गाथा | पी वत्सला को समर्पित

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गाथा | पी वत्सला को समर्पित खुले हुए झरोखे के पास टीचर एकटक खड़ी थीं।पत्थर की तरह स्थिर।“इधर-उधर” नज़र डालते हुए अप्पू मास्टर वहाँ से गुज़र गए।इन दिनो

गाथा | पी वत्सला को समर्पित

खुले हुए झरोखे के पास टीचर एकटक खड़ी थीं।पत्थर की तरह स्थिर।“इधर-उधर” नज़र डालते हुए अप्पू मास्टर वहाँ से गुज़र गए।इन दिनों टीचर के भीतर असह्यता बढ़ती ही जा रही थी।बातचीत लगभग बंद।इंटरव्यू पूरी तरह ठुकरा दिए गए थे।नाममात्र का भोजन करने के बाद वे चुप्पी को चबाती हुई खड़ी रहतीं—शायद पुराने “धान के दिनों” की स्मृति में।कभी-कभी ताज़ा जूस पी लेतीं।वही एकमात्र राहत थी।अप्पू मास्टर ने लंबी साँस ली।

पहर दर पहर झरते जा रहे थे।टीचर अब भी उसी शिलावत् मुद्रा में।बिछाई हुई चारपाई भी एक और पत्थर बनकर मौन में लंबी पड़ी थी।मन में ठहराव था—उबाऊपन की पराकाष्ठा।

“लेटेंगी नहीं?”
उन्होंने पूछा।

असह्यता भारी हो चली थी,इसलिए अप्पू मास्टर ने साहस बटोर कर पूछा।मौन टूटा—ईर्ष्या भरी कठोरता के साथ
टीचर का उत्तर किसी प्रहार-सा पड़ा—“नहीं!”

गाथा | पी वत्सला को समर्पित
अप्पू मास्टर बिना कुछ कहे शयनकक्ष की ओर चले गए।‘अस्किता’ के बाद से वे अलग कमरे में सोते थे।होम नर्स रखने की बात उन्होंने कही थी।पर टीचर की सहमति चाहिए थी।ज़रूरी काम निपटाने की ‘क्षमता’अब भी उनके भीतर मौजूद थी।

“ज़रूरत नहीं!”टीचर ने कड़क आवाज़ में कहा।

अप्पू मास्टर ने विरोध नहीं किया।जिद तो टीचर की पुरानी आदत थी।आज भी याद है—गोद में शिशु लिए वायनाड की चढ़ाई चढ़ जाना।“धान लेकर ही लौटेंगे”—यही जिद।भय और क्लेश में बीते वे दिन।आख़िर जिद जीत गई।बीज धान की गठरियाँ उठाकर लौटते समय टीचर उस उपजाऊ जंगल-माटी की तरह आनंद से लहलहा उठी थीं।

मलयालम भाषा ने वायनाड की धरती की ‘तीख़ी गंध’ जानी। सफेद चमड़ी वाले शोषकों के अट्टहास सुने और काँप उठी। काले लोगों के भीतर की पीड़ा से जलती रही। अपमानों से जूझते-जूझते मलयाली चेतना में स्थायी हो गई—
और अब वह सब एक धुँधली होती स्मृति मात्र है।

अप्पू मास्टर ने फिर एक साँस छोड़ी। स्मृतियाँ मरती नहीं। स्मृति-खिड़की खोलकर, रुग्ण शय्या को पूरी तरह अनदेखा करती हुई टीचर ग्रीष्म में कदम रखती हैं।

नट्टपारा की तपती दोपहर।बच्चों के अधिकारों का आंदोलन।कमर कसकर लुंगी चढ़ाए जंगली बिल्लियों-सी आँखों वाले लड़कों की उग्र जुलूस।

“तुम किधर जा रही हो, वत्सला?”सहेली की जिज्ञासु आँखें हैरानी से भर उठती हैं।

लड़के—आँख-कान बंद किए हुए उन्माद में डूबे।प्रदर्शन उफान पर है।लड़कियाँ—घर लौटने की जल्दी में।आंदोलन उनके लिए नहीं बताया गया था। भागने के सिवा दौड़ना, कूदना जैसी कोई सक्रिय क्रिया—यहाँ तक कि ऊँची आवाज़ में बोलना भी लड़कियों के लिए वर्जित था। ज़ोर से हँसना तक अपथ्य! उसे वेश्यावृत्ति की ओर जाने की सीढ़ियाँ माना जाता था। फिर वत्सला क्यों आंदोलन की ओर बढ़ रही है? फालतू किताबें पढ़ने का असर!

सहेली ने यथासंभव उसे सदाचार सिखाने की कोशिश की— कुछ भारी मन से। “मुझे भी आंदोलन करने का अधिकार है।”वत्सला बिना झिझक जुलूस में घुस गई। सहेली आँखें फैलाए पीछे हट गई।दरवाज़े से टेक लगाकर
आँखें मूँद लीं।

“मुझसे यह सब देखा नहीं जाता…”उसके होंठ काँप उठे।

वत्सला सिर ऊँचा किए जुलूस में आगे बढ़ती गई। अचानक जुलूस पर सन्नाटा जम गया। नारे लगाने वाले गले मौन में गद्गद हो उठे। भिंची हुई मुट्ठियाँ अपने-आप ढीली पड़ गईं। छात्र-नेता शेर तक पसीना बहाने लगे। तभी वत्सला ने
गर्दन सीधी की और स्वर खोल दिया। अधिकारों के नारे एक नए ताल में उठे। क्षण भर में वे प्रतिध्वनियों में बदल गए।

आवेग की आँच में वत्सला और ऊँची हो गई। आंदोलनों ने उसकी दृष्टि तेज़ कर दी। संपन्न समाज द्वारा हाँके गए आदिम मनुष्य—उनके चेहरों पर हरी मिट्टी का सत्य और नैतिकता उभर आई। अक्षरों के ध्वज थामे मलयालम की धरती ने कुलीन चौखटें तोड़ दीं।

स्मृतियाँ—कभी बूढ़ी न पड़ने वाली स्मृतियाँ।उनके सहारे टीचर ने अपने लिए रखी गई रुग्ण शय्या को उपेक्षा से देखा।उस दृष्टि को सह न पाकर चारपाई ने अत्यंत विनम्रता से मानो कहा— “ज़रा लेट जाइए, टीचर…कब से मैं यूँ अकेली पड़ी हूँ…”स्मृतियों की जीवंत शक्ति पर टिके टीचर डगमगाईं नहीं। रुग्ण शय्या अपने-आप ऊँघने लगी।जलते, दहकते पुरुष-सूर्य के गर्व के सामने चेतावनी की तनी हुई उँगली-सी टीचर अडिग खड़ी रहीं।

“नहीं।
वत्सला गिरेगी नहीं!”

अप्पू मास्टर की आँखें भर आईं। उन्होंने चुपचापआँसू पोंछ लिए।                                

टिप्पणी: पी. वत्सला — मलयालम साहित्य की एक प्रसिद्ध उपन्यासकार और कथाकार हैं।‘नेल्लु’ आदि उपन्यासों के माध्यम से उन्होंने आदिवासी जीवन को मलयाली समाज के समक्ष अत्यंत सशक्त और प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।

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