जियो और जीने दो कहानी

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जियो और जीने दो कहानी जियो और जीने दो - देवी नागरानी मैंने चाय की दूसरी बार प्याली भर ली, और उसके ख़त्म होते ही ग़लीचे पर अपने पेट के बल लेट गई । सिलसिलेवार आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे , कितने तो मैं चाय की पहली प्याली के साथ पी गई थी। इस तन्हाई के आलम में यही सोचती रही कि शायद अपनों का साथ पाना मेरे हिस्से में न था या मैं ख़ुद को उसके लिये तैयार ही न कर पाई थी ।

जियो और जीने दो - देवी नागरानी

मैंने चाय की दूसरी बार प्याली भर ली, और उसके ख़त्म होते ही ग़लीचे पर अपने पेट के बल लेट गई । सिलसिलेवार आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे , कितने तो मैं चाय की पहली प्याली के साथ पी गई थी। इस तन्हाई के आलम में यही सोचती रही कि शायद अपनों का साथ पाना मेरे हिस्से में न था या मैं ख़ुद को उसके लिये तैयार ही न कर पाई थी । 

‘ये अपने पास निशानी के तौर पर रख लो. कभी याद के गलियारे से गुज़रो तो इस भाई को ज़रूर याद करना’, छोटे भाई सुरेन के ये शब्द मुझे आज भी याद हैं । 
जब बाबा गुज़र गए तो हम दोनों भाई-बहन अपने-अपने शहरों से हवाई जहाज़ से उनके आख़िरी दर्शन करने आ पहुँचे। पर क्या हम बाबा को देख पाए ? नहीं ! उनके चरण तक न छू पाए। अपने दर्द को सहलाते हुए जब हम वहाँ पहुंचे तो देखने को मिली उनके शरीर की अस्थियाँ जो शोलों के होम से इक मुट्ठी भर छार बनकर रह गई थी । क्या देखने की तमन्ना थी और क्या देखने को मिला ? बाबा की उँगली से निकाली गई अंगूठी, जो बाद में सुरेन को दी गई, वही मोती की अंगूठी जुदा होने के पहले सुरेन ने मुझे दी थी। आज उसे देखकर मुझे भाई की बहुत याद आई। जाने क्यों लगा कि उड़कर भाई के पास जाऊँ उसके सीने से लगकर रोऊँ। बाबा की कोठी की चाबियाँ भी उसने मुझे दे दी थीं । सिसकियाँ लेकर रोते हुए मुझे अहसास हुआ कि कोई मेरे पीछे खड़ा है । 
‘अम्मा’, मैंने आवाज दी। अम्मा अधेड़ उम्र की बेवा थीं, जिसका इस जहान में अपना कोई न था । काम की तलाश में एक दिन वह मेरी चौखट पर आई और मैंने उन्हें घर के अन्दर ले लिया । आज तक वह जी जान से मेरी ख़िदमत करती आ रही हैं, कभी उस चौखट के बाहर न जा पाई। इस घर की वीरान चारदीवारी में उसने जैसे जान फूँक दी, जहाँ वीराना बसता था वहाँ बहारों की ताज़गी ले आई । सुन्दर फूलों को लाकर गुलदान सजातीं, भारी भरकम पर्दे उतारकर जालीदार पर्दे चढ़ा देतीं, जहाँ से बाहर की पारदर्शी सुन्दरता भी अन्दर झाँकने लगती । कभी बालों में तेल डालकर अपनी उँगलियों से मस्तिष्क को सहलाती, कभी अपनी गोद में सर रखकर बालों को सहलाती और यही अहसास मुझे मेरा बचपन लौटा देता । व्यंजन बनाकर खिलाने में भी उसका जवाब न था। पाँच दिन तो काम पर जाने की आपाधापी में कुछ कर न पाती थी, पर शनिवार, रविवार को वह ख़ूब पकाती और गर्म-गर्म पकवान सामने रखकर खाने का आग्रह इतने प्यार से करती कि मैं ना नहीं कह पाती । कभी दाल-पकवान, तो कभी बेसन की भाजी, कभी जवारी की रोटी, ऊपर से मक्खन धरा हुआ, तो कभी शीरा-पटाटा-पूरी ! वो ख़ासकर उस दिन बनाती जिस दिन उमेश आने वाला होता । उसे हर एक की पसंद-नापसंद का ख़याल रहता था । 

‘कहो उर्मी, मैं यहीं तुम्हारे पीछे खड़ी हूँ । देख रही हूँ कि तुम्हारी चाय ठंडी हो गई। उठो, मैं एक गर्म कप चाय बनाकर लाती हूँ ।’ 

‘अच्छा, पर एक नहीं दो बना लाओ, मेरे और अपने लिये भी।’ 
अम्मा रसोई की तरफ मुड़ी और मैं अपने ही कथन पर हैरान होती रही, सदा एकान्त में अपनी तन्हाइयों को
जियो और जीने दो
जियो और जीने दो
ओढ़कर बैठी रहने की आदी, गुमसुम से, खोई हुई अपने ही सोच के संसार में, आज तक कभी किसी के साथ अपने आप को बाँटने की कोशिश नहीं की, पर आज...? अतीत की यादें मेरी सोचों का हिस्सा बन चुकी हैं, और उनके साथ जीना मेरी फ़ितरत । पर बीते कुछ दिनों से एक घुटन का अहसास मेरे मन को मथता रहा । उमेश ने मेरा बहुत समय अपने नाम कर लिया था । इसमें कोई शक़ नहीं कि उसमें मेरी चाहत भी शामिल रही । ऑफ़िस के काम के बाद लौटकर घर आते ही मैं शाम के सात बजने का इन्तज़ार करती। हर शाम वह इसी समय मुझे लेने आता, कभी कार में तो कभी मोटर बाईक पर और हम दोनों घंटों तक हवाओं की लय-ताल पर कभी समन्दर के किनारे, कभी रेस्टोरेंट में कॉफ़ी पीते, टहलते, खुली फिज़ाओं का आनंद लूटते। मुझे लगने लगा जैसे उमेश मेरे साथ ख़ुश है, बहुत ख़ुश। वैसे वह भी मुझे भाने लगा था, मैं भी उसकी सोहबत में खुश थी, बहुत खुश। आज भी उसका मुस्कुराता सुंदर चेहरा मेरी आँखों के आगे बिन बुलाये आ जाता है। विश्वास कहूँ या अंधविश्वास पर उन दिनों मुझे कभी यह ज़रूरत ही नहीं महसूस हुई कि मैं उसके बारे में कुछ ज़्यादा जानूँ, कभी मुड़कर कोई सवाल करूँ। वो कहता रहता था - ‘उर्मी तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो, शायद तुम मेरे लिये ही इस ऑफ़िस में आई हो, मैं तुम्हारा बॉस ही नहीं तुम्हारा दोस्त भी बनकर रहना चाहता हूँ, उसी दायरे में जिसकी नींव पर हमने दोस्ती की शुरुआत की ।’ इस प्रकार की गुफ़्तगू की ओर मैं ज़्यादा ध्यान न दे पाई, बस उसके साथ की ख़ुमारी में खो जाया करती थी।
उमेश की शख़्सियत का यह पहलू मुझे मुतासिर किया करता था कि उसने कभी भी मेरे साथ कोई बदसलूकी नहीं की। मेरे काम को सराहते हुए मेरी हिम्मत अफ़ज़ाई की। शामें साथ गुज़ारते हुए जो हसीन यादें बीते पलों की साथ हैं, वही अब मेरी अपनी धरोहर है। फिर भी जाने क्यों आज मेरे दिल में उमेश के लिये कोई भाव नहीं उभरता?  उससे नफ़रत कर पाऊँ यह तो मुमकिन ही नहीं। वह अच्छी तबीयत और साफ़ दिल वाला इन्सान है, जिसने आज़ादी का सही अर्थ समझा । ‘जियो और जीने दो’ उसके निजी क़िरदार की पहचान रही और शायद इसी कारण मुझे उसकी नज़दीकी भाई। उसके साथ प्रेम का नाता जोड़ा जो अरसे तक क़ायम रहा, पर आज यह भी मेरा फ़ैसला है कि मैं उसके साथ की मोहताज कम और एकांत की शाइक बनी हुई हूँ । सालों तक साथ रहा पर सुविधा के आधार पर कोई भी किसी की रुकावट नहीं बना और न ही किसी ने चाहा कि कोई बंधन उन्हें बाँधे ! 

‘‘तुम बात का ग़लत मतलब निकाल रही हो उर्मी ! मुझे दायरे में क़ैद करने की कोशिश कर रही हो । मैं खुद आज़ादी का कायल हूँ, तुम्हें मैंने पहले भी कहा था कि हम कभी भी एक दूसरे के लिए रुकावट नहीं बनेंगे ।’’ 
एक दिन मैंने उसके सामने शादी का प्रस्ताव रखा और वह तुरंत ‘हाँ’ न कर सका। कारण जानने की कोशिश में मैंने क्या उधेड़ दिया पता नहीं ? पर उमेश की नाराज़गी ने हम दोनों को सवालों-जवाबों की कतार में लाकर खड़ा कर दिया । 

‘उर्मी हम अच्छे दोस्त हैं, और मैं वादा करता हूँ कि हमेशा ही तुम्हारा दोस्त रहूँगा, इससे ज़्यादा तुम मुझसे कुछ उम्मीद मत रखना।’ 
यह सच है कि उमेश की और मेरी इस सिलसिले में कभी कोई भी बात न हुई थी । उसका व्याहवार हमेशा फ़र्म में मुलाज़िम जैसा और बाहर एक अच्छे दोस्त जैसा रहा । वह उस दिन से मेरा खैरख़्वाह रहा, जिस दिन मेरा इन्टरव्यू लेकर मुझे अपनी सेक्रेटरी की जगह पर नियुक्त किया। इसे मैं उसकी ख़ासियत कहूँ या सद्गुण कि वह ऑफिस में सबको इज़्ज़त देता और अपने मुलाज़िमों से इज़्ज़त और वफ़ादारी की उम्मीद भी रखता । वह मुझसे बहुत ख़ुश था पर इन लक्ष्मण रेखाओं में मैं भी शामिल थी । ऑफ़िस में वह जितना सोबर और सीरियस रहता था, बाहर मेरे साथ उतना ही ख़ुश, बच्चों की तरह मुस्कुराता, खिलखिलाता, गुनगुनाता हुआ, कभी-कभी मेरे ज़ोर देने पर वह यह ग़ज़ल गाता.... 

‘सीने में सुलगते हैं अरमाँ आँखों में उदासी छाई है....ये आज तेरी दुनियाँ से हमें तक़दीर कहाँ ले आई है..... ।’      और उस दौरान उसकी उदास आँखों में नमी तैर आती।

दरवाज़े पर आहट के साथ आवाज़ आई ‘उर्मी उठो चाय लाई हूँ, गर्म-गर्म पी लो’ कमरे की बत्ती जलाते हुए अम्मा ने कहा । शाम ढलकर रात होना चाह रही थी, साढ़े पांच बजे ऑफिस से आकर गुमगुम-सी खोई रही, अब साढ़े सात बजे थे । दो घंटे का समय सोचते हुए कैसे गुज़र गया पता ही न चला। 

‘अम्मा तुम भी चाय लेकर मेरे पास बैठ जाओ ।’ ....कहने भर की देर थी, वह ज़मीन पर मेरे सामने बैठ गई । चाय की चुस्की भरते हुए सोचती रही कि यह तन्हाई भी कितनी नीरस है जो इन्सान को यादों की गहरी वादियों की अंधेरी गुफ़ाओं में ले जाती है । अगर घर में अम्मा न होती तो मैं न जाने और कितने घंटे इन्हीं सोचों में खोई रहती।  
‘अम्मा तुम शाम को इसी तरह मेरे साथ चाय पिया करो ।’ 
‘उर्मी, आज उमेश तुझे लेने नहीं आया?’ घड़ियाल की ओर देखते हुए अम्मा ने पूछा।  
‘नहीं, अब वह कभी नहीं आएगा ।’ मैंने भीगी-सी आवाज़ में कहा‘क्यों उर्मी क्या हुआ है?’ अम्मा ने अपनाइत से अपना हाथ मेरे घुटनों पर रखते हुए फिर सवाल किया। 

‘‘यही तो मुझे नहीं मालूम और न मैं जानना चाहती हूँ। आज २८ तारीख़ है, परसों तीस तारीख़ से मैं ऑफ़िस का काम छोड़ दूँगी।  फिर हम यहाँ नहीं रहेंगे, बाबा की कोठी में चलेंगे,  तुम मेरे साथ चलोगी न अम्मा ?’’ ऐसा कहते हुए मेरा गला भर आया। मैंने अपनी रुलाई को विराम देने के लिये चाय की प्याली को होठों तक ले आने की चेष्ठा की। पर दुख ने कुछ यूँ घेरा कि न मैं चाय पी सकी, न आँसू । प्याली वापस रखते हुए अम्मा का हाथ अपने हाथ में लेकर चूमते हुए कहा- 
‘‘अम्मा तू मुझे अकेली छोड़कर न जाना, अब मेरा यहाँ कोई नहीं है, बाबा भी चले गये, भाई.. !’’ कहकर मैं बच्चों की तरह रोने लगी और उन आँसुओं के अक्स में मैंने उमेश को फिर-फिर कहते सुना, ‘‘पर मैं तुमसे शादी नहीं कर सकता, उर्मी मुझसे बार-बार उसका कारण न पूछो। हम दोस्त हैं, दोस्त रहेंगे, प्लीज़ समझने की कोशिश करो ।’’ 
‘‘क्या समझूँ ? तुम कुछ कहो तो समझूँ । अभी तो मुझे यही समझ में आ रहा है जैसे मैं तुम्हारे लिये सिर्फ़ एक साधन हूँ शाम का वक़्त गुज़ारने का। जिसके साथ तुम दो- तीन घंटे मन बहलाते रहते हो...।’’
‘‘यह गलत है उर्मी, न मेरी नीयत में कुछ है, न तुम्हारी... बस हमारी समझ अब मेल नहीं खाती।’’ ऐसा कहकर उमेश ने अपना सर दोनों हाथों के बीच जैसे नोचना चाहा । 
‘पर मुझमें क्या कमी है कि...?’ मैंने अपने ही सवाल के जवाब में फिर सवाल किया।  
मेरी बात को काटते हुए उमेश ने मेरा चेहरा अपने हाथों में लिया और आँखों में आँखे डालते हुए कहा - ‘‘उर्मी फिर कभी यह लफ़्ज इस्तेमाल न करना, कमी तुममें नहीं मुझमें है....  बस !’’ इतना कहकर वह बच्चों की तरह रोने लगा । 

मैं हैरान और परेशान उसे देखती रही, उसके मासूम चेहरे को जिसको उसके ही आँसुओं ने अभी अभी धोया था. किसी गहरे घात से हल्दी की तरह ज़र्द हुआ था उसका चेहरा। 
दूसरे दिन ऑफ़िस में उसने मुझसे और मैंने उससे आँखें चुराईं, बिना ज़्यादा बातचीत के दिन गुज़रा और शाम को घर आई। उमेश के बहुत समझाने के बावजूद उसके साथ बाहर घूमने न जा सकी । दिल को कोई तो चोट पहुँची है, कहीं तो दरार आई है जो दिल जुड़ने का नाम ही नहीं लेता। 

‘सर में थोड़ा गर्म तेल डालती हूँ राहत मिलेगी। ’ कहते हुए अम्मा एक तसरी में गरम तेल ले आई । मेरा सर अपने घुटनों पर रखते हुए अपनी उँगलियों के पोरों से मेरे खुले बालों में तेल डालती रही फिर काफ़ी वक़्त कंघी से मेरे बालों को लसारती रही। मुझे बहुत आराम मिला। शायद तेल का असर था या अम्मा के सामीप्य का था जो मुझे राहत देता रहा। 
मुझे अपनी नौकरी व उस अधूरे प्यार को खोने का ज़्यादा अफ़सोस न था जितना अपने आप को उस गहरे आघात से बचाने पर संतोष था । बाबा के बारह दिन के बाद जब सुरेन वापस जा रहा था तो कोठी की चाबियाँ मुझे देते हुए बोला - ‘उर्मी ज़िन्दगी में छोटे-बड़े हादसे दरपेश आएँगे । कभी तुम्हें ज़रूरत पड़े तो बाबा की यह कोठी आकर बसाना, मुझे ख़ुशी होगी ।’ 
चाबी लेते मुझे बहुत हैरानी इस बात पर हुई कि छोटा होते हुए भी वह बड़ी गहरी बात कह पाया। भविष्य के गर्भ से इन्सान को क्या हासिल होता है यह आज जानना मुश्किल है। हाथों में था वही चाबियों का गुच्छा, सामने बंधा हुआ सामान और नीचे टैक्सी लेने गई हुई अम्मा।      
                                                                              
‘जियो और जीने दो’ कितना सही कहा था उमेश ने। उसने वाक़ई मुझे जीने दिया पर शायद मैं ऐसा न कर पाई। औरत की फ़ितरत ही शायद ऐसी है: वह पूर्णता चाहती है। जिसे अपना समझती है उसे बंटा हुआ नहीं देख सकती, चाहे वह प्यार ही क्यों न हो । उसे पूर्णरूप में पाने के लिये वह जीना तो क्या मरने तक को तैयार हो जाती है । मगर एक अपूर्ण, अधूरी ज़िन्दगी को गुज़ारना ‘जीना’ तो नहीं ! ‘जीने दो’ तो बहुत दूर की बात है, कौन किसको जीने दे यह एक अनसुलझी गुत्थी है । 
मैं फिर सोच के जाल में उलझ गई। इन्सान कितना मतलबी होता है, अपनी सुविधा से अक्षरों का जाल बुनकर एक आज़ाद ज़िंदगी को क़ैद बख़्शता है।  

‘उर्मी चलो, नीचे टैक्सी खड़ी है।’ सामान के पीछे-पीछे मैं भी उसी राह पर चली जहाँ बाबा की कोठी, उसका आँगन मेरी बिखरी जवानी को आगोश में लेने के लिये आतुर था ।


देवी नागरानी
जन्म: 1941 कराची, सिंध (तब भारत), 12 ग़ज़ल-व काव्य-संग्रह, 2 भजन-संग्रह, 12 सिंधी से हिंदी अनुदित कहानी-संग्रह प्रकाशित। सिंधी, हिन्दी, तथा अंग्रेज़ी में समान अधिकार लेखन, हिन्दी- सिंधी में परस्पर अनुवाद। श्री मोदी के काव्य संग्रह, चौथी कूट (साहित्य अकादमी प्रकाशन), अत्तिया दाऊद, व् रूमी का सिंधी अनुवाद. NJ, NY, OSLO, तमिलनाडू, कर्नाटक-धारवाड़, रायपुर, जोधपुर, केरल व अन्य संस्थाओं से सम्मानित। डॉ. अमृता प्रीतम अवार्ड, व् मीर अली मीर पुरूस्कार, राष्ट्रीय सिंधी विकास परिषद व् महाराष्ट्र सिन्धी साहित्य अकादमी से पुरुसकृत। सिन्धी से हिंदी अनुदित कहानियों को सुनें @ https://nangranidevi.blogspot.com/     contact: dnangrani@gmail.com  


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जियो और जीने दो कहानी जियो और जीने दो - देवी नागरानी मैंने चाय की दूसरी बार प्याली भर ली, और उसके ख़त्म होते ही ग़लीचे पर अपने पेट के बल लेट गई । सिलसिलेवार आँसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे , कितने तो मैं चाय की पहली प्याली के साथ पी गई थी। इस तन्हाई के आलम में यही सोचती रही कि शायद अपनों का साथ पाना मेरे हिस्से में न था या मैं ख़ुद को उसके लिये तैयार ही न कर पाई थी ।
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