एक और वापसी

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मेट्रो स्टेशन पहुँच कर वह घर जाने वाली मेट्रो ट्रेन में बैठ गया । सीट पर बैठ कर उसने अपनी आँखें मूँद लीं । उसे लगा जैसे वह बरसों बाद अपने घर वापस लौट

एक और वापसी


लोग आपने-सामने की सीटों पर ऐसे बैठे थे जैसे खेत की क्यारियों में उगी हुई गोभियाँ हों । सीट पर बैठ कर उसने सुबह का अंग्रेज़ी अख़बार निकाल लिया । भला हो इस मेट्रो ट्रेन का । नहीं तो वह बसों के धक्के खा रहा होता । कुछ साल पहले की तरह । मेट्रो के ए.सी. माहौल में वह बड़ी राहत महसूस कर रहा था । हर दिन सुबह-शाम घर से दफ़्तर और दफ़्तर से घर तक का सफ़र अब ज़्यादा आसानी से कट जाता था ।

उसने एक नज़र सामने की सीट पर बैठे यात्रियों पर डाली । केन्द्रीय सचिवालय के स्टेशन से उसकी तरह ही कई सरकारी कर्मचारी घर जाने के लिए मेट्रो ट्रेन पर चढ़े थे । कई थके हुए चेहरे एक-दूसरे को यूँ देख रहे थे जैसे आईने में वे अपना ही प्रतिबिंब देख रहे हों । उसने घड़ी पर निगाह डाली । शाम के साढ़े छह बज रहे थे । जब वह दफ़्तर से निकला था तब सूर्यास्त हो रहा था ।

अचानक उसकी निगाह सामने ज़रा दाईं ओर की सीट पर बैठी युवती पर पड़ी । कुछ पलों के लिए वह उस अनुपम सौंदर्य को अपलक निहारता रह गया । उस युवती से नज़रें मिलते ही थोड़ा झिझक कर उसने अपनी निगाहें हटा लीं और अख़बार खोल कर पढ़ने की कोशिश करने लगा । लेकिन उसके मन में वह मनोहारी छवि जैसे रच-बस गई । आह , क्या चेहरा है । क्या आँखें हैं । क्या फ़िगर है । युवती की शक्ल किससे मिलती-जुलती थी ? मधुबाला से या माधुरी दीक्षित से ? उसे उस युवती की ओर देखने की उत्कट इच्छा हुई ।

कनखियों से उसने उस युवती की ओर दोबारा देखा और उसकी ओर खिंचा चला गया । क्या प्रबल आकर्षण था । उसे लगा जैसे मेट्रो के डिब्बे में सूर्योदय हो गया हो । उसके कानों में किशोर कुमार के शोख़ और मस्ती से भरे गीत बजने लगे । मेट्रो के डिब्बे में जैसे वसंत ऋतु आ गई थी । क्या पास ही कहीं कोयल कूकी ? यह फूलों की सुगंध कहाँ से आई ? उसके मन में उस युवती को निहारते रहने की उत्कट इच्छा हुई । वह इस अजनबी युवती के लिए एकतरफ़ा चुम्बकीय आकर्षण के गुप्त-बंधन में बँधा चला जा रहा था ।

लोग उसे युवती को घूरते हुए न देख लें , इसलिए उसने अख़बार पढ़ने की कोशिश की । समूचा अख़बार वाहियात खबरों से भरा हुआ था । मुंबई में हुए आतंकवादी हमलों के बाद अब पाकिस्तान से युद्ध की शंका जताई जा रही थी । उसे लगा जैसे उसकी आँखों में नौ मन धूल-मिट्टी पड़ गई हो । सारी दुनिया पागल हुई जा रही थी । 

अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी विमानों द्वारा की गई बमबारी में दर्जनों लोग मारे गए थे । इराक़ , सीरिया और पाकिस्तान में हुए बम-विस्फोटों में बीसियों लोग हताहत हुए थे । इज़राइल ने हमास पर हमला कर दिया था । फ़िलिस्तीन में खून-ख़राबा हो रहा था । ईरान लम्बी दूरी तक मार करने वाले प्रक्षेपास्त्रों का परीक्षण कर रहा था । रूस जार्जिया को हमले की धमकी दे रहा था । सोमालिया के तट के पास समुद्री लुटेरे जहाज़ों का अपचालन करके दर्जनों लोगों को बंधक बना रहे थे । और उन्हें छोड़ने के लिए लाखों डॉलर की फिरौती माँग रहे थे । पढ़ते-पढ़ते उसका दिमाग़ ख़राब होने लगा । वह उँगली से नाक में से गंदगी निकालते-से समय का हिस्सा नहीं बनना चाहता था ।
एक और वापसी

उसने एक बार फिर उस युवती की ओर देखा । आह , क्या अतुल्य सौंदर्य था । भगवान ने उसे बड़ी मेहनत से तराशा था । युवती को देखते-देखते उसकी जीभ पर शहद का स्वाद आ गया । उसके नाक में पके हुए चौसा आम की ख़ुशबू समा गई । अनायास ही उसने अपनी क़मीज़ का ऊपरी बटन खोल लिया । युवती साथ बैठी महिला से बातें करते हुए किसी बात पर मुस्कुराई । हाँ , मधुबाला जैसी मुस्कान थी उसकी । अचानक उसकी आँखें युवती की आँखों से मिलीं । आह , क्या नरगिसी आँखें थीं — उसने सोचा । सौंदर्य की सराहना होनी ही चाहिए । वर्ना क्या रखा था इस जीवन में । वही आतंकवाद , रोज़मर्रा की चीज़ों के बेतहाशा बढ़ते दाम ।

उसने एक बार फिर युवती की ओर देखा । गुलाबी टॉप और नीली जींस में वह बेहद सुंदर लग रही थी । अचानक उसके भीतर से उठी एक आवाज़ ने उसे चेतावनी दी — ‘ सम्भव जा । तू शादी-शुद्ध है । दो-दो बच्चे हैं तेरे । यह किधर जा रहा है तू ? अपनी उम्र का तो ख़्याल कर । ‘

तो क्या हुआ — उसने ख़ुद को समझाया । उसे भी तो जीवन जीने का हक़ है । मज़ा लेने का हक़ है । वह अब पैंतालीस साल का हो गया था । उसकी कनपटी के बाल थोड़े पक गए थे । वह सिर के बीच से थोड़ा गंजा हो गया था और उसकी हल्की -सी तोंद निकल आई थी — इसका यह अर्थ तो नहीं था कि वह मोह-माया त्याग कर साधु बन जाए । यह जीवन कितना छोटा था । इसमें आनंद देने वाले पल कितने कम थे । शादी के बाद वह अपने लिए कहाँ जी पाया था । घर-गृहस्थी का बोझ सँभालते हुए उसकी उम्र बीती जा रही थी । जब वह काफ़ी युवा था तभी उसके पिता ने उसकी शादी अपने एक मित्र की बेटी से कर दी थी । वह अपनी जवानी को ठीक से ‘ एंजोय ‘ भी नहीं कर पाया था । करोड़ों भारतीयों की तरह शादी के बाद अपनी पत्नी से प्यार करना ही उसकी मजबूरी बन गई थी । और फिर वह कौन-सा इस एकतरफ़ा आकर्षण के खेल को गम्भीरता से ले रहा था । उसने थोड़ी-सी दिल्लगी कर ही ली तो क्या हो गया — उसने ख़ुद को समझाया ।

तभी कश्मीरी गेट स्टेशन आ गया । रोज़ की तरह उसे यहाँ अंडरग्राउंड मेट्रो ट्रेन से उतर कर शाहदरा जाने वाली ओवरहेड मेट्रो ट्रेन पकड़नी थी । लेकिन यह युवती अब भी अपनी सीट पर बैठी हुई थी । उसे शायद आगे जाना था । ‘ यदि मैं यहाँ न उतरूँ तो ‘ — उसने ख़ुद से पूछा । ‘ यदि मैं इस सुंदरी के पीछे-पीछे चला जाऊँ तो ? ‘ उसे लगा जैसे वह वापस अपने युवावस्था के दिनों की ओर लौट रहा हो । अपनी जवानी की ओर यह वापसी उसे कितनी सुखद लग रही थी ।

शायद वह युवती अगले स्टेशन पर उतर जाए । तब मैं भी उतर कर दूसरी मेट्रो ट्रेन पकड़ कर वापस घर जा सकता हूँ । चलो , थोड़ी देर का साथ और सही — उसने खुद को समझाया । एकाएक यह खेल अब ऊँचे गियर में चला गया था । सिविल लाइन्स का स्टेशन आया और निकल गया । फिर विधान सभा का स्टेशन आया और पीछे छूट गया । युवती नहीं उतरी । वह भी युवती को कनखियों से ताकता हुआ बैठा रहा । वह अब उस युवती की परछाईं बन जाना चाहता था । अब उसका पूरा वजूद उस युवती को उसके अज्ञात नाम से पुकार रहा था ।
‘ यह क्या कर रहा है , बेवक़ूफ़ ‘ — उसके भीतर की आवाज़ ने उसे चेतावनी दी । ‘ मैं रास्ता भटक गया हूँ । गलती से ग़लत मेट्रो ट्रेन में बैठ गया हूँ ‘ — उसने अपने भीतर की आवाज़ को समझाया । लेकिन यह सच नहीं था । वह जानता था कि वह पूरे होशो-हवास में में इस युवती का पीछा कर रहा था । ‘ मैं मुखर्जी नगर में रहने वाली अपनी दूर की रिश्ते की चाची से मिलने जा रहा हूँ ‘ — उसने खुद को बेवकूफ़ बनाना चाहा । पर यह भी सच नहीं था । वह जान-बूझकर उस सुंदरी के पीछे-पीछे यहाँ तक चला आया था ।
‘ हाँ , मैं इस सुंदरी को चाहने लगा हूँ ‘ उसने मन में ही चिल्ला कर खुद से कहा । ‘ सारी दिशाएँ ग़लत हैं । केवल एक ही दिशा सही है , जिसमें यह युवती जा रही है । इस सौन्दर्यवती का पीछा मैं ब्रह्मांड के अंतिम छोर तक कर सकता हूँ ‘ — उसने खुद से कहा ।
‘ और तुम्हारी पत्नी का क्या होगा जो घर पर बैठी तुम्हारा इंतज़ार कर रही है ‘ — उसके भीतर की आवाज़ ने उसे फिर टोका ।
‘ कह दूँगा , आज दफ़्तर में काम बहुत था ‘ उसने कहा । उसके भीतर की आवाज़ आज बहुत बक-बक कर रही थी ।
कहाँ वह लावण्यमयी युवती थी , कहाँ उसकी पत्नी थी । भला दोनों का कोई मेल था क्या ? यह युवती परम सुंदरी थी जबकि उसकी पत्नी की बची-ख़ुशी ख़ूबसूरती भी घर-गृहस्थी के चक्कर में दब कर ख़त्म हो चुकी थी । यह युवती दूध-सी गोरी थी जबकि उसकी पत्नी कितनी साँवली थी । यह युवती कितनी छरहरी थी जबकि उसकी पत्नी शादी के बाद से लगातार मोटी होती चली गई थी । लगता था जैसे भगवान ने इस सुंदरी को फुर्सत के समय जबकि उसकी पत्नी को ओवर-टाइम के समय बनाया था — उसने सोचा ।
मेट्रो ट्रेन अब विश्वविद्यालय के स्टेशन के पास पहुँचने वाली थी । उसने एक बार एक भरपूर निगाह उस युवती पर डाली । आह , इस युवती का सौंदर्य कितना मासूम था , कितना मनोहारी था , कितना मोहक था । कुल-वर्ण से भी वह शिक्षित , सभ्य , संभ्रांत परिवार की कुलीन संस्कारों वाली युवती लगती थी । उसके एक-एक अंग से शील टपक रहा था । उसके बदन का एक-एक अंग जैसे लाज में तराशा हुआ था — उसने सोचा । यह युवती एक दमकता हुआ हीरा थी । सुंदर हो कर भी वह कितनी सुशील थी । काश , पिताजी ने मेरी शादी में इतनी जल्दी नहीं की होती । ऐसी युवती यदि उसकी पत्नी होती तो उसका जीवन कितना सुखमय होता — उसने सोचा ।
‘ अपनी उम्र तो देखो , — उसके भीतर की आवाज़ ने उसे सलाह दी ।
‘ उम्र क्या चीज़ होती है ? इमरान खान ने जब जेमिमा से शादी की थी तो क्या उनकी उम्र एक ही थी ? पंडित रविशंकर अपनी बेटी की उम्र की युवती से शादी करके खुश थे । दुनिया में ऐसे सैकड़ों -हज़ारों उदाहरण मौजूद थे ‘ — उसने अपने भीतर की आवाज़ को डपट कर कहा ।
तभी विश्वविद्यालय का स्टेशन आ गया । लोगों की भीड़ मेट्रो के दरवाज़े की ओर बढ़ने लगी । युवती भी अब अपनी सीट से उठ खड़ी हुई । वह भी अपनी सीट से उठ गया । वह उस युवती से एक निश्चित दूरी बनाए हुए उस भीड़ में अपनी आँखों से उसे थामे रहा ।
मेट्रो स्टेशन से बाहर निकल कर युवती एक ऑटो रिक्शा में जा बैठी । अब ? उसने खुद से पूछा । जब यहाँ तक आ गया हूँ तो थोड़ी दूर और सही — उसने सोचा । ऐसी सुंदरी के लिए तो आदमी कहीं भी जा सकता है । उसने जल्दी से एक ऑटो-रिक्शा लिया और ड्राइवर को युवती के ऑटो-रिक्शे के पीछे चलने का निर्देश दिया । आगे वाला ऑटो फुदकता हुआ रिंग-रोड छोड़ कर हरी हो गई लाल बत्ती से दाईं ओर मुखर्जी नगर जाने वाली सड़क की ओर मुड़ गया । उसने अपने ऑटो को भी आगे वाले ऑटो के पीछे लगा लिया । वह खुद को उस सुंदरी के असीम आकर्षण की अदृश्य डोर से बँधा हुआ महसूस कर रहा था ।

बतरा सिनेमा से थोड़ा पहले उसके आगे वाला ऑटो रुका । युवती के ऑटो से थोड़ा पहले उसने अपना ऑटो भी रुकवा लिया । युवती ऑटो से उतरी और फुटपाथ पर पहले से ही खड़े चार-पाँच लफ़ंगे जैसे दिखने वाले युवकों के पास पहुँची । युवकों ने उसे कुछ रुपये दिए । युवती ने रुपए लेने से इंकार कर दिया । उनके बीच थोड़ी बहस होने लगी । वह हैरान-सा पिछले ऑटो-रिक्शा में बैठा हुआ यह सारा तमाशा देख रहा था । अब युवकों ने उस युवती को और ज़्यादा रुपए दिए । इस बार युवती ने रुपए ले कर अपने पर्स में डाल लिए ।और फिर सारे युवक उस युवती को बारी-बारी से चूमने लगे । उनके हाथ उसके अंगों को टटोल रहे थे । इसी अवस्था में वे सब पास ही खड़ी एक मारुति कार में बैठे और कार धूल उड़ाती हुई कुछ ही पलों में आँखों से ओझल हो गई ।

वह सन्न रह गया । वह एक भूखे आदमी द्वारा एक बड़े-से डोंगे से ढक्कन हटाने जैसा पल था । भीतर डोंगे में कुछ भी नहीं बचा था । उसे लगा जैसे बीच दोपहरी में अचानक सूर्यास्त हो गया हो । जैसे आसमान में अचानक घुप्प अँधेरा छा गया हो । वहाँ न चाँद था , न सितारे थे । अचानक उसे बड़ी शिद्दत से एक उदास ख़ालीपन का बोध हुआ । उसे लगा जैसे वह बेहद थक गया था । खेल ख़त्म हो चुका था । वह हारे हुए खिलाड़ी-सा बुझा महसूस कर रहा था । उसने ड्राइवर को ऑटो-रिक्शा वापस विश्वविद्यालय के मेट्रो ट्रेन स्टेशन ले चलने के लिए कहा ।

उसे लग रहा था जैसे उसके दिल पर भारी पत्थर पड़ा हुआ हो । उसके मन के मूर्तिकार ने उस युवती के बारे में इतनी मेहनत से जो छवि गढ़ी थी वह एक पल में खंडित हो कर धूल-धूसरित हो गई थी । उसे लगा जैसे पिछले डेढ़ घंटों में वह कई बरस बूढ़ा हो गया था । उसके घुटनों के जोड़ों में दर्द होने लगा । अचानक उसे खाँसी का तेज़ दौरा पड़ा । उसका मन न जाने कैसा-कैसा करने लगा ।

संयत होने पर उसे अपनी पत्नी का प्यारा चेहरा और बच्चों की मीठी बातें याद आईं । उसे याद आया कि वह अपनी बीवी-बच्चों से कितना प्यार करता था । उसने चाहा कि वह जल्दी से घर पहुँच कर अपनी पत्नी की गोद में सिर रखकर लेट जाए । वह अपने चेहरे पर अपनी पत्नी के हाथों का स्नेहिल स्पर्श महसूस करना चाहता था । वह अपने बच्चों को गोद में ले कर चूमना चाहता था । उसे लगा कि वह घने जंगल में रास्ता भटक गया था । उसे लगा जैसे वह किसी चमकीली सतह पर फिसल कर गिर गया था । मेट्रो स्टेशन पहुँच कर वह घर जाने वाली मेट्रो ट्रेन में बैठ गया । सीट पर बैठ कर उसने अपनी आँखें मूँद लीं । उसे लगा जैसे वह बरसों बाद अपने घर वापस लौट रहा हो । घर-वापसी के ख़्याल से ही उसे राहत महसूस होने लगी ।

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सुशांत सुप्रिय
A-5001 ,
गौड़ ग्रीन सिटी,
वैभव खंड,
इंदिरापुरम् ,
ग़ाज़ियाबाद-201014
( उ.प्र.)
मो : 8512070086
email: sushant1968@gmail.com
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