इन उदास करुणा-पूर्ण नेत्रों को देखकर रुक गया। उसने पास आकर पूछा 'बेटी, रोती क्यो है ? बालिका ने बिना कुछ कहे, अपना डोरी वाला हाथ, उसकी ओर बढ़ा दिया। युवक ने पूछा-यह क्या है। बालिका ने उत्तर में कहा-राखी।'

युवक और अधिक कहे बिना समझ गया। उसने मुस्कराकर अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ा दिया। बालिका प्रसन्न हो गई, उसने बहुत चाव से युवक को राखी बांधी। राखी बंधवा कर युवक ने बालिका को दो रुपये देने चाहे। पर बालिका आठ आने लेने के हठ पर अड़ गयी कि मैं तो पैसे ही लूंगीं। अंत मे युवक ने चार आने पैसे भी निकाले उसे देते हुए कहा, तुझे दोनों लेने पडेंगें। बालिका का नाम सुरसती, (सरस्वती) था।

गोपालगंज (लखनऊ) के एक सुंदर कमरे में एक युवा चिंता-मगन था। वह अपने आप से बातें 'सारा परिश्रम व्यर्थ गया ? सारी चेष्टाएँ निष्फल हुई। क्या करूँ, कहां जाऊँ ? उन्हें कहाँ ढूँढा ? सारा उन्नाव छान मारा, फिर भी पता न लगा।" सहसा उस युवक घनश्याम से मिलने अमरनाथ आया। अमरनाथ ने पूछा कानपुर से कब लौटे, उन्नाव भी उतरे होगे। घनश्याम ने कहा कल लौटा, और उन्नाव भी उतरा था। पर सब व्यर्थ, उन्होंने उन्नाव न जाने कब छोड़ा। लखनऊ आकर रहते हुए एक वर्ष हो गया, पर सब व्यर्थ। उन्हे ढूँढने का बहुत प्रयत्न किया, पर सब व्यर्थ। घनश्याम दुखी था कि कोई अपने घर को कैसे भूल जाता है। अमरनाथ की बात पर वह कहता है 'अजी चूल्हे में जाए ऐसा धन, जिससे सुख-शांति न मिलती हो ।

घनश्याम के हाथ में लाल डोरा देखकर ; अमरनाथ ने पूछा यह डोरा क्यों बांधा है। घनश्याम ने उसे राखी के बारे में बताया। उसकी बात सुनकर अमरनाथ ने कहा, यदि ऐसा है तो यह डोरा बहुत ही अमूल्य है।

पूर्वोक्त घटना को पांच वर्ष व्यतीत हो गए। घनश्याम को पिछली बातें भूला गयी थीं, पर उस बालिका की याद कभी-कभी हो आती। हुआ यह कि वह अपनी माता सहित, बहुत दिन हुए, कहीं चली गई थी। आज भी वे अपना बक्स खोलते हैं, तो कोई वस्तु देखकर चौंक उठते हैं। और साथ ही कोई पुराना दृश्य भी आंखो के सामने आ जाता।
 
मित्रों के बहुत कहने पर घनश्याम विवाह के लिए राजी हुआ अमरनाथ उन्हें लेकर दरियागंज गये। वहाँ एक छोटे से मकान के सामने खड़े हो गए और मकान का दरवाजा खटखटाया। मकान छोटा था, अमरनाथ ने कहा, अगर लड़की तुम्हे पसन्द आ जाये, तो बाकी कुछ सहन किया जा सकता है। स्त्री ने दीपक जलाया, उसने जैसे ही घनश्याम की ओर अपनी दृष्टि डाली, वह ज्ञान-शून्य होकर गिर पड़ी। घनश्याम ने कहा 'उफ़ मेरी माता'। तभी एक लड़की पानी लेकर आयी। घनश्याम ने देखा लड़की कोई और नहीं, वही थी जिसने पांच वर्ष पूर्व उसे राखी बांधी थी।

श्रावण का महीना, घनश्याम दास के घर पर खूब सज धज थी। उनकी भगिनी सरस्वती ने उन्हें राखी बांधी।
 

रक्षा बंधन कहानी की समीक्षा

'रक्षाबंधन' हिन्दी साहित्य की प्रसिद्ध कहानियों में से एक है। विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक ने इस कहानी में भाई-बहिन के लगाव, अपनत्व, प्रेम और सार्वकालिक संबंध को दिखाया। कथावस्तु के स्तर पर कहानी घनश्यामदास और सरस्वती के रागात्मक प्रेम को दिखाती है। सरस्वती का मन रक्षाबंधन के दिन राखी बांधने का है। वह राखी की डोरी लेकर आने-जाने वालों को निहारती है। उसे सुबकते देखकर घनश्यामदास सरस्वती के पास पहुँचता है और राखी का डोरा बँधवाता है। यह संबंध कहानी के बदलते घटना-क्रम के साथ भी बना रहता है। पाँच वर्ष के अंतराल पर मिलने पर भी दोनों एक दूसरे को पहचान जाते हैं। यह रागात्मकता भारतीय संस्कृति का अनूठापन भी है और उसकी अपनी विशिष्टता भी। यही वसुधैव कुटुम्बकम की भावना का विकास करने का साधन है!
 
कहानी की मुख्य पात्र सरस्वती हैं। उसकी इच्छा और भावनाएँ ही कहानी के घटनाक्रम का विकास करती हैं। सरस्वती सरल हृदय की भावुक लड़की है। वह त्योहार के उत्साह से भरी-पूरी है। मानों लेखक कहना चाहता है कि बच्चों में प्रत्येक भाव को पल्लवित करने की उम्र बचपन ही है। यह मनोविज्ञान बच्चों की सरलता को बढ़ाने का माध्यम है।

कहानी का देशकाव्य आधुनिक जीवन की जटिलता है। इसमें अमरनाथ अपनी व्यस्तता के कारण सरस्वती से पाँच वर्षों के अंतराल के बाद मिलता है, किन्तु मन में, उसके अन्तरचेतना में बहन के प्रति संवेदना वर्तमान रहती है। कहानीकार के मन में कहीं न कहीं यह भाव भी है कि व्यक्ति का मन सुसुप्त भावों को संजोए रहता है और आवश्यकता तथा परिस्थिति के अनुरूप ये भाव प्रस्फुटित होते हैं। जीवन का यही क्रम सामाजिकता को गतिशील करता है। कहानी का वातावरण मध्यवर्गीय परिवारों के तनाव और लगाव का दस्तावेज है। मध्यवर्गीय मानसिकता संबंधों को जीने और भोगने को प्राथमिकता देती है। वे मूल्यों की आदर्शवादिता में जीते हैं। कहानी इन्हीं मूल्यों को स्थापित कर मध्यवर्गीय चेतना को जीवन्त करती है।
 
कहानी का उद्देश्य सामाजिक जीवन में संबंधों के चित्र को उकेरना है और मूल्यों की तलाश करना है। घनश्यामदास भारतीय परम्परा और मूल्यों में आस्था रखने वाला मध्यवग्रीय व्यक्ति है वह जीवन की आधुनिकता से अधिक जीवन की बंधी-बंधाई पद्धति का विश्वासी है। भारत का दर्शन यही है। आधुनिकता का द्वन्द्व पंरपंरा की आस्था है। संस्कृति की आस्था ही उसके विकास का हेतु और सेतु है। कहानीकार का प्राथमिक उद्देश्य संबंधों की प्रगाढ़ता के जीवन-मूल्यों के प्रति लगाव का माहौल बनाना है।
 

रक्षा बंधन कहानी के प्रमुख पात्र घनश्याम दास का चरित्र चित्रण

घनश्यामदास 'रक्षाबंधन' कहानी का केन्द्रीय पात्र है। इसे कहानी का नायक भी कह सकते हैं। कानपुर में सरस्वती से राखी बंधवा कर वह लखनऊ आता है, अमरनाथ से और अपने मित्रों से बात करके जीवन की घटना में परिवर्तन आता है। घनश्याम की भावनाप्रधान और भावुकता ही वह कसौटी जिसकी तलाश लेखक आधुनिक परिप्रेक्ष्य में करता है। हमारे समाज को आधुनिक, व्यावसायिक भावभूमि में सहजता की तलाश है। घनश्यामदास के चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ हैं— 
  1. भावुक : घनश्यामदास एक भावुक प्रवृत्ति का व्यक्ति है। बहुत चिंतामग्न होकर कानपुर में बीच रास्ते से गुज़रते समय वह सुरसति थी करूणाव्यवस्था को देखकर भावविह्वल हो उठता है। उसके पास जाकर पूछता है और कारण जानकर पूरी भावमयता से अपना बायां हाथ आगे बढ़ा देता है। घनश्यामदास जितना सरस्वती के प्रति भावुक है, उतना ही अपने परिवार को लेकर चिंतित भी है- “कुछ नहीं, यह सब मेरे ही कर्मों का फल है। यदि मैं उन्हें छोड़कर न जाता ; यदि गया था, तो भी उनकी खोज-ख़बर लेता रहता। परन्तु मैं तो दक्षिण जाकर रूपया कमाने में इतना व्यस्त था कि कभी याद ही न आयी।" 
  2. सरल : सरलता व्यक्ति का सहज गुण हैं। घनश्यामदास सरल स्वभाव का व्यक्ति है। अमरनाथ और अपने मित्रों के कहने पर वह विवाह के लिए तैयार हो जाता है। सरस्वती और उसकी माँ के लिए लगाव भी उसके सरल स्वभाव का ही अंग है। 
  3. सहृदयता : घनश्यामदास अंतरंग व्यक्तित्व का धनी है। वह अपने संपर्क में आने वाले सभी व्यक्तियों से सहज संबंध बनाता। अमरनाथ, सरस्वती, सरस्वती की माँ सभी घनश्याम के मिलनसार पूर्ण व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित होते हैं। 
  4. संस्कारवान : घनश्याम के हृदय में बड़ो के लिए आदर, समव्यस्कों के लिए स्नेह है। वह पर्व की गरिमा और उदारता का अनुभव करता है। उसके हृदय का सम्मान भाव ही उसके चरित्र को उदात्त बनाता है।
  5. अपनत्व : परिवारजनों के प्रति अपनत्व होने के कारण ही, उसके हृदय में सभी के लिए मोह है। अपने परिवार के प्रति अपनी आत्मीयता प्रकट करते हुए वह कहता है—“तुम तो जानते ही हो कि मुझे लखनऊ आकर रहे, एक वर्ष हो गया और जब से यहाँ आया हूँ, उन्हें ढूंढने में कुछ भी कसर न उठा रखी। इसी प्रकार यह कथन भी घनश्याम के इसी व्यक्तित्व को निरूपित करता है- “घनश्याम ने दो अशर्फियाँ उसके हाथ में धर दी और मुस्कराकर बोले क्या पैसे भी देने होगें ?"
 

रक्षा बंधन कहानी के शीर्षक की सार्थकता

रक्षाबंधन कहानी का शीर्षक अभिधा शब्दशक्ति की गुणवत्ता और उसकी महत्ता को दर्शाता है। कहानी का वृत श्रावणी मास से आरंभ होकर श्रावणी मास पर ही समाप्त हो जाता है। इस बीच कहानी में घटनात्मक परिवर्तन आता। कहानी मे प्रधान रूप से तीन दृश्य या घटनाएँ हैं; 
  1. श्रावणी मास का उत्सव ; नगर में चहल पहल और सरस्वती का उदास चेहरा। युवक का आगे बढ़कर सरस्वती से राखी का डोरा बंधवाना । 
  2. घनश्याम दास का परिवार के प्रति मोह और धन (व्यावहारिता) से अधिक भावना को पश्रुय देना । 
  3. अमरनाथ आदि मित्रों के कहने पर घनश्याम का विवाह के लिए राजी होना। विवाह हेतु एक लड़की को देखने जाना। वहाँ अकस्मात् ही सरस्वती और उसकी माँ से भेंट। कहानी का इतिवृत्त और उसमें वर्णित घटनाएँ सभी कहानी को अभिधा शक्ति से संपन्न मानती हैं। कहानी की ध्वनि उतनी ही अधिक मार्मिक है। रक्षाबंधन सिर्फ पर्व का प्रतीक नहीं है, अपितु यह हृदय की पावन भावना है।
 

रक्षा बंधन कहानी का उद्देश्य विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक

विश्वंभर नाथ शर्मा 'कौशिक' की कहानी 'रक्षा बंधन' मानवीय भावों की सहजता, पवित्रय और अनिवर्चनीयता तथा सार्वकालिकता को दर्शाती है। सामाजिक संबंधो में प्रगाढ़ता और उनका अस्तित्व सिर्फ रक्त-संबंध के कारण ही नहीं होता, अपितु इसका आधार मनुष्य मन की वे भावनाएँ होती हैं, जिनको अभिव्यक्त करने के लिए कोई शब्द नहीं होता। 'रक्षा बंधन' भाई-बहिन की स्नेहमयी भावनाओं का रागात्मक संबंध दिखाने वाला पवित्र पर्व है। इस पर्व के सांस्कृतिक रूपा का आधार पोराणिक हो सकता है, पर कौशिक जी की कहानी पूरी तरह सामाजिक परिप्रेक्ष्य को आधार बनाकर रची गयी है।
 
बचपन का भोलापन सरस्वती को रक्षाबंधन के पर्व के दिन उदास कर देता है। एक करूण, स्नेहमयी व्यक्ति घनश्याम उसे इस स्थिति में देखता है और अपना बायाँ हाथ आगे कर देता है सरस्वती उसकी कलाई में लाल डोरा बांधती है। पांच वर्ष बाद एक भिन्न परिस्थिति में दोनो पुनः मिलते हैं। भाई-बहिन का पुनीत संबंध अपनी जगह बना हुआ है। कहानी के मध्य में घटना और संवाद कहानी की रोचकता को बढ़ाते हैं।
 
कहानी वर्तमान समाज में संबंध की टूटन के माहौल में संबंध की प्रगाढ़ता का आदर्श रखती है। लेखक की मान्यता मनुष्य के साहित्यक संबंध पर है। वह संबंध के खरेपन के लिए भावनाओं की पवित्रता और सच्चेपन को महत्वपूर्ण मानता है। कहीं न कहीं सभी मनुष्यों की भावनाएँ ही निर्णापक होती हैं। रक्षाबंधन कहानी में घनश्यामदास सरस्वती से राखी बंधवाता है और यह प्रसंग उसके जीवन ही नही आत्मा का अनिवार्य प्रसंग बन जाता है।
 
कहानी घटनाप्रधान है और घनश्यामदास का केन्द्रीय चरित्र इसे उद्देश्य की उदादत्ता प्रदान करता है। घनश्यामदास संबंधों के निर्वाह को महत्व देता है। अपनी अंतरचेतना में आदर भाव को समाहित किए रहता है। 'रक्षाबंधन' सिर्फ कहानी नहीं है, बल्कि यह भावनाओं की प्रधानता और उसकी महत्ता को घोषित करती है। समाज कितनी भी तेजी से क्यो न बदल जाए, स्थितियो में कितना ही फर्क क्यों न आ जाए, व्यक्ति जीविकार्जन के लिए भिन्न स्थल पर ही क्यों न चला जाए भावनाएँ नहीं बदलनी चाहिए।
 

रक्षा बंधन कहानी की भाषा शैली

भाषा भावो की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है। कौशिक जी प्रेमचंद युगीन कहानी धारा के कहानीकार है। आपकी भाषा में सहजता, सरलता, प्रवाहमयता, बिम्बात्मकता के गुण मिलते है। इनकी भाषा की प्रधान विशेषताएँ है - 
  1. शब्द भंडार : कौशिक जी के गद्य में शब्दगत विविधता मिलती है, श्रावण, स्त्री-पुरुष, आनंद, उत्साह, श्रावण, उत्सव, यजमान, नेत्र, अश्रुपूर्ण, कुद्ध आदि तत्सम् शब्द बाहुल्य में मिलते है। साथ ही काम-काज, इठलान, मुस्कराना, निदला, रट लगाना जैसे शब्द भी मिलते है, जो भाषा को सहजता प्रदान करते है। अपने शब्द की विपुलता से इनकी भाषा प्रवाहमयी और सेप्रेषणीय है—“अंत को बालिका निराश होकर घर के भीतर लौट जाने को उद्धत ही हुई थी कि एक सुंदर युवक की दृष्टि, जो कुछ सोचता हुआ धीरे-धीरे जा रहा था, बालिका पर पड़ी।" 
  2. संवाद-योजना : कौशिक जी के संवाद संक्षिप्त, एवं चुस्त है। संवाद भावों के गंथन और घर्षण का कार्य करते हैं। इनसे पात्रों के सभी भाव सहन रूप से अभिव्यक्ति पाते हैं।भाव की मनोरमता और पद की सहजता दोनों का सामान्य संप्रेषक कौशिक जी की भाषा की विशेषता है। 
  3. वर्णनात्मकता : कहानीकार किन्हीं स्थलों पर वर्णन भी करता चलता है। ये स्थल नीरस था बोझिल नहीं है, अपितु कहानी के विकास में सहायक हैं। इनसे घटना का संकेत मिलता है और कहानी के विकास को गति मिलती है “गोलागंज (लखनऊ) की एक बड़ी तथा सुंदर अट्टालिका के एक सुसज्जित कमरे में एक युवक चिंता सागर में निमग्न बैठा है। कभी वह ठंडी सांस भरता है, कभी रूमाल से आंखे पोंछता है।" 
  4. चित्रात्मकता: कौशिक जी की भाषा चित्र-प्रधान है। कहानी की चित्र योजना घटनाओं को घटित होते हुए दिखाती हैं - 'तुझे दोनो लेने होंगे यह कहकर युवक ने बल-पूर्वक पैसे तथा रूपये बालिका के हाथ पर रख दिये। 
  5. अभिधार्थता: कौशिक जी ने अभिधा शब्दशक्ति का प्रयोग कर के भाषा की शक्ति को उद्दघाटित किया है जो भई वाह! अच्छी राखी है। लाली डोरे को राखी बताते हो। यह किसने बांधी है ? किसी बड़े कंजूस ब्राह्मण ने बांधी होगी। दुष्ट ने एक पैसा तक खरचना पाप समझा। डोरे ही से काम निकाला। भाषा की धन्यात्मथता, अभिधार्थता और शब्द भंडर सभी कुछ कौशिक जी भाषा के सौंदर्य को बढ़ाते हैं। 

रक्षा बंधन कहानी में सामाजिक यथार्थ निरूपण

रक्षाबंधन कहानी भारतीय सांस्कृतिक पर्व 'राखी' को अपनाकर अपने भावों को अभिव्यक्त करती है। यह कहानी सरस्वती की भावनाओं के प्रवाह को दिखाती है और रक्षाबंधन पर्व की मूल्य धर्मिता को स्पष्ट करती है। भारतीय समाज में अमरकांत और सरस्वती का स्नेह रक्षाबंधन के पर्व की पवित्रता और सार्वकालिकता को स्पष्ट करत है। अमरकांत को सरस्वती ने राखी के अवसर पर लाल डोरा बांधा। यह लाल डोरा रक्षाबंधन पर्व की सांकेतिकता को दिखाता है। इस डोरे का स्नेह, भावात्मक लगाव दोनों के अलग होने के बाद भी बना रहता है। घनश्यामदास सरस्वती से पाँच वर्ष के अंतराल के बाद मिलता है और फिर भी दोनो एक दूसरे को पहचान ही नहीं लेते, इस अटूट बंधन में भावात्मकता लगाव भी अनुभव करते हैं।
 
कहानी में यह पंक्तियाँ घनश्यामदास का मित्र अमरकान्त कहता है। वह वस्तुस्थिति से अनभिज्ञ है, अतः घनश्याम से सहज विनोद भाव के कारण यह सारी बातें कह जाता है। सामाजिक जीवन में भावात्मक लगाव की स्थितियों को इन पंक्तियों के माध्यम से जाना जा सकता है। अमरकांत विस्मित हो काष्ठवत् बैठे रहे। अंत को कुछ क्षण उपरांत 
बोले-उफ़, ईश्वर की बड़ी विचित्र महिमा है। जिनके लिए तुमने न जाने कहाँ-कहाँ की ठोकरें खाईं अंत में इस प्रकार मिले। 

इस कहानी की नायिका सरस्वती, नायक घनश्यामदास और सहायक पात्र अमरकांत कहानी को चरम विकास की ओर उन्मुख करते हैं। कहानी में चरित्र से अधिक महत्वपूर्ण कथानक का घटना वैचित्र्य है। कहानीकार इसी घटना-वैचित्र्य के आधार को लेकर ताना-बाना बुनता। कहानी की उपर्युक्त पंक्तियाँ घटना-व्यापार की इसी महत्ता को स्थापित करती हैं। कहानी का आरंभ भी 'श्रावण की धुम-धाम है। नगरवासी स्त्री-पुरुष बड़ें आनंद तथा उत्साह से श्रावणी का उत्सव मना रहे हैं।' इस कहानी का अंत भी इसी श्रावणी उत्सव से होता है। 'श्रावण का महीना है और श्रावणी का महोत्सव।घनश्यामदास की कोठी खूब सजायी गयी है।' इस तरह कहानी की उपर्युक्त पंक्तियाँ भी रक्षाबंधन के सूत्र बिंदु को ही स्पष्ट करती है।

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