राब्ता | हिंदी कहानी

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नलनी अपने पिता की बात को समझती है और सर हिला कर मंजूरी देती है,टुकड़ों को नदी में डाल देती है,नदी में टुकड़े को डालते ही टुकड़े नदी की लहरों में गुम ह

राब्ता | हिंदी कहानी


“अपनी जिंदगी का हर पल तुमको दे बैठे भूल से एक भूल कर बैठे, मोहब्बत से खमोखा की जंग कर बैठे”…..

एक रोज नलनी अपनी बालकनी पर खड़ी यूंही चांद को निहार रही थी, चांद को यूं टकटकी लगाकर बस देखे जा रही थी,जाइए बह आंखो ही आखों में चांद से अपने दिल का हाल वया कर रही हो,

अचानक मोबाईल पर अनजान शख्स का संदेश आता है, नलनी का ध्यान सिर्फ चांद की तरफ है, ऐसा लगता है नालनी इस समय चांद से बात करने के अलावा कोई और काम नहीं करना चाहती ,मगर संदेश के बार बार आने से ,नलनी परेशान हो रही थी .

’अरे एक बार रिप्लाई भी कर दो’(अंजान शक्श का संदेश)इतनी खूबसूरत स्माइल है ,अब तो मुस्कुरा दो’

नलनी संदेश पढ़कर आश्चर्य में थी ,की यह अंजान सख्श कौन है?

नलनी खुद को रोक नहीं पाई और गुस्से में रिप्लाई कर ही देती है,

“ देखिए मुझे यूं बार बार संदेश करके परेशान। न करे,आपसे बात करने में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है”

अंजान शक्श कहेता है, “ अरे एक बार बात तो सुन लो”

राब्ता | हिंदी कहानी
नलनी गुस्से में आग बबूला हो जाती है, “get the hell out of here, don’t massage me again, अरे!  समझ में  नहीं आता है आपको ,नही करनी बात आपसे”

नलनी खीझ जाती है,

अंजान शक्श_सॉरी, आगे से आपको परेशान नहीं करूंगा,                   

नलनी को अपनी ही कही बातो पर अफसोस होता ,दो मिनट सोचकर फिर वो सॉरी का संदेश भेजती है,

अंजान शक्श ,अरे! हमे आपकी माफी नहीं दोस्ती चाइए ,बोलिए मिलेगी?

नलनी_ ( देर रुककर जवाब देती है)हम तो एक दूसरे को जानते भी नहीं तो कैसे….?

अंजान शक्श _ लीजिए ये भी कोई बड़ी बात है,मेरा नाम पुनीत है आपके ही शहर का रहने वाला ही,निहायती शरीफ हु!

नलनी (हंसकर), काफ़ी मजाकिया किस्म के व्यक्ति है…

नलनी _बेशक  और आप काफी दिलचस्प…

इस तरह दोनो की बातो का सिलसिला बढ़ता गया ,एक दूसरे का नंबर भी मिल गया, दिन रात बातों का सिलसिला जारी रहा, महीनो ब्रेट गए ,उनकी दोस्ती को दिन पर दिन गहरी होती गई।

नलनी कही न कही पुनीत को पसंद करने लगी थी, नलनी ये बात पुनीत को बताना चाह रही थी,

“पुनीत मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हु,” नलनी पुनीत को संदेश करती है,

“हा कहो ना मैं तो सिर्फ तुम्हे ही सुनना चाहता हूं, क्या कहना है कहो” पुनीत का जवाब आता है।

नलनी मैं दिन रात सिर्फ तुम्हारे बारे में ही सोचती हु,हर वक्त मुझे सिर्फ तुम्हारा ही ख्याल रहता है, तुम क्या कर रहे हो ,क्यों कर हो, हर वक्त उन्ही बातो का ख्याल दिल में आता ही रहता है, मुझे तुमसे बात करना और सिर्फ तुम्हारी बाय करना अच्छा लगता है ,ऐसा लगता है मेरी जिंदगी तुम पर थम सी गई है,मुझे लगता है की मुझे तुमसे….

पुनीत_???? क्या लगता है तुम्हे?

नलनी _तुम ही बताओ ना ये क्या है, क्या तुम्हे भी ऐसा ही महेसूस होता है जैसे मुझे हो रहा है, क्या तुम भी मेरे बारे में ऐसा ही सोचते हो जैसा मैं सोच रही हु?तुम मुझे कभी छोड़ कर तो नही जाओगे न?

पुनीत_ मैंने अपनी जिंदगी ही तुम्हारे नाम कर दी और तुम कहती हो की तुम्हे छोड़ कर तो नही जाउगा ,मुझे तो डर है की तुम हि मुझे छोड़ के चली जाओ!

नलिनी पुनीत मुझे लगता की मुझे तुमसे प्या…….अचानक दरवाजे पर दस्तक होती है, नलनी बाहर आकर देखती है तो उसकी मां होती है

“बेटी जरा बाहर तो आ ,तुमसे कोई मिलने आया है,”मां कहती है

नलनी बाहर जाकर देखती है तो एक 65 वर्षीय शक्श सादे लिबास में और 50 वर्षीय महिला बैठी हुई थी,सामने सोफे पर बैठे दोनो पति पत्नी नलनी को उम्मीद भरी निगाहों से देख रही थे, नलनी बेहद आश्चर्य में थी की आखिर ये दोनो है कौन ,

यही हमारी बिटिया है, नलनी के तरफ इशारा करते हुए उसके पिता कहते है, नलनी। अपने पिता को इशारे में उन लोगो के परिचय पूछती है,मगर पिता बिना बताए इशारे में अंदर जाने का आदेश दे देते है, उधर नलनी भी जल्दी में होती है,उन बस को नजरअंदाज करके अंदर चली जाती है,

कमरे में  जाते ही तकिए के नीचे रखा फोन निकालती है ,पुनीत के कई संदेश देख कर हैरान रह जाती है,

“कहा चली जाती हो, ऐसे न जाया करो ,मुझे डर लगने लगता की कही मैं तुम्हे खो ना दू”

नलनी_ लेकिन हम तो यही है आपके पास , ऐसा कभी होगा, अच्छा तो बताओ हम कब मिल रहे है,मैं तुमसे मिलना चाहती हु ,तुम्हे देखना चाहती हु,

पुनित _हम तो आपको रोज देखते है, रोज आपकी हसी महेसस करते है, 

नलनी_ वो कैसे?

पुनित_ अच्छा क्यों आपको यकीन नही हो रहा?

(दरवाजा पे दसतक देता है)

“बेटी कल जल्दी उठना होगा हमे ,बेहद जरूरी काम से बाहर जाना है”नलनी के पिता कहते है।

कृतिका दुबे
नालिनी सिर हिला कर अपनी मंजूरी दे देती है,

पापा के जाते ही फोन को जैसे ही निकालती है,तो फोन डेड हो चुका होता है,

अरे यार! …. सुबह ही बात करती हु, खुद से बात करती हुई।

अगली सुबह पापा की आवाज सुनकर जल्दी से अपने बिस्तर से उठती,जल्दी में अपना फोन घर पे ही भूल जाती है, ऑटो में बैठी नालनि जब अपना बैग खोलकर फोन खोजती है,तो फोन बैग में ना पाके मायूस हो जाती हैं,

“पता नही क्या सोच रहा होगा ,परेशान तो नही हो रहा होगा, ,(एक मिनट रुककर) इसी बहाने अपने प्यार की गहराई का पता लगेगा”

ऐसा सोचते सोचते बह स्थान आ जाता है जहा उन सबको जाना था, नालनि जगह को देख कर आश्चर्य के थी क्योंकि उससे पहले वो उस जगह पर कभी नही आई, नदी का किनारा ,चारो तरफ रेत ही रेत , एक शांत माहौल,दूर  कुछ लोग धुंधले से नजर आ रहे थे, धीरे धीर पास जाती हैं तो देखती है की जिन लोगो की मुलाकात उनकी घर पर हुई थी, वही  अनजाने शक्श पुरुष और महिला थे नलनी पूरी तरह आश्चर्य के  थी की आखिर ये लोग है कौन और वह क्या कर रहें है,थोड़ा और नजदीक जाति है तो देखती है की वहा किसी हवन की प्रक्रिया चल रही थीं, उस हवन के पास पंडित जी अपनी  अवस्था में बैठे हुए  थे, नलनी पूरी तरह आश्चर्य में थी यही सोचती हुई अपने कदमों को बढ़ा रही थी की आखिर यह सब हो क्या रहा है? इन्ही सब कश्मकश के बीच नलनी के पिता उस पुरुष (जो उसे उसके  घर पर मिले थे) से कहते है,” लिजिए ले आया मैं अपनी बेटी को”

नलिनी _ पापा ये सब क्या हो रहा है?

पुरुष_ ’आओ बेटी’ नलनी का हाथ पकड़ कर कहते है, नलनी हाथ झटककर बोलती है,”ये सब क्या हो रहा कोई मुझे कुछ बतायेगा”?

पंडित_मुहूर्त का समय नजदीक है, कृपया विधि शुरु करवाए, लड़की यहां भेजे ,” बेटी यहां आकार बैठो;”

नलनी_(अपने पापा के पास जाकर)पापा ; यह सब क्या हो रहा है, आप खामोश क्यों है,कुछ बोलते क्यों नही?

पुरुष _बेटी मैं बताता हु,यह सब मेरे बेटे की आत्मा की शांति के लिए हो रहा है,

नलनी_ तो इसमें मुझे क्यू लाया गया है, मैं क्या कर सकती हु इसमें।

पुरुष_ बेटी, मेरा बेटा तुम्हे पसंद करता था, शादी का सपना देखता था तुम्हारे साथ ,एक दिन अपने मन की बात  बताने के लिए घर से निकला,बेहद खुश था, उसे क्या पता था की अगली सुबह उसे नसीब ही नही होगी , ख़ुशी में सुध बुध खोए जा रहा था की … रास्ते एक ट्रक से जा टकराया और उसकी वही मौत हो गई ,

नलनी _ ओह! , यह तो बहुत ही गलत हुआ, लेकिन मैं आपकी इसमें मदद कर सकती हु?

पंडित_क्युकी वो आज भी भटक रहा है,उसकी आत्मा को आज भी मुक्ति नही मिली है, उसे मुक्ति सिर्फ तुम्हारे हाथो से ही मिल सकती है, शांति पाठ  ,हवन ,पिंडदान सब करवा कर देख लिया ,उसे मुक्ति नही मिली

“बेटा  सिर्फ तुम ही हो जो उसे आजाद कर सकती हो”

नलनी_क्या बकवास है ये, किस जमाने में जी रहे है आप लोग,इन सब के चक्कर में मत पड़िए ,यह सब ठगने के जाल है..

और पंडित जी आप, कितने पैसे लिए इन बेचारे से, भाले भाले लोगो को खूब लूटते है आप जैसे लोग, सब पता है मुझे , एक काम करो मैं देती हु रूपए तुम्हे, बोलो कितने चाहिए,

इतना कहते कहते अचानक उसका पैर एक जमीन पर रखी तस्वीर से टकरता है,बोलते बोलते तस्वीर को उठती है और घुमाकर जैसे ही तस्वीर को उठती है, उसके पैरो के तले जमीन खिसक जाती है, लड़खड़ाते हुए शब्दों से पूछती है… ये …..ये…..

पुरूष _ यही तो मेरा बेटा है पुनीत(उसके हाथ से तस्वीर छुटती है और जमीन पे जा गिरती है)भरे हुए गले से कहती है, “ये नही हो सकता,ये सब झूठ है,मैं कल ही बात कर रही थी आप लोग को कोई भ्रम हुआ है”

पुरूष 3 महीने पहले 27 अक्टूबर को ,मेरा बेटे की मौत हो चुकी थी,

तब नलनी को याद आता है 28 अक्टूबर रात 12 बजे उसका संदेश आने शुरू हुए, नलनी को सब समझ में आ जाता है।

पुरूष _ बेटी हमारी मदद करो (हाथ जोढ़कर) नलनी पुरुष का हाथ पकड़कर इशारे में मदद की हामी भरती है, 

नलनी _आपके पास इसका मोबाइल फोन होगा,? जो वो यूज करता था।

पुनीत की मां_ हां,मैं ले आई हु, क्युकी पंडित जी ने बोला था की पुनीत की जुड़ी हर चीज पुनीत की आत्मा को मुक्ति दिलाने में सहायक हो सकती है,तो मैं उसका फोन ले आई,

नलनी _लाइए ,ये आप मुझे दे दीजिए, मोबाइल हाथ में लेते ही नालनी इधर उधर देखने है, अचानक सामने पड़ा बड़ा सा पत्थर उठती है,और मोबाइल  मरती है और तब तक मारती है जब तक उसके टुकड़े टुकड़े न हो गए, उन्हीं टुकड़ों को लेकर वापस हवन में बैठ जाती है,

नलनी टुकड़ों को देखकर अपने आसुओ को रोक नही पाती,वो उन टुकड़ों में पुनीत का अधूरा चहेरा ढूंढती है,उसे उस हर वो याद कचोटती है जो उनसे पुनीत के साथ जिए थे, इसी बीच पंडित जी हवन संपन्न होने को कहते है,

पंडित_ बेटी, अब इन टुकड़ों को नदी में बहा दो…(नलनी चुपचाप अपने आसू के साथ उन टुकड़ों को देख रही थी)

बेटी टुकड़ों को समुंदर में बहाने से ही प्रक्रिया सम्पन होगी, (नलनी बस उन टुकड़ों कों देखे जा रही थी)

नलनी के पापा ये सब देख रहे थे, बह नलनी के नजदीक जाकर उसके कंधे पर हाथ रखकर कहते है,

“ बेटी जो है ही नही उसके लिए क्या दुखी होना, जिंदगी में ऐसे लम्हे भी आते है जिन्हे हमें अलविदा कहना होता है”

नलनी अपने पिता की बात को समझती है और सर हिला कर मंजूरी देती है,टुकड़ों को नदी में डाल देती है,नदी में टुकड़े को डालते ही टुकड़े नदी की लहरों में गुम हो जाते है,और नलनी अपने पुनीत को बहेता हुआ छोड़कर वापस घर की तरफ चली जाती है…..


- कृतिका दुबे
ईमेल आईडी - kritikadubey88@gmail.com

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