आओ रील बनाएं भाई, कुछ करना पड़ेगा!” “क्या?” “रील बनानी पड़ेगी!” अब कर्म का नहीं, क्लिप का युग है। जो रील बनाता है, वही असली ‘रोल मॉडल’ है। बाकी
आओ रील बनाएं
भाई, कुछ करना पड़ेगा!”
“क्या?”
“रील बनानी पड़ेगी!”
अब कर्म का नहीं, क्लिप का युग है। जो रील बनाता है, वही असली ‘रोल मॉडल’ है। बाकी सब बेरोजगार, असफल और बोरिंग माने जाते हैं।
गाँव के मोड़ पर बैठा पप्पू, जो कल तक चौधरी के खेत में काम करता था, आजकल कैमरे के आगे मुँह बनाकर “ट्रेंडिंग ऑडियो” पर लिप-सिंक करता है। लोग पूछते हैं, “अबे काम-धंधा क्या करता है?”पप्पू छाती ठोककर कहता है , “इंफ्लुएंसर हूँ! गाँव का पहला कंटेंट क्रिएटर!”
दूसरे दिन जब वह नाचते हुए “तेरी मेरी कहानी…” पर रील डालता है, तो चार लाइक और एक कमेंट आता है। “भाई, बैकग्राउंड में भैंस दिख रही है। पप्पू गर्व से जवाब देता है — “नेचुरल शूट है भाई, हम तो रॉ फील देते हैं।”
उसी भैंस ने उसे गाँव के बच्चों में स्टार बना दिया है। बच्चे कहते हैं — “देखो, वही भैंस जो रील में आई थी!”भैंस अब कैमरा देखते ही सींग चढ़ा देती है।उसे भी ‘फेमस’ होने का चस्का लग गया है।
शहर में, ऑफिस का हर कर्मचारी अब दो जिंदगी जीता है।एक रियल, दूसरी रील। सुबह बॉस से डाँट खाई, तो शाम को “मोटिवेशनल वीडियो” डाल देता है। “कभी हार मत मानो, सफलता बस एक रील दूर है।”
सच्चाई ये है कि बॉस ने उसी दिन कहा था। “तू काम में ढील देता है, रील नहीं।”
कॉफी कैफे अब ‘कंटेंट जोन’ बन चुके हैं।जहाँ कभी लोग अखबार पढ़ते थे, अब वहीं कैमरा ट्राइपॉड टिके हैं।लोग सिप लेकर नहीं, सिप दिखाकर पीते हैं । ताकि वीडियो में “स्मोकी कॉफी इफेक्ट” आए।
एक लड़की हर टेबल पर बैठकर कह रही थी ।“एक बार फिर शूट करो न यार, कप सही से पकड़ नहीं आया!”
वेटर बोला,“मैडम, कप में अब कॉफी नहीं है।”
लड़की ने कहा ,“तो क्या हुआ, फिल्टर डाल देंगे!”
अब तो माँ-बाप भी शामिल हो गए हैं इस नए धर्म 'रील धर्म में!' पहले माँ चिल्लाती थी , “मोबाइल रखो और पढ़ाई करो।”अब वही कहती है ,“बेटा, वो ‘भाभी वाला ट्रेंड’ डाल न, तेरे अंकल देखना चाहते हैं।”
यहाँ तक कि पिता जी, जो कल तक कैमरे के सामने झिझकते थे, अब “कपल ट्रेंड” में पत्नी के साथ डायलॉग बोलते हैं ,“हम तो बस तुम्हारे हैं।”पीछे से बेटे की आवाज आती है , “कट! पापा थोड़ा और फीलिंग दो न!”
दुनिया अब एक्टिंग की नहीं रही । अब सब रीलिंग में है।हर घर में अब एक ‘रीलिंग रूम’ बन चुका है, जिसमें लाइट, ट्राइपॉड और दर्पण साथ रहते हैं , जैसे किसी मंदिर में दीपक और मूर्ति।मोबाइल अब देवता है, और लाइक अब प्रसाद।हर शहर, हर कस्बे में एक न एक ‘रील गुरु’ मिल जाएगा।
ऐसे ही एक गुरु हैं ,“श्री श्री कंटेंटानंद जी महाराज।”वे हर क्लास में कहते हैं , “रील बनाओ, फेम पाओ। जो नहीं बना रहा, वो पिछड़ रहा।”
उनका नियम बड़ा स्पष्ट है —
1. रोज़ एक रील, नहीं तो फॉलोअर्स कम होंगे।
2. खाने से पहले फोटो, सोने से पहले शूट।
3. जीवन में कुछ न हो, तो डायलॉग डालो — “ज़िंदगी भी क्या चीज़ है।”
लोग अब आध्यात्म नहीं, एल्गोरिद्म पूछते हैं।
कब पोस्ट करें? कौन सा ट्रेंड चलेगा?
“गुरुजी, अगर मेरा वीडियो वायरल न हुआ तो?”“बेटा, कर्म करते रहो,कंटेंट बुरा नहीं होता, टाइमिंग खराब होती है।”
अब तो मौत भी इंस्टा पर लाइव हो सकती है।किसी की बाइक फिसल जाए, लोग पहले कैमरा निकालते हैं ,“भाई, कंटेंट बन जाएगा।”सहानुभूति पीछे, व्यूज़ आगे।
पिछले हफ्ते के वायरल वीडियो में दिखा । एक आदमी नदी में डूब रहा था और दूसरा चिल्ला रहा था , “भाई तैर नहीं सकता, लेकिन कंटेंट तैर रहा है!”लोगों ने लिखा ,“ओएमजी, क्या रियल मोमेंट है!”कमेंट्स में किसी ने लिखा ,“सोल फॉर साउंड ट्रेंडिंग है।”
इंसान अब इंसान नहीं, इंस्टान हो गया है ,जो हर क्षण पोस्ट करने की बेचैनी में जीता है।हर भावना अब एंगल ढूँढती है, “रोना है तो कैमरे की ओर देख कर रोओ।”
इस काम में अब नेता भी पीछे नहीं हैं। उनकी रैलियों में भाषण कम, रील ज्यादा बनती है।“देश बदल रहा है” वाले डायलॉग के साथ स्लो-मोशन में झंडा लहराते हैं।पीछे गाना चलता है , “लॉन्ग लाइव द लीडर”।यहाँ तक कि चुनावी प्रचार भी अब “रील फॉर्मेट” में होता है ।“स्क्रिप्ट: गरीब का बेटा – म्यूजिक: इमोशनल – एंड में: वोट फॉर मी।”
सोशल मीडिया सलाहकार कहते हैं , “सर, रील में 10 सेकंड में जनता को इमोशनल कर दो, बाकी काम एल्गोरिद्म करेगा।”
देश का लोकतंत्र अब एल्गोरिद्म पर निर्भर है। अब तो प्यार भी रील में मापा जाता है।अगर किसी ने “कपल ट्रेंड” पर वीडियो नहीं डाला, तो रिश्ता अधूरा माना जाता है।
लड़की कहती है _“तुम मुझसे प्यार करते हो?”
लड़का जवाब देता है — “हाँ, लेकिन कैमरा चालू कर लो, ये मोमेंट वायरल हो सकता है।”
। ब्रेकअप भी ऑनलाइन होता है —
“गाना: टूटे दिल वाला – बैकग्राउंड: बारिश – कैप्शन: उसने कहा था।”
और फिर हज़ारों कमेंट्स —
“Stay strong bro 💔”, “You deserve better”, “Keep shining king 👑”
प्यार अब फील नहीं, फिल्टर है।
दर्द अब दिल में नहीं, डायलॉग में है।
रील की क्रांति गाँवों में भी उतर आई है।जहाँ पहले लोग भजन गाते थे, अब “ट्रेंडिंग ऑडियो” पर थिरकते हैं।भजन मंडली की जगह अब “रील टीम” बन गई है।
काका कहते हैं — “हमारे जमाने में लोग मंदिर जाते थे भक्ति के लिए।”पोता जवाब देता है — “अब मंदिर भी कंटेंट लोकेशन है काका! लाइट अच्छी आती है।”हर त्यौहार अब “क्लिप अवसर” है।दीवाली में पटाखा जलाने से पहले रील,होली में रंग लगाने से पहले शूट,रक्षा बंधन में राखी बाँधने से पहले एंगल सेट।
माँ के आँचल से ज़्यादा चमक अब रील लाइट में है। जो लोग कैमरे पर हँसते हैं, कैमरे के बाहर रोते हैं।कई ‘क्रिएटर्स’ डिप्रेशन में हैं — क्योंकि उनके 50K फॉलोअर्स हैं लेकिन कोई असली दोस्त नहीं।लाइक मिलते हैं, अपनापन नहीं।कमेंट्स मिलते हैं, गले लगाने वाला कोई नहीं।हर वीडियो के पीछे छिपा है एक “असफल जीवन” जो ध्यान चाहता है, पर सिर्फ व्यूज़ पाता है।
कोई कहता है — “भाई, मेरी रील वायरल हो जाए तो सब ठीक हो जाएगा।”पर वायरल होते ही पता चलता है — अब अगली रील बनाने की भूख लग गई है।यह एक अंतहीन भूख है — क्लिप से क्लिक तक, और फिर क्लिप तक।
एक दिन पप्पू, वही गाँव वाला रीलस्टार, अचानक कैमरा बंद कर देता है।लोग पूछते हैं — “क्या हुआ, नई रील क्यों नहीं आई?”वह मुस्कराकर कहता है —“अब रील नहीं, असली ज़िंदगी बनाना चाहता हूँ।”
वह खेत में काम करता है, बच्चों के साथ खेलता है, माँ के साथ बैठकर रोटी खाता है —बिना किसी कैमरे के।उसे अब एहसास होता है कि रील से मिली शोहरत नकली थी, लेकिन ज़िंदगी असली है।कहानी का आख़िरी सीन यहीं खत्म होता है कैमरा बंद, पर इंसान चालू।
अब समाज के हर कोने में एक नया नारा गूँजता है —“आओ रील बनाएं!”लेकिन इस शोर के बीच एक धीमी आवाज़ अब भी बची है —“आओ जीवन बनाएं।”जब तक हम कैमरे से बाहर देखना नहीं सीखेंगे,तब तक हर मुस्कान बस फिल्टर रहेगी,हर दोस्ती बस ट्रेंड रहेगी और हर भावना बस रील रहेगी।“पहले लोग जीवन को रंगीन बनाने के लिए जीते थे,अब लोग जीवन को वायरल बनाने के लिए जी रहे हैं।”
- हनुमान मुक्त,"मुक्तायन" ,93, कान्ति नगर,
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