स्त्री विमर्श की अवधारणा का उद्भव एवं विकास

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स्त्री विमर्श की अवधारणा का उद्भव एवं विकास स्त्री विमर्श की अवधारणा एवं स्वरूप एक ऐसा विषय है जो आधुनिक समाजशास्त्र, साहित्य और दर्शनशास्त्र के केंद्

स्त्री विमर्श की अवधारणा का उद्भव एवं विकास

स्त्री विमर्श की अवधारणा एवं स्वरूप एक ऐसा विषय है जो आधुनिक समाजशास्त्र, साहित्य और दर्शनशास्त्र के केंद्र में स्थित है, जहां स्त्री की स्थिति, अधिकारों और पहचान को केंद्र में रखकर चर्चा की जाती है। स्त्री विमर्श मूल रूप से उस चिंतन प्रक्रिया को संदर्भित करता है जो पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री की दमित अवस्था को चुनौती देती है और उसे मुक्ति, समानता तथा आत्मनिर्भरता की दिशा में ले जाती है। यह अवधारणा पश्चिमी फेमिनिज्म से प्रेरित है, लेकिन भारतीय संदर्भ में इसका स्वरूप अधिक विविध और सांस्कृतिक रूप से अनुकूलित है, जहां धार्मिक, सामाजिक और ऐतिहासिक परंपराओं का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। स्त्री विमर्श न केवल स्त्री की शोषित स्थिति पर प्रकाश डालता है, बल्कि पुरुष-प्रधान समाज की संरचनाओं को भी प्रश्नांकित करता है, जिससे एक नई सामाजिक व्यवस्था की कल्पना की जा सकती है।

स्त्री विमर्श की अवधारणा का उद्भव एवं विकास

स्त्री विमर्श की अवधारणा का उद्भव एवं विकास
स्त्री विमर्श की अवधारणा का जन्म उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में हुआ, जब पश्चिम में मैरी वोलस्टोनक्राफ्ट, सिमोन द बोउवार और अन्य विचारकों ने स्त्री की द्वितीयक स्थिति को चुनौती दी। बोउवार की प्रसिद्ध कृति "द सेकंड सेक्स" में स्त्री को "दूसरा" कहा गया है, जो पुरुष की छाया में जीती है। भारतीय संदर्भ में यह अवधारणा स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उभरी, जब महात्मा गांधी, राजा राममोहन राय और ज्योतिबा फुले जैसे समाज सुधारकों ने सती प्रथा, बाल विवाह और विधवा पुनर्विवाह जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया। लेकिन वास्तविक स्त्री विमर्श का विकास 1970 के दशक में हुआ, जब फेमिनिस्ट आंदोलन ने वैश्विक स्तर पर गति पकड़ी। भारत में यह दलित स्त्री विमर्श, आदिवासी स्त्री विमर्श और मुस्लिम स्त्री विमर्श जैसे उप-विषयों में विभाजित हो गया, जो दर्शाता है कि स्त्री की समस्या एकरूप नहीं है, बल्कि वर्ग, जाति और धर्म से प्रभावित है। अवधारणा के मूल में यह विचार निहित है कि स्त्री का शोषण केवल शारीरिक या आर्थिक नहीं, बल्कि भाषाई, सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी होता है, जहां स्त्री को वस्तु के रूप में चित्रित किया जाता है।

स्त्री विमर्श का बहुआयामी स्वरूप

स्त्री विमर्श का स्वरूप बहुआयामी है, जो साहित्य, राजनीति, शिक्षा और मीडिया में विभिन्न रूपों में प्रकट होता है। साहित्य में यह स्वरूप विशेष रूप से प्रभावशाली है, जहां लेखिकाएं जैसे महादेवी वर्मा, इस्मत चुगताई, अमृता प्रीतम और मन्नू भंडारी ने अपनी रचनाओं में स्त्री की आंतरिक पीड़ा, इच्छाओं और विद्रोह को अभिव्यक्त किया। उदाहरणस्वरूप, चुगताई की कहानी "लिहाफ" में समलैंगिकता और दमित यौनिकता पर चर्चा की गई है, जो पितृसत्ता की सीमाओं को तोड़ती है। स्वरूप के संदर्भ में स्त्री विमर्श को तीन लहरों में विभाजित किया जा सकता है: पहली लहर में मताधिकार और कानूनी समानता पर जोर, दूसरी में यौनिकता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, तथा तीसरी में इंटरसेक्शनलिटी, जहां लिंग के साथ जाति, वर्ग और नस्ल को जोड़ा जाता है। भारतीय स्वरूप में यह और अधिक जटिल है, क्योंकि यहां वैदिक काल से ही स्त्री को देवी के रूप में पूजा जाता रहा है, लेकिन वास्तविक जीवन में उसे अधीन रखा गया। रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में सीता और द्रौपदी की छवियां स्त्री की सहनशीलता को दर्शाती हैं, जबकि आधुनिक स्त्री विमर्श इन्हें पुनर्व्याख्या कर विद्रोही रूप देता है।समाज में स्त्री विमर्श का स्वरूप आंदोलनों के माध्यम से उभरता है, जैसे निर्भया कांड के बाद का मीटू आंदोलन, जिसने यौन हिंसा पर वैश्विक बहस छेड़ी। यह स्वरूप शिक्षा में भी दिखाई देता है, जहां लिंग संवेदनशील पाठ्यक्रम विकसित किए जा रहे हैं, ताकि बालिकाओं को अपनी पहचान बनाने का अवसर मिले। आर्थिक स्वरूप में स्त्री विमर्श श्रम बाजार में असमानता, वेतन भेद और घरेलू श्रम की मान्यता पर केंद्रित है, जो दर्शाता है कि स्त्री का योगदान अक्सर अदृश्य रहता है। सांस्कृतिक स्वरूप में यह मीडिया की स्त्री छवियों को चुनौती देता है, जहां विज्ञापनों और फिल्मों में स्त्री को सौंदर्य की वस्तु बनाया जाता है। हालांकि, सकारात्मक स्वरूप भी है, जहां स्त्री विमर्श ने महिलाओं को राजनीति में स्थान दिया, जैसे इंदिरा गांधी और ममता बनर्जी जैसी नेत्रियों के उदय से। लेकिन चुनौतियां बनी हुई हैं, जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में पितृसत्ता का मजबूत प्रभाव, जहां स्त्री विमर्श अभी भी प्रारंभिक स्तर पर है।

चुनौतियाँ एवं वर्तमान स्थिति

निष्कर्ष रूप में, स्त्री विमर्श की अवधारणा और स्वरूप एक गतिशील प्रक्रिया है जो समाज को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में कार्य करती है। यह न केवल स्त्री की मुक्ति का माध्यम है, बल्कि पूरे समाज की प्रगति का आधार भी। भविष्य में इसका स्वरूप और अधिक विस्तृत होगा, जहां ट्रांसजेंडर और क्वीयर मुद्दों को शामिल किया जाएगा, ताकि लिंग की अवधारणा को पुनर्परिभाषित किया जा सके। अंततः, स्त्री विमर्श एक क्रांति है जो समानता की नींव पर टिकी है, और इसका प्रभाव हर क्षेत्र में महसूस किया जा रहा है।

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