लाटी कहानी की समीक्षा सारांश उद्देश्य प्रश्न उत्तर | Lati Kahani Shivani

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लाटी कहानी की समीक्षा सारांश उद्देश्य प्रश्न उत्तर Lati Kahani Shivani lati kahani class 12th लाटी कहानी कथा लेखिका शिवानी की एक घटनाप्रधान कहानी

लाटी कहानी की समीक्षा


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शीर्षक एवं कथानक

लाटी के जीवन की त्रासदपूर्ण व्यथा को कहानी का शीर्षक अभिव्यक्त करने में समर्थ है। कहानी का कथानक एकमात्र उसी पर केन्द्रित है; अतः सब प्रकार से 'लाटी' शीर्षक सार्थक है। अत्यन्त संक्षिप्त यह शीर्षक सारगर्भित और कहानी की मूलभावना पर केन्द्रित है। इसलिए शीर्षक सभी विशेषताओं पर खरा उतरता है। 

लाटी कहानी की समीक्षा सारांश उद्देश्य प्रश्न उत्तर | Lati Kahani Shivani
मध्यवर्गीय पहाड़ी परिवार से सम्बन्धित कहानी 'लाटी' का कथानक यद्यपि बहुत विस्तृत नहीं है, किन्तु इसके कथानक को मानवीय संवेदना का विस्तार अत्यधिक गम्भीर बना देता है। कथानक में उस नई-नवेली दुल्हन बानो के जीवन की त्रासदी को दर्शाया गया है, जिसका पति कप्तान जोशी विवाह के तीसरे दिन ही युद्धभूमि में उसे छोड़कर चला जाता है और घर लौटता है दो साल बाद। बानो ने इन दो सालों में सात-सात ननदों के ताने सुने, भतीजों तक के कपड़े धोए और ससुर के होज बुने। पाँच-पाँच सेर उड़द पीसकर उनकी बड़ियाँ बनाईं। उसके हृदय को बेधने में सास और चचिया सास के व्यंग्य-बाणों ने भी कोई कोर-कसर न रख छोड़ी। सौलह वर्षीया बानो इस ताड़ना और संत्रासभरी जिन्दगी के कारण क्षयरोग का शिकार हो गयी। उसे गोठिया सैनेटोरियम में पहुँचा दिया गया। जब कप्तान को घर आकर पता चलता है कि गोठिया सैनेटोरियम में बानो भर्ती है तो बिना कोई क्षण गँवाए वह अपनी बानो के पास पहुँचकर उसकी जी-जान से सेवा करता है, किन्तु बानो के जीवन में सुख नहीं लिखा था। उसे एक दिन सैनेटोरियम छोड़कर चले जाने की नोटिस मिल गयी। मतलब साफ था कि मौत उसके अत्यधिक समीप पहुँच चुकी है और वह एक-दो दिन की ही मेहमान है। उसे कप्तान घर वापस नहीं लाता, अपितु भुवाली में ही किराये का एक कमरा ले लेता है। बानो मृत्यु को सन्निकट जानकर रात्रि में घर छोड़कर आत्महत्या करने के लिए नदी में कूद जाती है। नदी किनारे कप्तान को जब उसकी साड़ी मिली तो वह उसे मरा जानकर घर लौट आया। उसका एक साल के भीतर दूसरा विवाह हो गया।
 
बानो को एक सन्त बचा लेता है और उसकी चिकित्सा से बानो का क्षयरोग ठीक हो जाता है, किन्तु उसकी आवाज और स्मृति दोनों चली जाती है। अभिशप्त जीवन जीने के लिए वह विवश है। कप्तान से मेजर बने जोशी की भेंट एक दिन भुवाली में चाय की दुकान पर अचानक ही लाटी से होती है। यही गूँगी और स्मृति खो चुकी विक्षिप्त लाटी बानो है। जोशी उसे पहचान जाता है, किन्तु पत्नी प्रभा के होते उसे स्वीकार करने का साहस नहीं कर पाता और लाटी उसे पहचान ही नहीं पाती। दुर्भाग्यग्रस्त लाटी वैष्णवी टोली के साथ वहाँ से चली जाती है। कहानी लाटी का कथानक एक अभागी महिला के जीवन की कारुणिक कथा है। लेखिका ने महिला जीवन की इस त्रासदी को कथानक के माध्यम से दिखाने का प्रयत्न किया है कि महिला ही महिला के शोषण का मुख्य कारण है। 

कथोपकथन अथवा संवाद

कहानी में कथोपकथन अथवा संवादों की भरमार नहीं है। कहानी में जो भी कथोपकथन हैं, वे सभी अत्यन्त प्रभावपूर्ण, भावात्मक, कथानक को गतिशील बनानेवाले, पात्रों के चरित्र पर प्रकाश डालनेवाले और रोचक हैं। नेपाली भाभी का यह भावपूर्ण संवाद कितना मार्मिक बन पड़ा है- 

'प्रौढ़ा नेपाली भाभी की सदाबहार हँसी से खिलखिलाती आँखें छलक उठतीं-"शाबास है, कप्तान बेटा, तुझे देखकर मेरी छातियों में दूध उतर आता है। कैसी सेवा कर रहा है तू, और एक हमारे हैं कुतिया के जने! मिले तो मूँछें उखाड़कर हरामी के मुँह में ठूंस दूँ।' 

कहानी के संवाद संक्षिप्त, सरल, स्वाभाविक, सारगर्भित, स्पष्ट, सार्थक हैं। पात्रों के चरित्र के अनुसार वे अत्यन्त सटीक बन पड़े हैं। कप्तान जोशी और बानो के प्रथम-मिलन के इन संवादों की यह बानगी देखिए-

'क्या नाम है तुम्हारा?' उसकी तीखी ठुड्डी उठाकर कप्तान ने पूछा था। 
'बानो।' उसके पहले होंठ हिलकर रह गये। 
'राम-राम, मुसलमानी नाम।' कप्तान ने हँसकर छेड़ दिया। 
'सब यही कहते हैं, मैं क्या करूँ?' बानो की आँखें छलक उठीं। 

पात्र और चरित्र चित्रण 

कहानी में यद्यपि अनेक पात्र हैं, किन्तु बानो (लाटी), कप्तान जोशी, नेपाली भाभी, प्रभा और वैष्णवी इसके मुख्य पात्र हैं। इनमें कथा का नायक कप्तान जोशी और नायिका लाटी है। लाटी और कप्तान के चरित्र को कथाकार ने विशेष रूप से सँवारा है। कथा-लेखिका ने दोनों के ही चरित्र का अंकन अत्यन्त भावपूर्ण एवं मानवीयता के धरातल पर किया है। सभी के मना करने पर भी कप्तान जोशी अपनी क्षय रोग से ग्रस्त पत्नी बानो का साथ नहीं छोड़ता तो बानो भी उसे और अधिक पीड़ा न पहुँचाकर स्वयं के बन्धन से मुक्त करने के उद्देश्य से आत्महत्या के लिए नदी में छलाँग लगा देती है। लेखिका ने कप्तान हृदय के द्वन्द्व का चित्रण अत्यन्त कुशलता से किया है। नेपाली भाभी की मृत्यु के समय उसके हृदय की पीड़ा का अनुभव देखने को मिलता है। कप्तान को भाभी की मृत्यु यह सन्देश देती है कि अब बानो की साँसें भी बहुत अधिक नहीं बची हैं। वह विचलित हो उठता है, किन्तु बानो पर अपनी पीड़ा को व्यक्त होने नहीं देता। मेजर जोशी को लेखिका ने कहानी के अन्त में भी द्वन्द्वग्रस्त दिखाया है कि वह पत्नी प्रभा की उपस्थिति में चाहकर भी लाटी से नहीं कह पाता-"मेरी बानो, बन्नी, बन्नू।" लेखिका का लाटी को कथा के अन्त में गूँगी और विक्षिप्त दिखाने का विशेष प्रयोजन है। ऐसा यदि वह न करती तो मेजर जोशी लाटी और प्रभा को अप्रिय परिस्थिति का सामना करना पड़ता। लाटी की पीड़ा तब शायद ननदों और सास की प्रताड़ना एवं क्षयरोग की विभीषिका से भी अधिक गहरी होती। लेखिका ने नेपाली भाभी के चरित्र के द्वारा महिलाओं के प्रति पुरुषों की उपेक्षा को दर्शाने के साथ-साथ हास्य-व्यंग्य का पुट भी कथा में दिया है। उसके चरित्र के माध्यम से उसने कथानक को भी गतिशील बनाया है। 'लाटी' का परिचय देने के लिए वैष्णवी के चरित्र की सृष्टि की गयी है। अतः कहा जा सकता है कि पात्र और चरित्र-चित्रण की दृष्टि से लाटी एक सफल कहानी है। 

देश काल और वातावरण

लाटी कहानी में देश-काल और वातावरण का सर्वत्र ध्यान रखा गया है। लेखिका की दृष्टि से एक क्षण के लिए भी वातावरण ओझल नहीं हो पाया है। पहाड़ी वातावरण को साकार करने के लिए लेखिका ने 'बुडज्यू', 'तिथांण' आदि आँचलिक शब्दों का प्रयोग किया है। कप्तान का बानो से कहा गया पहाड़ी नामों से युक्त यह संवाद भी पहाड़ी वातावरण को साकार कर देता है-"पहाड़ी नाम भी कोई नाम होते हैं भला, सरुली, परुली, रमा, खष्टी।" भुवाली के गोठिया सैनेटोरियम का यह चित्र भी वहाँ के वातावरण को हमारी आँखों के सामने साकार कर देता है- 

"लम्बे देवदारों का झुरमुट झुक-झुककर गोठिया सैनेटोरिया की बलैया-सी ले रहा था। काँच की खिड़कियों पर सूरज की आड़ी-तिरछी किरणें मरीजों के क्लांत चेहरों पर पड़कर उन्हें उठा देती थीं। मौत की नगरी के मुसाफिरों के रोग-जीर्ण पीले चेहरे सुबह की मीठी धूप में क्षणभर को खिल उठते ।" 

इस प्रकार कहानी की पृष्ठभूमि के पहाड़ी परिदृश्य और सैनेटोरियम के वातावरण को लेखिका साकार करने में पूर्ण सफल हुई है। 

भाषा शैली 

प्रस्तुत कहानी में सरल, स्वाभाविक और सामान्य बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया गया है। पहाड़ी शब्दावली का प्रयोग भी पहाड़ी वातावरण को साकार करने के लिए यथावश्यक हुआ है। नेपाली भाभी का पहाड़ी शब्दावली से युक्त यह स्वाभाविक संवाद यहाँ द्रष्टव्य है-"हैं हमारे 'बुडज्यू' आधी कुमाऊँ के छत्रपति पर बहू तिथांण (श्मशान) को जा रही है तो उनकी बला से! दुम उठाकर जिसे देखो, वही बदजात नर से मादा निकला।"

कहानी में लेखिका शिवानी का पूर्वाग्रह किसी भाषा-विशेष के शब्दों के प्रति देखने को नहीं मिलता। अरबी-फारसी, अंग्रेजी, उर्दू, तत्सम, तद्भव, आँचलिक और देशज आदि सभी प्रकार के शब्दों का प्रयोग कहानी में किया गया है। 

आधुनिक सभ्य समाज की हिंग्लिश भाषा का यह उदाहरण भी आकर्षक बन पड़ा है-"चलो डार्लिंग, पहाड़ का इंटीरियर घूमा जाए। भुवाली चलें..... इसी दुकान में आज एकदम पहाड़ी स्टाइल से कलई के गिलास में चाय पिएँगे हनी।" कथा-लेखिका ने शैली के रूप में चित्रात्मक, हास्य व्यंग्यात्मक, वर्णनात्मक और सूत्रात्मक शैलियों का प्रयोग किया है। इस प्रकार भाषा-शैली की दृष्टि से लाटी एक प्रभावपूर्ण कहानी है।

उद्देश्य

पति के बिना मध्यमवर्गीय समाज में अकेली रहनेवाली पत्नी के जीवन की त्रासद को दिखाना कहानी का उद्देश्य रहा है। यह भी सन्देश लेखिका ने दिया है कि आज महिला ही महिला के शोषण में लगी है, अतः उन्हें अपने दृष्टिकोण में परिवर्तन करते हुए उनके साथ सहयोग करते हुए अपनी उन्नति के मार्ग को प्रशस्त करना चाहिए। एक उद्देश्य लेखिका का यह भी है कि यदि क्षयरोग जैसे असाध्य रोग में परिजनों का सहयोग एवं सहानुभूति रोगी को मिले तो व्यक्ति को मृत्यु से बचाया भी जा सकता है। एक दिन लम्बी-चौड़ी देहवाली नेपाली भाभी अचानक दम तोड़ देती है किन्तु रुई के फाये जैसी बानो का क्षयरोग बाल भी बाँका न कर सका। 


लाटी कहानी का सारांश Lati Kahani ka Saransh in Hindi

लाटी कहानी कथा लेखिका शिवानी की एक घटनाप्रधान कहानी है।कथावस्तु कहानी के नायक कप्तान के जीवन में घटी एक मार्मिक घटना से ग्रहण की गयी है। घटना के अनुसार अपनी बीमार पत्नी 'बानो' से कथानायक कप्तान जोशी अत्यधिक प्रेम करते हैं। जब बानो टी0 बी0 की मरीज होने के कारण जिन्दगी से निराश हो जाती है तो नदी में डूबकर आत्महत्या करने का प्रयास करती है। कप्तान यह यकीन कर लेता है कि बानो डूबकर मर गई, किन्तु वही बानो लाटी बनकर बाद में उसे मिलती है। अपने अतीत की कोई बात उसे याद नहीं है।कथा-लेखिका ने संक्षिप्त-सी कथावस्तु को अपनी प्रतिभा से ऐसे मार्मिक कलेवर में पिरोया है कि मन के सभी तार बज उठते हैं।
 
गोठिया सैनेटोरियम के तीन नम्बर के बँगले में कप्तान जोशी अपनी टी0बी0 की मरीज पत्नी बानो के साथ दुगुना किराया देकर रहता था। उसे 'बानो' से अत्यधिक प्रेम था। अपनी पत्नी 'बानो' को देख वह सहज भाव से मुस्करा देता और उसे प्रसन्न करने की पूरी कोशिश करता है। पत्नी के पलंग के पास बँगले के बरामदे में वह दिनभर कुर्सी डाले बैठा रहता, कभी अपने हाथों से टेम्परेचर चार्ट भरता और कभी समय देख-देखकर दवाइयाँ देता। कप्तान अपनी पत्नी की ऐसी घातक बीमारी पर भी बड़े यत्न और स्नेह से सेवा करता था। विवाह के दो वर्ष बाद ही 'बानों' को भयंकर बीमारी (तपेदिक) हो गई। माता-पिता के पत्र उसके पास आते कि यह भयंकर बीमारी है, तुम उससे बचकर रहो। माँ ने रो-रोकर पत्र लिखा कि मेरे दस-बीस बेटे नहीं तुम अकेले हो। इन बातों का कोई असर कप्तान पर नहीं हुआ। बानो की सेवा-शुश्रूषा में उसने कोई कमी नहीं रखी।
 
सैनेटोरियम में ही भर्ती क्षयरोगिणी नेपाली भाभी खुले मन से कप्तान की प्रशंसा करती है। वह कहती है कि एक मेरा पति है, जो पी के धुत रहता है और सालभर से देखने भी नहीं आया है। वह कप्तान से कहती है शाबाश कप्तान बेटा, तुझे देखकर मेरी छातियों में दूध उतर आता है। 

कप्तान को 'बानो' से विवाह के ठीक तीसरे दिन बाद बसरा जाना पड़ा। उसे बानो को छोड़कर जाना असहनीय था। पहली मुलाकात में उसने बानो से उसका नाम पूछा था, और उसने अपना नाम बानो बताया तो मजाक में कप्तान ने कहा कि यह तो मुसलमानी नाम है। बानो की आँखें यह सुनकर जब छलक उठीं तो कप्तान बोला मैं तो तुम्हें छेड़ रहा था-कितना प्यारा नाम है। सोलह वर्षीया खिलौने-सी बहू बानो को कप्तान बहुत अधिक प्यार करता था। दो वर्ष बाद कप्तान वापस आता है, बानो इस बीच सात-सात ननदों के ताने सुने, ससुर के होज बने, भतीजों के कपड़े धोये, पहाड़-सी नुकीली छतों पर पाँच-पाँचा उड़द पीसकर बड़ियाँ बना डालीं। उससे कहा गया कि जापानियों ने तेरे पति को कैद कर लिया है, वह अब कभी नहीं लौटेगा। उसके अन्तर्मन को सास और चचिया सास के व्यंग्य-बाण भेद देते, वह घुलती चली गई और एक दिन क्षय-रोग से पीड़ित होकर चारपाई पकड़ ली।
 
युद्ध से लौटकर बानो को देखने दूसरे ही दिन कप्तान वापस आया तो घरवालों के चेहरे लटक गए। बानो को एक प्राइवेट बरामदे में लेटी देखकर कप्तान के होश उड़ गए। बानो दो वर्ष में घिसकर और भी बच्ची बन गई थी। कप्तान को देखकर उसकी आँखों से आँसू टपकने लगे। उसकी नाजुक हालत देखकर अन्त में डॉक्टर ने कप्तान को नोटिस दे दिया, कल ही कमरा खाली करके मरीज को घर ले जाइए। बानो से उसने कहा घर नहीं, दूसरी जगह चलेंगे। सुबह उठा तो बानो पलंग पर नहीं थी। बानो डूबकर की साड़ी दूसरे दिन नदी के घाट पर मिली। कप्तान को जब लाश भी न मिली तो उसने समझ लिया कि बानो नदी में मर गई। एक साल में ही कप्तान का दूसरा विवाह हो जाता है, उसकी पत्नी प्रभा ने दो बेटे और एक बेटी उसे दिए। अब कप्तान मेजर हो गया। जब लाटी के रूप में वैष्णवी के साथ 'बानो' मेजर को मिलती है तो मेजर उसे पहचान लेता है, लेकिन लाटी बोल नहीं पाती है और न ही उसे अपना अतीत याद है। कहानी का अन्त यहीं पर होता है। 

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