अनुवाद की आवश्यकता एवं महत्व

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अनुवाद की आवश्यकता एवं महत्व


नुवाद की उपयोगिता अनुवाद की आवश्यकता अनुवाद का महत्व anvaad ke mahatva लक्ष्य भाषा एवं स्रोत भाषा anuvad vigyan - प्रारंभ में अनुवादक को साहित्य की दुनिया में बड़ी हीन दीं दृष्टि से देखा गया। अनुवाद कार्य को निम्न किस्म के कार्य के रूप में स्वीकार किया गया। कहा जा सकता है कि पढ़े - लिखे बेकार व्यक्ति के लिए नोन तेल लकड़ी का एक छोटा - मोटा जुगाड़ अनुवाद कार्य था। इतना जरुर है कि कभी कभी किसी यशस्वी साहित्यकार या प्रेरित की प्रेरणा या प्रोत्साहन से किसी भाषा की किसी महान कृति का अनुवाद कर या करवा लिया गया। परन्तु ऐसे प्रयास निश्चित रूप से व्यक्तिगत और विरल ही अधिक मिलेंगे। एक सशक्त और सार्थक परंपरा के रूप में अनुवाद की कभी न तो लोक समर्थन मिला और न ही व्यावसायिक प्रोत्साहन। परन्तु ज्यों त्यों ज्ञान का क्षितिज विस्तृत होना लगा ,विश्व दृष्टि का निर्माण होना लगा। जीने और जीवित रहने , जीते रहने का सम्बन्ध एक प्रान्त , एक राष्ट्र के बजाय समस्त विश्व से प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ गया ,तब यह स्वाभविक ही था कि विश्व के विभिन्न भागों ,वर्गों ,व्यवसायों के लोगों के भीतर एक दूसरे को जानने - समझने की इच्छा बलवती होने लगी। तकनीकी , औद्योगिक ,चिकित्सा ,विधि ,वाणिज्य से लेकर सांस्कृतिक और साहित्यिक आदान - प्रदान ने जीवन मूल्यों में भारी परिवर्तन उपस्थित कर दिया। विश्व के विभिन्न भूखंडों में बसने वाले मनुष्य मात्र में दर्द ,बेचैनी ,आंसूओं और उल्लासों के बीच एक अजीब सा साम्य का अहसास होने लगा। अनुवाद विश्व के विभिन्न देशों के बीच संवाद विवाद की कार्य किया। अनुवाद विश्व के विभिन्न देशों के बीच संवाद विवाद की स्थितियों का माध्यम भी बना। अनुवाद के सेतु पर से ही चलकर मूल भाषा अपनी साहित्यिक तथा तकनीकी उपलब्धियों को लक्ष्य भाषा तक पहुँचाती है। 

अनुवाद की आवश्यकता एवं महत्व
आज जहाँ अनुवाद के कारण जहाँ एक भाषा एवं भाषिक इकाई को दूसरी भाषा की तुलना में अपने साहित्य एवं विकसित ज्ञान -विज्ञान का अंदाजा लगता है, वहीँ अनुवाद के द्वारा हमें किसी भाषा की मानसिकता एवं मनोभूमि का सही सही जायजा हो जाता है। 

अनुवाद विश्व की चेतना और गति का बैरोमीटर और विश्व के संपर्क का सूत्रधार बन गया है। भारत में स्वतंत्रता के पश्चात जब चाहुदिशाओं में विकास की योजनाएं बनने लगी ,प्रशासनिक कार्यों तथा शिक्षा ,विधि आदि विभिन्न क्षेत्रों में भारतीय भाषाओँ ,विशेष रूप से जब हिंदी का दबाव बढ़ने लगा ,तब यह आवश्यक हो गया कि भारतीय भाषाओँ की साहित्यिक मानसिकता के साथ विभिन्न क्षेत्रों में हिंदी को बढ़ावा देने के लिए अखिल भारतीय पारिभाषिक शब्दावली का निर्माण किया जाए। इस कठिन कर्म को अंजाम देने के लिए अनुवाद एक महत्वपूर्ण मार्ग समझा गया। अनुवाद के लेखक की शैली एवं भाषा के प्रवाह के साथ पाठकों की समझ तथा सम्प्रेषण क्षमता के प्रति भी सतर्क रहना पड़ता है। ताकि एक ओर वह मूल लेखक की रचना को उसकी निजता एवं संवेदन के सभी स्तरों को उसी की भाषा शैली में प्रस्तुत कर सके और दूसरी ओर अपने पाठक वर्ग को भी रचना के विभिन्न आयामों से सहजता से परिचित करा सके। 

अनुवाद का उद्देश्य

आज अनुवाद का क्षेत्र बड़ा व्यापक और निरंतर महत्वपूर्ण होता जा रहा है। अनुवाद आज न तो घटिया किस्म का रोजगार रहा है और न कामचलाऊ ज्ञानी पंडितों के हस्तलाघव का करिश्मा। आज वह विभिन्न अनुशासनों ,विविध ज्ञान शाखाओं के विभिन्न भाषाओँ के विस्तार तक संसाधन बन गया है। सच कहा जाए तो आज विश्व का एक दूसरे का परिचय अनुवाद के परिचय पत्र के माध्यम से हो रहा है। एक ओर ललित तथा सृजनात्मक साहित्य की अन्य भाषा में जस की तस ,प्रस्तुति अनुवाद की कला की संज्ञा प्रदान करती है ,वहीँ दूसरी ओर भौतिक ,तकनीकी ,वैज्ञानिक ,आद्योगिक शब्दावली का तर्कसम्मत सन्दर्भ सापेक्ष अनुवाद उसे विज्ञान की शाखा में सम्मिलित करने के लिए तत्पर दिखता है। विज्ञानं ,तकनीकी ,चिकित्सा ,विधि तथा वाणिज्य आदि विषयों के अनुवाद में साहित्यिक भावुक भंगिमा के बजाए एक नियत अर्थ के लिए ,एक विशेष प्रयोजन के लिए एक पर्यायहीन शब्द का प्रयोग होता है। भाषा की विभिन्न शैलीगत प्रयोगों से हटकर एक निरपेक्ष एकार्थक शब्द अनुवाद को विज्ञान का रु[प प्रदान करता है। ऐसी पारिभाषिक शब्दावली में न तो भावनाओं का झाग होता है न ही विचारों की झंझा और न किसी दर्शन का आत्मालाप परन्तु उसमें होता है मात्र माध्यम बनने की नियति। 

अनुवाद कार्य का आधार

संक्षेप में अनुवाद मूल की जीवंत अनुकृति को इतर भाषा में प्रस्तुत करता है। मूल रचाव -कसाव के साथ पुनः प्रस्तुतिकरण का प्रयत्न अनुवाद की कला अनुशासन में सम्मिलित करा देता है। वहीँ वैज्ञानिक ,तकनीकी ,वाणिज्य ,विधि ,चिकित्सा आदि पारिभाषिक विषयों में अनुवाद की अनाशक्ति ,एकार्थाकता ,पर्यायहीनता ,विकल्पशून्यता ,स्पष्टता तथा सरलता अनुवाद को विज्ञान का दर्जा प्रदान करते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि अनुवाद कार्य कार्बन कॉपी करना जैसा सरल कार्य नहीं है ,बल्कि वह स्त्रोत भाषा के सृजनात्मक साहित्य की सृजनात्मकता को लक्ष्य भाषा में उसी क्षमता में उसकी सभी सूक्ष्मताओं एवं भंगिमाओं के साथ रूपांतरित करने का प्रयत्न है। दूसरी ओर वह कार्यालयी अनुवाद की रूक्ष आचार संहिताओं एवं मर्यादाओं व मूल की कार्यालयहीनता को लक्ष्य भाषा में उनकी सम्पूर्ण अनाशक्त ,स्पष्ट एवं तटस्थ भाव से अभिव्यक्त कर देता है। सृजनात्मक साहित्य की सृजनात्मकता से उसका सक्रीय साक्षात्कार एवं कार्यालयीन साहित्य के प्रति उसकी अनाशक्त तटस्थता के कारण अनुवाद को आज कला के साथ साथ विज्ञान भी माना जाने लगा है। 

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