Essay on Pustak ki Atmakatha | पुस्तक की आत्मकथा निबंध हिंदी में

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पुस्तक की आत्मकथा निबंध हिंदी Essay on Pustak ki Atmakatha पुस्तक की आत्मकथा निबंध हिंदी में मैं एक पुस्तक हूँ, ज्ञान और कल्पनाओं का भंडार। कागज और स्

पुस्तक की आत्मकथा निबंध हिंदी


मैं एक पुस्तक हूँ, ज्ञान और कल्पनाओं का भंडार। कागज और स्याही से निर्मित, मेरे पन्नों में अनगिनत कहानियाँ, कविताएँ, नाटक और ज्ञान के अमूल्य रत्न छिपे हैं। सदियों से, मैंने मानव सभ्यता के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, शिक्षा प्रदान करते हुए, मनोरंजन करते हुए और विचारों को प्रेरित करते हुए।

अतीत,बीता हुआ समय और जीवन,वर्तमान चाहे कितना भी अच्छा क्यों न हो, पर सभी को अपना अतीत हमेशा सुखद और आकर्षक लगा करता है। सभी उस तरफ लौट जाने की इच्छा किया करते हैं। मैं अपने अनुभव के आधार पर ही यह सब कह-सुना रही हूँ- मैं पुस्तक। 

मनोरंजन का खजाना पुस्तक

आज यानि वर्तमान में मैं एक पुस्तक हूँ। मेरी गणना श्रेष्ठ मानी जाने वाली पुस्तकों में होती है, आम घटिया और सड़क छाप पुस्तकों में नहीं। मुझे ज्ञान-विज्ञान और समझादारी का आनन्द और मनोरंजन का खजाना माना जाता है। इस कारण मैं धड़ाधड़ बिका करती हूँ । आज तक मेरे अनेक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। बड़े-बड़े विद्वान मुझे अपना और मेरी प्रशंसा कर चुके और निरन्तर करते रहते हैं। लेकिन आदर-मान की यह स्थिति मुझे एकाएक या सरलता से नहीं मिल गई है। मेरा अतीत बड़ा गहरा, सुहावना और हरा-भरा है, आनन्द-मस्ती से झूमता हुआ ।

पुस्तक का जन्म

मेरी मूल घर एक सघन जंगल में था। वहाँ कई जातियों के पेड़-पौधों, वनस्पतियाँ आदि हम मिल-जुल कर रहा करते थे। हवा चलने पर साथ हिल कर मस्ती में झूमा करते थे। कई बार तेज बवण्डर या तूफान आकर हमें झुकाने या तोड़ डालने का प्रयास भी करते, पर आकर गुजर जाते। हाँ, उन की तीव्रता के कारण हमारी डालियों पर रहने वाले बेचारे अनेक पक्षियों के घोंसले अवश्य ही उड़, गिर और नष्ट हो जाते। हमारे आस-पास कई जातियों-प्रजातियों के पशु भी मुक्त भाव से रहा और विचरा करते। लेकिन लगता है, प्रकृति को और तुम मनुष्यों को हमारा यह सुख स्वीकार नहीं था। तभी तो उनका प्रकोप कुल्हाड़ा बनकर गिरा हम पर ।
 
Essay on Pustak ki Atmakatha | पुस्तक की आत्मकथा निबंध हिंदी में
एक दिन सुबह-सुबह आँख खुलने पर देखा, कुल्हाड़े उठाए कुछ लोग आए और विशेष कर हमारी जाति के पेड़ों को काटने लगे। साँझ ढलने तक उन्होंने मेरे सभी साथी जाति भाइयों को काट कर ढेर कर दिया। अगले दिन कुछ लोगों ने आकर आरी से रेत-रेत कर हमारे विशाल शरीर को छोटे टुकड़ों में बाँट दिया। कुछ दिनों बाद ट्रकों पर लाद कर हमें एक विशाल आँगन में लाकर पटक दिया गया, वहाँ आ कर पता चला कि वह कोई मिल है, लोग उसे कागज-मिल कह रहे थे। कुछ दिन वहीं पड़ने रहने के बाद हमें उठाकर एक मशीन के तख्ते पर रख दिया गया। वह चला और हम काँपने लगे। ओह ! हाय! आह ! कड़कड़ड़ड़ देखते- ही - देखते हमारे वे टुकड़े पिस और कूटे जाकर चूरा-चूरा हो गए। इसके बाद हमें बड़े हौजों में भरे पानी में डाल दिया गया और काफी समय तक हम उन्हीं में डूबते-उतरते, सड़ते-गलते हुए एक गाढ़ा घोल-सा बन गए। वहाँ से निकाल और कई रासायनिक प्रक्रियाओं और मशीनों की गर्मी से गुजरने के बाद एक तरफ से जब हम बाहर निकले, तब हमारा रंग-रूप और नाम तक सभी कुछ बदल चुका था। मैंने सुना, वहाँ के लोग आपस में कह रहे थे - 'वाह! कितना बढ़िया कागज बना है इस बार !' 
 
वहाँ से मिल-गोदाम और कुछ दिनों बाद एक ट्रक पर बण्डलों के रूप में लाद कर हमें शहर में एक कागज-विक्रेता के गोदाम में पहुँचा दिया गया। कुछ दिन के बाद एक आदमी आया और हमें खरीद कर अपने यहाँ ले जाकर एक डेर-सा कोने में लगा दिया। देखा, वहाँ एक तरफ तो कुछ लोग खाने में से अलग-अलग अक्षर निकाल कर उन्हें जोड़ते जा रहे थे, जबकि एक तरफ घरघर्राती हुई एक मशीन-सी चल रही थी। साँस रोककर सोचते रहे- पता नहीं, अब हमारे साथ कैसा व्यवहार किया जाएगा ? जल्दी ही हमें उठा कर उस मशीन पर चढ़ा दिया गया और हम एक-एक पर छप छप कर कुछ छपने लगा। 

छपने के बाद एक दिन एक अन्य आदमी हमें उठवा कर अपने यहाँ ले गया। वहाँ बैठे अन्य छोटे-बड़े आदमी हमें मोड़-मोड़ कर रखने लगे। फिर एक मशीन से स्टिच किया और सिया गया। उसके बाद आस- पास से काँट-छाँट कर संवारा और जिल्दबन्दी की गई। ऊपर लेई से कुछ चिपकाया और एक कवर-सा लपेट दिया गया - हाँ यही, जो इस समय भी मुझ पर चढ़ा हुआ मेरे तन की रक्षा तो कर ही रहा था, मेरी शोभा भी बढ़ा रहा था।
 

पुस्तक का समय के साथ परिवर्तन

इस प्रकार मुझे वर्तमान स्वरूप और आकार मिल पाया और मैं पुस्तक कही जाने लगी। अरे, हाँ, मैं उस का नाम तो भूल ही गई, जिस बेचारे ने कड़ी मेहनत कर के मेरे भीतर छपने-सजने वाला सब कुछ दिया। उस बेचार व्यक्ति को लेखक कहा जा सकता है कि जिस के बिना मैं बन ही नहीं सकती। परन्तु मैं क्या, प्रकाशक तक पुस्तक छप जाने के बाद उस बेचारे लेखक के हित का ध्यान नहीं रखा करते। उसे कतई भूल जाया करते हैं। 

जो हो, मेरे बनने और अस्तित्व में आने की कहानी मात्र इतनी ही है। लेखक महोदय ने अपने लम्बे जीवन-व्यवहारों के अनुभव से जो सीखा, उसे भाव और विचार के रूप में मुझ में संजो रखा है। इसी कारण मैं ज्ञान-विज्ञान, आनन्द-मनोरंजन का भण्डार कहलाती और मानी जाती हूँ। मेरे अभाव में पढ़ाई- लिखाई कतई संभव नहीं। जिस देश समाज में मुझ पुस्तक का सम्मान न हो, उसे असभ्य और अशिक्षित माना जाता है। 

मैं एक शक्तिशाली उपकरण हूँ। मैं लोगों को सोचने, महसूस करने और कल्पना करने में मदद करती हूँ। मैं विभिन्न संस्कृतियों और विचारों को जोड़ती हूँ, और लोगों को एक नई दुनिया में ले जाती हूँ।मैं एक पुस्तक हूँ, और मुझे गर्व है कि मैं शिक्षा, मनोरंजन और प्रेरणा का स्रोत बनकर दुनिया को बदलने में योगदान करती हूँ।

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