नाला सोपारा

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हम आजादी की 73 वीं वर्षगाँठ मना चुके हैं। इस बीच हम अनेक मध्यकालीन रूढ़ियों, अंधविश्वासों और सड़ी-गली मान्यताओं को भी तोड़ चुके हैं। सती प्रथा, बाल

सम्मान की ज़िंदगी जीने की चाहत : नाला सोपारा



हम आजादी की 73 वीं वर्षगाँठ मना चुके हैं। इस बीच हम अनेक मध्यकालीन  रूढ़ियों, अंधविश्वासों और सड़ी-गली मान्यताओं को भी तोड़ चुके हैं। सती प्रथा, बाल विवाह, अस्पृश्यता आदि से निजात पा चुके हैं। इतना ही नहीं, हाशियाकृत समुदायों को केंद्र में लाने की पुरजोर कोशिश करके एक हद तक सफलता भी प्राप्त कर चुके हैं। स्त्री, दलित और आदिवासी समुदायों के मानवाधिकारों की बहाली इसका प्रबल उदाहरण है।  लेकिन जब बात आती है किन्नरों की, तो सभी आदर्शवादी बातें हाशिये पर चली जाती हैं। जरा एक मिनट के लिए सोचें तो सही! सड़क पर जाते समय या ट्रेन में सफर करते समय यदि किन्नर सामने आ जाए तो .... हम अंदर ही अंदर डरने लगते हैं, उनसे बचकर जाने की कोशिश करते हैं, इतना ही नहीं उन्हें हिकारत की दृष्टि से देखने लगते हैं। 

आखिर किन्नर कौन हैं? वे कहाँ से आए? हम क्यों उनसे डरते हैं? क्यों उन्हें हिकारत की दृष्टि से देखते हैं? किन्नर भी इसी समाज के सदस्य हैं, तो फिर उनके साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया जाता है? शारीरिक रूप से विकलांग को और मानसिक रूप से विकृत व्यक्ति को घर-परिवार में और समाज में भी स्थान मिलता है, लेकिन आनुवंशिक (जेनेटिक) रूप से विकृत व्यक्ति को समाज क्यों नहीं अपना सकता? आखिर उनका क्या दोष है? विज्ञान यह साबित कर चुका है कि यह विकृति क्रोमोसोमल उत्परिवर्तन (क्रोमोसोमल म्यूटेशन) के कारणवश पैदा होती है। स्वाभाविक रूप से मनुष्य में 46 क्रोमोसोम होते हैं। 22 +xx हैं तो स्त्री; और 22+xy हैं तो पुरुष। लेकिन जब क्रोमोसोमल उत्परिवर्तन होता है तो आनुवंशिक विकृति होती है। ऐसी स्थिति में किन्नर पैदा हो जाते हैं। उनमें 22+xyy या 22+xxy क्रोमोसोम होते हैं। यह तो प्रकृति प्रदत्त है। इसमें उस बच्चे का क्या दोष है? लेकिन उसे घर-परिवार से दूर होना पड़ता है और समाज की दृष्टि में भी एक गाली बनकर रह जाना पड़ता है। किन्नरों की व्यथा-कथा को अनेक साहित्यकारों ने अपने-अपने ढंग से अभिव्यक्त किया है। उनमें विख्यात कथाकार चित्रा मुद्गल का अग्रणी स्थान है। जब उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई, उस समय संध्या द्विवेदी से बातचीत करते हुए चित्रा मुद्गल ने यह स्पष्ट किया कि लंबे समय से उनके मन में भी एक पीड़ा थी। एक छटपटाहट थी, कि “आखिर क्यों हमारे इस अहम हिस्से को अलग-थलग किया जा रहा है। हमारे बच्चों को क्यों हमसे दूर किया जा रहा है। आजादी से लेकर अभी तक कई रूढ़ियाँ टूटीं। लेकिन किन्नरों की ज़िंदगी में कोई बदलाव नहीं आया। क्यों, आखिर इनका दोष क्या है? यही सवाल था जो मुझे बेचैन करता था।“ इसमें संदेह नहीं कि चित्रा मुद्गल की इसी बेचैनी का परिणाम है ‘पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा’ (2016)। इसी उपन्यास के लिए उन्हें 2018 के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया।         
आधुनिक भारतीय साहित्य में चित्रा मुद्गल (1943) का अपना एक विशिष्ट स्थान है। मूलभूत मानवाधिकारों से वंचित समुदायों के बीच रहकर उन्होंने उनके अधिकारों के लिए संघर्ष किया है। अतः उनकी कथनी और करनी में अंतर नहीं दिखाई देता। उनके अन्य उपन्यासों में एक जमीन अपनी, आवाँ, गिलीगडु उल्लेखनीय हैं। उनकी संपूर्ण कहानियाँ ‘आदि-अनादि’ नाम से तीन खंडों में प्रकाशित हैं। सहकारी विकास संगठन, मुंबई द्वारा फणीशवरनाथ रेणु सम्मान (एक जमीन अपनी), यू.के. अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान (आवाँ), हिंदी अकादमी दिल्ली के साहित्यकार सम्मान से वे अलंकृत हो चुकी हैं। उनके उपन्यासों एवं कहानियों की कथा-भूमि में वैविध्य द्रष्टव्य है। उनके कथा साहित्य की ग्राफ नीचे से ऊपर की ओर जाती हुई नजर आती है।  

चित्रा मुद्गल अपने प्रयोगों के लिए जानी जाती हैं। उनकी सब कथाकृतियों का प्लॉट एक-दूसरे से भिन्न है। वे हमेशा ही चर्चा में रहीं। ‘एक जमीन अपनी’ और 'आवाँ’ में जहाँ उन्होंने स्त्री विमर्श को ऊँचाइयों तक पहुँचाया, वहीं ‘गिलीगडु’ में वृद्धावस्था की चर्चा की। इन सबसे अलग, ‘पोस्ट बॉक्स नं. 203 नाला सोपारा’ की कथावस्तु उस हाशियाकृत समुदाय (किन्नर) पर केंद्रित है, जिसे सभ्य समाज में कीड़े-मकौड़ों से भी हेय दृष्टि से देख जाता है। इस उपन्यास की शैली पत्रात्मक है। पत्रों में पुत्र का एक बेबस माँ से संवाद है। कुल मिलाकर सत्रह (23 जुलाई, 2011 से लेकर 24 दिसंबर 2011 के बीच लिखे गए) पत्र और उपसंहार में दो समाचार इस उपन्यास में सम्मिलित हैं। यह उनकी प्रयोगधर्मिता का ही परिचायक है। 

इस कथा की शुरूआत होती है विनोद के पत्र से (संपूर्ण उपन्यास में सिर्फ विनोद के ही पत्र हैं। उन्हीं पत्रों में माँ की पीड़ा को भी अभिव्यक्त किया गया है, संवादों के माध्यम से)। उपन्यास के नायक विनोद को अपने परिवार से दूर होना पड़ता है - किन्नर होने के कारण। अपनी बा को संबोधित करते हुए वह लिखता है कि “जब बाहर और भीतर एक साथ मेघ बरस रहे हों तो तुझे लिखी जाने वाली चिट्ठी शुरू कैसे हो सकती है?” (पृ. 8)। इस वाक्य में गुँथी विनोद की पीड़ा द्रष्टव्य है। माँ अपने बेटे की पीड़ा को कम करने के लिए कहती है कि जब जब वह अनमना महसूस करे, तब तब ध्यान मुद्रा में बैठकर अपनी अंतरात्मा में कृष्ण की छवि को उतारने की कोशिश करे। लेकिन विनोद को कृष्ण दिखाई नहीं देते। इसीलिए वह पूछ बैठता है कि कृष्ण को उस जगह से परहेज तो नहीं, जहाँ वह रह रहा है या फिर आधे-अधूरे उससे! 


विडंबना देखिए, जब शरीर का कोई अंग काम नहीं करता या उसे काटना पड़ जाए, तो उसके स्थान पर नकली अंग लगाया जा सकता है। लेकिन आनुवंशिक विकलांगता के लिए ऐसा कोई प्रावधान है नहीं, इसके सिवाय कि उस बच्चे को हमेशा-हमेशा के लिए त्याग दिया जाए। विनोद की मानसिक व्यथा को चित्रा मुद्गल ने इन वाक्यों के माध्यम से अभिव्यक्त किया है - “तूने, मेरी बा, तूने और पप्पा ने मिलकर मुझे कसाइयों के हाथ मासूम बकरी-सा सौंप दिया। मेरी सुरक्षा के लिए कोई कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं की? मनसुख भाई जैसे पुलिस अधीक्षक पप्पा के गहरे दोस्त के होते हुए? वो अपने आप मुझे बचाने के लिए तो आ नहीं सकते थे? मेरे आंगिक दोष की बात पप्पा ने उनसे बाँटी जो नहीं होगी। वरना वह मुझे बचाने जरूर आ जाते। क्यों वह अनर्थ हो जाने दिया तूने, जिसके लिए मैं दोषी नहीं था! ... क्या सामान्य लोगों की तरह जीवन जीने का अधिकार न होता मेरा?” (पृ. 11)। ट्रांसजेंडरों के लिए कानून बना है, फिर भी ज़मीनी सच्चाई यह है कि उन्हें वह अधिकार प्राप्त नहीं है। वे तो हर तरह से उपेक्षित हैं।  

सरकार ने कन्याभ्रूण हत्या को अपराध मानते हुए कानून बनाया। इसके तहत माता-पिता को अपराधी माना जाता है। लेकिन जननांग दोषी बच्चों को त्यागने वाले माता-पिता अपराधी नहीं हैं? मेडिकल साइंस के चमत्कारों से क्या
नाला सोपारा

नहीं हो सकता? हार्मोन असंतुलन को भी संतुलित किया जा रहा है। सर्जरी के माध्यम से दोषों को ठीक किया जा सकता है, तो जननांग दोष को क्यों नहीं? अतः चित्रा मुद्गल विनोद के माध्यम से टिप्पणी करती हैं कि “अविकसित लिंग दोषियों के दिल-दिमाग में स्वयं के प्रति बैठे हुए नकारात्मक सोच को निष्कासित करना जरूरी है।“ (पृ. 178)

कानूनन अब किन्नरों को 'अन्य' वर्ग में शामिल किया गया है। जब पूनम विनोद से कहती है कि जनगणना में सरकार ने किन्नरों को शामिल कर लिया है, तो विनोद आक्रोश व्यक्त करता है और कहता है कि किन्नरों को अन्य-0 कहने के पीछे निहित सत्ता के मकसद को समझने की कोशिश करनी होगी। “मर्द और औरत तक तो जेंडर का विभाजन ठीक है पर अन्य-0 क्यों? लिंग दोष के चलते हमें ‘अन्य-0’ की श्रेणी में झोंक दिया जाएगा। हम तुम्हें पहचान दे रहे हैं। पहचान देने के लिए ही यह श्रेणी बनाई है। पहचान लेकिन वही रहेगी जो रही चली आई है।“ (पृ. 113)। विनोद नहीं चाहता है तिरस्कार और अपमान की ज़िंदगी जीना। वह तो सम्मान की ज़िंदगी जीना चाहता है। इसलिए वह कहता है “कह देना सरदार से। ‘अन्य-0’ में शरीक होकर नहीं बनवाना मुझे आधार कार्ड। .... फोटो ऊपर की खिंचेगी, नीचे की नहीं।“ (पृ.113)। चित्रा मुद्गल ने विनोद के माध्यम से किन्नर समुदाय की मनोकामना को अभिव्यक्त किया है कि वे भी हम सबकी तरह ही सम्मान की ज़िंदगी जीना चाहते हैं। सरकार ने किन्नरों को तीसरे खाने में आरक्षित किया है। चित्रा मुद्गल विनोद के माध्यम से यह टिप्पणी करती हैं कि “इस खेल को जननांग दोषी नहीं समझ पा रहे हैं। नहीं समझ पाएँगे।“ (पृ.178) 

विनोद रिश्तों के लिए तड़पता है, अपनों के प्यार के लिए तरसता है। वह अपनी पीड़ा को एक पत्र में अभिव्यक्त करता है, जिसे पढ़ते समय आँखें नम हो आती हैं - “अपने इस दीकरे को तुम लोगों ने स्वयं घर से खदेड़ उन हाथों में सौंप दिया, जिन्होंने अपने मानसिक अनुकूलन को ही अपनी नियति मान लिया और हाशिये के उस नरक की शर्तों को अपने जीवन का पर्याय। मन सुलगती-भीगती लकड़ियों सा घुनता रहता है बा, क्यों नहीं तोड़ने की कोशिश की उन लोगों ने उन शर्तों को कि नहीं जिएंगे हम उस तरह से, जिस तरह वो जिलाए रखने की साजिश रच रहे हैं। अपने मनोरंजन और खिलंदड़ेपन के रस को जीने के लिए!” (पृ. 50)। विनोद यहाँ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि किन्नर समुदाय का प्रतिनिधि है। वह कहता है कि जिस नरक में उसे धकेला गया है, वह एक अंधा कुआं है, जिसमें सिर्फ साँप-बिच्छू रहते हैं। “साँप-बिच्छू बनकर वह पैदा नहीं हुए होंगे। बस, इस कुएं ने उन्हें आदमी नहीं रहने दिया।“ (पृ.11)।  

विनोद की मानसिक पीड़ा को पढ़ते समय ऐसा नहीं लगता कि चित्रा मुद्गल ने मात्र कल्पना का सहारा लिया है। पूरे उपन्यास में विनोद किन्नर होकर पैदा होने की पीड़ा, घर-परिवार और समाज से तिरस्कृत होने का दंश झेलता है। वह किन्नर समुदाय के कायदे-कानून नहीं अपना सकता। वह कहता है, “उनके लात, घूंसे, थप्पड़ और कानों में गरम तेल सी टपकती किसी भी संबंध को न बख्शने वाली अश्लील गालियों के बावजूद न मैं मटक-मटक कर ताली पीटने को राजी हुआ, न सलमे-सितारे वाली साड़ियाँ लपेट लिपिस्टिक लगा कानों में बुंदे लटकाने को। बहुत कुछ अविश्वसनीय वह हरकतें भी, जिन्होंने मुझे बहुत तोड़ने की कोशिश की और जिनका जिक्र मैं बा, तुझसे कैसे कर सकता हूँ।“ (पृ. 9)। चित्रा मुद्गल यदि इतने स्वाभाविक रूप से एक किन्नर की पीड़ा को अभिव्यक्त कर सकीं, तो इसके पीछे कारण है। साहित्य अकादमी पुरस्कार घोषित होने पर एनडीटीवी को दिए एक साक्षात्कार में इस बारे में उन्होंने बताया - “जब मैं मुंबई के नाला सोपारा में रहती थी, तब मैं एक ऐसे ही युवक से मिली थी। उसे किन्नर होने की वजह से घर से निकाल दिया गया था। यह उपन्यास उसी युवक के विद्रोह की कहानी है। मैंने उसे अपने घर पर बहुत दिनों तक साथ रखा।“
घर-परिवार के लोग किन्नर के रूप में पैदा हुए बच्चे को त्याग देते हैं। समाज उसे दुत्कारता है। लेकिन विडंबना देखिए, जब कभी किसी के घर विवाह संपन्न होता है या फिर नवजात शिशु का जन्म होता है तो किन्नरों का आशीर्वाद लिया जाता है। सामाजिक मान्यता है, किन्नर के आशीर्वाद से लोगों के वंश सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है। लेकिन उसी किन्नर समुदाय को हेय दृष्टि से देखा जाता है। 

माँ और बेटे के बीच सामाजिक दूरी है। उन्हें आपस में एक-दूसरे से बात करने के लिए पत्रों का सहारा लेना पड़ा। पत्र भी सीधे घर के पते पर नहीं भेज सकता वह; इसलिए माँ ने पोस्ट बॉक्स का सहारा लिया ताकि परिवार के सदस्य न जान सकें और जगहँसाई से भी बच सके। आखिर ऐसा क्यों? क्या दोष है उस बेटे का? उस माँ की स्थिति क्या होगी, जिसने उसे जन्म दिया? विनोद अपनी माँ से अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहता है- “मनुष्य के दो ही रूप अब तक देखे थे मैंने। इस तीसरे रूप से मैं परिचित तो था, लेकिन उसे मैं पहले रूप का ही एक अलग हिस्सा मानता था। तूने मेरे जन्मते ही मनुष्य के इस तीसरे रूप को देख लिया था न, बा! उसी समय खतम कर देना था न बा मुझे! तू किस मोह में पड़ गई थी, बोल?” (पृ. 25)। यह अंश पढ़ते समय पाठक एक बार ही सही सोचने लगता है। उसकी आँखों के समक्ष विनोद जैसे अनेक लोगों की पीड़ा का उभर आना स्वाभाविक है। 

चित्रा मुद्गल ने अनेक स्थलों पर किन्नरों की मानसिक पीड़ा और संघर्ष को मार्मिक रूप से उजागर किया है। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं - “कभी-कभी मैं अजीब सी अंधेरी बंद चिमगादडों से अटी सुरंग में स्वयं को घुटता हुआ पाता हूँ। बाहर निकलने को छ्टपटाता मैं मनुष्य तो हूँ न! कुछ कमी है मुझमें; इसकी इतनी बड़ी सजा!” (पृ. 30), “यह कौन सा तिलिस्म है बा! हैरत में हूँ... सबने मुझसे मुँह मोड़ लिया, सपनों ने मुँह नहीं फेरा।“ (पृ. 30), “कब तक लड़े कोई अपने से, अपनों से।“ (पृ. 33), “किन्नर के रूप में मरना नहीं चाहता।” (पृ. 33), “हिकारत की दक्षिणा जहर है, जहर, तुम्हें मारने का जहर।” (पृ. 50), “अपने वजूद के दाखिल होने की गुंजाइश की तलाश।” (पृ. 43)। ऐसी मार्मिक उक्तियाँ पीड़ा का जो पाठ रचती हैं, उससे किन्नर समुदाय के अस्तित्व की छटपटाहट बिंबित हो उठती है। 

चित्रा मुद्गल ने इस उपन्यास के माध्यम से किन्नरों के जीवन से संबंधित अनेक पहलुओं को मार्मिक रूप से उजागर किया है। विनोद किन्नर होने के कारण घर-परिवार से दूर होकर भावात्मक शोषण का शिकार होता है। वह चाहकर भी ज्योत्स्ना से विवाह नहीं कर सकता। इस बात से वह आजीवन दुखी रहता है। वह अपनी पीड़ा को एक पत्र में इस तरह व्यक्त करता है - “मुझे लगता है बा, मैं कुछ बन जाता तो उससे ब्याह जरूर करता। सब कुछ बता देता उसे। कह देता, तू मुझसे फेरे भर ले ले। अपनी इच्छाएँ जीने के लिए तू स्वतंत्र है। बच्चा हम गोद ले लेंगे। गोद नहीं लेना चाहेगी, तो जिससे मर्जी हो, बच्चा पैदा कर लो। खुशी-खुशी मैं उसे अपना नाम दूँगा, वे सारे सुख दूँगा, जो एक बाप से औलाद उम्मीद करती है।" (पृ.30)। इससे यह स्पष्ट है कि वह दूसरों की तरह ही ज़िंदगी जीना चाहता है, लेकिन यह हो नहीं पाता। वह रिश्तों के लिए तड़पता है। अंदर ही अंदर ही घुटता है। 

विनोद दूसरे बच्चों की तरह ही स्कूल जाता है और वह सभी विषयों में तेज है। बस फर्क इतना ही है कि वह “स्कूल की चारदीवारी से सटकर पैंट के बटन खोलकर खड़े” (पृ. 10) नहीं हो सकता दूसरों की तरह। उसे किन्नरों से बचाने के लिए माता-पिता बहुत कोशिश करते हैं। जब किन्नर पहली बार उनके घर पहुँचते हैं और बच्चे को दिखाने के लिए कहते हैं, तो उनसे विनोद को बचाने के लिए छोटे बेटे को दिखा दिया जाता है। “मंजुल की चड्ढी उतरवा चंपाबाई ने साफ कह दिया था - खेल खेल रहे हैं वे लोग उनके साथ। बच्चा इससे बड़ा है।“ (पृ. 12)। किन्नरों के डर से माँ विनोद को हॉस्टल भेजना चाहती है। उस समय उनका बड़ा बेटा यह आशंका व्यक्त करता है कि “चौदह बरस बाद अचानक जिन्न से हिजड़े यहाँ प्रकट हो सकते हैं, तो हॉस्टल में नहीं प्रकट हो सकते! कोई गारंटी है इसकी?” (पृ. 13)। विनोद की स्कूल की पढ़ाई छूट जाती है। एक दिन वह किन्नरों की पकड़ में आ ही जाता है और परिवार वाले बदनामी के डर से यह घोषित करते हैं कि एक दुर्घटना में उसकी मृत्यु हो गई। घर भी बदल लेते हैं।      
विनोद किन्नरों की टोली में रहने के लिए मजबूर हो जाता है, लेकिन वह अपने आपको उनके जैसा तो नहीं कर पाता। उसे किन्नरों के पारंपरिक काम स्वीकार्य नहीं हैं। लेकिन हाँ, उनके कुछ महत्वपूर्ण काम अपने जिम्मे जरूर लेता है। जैसे सरकारी, गैर सरकारी अस्पतालों के जचकी वार्डों के चक्कर लगाकर नए जन्मे बच्चों के घर-घाट के अते-पते नोट कर लाना, ताकि वे “उनसे बधावा उगाहने की रस्म पूरी कर सकें।“ (पृ. 25)। वह अपने अधूरेपन और कशमकश को दूर करना चाहता है। वह संकल्प लेता है कुछ बनने का तथा अपनी बिरादरी के लोगों को समाज में इज्जत दिलाने का। 

विनोद किन्नर समुदाय के प्रति भी अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए कहता है - “यह भीतर से खोखले और डरे हुए लोगों की जमात है। ये चाहते हैं, जिस विशेष परिभाषा से उन्हें मंडित किया गया है, उसी रूप में ही सही, उनकी भी एक संगठित उपस्थिति समाज में बने। उनकी ताकत में इजाफा हो। ढूँढ़ते फिरते हैं, जननांग विकलांगों को, इसीलिए। कहीं से कोई टोह मिल जाए। गुरु परंपरा से दीक्षित कर बनाए रखना चाहते हैं उस एकता को जो उन्हें आपस में जोड़े रहे। अब आप ही बताएँ बा, उन्हें समाज की मुख्यधारा में क्यों नहीं स्वीकार्य होना चाहिए?” (पृ.50-51)   

विनोद किन्नरों का पारंपरिक व्यवसाय नहीं अपनाता। वह पढ़-लिखकर कुछ बनना चाहता है। जब वह परिस्थितियों से थक हारकर मरने की बात करता है, तो पूनम मरने की बात पर कुठाराघात करती है और कहती है, “विधायक जी की कोठी पर बधावा नाचने गई थी उनके पोते के जन्म पर, तो उनसे बात कर ली थी। बोले थे पूनम, एक कागज पर उसके स्कूल का नाम, पता लिखवा लाना। मुश्किल थोड़े ही है उसके कागज मंगवाना।“ (पृ. 34)। पूनम भी किन्नर है। वह पढ़ना-लिखना चाहती है। “अंगूठा लगाना उसे मंजूर नहीं था। जो तय कर लेती है, उसे करके ही दम लेती है।“ (पृ. 25)। उसी की सहायता से जब विनोद विधायक जी से मिलता है, तो वे कहते हैं “जिल्लत की ज़िंदगी तू नहीं जीना चाहता, पुत्तर! बुलंद हौसला है तेरा।“ (पृ.39)। विधायक जी की कृपा से एनआईटी बेसिक कंप्यूटर प्रोग्राम में उसका दाखिला हो जाता है। धीरे-धीरे वह विधायक जी के सारे काम संभालने लगता है। विधायक जी का संबोधन ‘बाऊजी’ में बदल जाता है। 

चुनाव का मौसम है। विधायक जी किन्नरों को वोट बैंक बनाना चाहते हैं, इसलिए विनोद का ‘उपयोग’ करने का निश्चय करते हैं। पहले तो सभा को संबोधित करने के लिए उनके मन में स्थानीय राजनीतिज्ञ का नाम होता है, लेकिन एकदम अपना ख्याल बदल लेते हैं और यह मौका विनोद को दिया जाता है। विनोद मुहरा बन जाता है। लेकिन इसके पीछे निहित राजनीति से वह अपरिचित ही रहता है। वह किन्नर समुदाय को सम्मान की ज़िंदगी दिलाना चाहता है। वह सरकार से अपील करता है कि “लिंग दोषी बिरादरी की घर वापसी को वह सुनिश्चित करे।“ (पृ. 186)। वह भरी सभा में अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए कहता है कि हर किन्नर को अवमानना को झेलने से इनकार करना चाहिए। ज़िल्लत की ज़िंदगी जीने से अच्छा है “कुली बनिए। मिस्त्री बनिए, ईंट-गारा ढोइए, जो चाहे, सो कीजिए। पाएँगे मेहनत के कौर की तृप्ति।“ (पृ. 187) 

वस्तुतः वंचित समुदायों का संघर्ष अस्तित्व का संघर्ष है। मनुष्य माने जाने का संघर्ष है। यह तभी संभव होगा जब अन्य-0 का आरक्षित वर्ग समाप्त होगा। चित्रा मुद्गल कहती हैं कि “उन्हें अलग से इस रूप में चिह्नित करना घोर अमानवीय कृत्य है। किन्नर चाहे जिस भी वर्ग की संतान हों, चाहे जिस जाति-बिरादरी, समुदाय से संबंधित हों, उसी जाति-वर्ग के अनुसार उन्हें अपना सामान्य जीवन जीने की सुविधा मिलनी चाहिए। अगर वे आरक्षित श्रेणी के माता-पिता की संतानें हैं, तो वे उस आरक्षित श्रेणी को प्राप्त होने वाली सुविधाओं की हकदार हैं। समर्थ माता-पिता के समक्ष उनके समुचित भरण-पोषण की दिक्कत है ही नहीं। उन्हें जरूरत है तो जागरूकता की।“ (पृ. 195-196)। किन्नर समुदाय को यदि मुख्यधारा में लाना है, तो पहले उन्हें शिक्षित करना आवश्यक है। 

चुनाव दूर नहीं है। अतः विधायक जी अपनी तैयारी में लगे हुए हैं। फार्म हाउस में महफिल सजती है। पूनम नाच-गाने के बाद पोशाक बदलने के लिए ड्रेसिंग रूम में जाती है। विधायक जी के भतीजे और उनके दोस्त पूनम के साथ नृशंस व्यवहार करते हैं। किन्नरों के गुप्तांग देखने के लिए छुरी से उसके अंगों को बेरहमी से काट देते हैं। जब उनका नशा उतर जाता है, तो पूनम को अधमरी हालत में छोड़कर फरार हो जाते हैं। “विधायक जी के भतीजे बिल्लू समेत अन्य चारों दोस्तों को रातोंरात किसी अज्ञात स्थान के लिए रवाना कर दिया“ (पृ. 205) जाता है। अस्पताल में पूनम मृत्यु से लड़ रही है। उसकी स्थिति से विनोद विचलित होता है। इसी समय उसे पता चलता है कि उसकी माँ का स्वास्थ्य भी बिगड़ रहा है। विनोद पर इसका असर पड़ता है। ऐसी स्थिति में किन्नर विचार-विमर्श में भागीदारी लेने पहुँच रहे थे। उसकी मानसिक स्थिति ठीक न होने पर भी वह आंदोलन से मुँह नहीं मोड़ना चाहता। साथ ही “आस्तीन के विषधरों” (पृ. 218) को भी क्षमा नहीं करना चाहता। लेकिन विडंबना कि वह स्वयं  उन आस्तीन के साँपों का शिकार हो जाता है। 

उपन्यास का अंत दो समाचारों से होता है। समाचार एक (27 दिसंबर) - ‘एक स्वर्गवासी माँ का माफीनामा, अपने किन्नर बेटे से घर वापसी की अपील।‘ (पृ. 222)। इसके संबंध में एक साक्षात्कार में चित्रा मुद्गल ने स्पष्ट किया है कि “उपन्यास के अंत में अखबार में बेटे को घर वापस बुलाने का आग्रह और संपत्ति में हिस्सा देने की बात के जरिए मैं कहना चाहती हूँ कि स्त्री को अब अपने बच्चों के लिए चुप्पी तोड़नी होगी।“ समाचार दो (मुंबई, 27 दिसंबर) सूचित करता है कि “कुर्ला कॉम्प्लेक्स से लगी हुई मीठी नदी में पुलिस ने एक किन्नर की फूली लाश बरामद की। शव की शिनाख्त नहीं हो पाई है। सिर बुरी तरह कुचला हुआ।“ (पृ. 224)। विनोद राजनीति का शिकार हो जाता है। विनोद की मृत्यु से माफिया (मुन्ना भाई किन्नर गिरोह) का संबंध जोड़ दिया जाता है और मामले को रफा-दफा कर दिया जाता है। आखिर “लिंग-पूजक समाज लिंगविहीनों को कैसे बर्दाश्त करेगा?” (पृ. 153)                         

उपन्यास में अनेक स्थानों पर चित्रा मुद्गल ने विनोद के माध्यम से समाज की संकीर्ण मानसिकता पर आलोचनात्मक टिप्पणी की है। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं - 
“जरूरत है सोच बदलने की। संवेदनशील बनने की। सोच बदलेगी, तभी जब अभिभावक अपने लिंगदोषी बच्चों को कलंक मान किन्नरों के हवाले नहीं करेंगे। उन्हें घूरे में नहीं फेंकेंगे। ट्रांसजेंडर के खांचे में नहीं ढकेलेंगे।“ (पृ. 112) 
“कानून बनाए। बाध्य करे अभिभावकों को। घर से बहिष्कृत बच्चों को वह जिस भी उम्र के पड़ाव में हों, अपने साथ रखें। उनकी चेतना को झकझोरे, ताकि भविष्य में कोई माता-पिता लोकापवाद के भय से लिंगदोषी औलाद को दर-दर की ठोकरें खाने के लिए घूरे पर न फेंकें।” (पृ. 186)  
“जननांग विकलांगता बहुत बड़ा दोष है, लेकिन इतना बड़ा भी नहीं कि तुम मान लो कि तुम धड़ का मात्र निचला हिस्सा भर हो। मस्तिष्क नहीं हो, दिल नहीं हो, धड़कन नहीं हो, आँख नहीं हो। तुम्हारे हाथ-पैर नहीं हैं। हैं, हैं, हैं; सब ऐसा ही है, जैसे औरों के है। यौन सुख लेने-देने से वंचित हो तुम, वात्सल्य सुख से नहीं! सोचो।“ (पृ. 50) 
“सामाजिकता की संवेदना से शून्य हो गए हैं सभी। दरवाजों पर ही काठ के पल्ले नहीं जड़े हुए हैं। हृदय भी कठ-करेज हो गए हैं।“ (पृ. 49)
“सहिष्णुता समस्या का हल नहीं है। बच निकलने का बाईपास है।“ (पृ.49)
“सुनने के लिए किन्नर शब्द भले गाली न लगे, मगर अपने निहितार्थ में वह उतना ही क्रूर और मर्मांतक है, जितना हिजड़ा। किन्नर की सफेदपोशी में लिपटा चला आता है, उसकी ध्वन्यात्मकता में रचा-बसा। कोई भूले तो कैसे भूले?” (पृ. 42)
“हमेशा ऐसी स्थिति नहीं रहने वाली। वक़्त बदलेगा। वक़्त के साथ नजरिया बदलेगा। ... हो सकता है, भविष्य में इस अपराध का भी कोई इलाज निकल आए।“ (पृ. 10)    
कुल मिलाकर यह कहना उचित होगा कि पिछले 2 दशकों में आई किन्नर विमर्श की रचनाओं की बाढ़ में चित्रा मुद्गल का यह उपन्यास औरों से एकदम अलग है। लेखिका किन्नर को किन्नर बनाए रखने की राजनीति को उघाड़ने में पूरी तरह सफल रही हैं। किन्नर नहीं, उस समुदाय के प्रत्येक सदस्य को पूर्ण मनुष्य का सम्मान दिलवाना इस कथाकृति का चरम प्रयोजन है। इसीलिए यह अपने निहितार्थ में विमर्श से आगे की रचना है - किन्नर विमर्श की सीमाओं को उलाँघती हुई।



- डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा 
सह संपादक ‘स्रवंति’
असिस्टेंट प्रोफेसर
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा 
खैराताबाद, हैदराबाद - 500 004     

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नाला सोपारा
हम आजादी की 73 वीं वर्षगाँठ मना चुके हैं। इस बीच हम अनेक मध्यकालीन रूढ़ियों, अंधविश्वासों और सड़ी-गली मान्यताओं को भी तोड़ चुके हैं। सती प्रथा, बाल
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