काश वह लौट सके | ग्रामीण संस्मरणात्मक कहानी गर्मी के दिन थे। लू के थपेड़े शहर की दीवारों से टकरा रहे थे, जब रोहित सिंह अपने गाँव से पढ़ाई के लिए बरेल
काश वह लौट सके | ग्रामीण संस्मरणात्मक कहानी
गर्मी के दिन थे। लू के थपेड़े शहर की दीवारों से टकरा रहे थे, जब रोहित सिंह अपने गाँव से पढ़ाई के लिए बरेली नगर के पास आकर रहने लगा। कंधे पर छोटा-सा बैग था, पर दिल में माँ-बाप की उम्मीदें, खेतों की हरियाली और घर की जिम्मेदारियाँ भरी थीं।
वह अकसर खुद को समझाता—
इंटरमीडिएट के बाद पढ़ाई ज़रूरी है। हम कोई बी.ए. करने थोड़ी आए हैं। इंजीनियर बनेंगे। अधिकारी न सही, जूनियर इंजीनियर तो बन ही जाएँगे।
पर दिल हर रोज़ गाँव की ओर खिंच जाता।
एक शाम गेट पर नज़र पड़ी। सामने से उसका मित्र आ रहा था—उम्र में थोड़ा बड़ा। रोहित उसे आदर से “दद्दा” कहता था।
“दद्दा, थैले में क्या है?”
“सब्जी है भाई, आज कुछ घर जैसा बनेगा।”
छोटी-सी रसोई में सब्जी की खुशबू फैल गई। दोनों फर्श पर बैठकर खाने लगे।
एक कौर लेते ही रोहित बोल उठा—
“दद्दा, बिल्कुल घर जैसी सब्जी है।”
शब्द वहीं थम गए।
उसकी आँखों के सामने गाँव उतर आया—आँगन में नींबू का पेड़, गर्मियों में नहर का ठंडा पानी, माँ का डाँटना कि इंटर में आ गया है और अभी भी छोटी बहन के साथ लंगड़ी खेलता है!लाला की दुकान से जीरा लाने के लिए मिले बीस रुपये और उसका न सुनना—सब कुछ जैसे जी उठा।इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान एक दिन उसे ख़बर मिली—उसे उनतीस–तीस हज़ार रुपये की स्कॉलरशिप मिली है।पहली बार इतनी रकम अपने नाम पर देखकर वह बेहद खुश हुआ।मन में सपनों की कतार लग गई— एक अच्छा मोबाइल, कलाई में HMT की घड़ी,नई जींस-शर्ट,थोड़ा-सा शहरी ठाठ। पर खुशी ज्यादा देर टिक न सकी। आँखें बंद करते ही घर सामने आ गया— छोटे भाई ऋतिक की स्कूल फीस, पिता का वह कर्ज जो उन्होंने महाजन लाला से लिया था, और बहन की शादी की चिंता, जिसका जिक्र घर में धीमी आवाज़ में होता था।जिस पैसे से वह अपने शौक पूरे करना चाहता था,उसी पर जिम्मेदारियों की परछाइयाँ पड़ गईं।
उस रात उसने खुद से कहा— शौक तो रुक सकते हैं…पर परिवार नहीं।स्कॉलरशिप की रकम अब उसे चमकती नहीं लगी। वह उसे पिता की खामोश मेहनत,माँ की बिना कहे दुआओं और गाँव की उम्मीदों जैसी लगी। रात में दद्दा ने उसकी चुप्पी तोड़ी। “गाँव याद आ रहा है न?”रोहित ने सिर झुका लिया। दद्दा बोले—“शहर पेट भर देता है,
पर आत्मा आज भी गाँव में ही सांस लेती है।”
अगली सुबह छत से उगता सूरज देखा। वही सूरज—पर न चिड़ियों की चहचहाहट थी, न मिट्टी की सौंधी गंध।क्लास में किताबें खुली थीं, पर हर पन्ने के पीछे उसे खेतों की मेड़ और माँ का चेहरा दिखता रहा।
एक दिन यूँ ही रोहित अपने मित्र से बातें करते हुए बोला—“दद्दा, आजकल सड़क सुविधाओं का इतना विकास हो रहा है कि लगता है कोई गाँव अब अछूता नहीं रहेगा। चाहे मेरा गाँव घुंघचाई हो या तुम्हारा गांव कड़इया—सब जगह पक्की सड़कें, बिजली, नेटवर्क… ऐसा लगता है मानो विकास में अब कोई गाँव महानगर से कम नहीं रहा।”
फिर वह थोड़ी देर चुप हो गया।“लेकिन एक बात है यार…”उसकी आवाज़ धीमी हो गई।
“हमारे बचपन में न पक्की सड़कें थीं, न बिजली की झिलमिलाती लाइटें। रात में अँधेरा जरूर होता था, पर उस अँधेरे में जो जुगनू चमकते थे, वो क्या ही सुंदर लगते थे। कभी उन्हें मुट्ठी में बंद कर लेते, कभी छोड़ देते। उनकी वो हल्की रोशनी… आज के बच्चे क्या महसूस कर पाएँगे?”
दद्दा ने धीरे कहा—
“विकास ज़रूरी है रोहित,
पर यादें अगर बुझ जाएँ,
तो रोशनी भी अधूरी लगती है।”
रोहित चुप रहा।उसकी आँखों में उस रात के जुगनू फिर से चमक रहे थे। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान जब रोहित सिंह को पहली बार लगभग उनतीस–तीस हज़ार रुपये की स्कॉलरशिप मिली, तो उसका मन खुशी से भर उठा।
इतनी बड़ी रकम उसने एक साथ पहले कभी अपने नाम पर नहीं देखी थी।
मन ही मन सपनों की एक लंबी कतार लग गई—एक अच्छा-सा मोबाइल,कलाई में चमकती HMT की घड़ी,नई जींस-शर्ट,शहर में रहने का थोड़ा सा ठाठ।उसे लगा, अब वह भी दूसरों की तरह खुलकर जी सकता है।पर यह खुशी ज्यादा देर टिक नहीं सकी।जैसे ही उसने आँखें बंद कीं,उसके सामने घर उभर आया।छोटे भाई ऋतिक की स्कूल फीस—जो समय पर भरनी थी।पिता का वह कर्ज—जो उन्होंने महाजन लाला से लिया था,और जिसे चुकाने की चिंता अक्सर उनकी चुप्पी में झलक जाती थी।
बहन की शादी—जिसका जिक्र घर में धीरे-धीरे, संकोच के साथ होता था।रोहित का मन भारी हो गया।जिस पैसे से वह अपने शौक पूरे करना चाहता था,उसी पैसे पर अब जिम्मेदारियों की परछाइयाँ गिरने लगीं।उसने खुद से कहा—शौक तो बाद में भी पूरे हो सकते हैं…पर परिवार का बोझ अभी का है।उस रात उसने स्कॉलरशिप के पैसों को बार-बार देखा।वह रकम अब उसे चमकती नहीं लगी—वह उसे अपने पिता की मेहनत,माँ की चुप दुआओंऔर गाँव की उम्मीदों जैसी महसूस होने लगी।
शहर ने उसे सपने दिखाए थे,पर गाँव ने उसे जिम्मेदार बना दिया था।काश वह लौट सके रोहित जब शहर की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी को देखता, तो अक्सर सोच में पड़ जाता।यहाँ सब कुछ है—तकनीक, सुविधाएँ, पैसा, भविष्य के सपने।
पर इन सबके बीच कहीं इंसान खुद ही पीछे छूट गया है।शहर में रिश्ते भी समय देखकर निभाए जाते हैं।ज़रूरत पड़ी तो आवाज़ दी,काम निकलते ही चुप्पी ओढ़ ली।यहाँ कोई किसी का नहीं,जब तक कोई काम अटका न हो।गाँव की याद आते ही मन भर आता।वहाँ लोग ज़्यादा पूछते थे,ज़्यादा टोकते थे,कभी-कभी तो निजी बातों में भी दख़ल दे बैठते थे।पर उस दख़ल में अपनापन होता था—बिना स्वार्थ, बिना मतलब।एक दिन शहर में पास ही रहने वाले गंगवार साहब का गैस सिलेंडर खत्म हो गया। रोहित की छुट्टी थी।वह गली में यूँ ही टहल रहा था कि गंगवार साहब ने उसे रोक लिया—“रोहित, आज ज़रा मेरा सिलेंडर एजेंसी से ले आओगे?मुझे थोड़ा ज़रूरी काम है।”रोहित ने मना नहीं किया।उसे लगा—छोटा-सा काम है, कौन-सा पहाड़ टूट पड़ेगा।सिलेंडर उठाए वह पसीने से भीग रहा था।हाथों में वजन था,और दिल में एक अजीब-सी चुभन।
उसे याद आया—कुछ दिन पहले गंगवार साहब के छोटे भाई की तिलक की रस्म हुई थी।पूरी गली को खबर थी।लोग आए, गए, खाए-पिए।पर रोहित को किसी ने बुलाना ज़रूरी नहीं समझा।जिसके घर की खुशी में वह शामिल होने लायक नहीं था,आज उसी के लिए वह बोझ ढो रहा था।
उस पल उसे समझ आया—शहर में इंसान की क़ीमत उसके काम से आँकी जाती है।उसकी आँखों के सामने गाँव घूम गया।वहाँ तो किसी के घर खुशी हो या ग़म,बिना बुलाए लोग पहुँच जाते थे। और अगर कोई न आए,तो अगली मुलाक़ात में शिकायत ज़रूर मिलती—“अरे, आए क्यों नहीं?”शहर की रोशनी में खड़ा रोहित गाँव के अँधेरे को तरस गया।वहाँ अँधेरा होता था,पर रिश्तों में उजाला था।यहाँ हर तरफ़ रोशनी है—पर दिलों में साया।उस शाम उसे जुगनू याद आए।
बिना बिजली, बिना स्विच,फिर भी अँधेरे में चमकते हुए। शायद रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं—जिन्हें दिखावे की रोशनी नहीं,सच्चे अँधेरे में चमकने का साहस चाहिए।रोहित देर तक खड़ा रहा। शहर चलता रहा। और उसके भीतर गाँव
और भी गहराई से बसता चला गया।
कभी-कभी किसी खास दिन या छुट्टी वाले दिन रोहित सिंह के सारे दोस्त इकट्ठा हो जाते।वही दिन होते,जब शहर थोड़ी देर के लिए गाँव-सा लगने लगता।छोटी-सी छत या किसी कमरे में हँसी का मेला लग जाता।विवेक कुशवाहा,राजपाल सिंह—जिसे सब प्यार से “दद्दा” कहते,योगेन्द्र, हरिज्ञान, त्रिपाठी,विशाल, जितेन्द्र—सब अपने-अपने रंग लेकर आते।
विशाल सबसे अलग।हमेशा हँसमुख,हर बात में मज़ाक,हर चुप्पी को ठहाके में बदल देने वाला।किसी की थकान देख ले,तो दो बातें में ही मुस्कान लौटा दे।और उसके बिल्कुल उलट विवेक।ज़रा-सी बात पर रूठ जाने वाला,पर भीतर से उतना ही सच्चा।रूठता भी उन्हीं से था,जिनसे अपनापन होता है।हँसी-मज़ाक के बीच अक्सर कोई न कोई बात ऐसी हो जातीकि विवेक चुप हो जाए।कमरे में अचानक सन्नाटा छा जाता। विशाल ताना मारता—“लो, फिर मान मनौवल का कार्यक्रम शुरू!”कोई चाय बना देता,कोई पुराने किस्से छेड़ देता,तो कोई गाँव की बातें शुरू कर देता—और थोड़ी देर में विवेक की नाराज़गी अपने-आप पिघल जाती।
वह हँसी,वह रूठना-मनाना,बिना किसी स्वार्थ के—रोहित को अपने गाँव की चौपाल याद दिला देता। वहाँ भी तो ऐसा ही होता था।कोई रूठता था,तो पूरा टोला मनाने आ जाता था।यहाँ शहर में,बस यही दोस्त थे जो उस खालीपन को भर देते थे।
उन पलों में रोहित महसूस करता—शहर में रहते हुए भी अगर अपने मिल जाएँ,तो दिल थोड़ी देर के लिए घर पहुँच जाता है। शायद इसी वजह से वह उन छुट्टियों का इंतज़ार करता था—जब किताबें बंद हों,ज़िम्मेदारियाँ कुछ देर को थम जाएँ,और दोस्त उसके जीवन में जुगनुओं की तरह चमक उठें।
शाम को उसने माँ को फोन लगाया।
“माँ…”
“आ गया मेरा इंजीनियर?”
इतना सुनते ही रोहित की आँखें भर आईं।
माँ बोलीं—
“बेटा, आगे बढ़ना ज़रूरी है।
पर अपनी जड़ों को मत भूलना।
गाँव वहीं है… तेरा इंतज़ार करता हुआ।”
फोन कट गया, लेकिन रोहित के भीतर कुछ जुड़ गया।उसने तय किया—वह पढ़ेगा, आगे बढ़ेगा, सपने पूरे करेगा,
पर गाँव को कभी पीछे नहीं छोड़ेगा। हर छुट्टी में लौटेगा,हर पेड़, हर रास्ते को याद रखेगा। क्योंकि कुछ जगहें छोड़ी जा सकती हैं…पर भुलाई नहीं जातीं।काश वह लौट सके—न सिर्फ़ गाँव,बल्कि अपने उसी सरल, सच्चे रूप के पास जहाँ से वह चला था।
रजत विश्वनाथ त्रिपाठी समकालीन हिन्दी साहित्य के युवा रचनाकार हैं। शिक्षा - इलाहाबाद राज्य विश्वविद्यालय, इलाहाबाद के विश्वविद्यालय परिसर से हिन्दी साहित्य में परास्नातक शिक्षा प्राप्त की है। लेखक का मूल निवास कटरा, जनपद शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) है। रचनाओं में सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण जीवन और मानवीय संवेदनाओं का सजीव चित्रण मिलता है। मो. 9058344432 ई-मेल: rajattripathi651@gmail.com


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