हमारी इन्दु

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हमारी इन्दु बड़ी - बड़ी आंखें , साधारण सा चेहरा, गेंहुआ रंग, धूसर से बाल। कोई ऐसी विशेष बात नहीं जिससे आकर्षण उत्पन्न हो, बस खास बात थी तो उसकी भोली सी मुस्कान जो अचानक कहीं गायब हो गई थी। एक दुकान में सेल्स गर्ल का काम करती। अधिक न बोलती बस अपने काम से काम ।

हमारी इन्दु


बड़ी - बड़ी आंखें , साधारण सा चेहरा, गेंहुआ रंग, धूसर से बाल। कोई ऐसी विशेष बात नहीं जिससे आकर्षण उत्पन्न हो, बस खास बात थी तो उसकी भोली सी मुस्कान जो अचानक कहीं गायब हो गई थी। एक दुकान में सेल्स गर्ल का काम करती। अधिक न बोलती बस अपने काम से काम ।

शहर से कई किलोमीटर दूर पैदल मार्ग , उस पर भी उबड़ - खाबड़ रास्ता , नदी किनारे वनों के बीच एक गाॅव जहां पेड़ों के झुरमुट के पीछे छिपे पत्थर की छत और पटाल वाले आॅगन वाले घर में ही रहती थी इन्दु। मिट्टी और सिमेंट मिश्रित घर जिसे देखकर लगता कि सामथ्र्यानुसार बना दिया गया होगा। सिमेंट वाला कमरा भाई का आखिर वह घर का चिराग है, और मिट्टी वाला; घर के बाकी सदस्यों का। 

 घर की सुबह जल्द ही हो जाती सुबह गाय को दुहना घर की साफ सफाई करना , चाय नास्ता वगैरह। मां सदा ही कहती रहती ‘‘ इन्दु तू चली जाएगी तो मेरा क्या होगा?’’ 
अरे ईजा कहां जाना है मैने? मैं कहीं नहीं जाउंगी। जाउंगी भी तो वापस आ जाउंगी।

’’ ना पोथी ऐसा कहाॅं होता है? ऐसा नहीं बोलते कभी-कभी वाणी लगती है। ब्याह करके कौन वापस आता है सबको अपना घर ही सम्हालना होता है।’’ मां के शब्दों में सदा ही चिंता झलकती।

घर में सभी की चिंता का विषय यही रहता कि इन्दु की शादी कैसे होगी? गरीबी के कारण न तो उसे अधिक पढ़ा
हमारी इन्दु
हमारी इन्दु
सके और न ही इतनी सामथ्र्य कि जेवर जुटा सकें। पिता गाॅव में मजदूरी करके घर खर्च उठा लेते, भाई एक दुकान में काम करता और इन्दु व उसकी माॅं खेती और पशु पालन से घर की आवश्यकता पूरी कर लेते। यह सब घर की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये तो काफी था किन्तु ब्याह?

ऐंसा नहीं कि विवाह प्रस्ताव नहीं आते किन्तु कहीं न कहीं धनाभाव आड़े आ ही जाता। माता- पिता चिंन्तित रहते किन्तु इन्दु वह तो मस्त मौला और कर्मठ बस अपने काम में लगी रहती। 

सुबह का समय इन्दु आंगन लीप रही, मां गौशाला में व्यस्त। आवाज आई ’’कोई है बड़ा घर में बेटा? ’’ अन्जानी आवाज। एक भद्र महिला आंगन के किनारे खड़ी। ’’ जी आओ। बस यहां से नहीं किनारे से आना ....... यहांॅ आपकी साड़ी खराब हो जाएगी। नमस्ते .... मेेैं मां को बुलाती हूॅं। झटपट आॅगन के किनारे हाथ घो कर माता -पिता को बुला लाई। 

’’जी....अनजान नजरों से देखते हुए युगल को देख महिला बोल उठी मैं रिस्ते के लिये आई हूंॅ। अपने लड़के के लिये तुम्हारी लड़की।’’ चेहरा प्रसन्नता से तो भर गया किन्तु महिला की वेशभूषा उसके बनने-ठनने का ढंग उसे बहुत ही सम्भ्रान्त बता रहा था। कुछ कहते तब तक इन्दु चाय नास्ता ले आई। ’’ बड़ी समझदार और होशियार है तुम्हारी लड़की।’’ आॅंखों से गौर से टटोलते हुए महिला बोली।’’ जी सब काम कर लेती है हमारी इन्दु ’’ घर तो पूरा इसी ने सम्हाल रखा है।’’ प्रसन्नता से माॅं बोल उठी। ’’जी मैंने भी बड़ी तारीफ सुनी थी आपकी बेटी की इसीलिये तो यहां तक आई हूॅं।’’

लो.... अपना परिचय तो बताना भूल ही गई मैं शहर के पास लगे गाॅव में रहती हूं। ’’  आपके गांव की बिटिया मंजू का पिछले वर्ष हमारे यहां ब्याह हुआ था। महिला से परिचय पाते ही पिता खिल उठे ’’अरे! तो आप तो ऐसे ही हमारे सम्बन्घी हुए। आपके यहां कहां गाॅव है वो तो शहर ही हुआ।

’’ मुझे तो आपकी लड़की पसन्द है , मेरे लड़के की तस्वीर देख लो शहर में प्राइवेट नौकरी करता है पचास हजार कमाता है ।  जमीन जायदाद सब है बस हमें सम्हालने वाली चाहिये। ’’ आप की सब बात ठीक है पर हम गरीब लोग आपकी बराबरी कैसे कर सकते हैं पिता का चेहरा अचानक मुरझा गया । मां की भी आंखे नम हो गईं। ’’ अरे..... ये आंसू विदाई के समय बहाना हमें कुछ नहीं चाहिये , बस एक जोड़ी कपड़े में विदा कर देना कहते हुए महिला का चेहरा गर्वित मुस्कान से भर गया, जैसे वह जान गई हो कि वह जीत चुकी है।

एक बार आपका लड़का भी देख लेता। कुछ हिचकिचाते हुए मां बोली। अरे ......मैं जो कहती हूं वही मेरे बेटे के लिये पत्थर की लकीर है। अबकी बार महिला के स्वर में अभिमान उतर आया। दोंनों पक्षों की सहमति से विवाह तय हो गया। जल्द ही विवाह की तिथि भी निर्घारित कर दी गई। माता - पिता के साथ इन्दु भी प्रसन्न थी। बस यही हिचक थी कि तस्वीर के अतिरिक्त होने वाले पति को नहीं देखा था; जबकि ...... ।

सामथ्र्य के अनुसार माता - पिता ने बेटी ब्याह दी विवाह के दिन रूपवान पति को देखकर इन्दु व उसके माता - पिता आश्चर्य चकित रह गए। आज तो उन्हें अपनी किस्मत पे विश्वास ही नहीं हो रहा था। अपने ही विवाह में वो जमकर नाची जैसे पहली बार इतनी खुशी मिली हो।

विवाह हो गया पति जो विवाह के एक दिन पूर्व ही शहर से आया था; विवाह के चार दिन बाद ही वापस लौट गया। विवाह क्या होता है, सुहाग की सेज क्या होती है? यह तो इन्दु समझ ही न पाई। 

विवाह के चंद दिनों में ही बड़े घर के रंग बदलने लगे। सास ने कहा बेटा तुम तो अपने घर में सब काम करने की आदी तो हो ही क्यों न गाय पाल लो ? जमीन भी आबाद हो जाएगी। इन्दु तो अच्छा घर , परिवार और मुंह से बेटा शब्द सुन कर ही फूली न समाई थी। वह सब काम करने को तैयार हो गई। अब वह तल्लीनता से घर गृहस्थी संभालने लगी। चंद दिनों में ही उसने सारी जमीन आबाद कर दी। जहां बंजर भूमि थी , वहां अब नई फसल उगने लगी। घर में दूघ दही की कोई कमी न रही । बस कमी थी तो उसके पति की जो घर आने का नाम ही न लेता।

कभी कभार उसे फोन पर चंद बात करने का अवसर मिल जाता , जो उसे अपने परिवार की मौजूदगी में ही करनी होती। घर में सास के अतिरिक्त दो शादी शुदा ननदों व उनके बच्चों का भी पहरा था। शुरू में तो नई गाय को चारा भी अधिक ही मिलता है, किन्तु समय बीतने के साथ ही सच्चाई बाहर आने लगती है। यही हुआ इन्दु के साथ। पति की बेरूखी पर जब इन्दु सवाल करने लगी तो कभी रूप, तो कभी वेशभूषा, तो कभी उसकी गरीबी पर ताने मिलने लगे। अब बड़ों से लेकर बच्चे भी उस पर चिल्लाया करते । किन्तु कुछ भी बालने का हक उसका न था।

एक रोज ’’इन्दू...........चिल्लाती हुई आवाज कानों में पड़ी सुबह का समय छह बज रहे होंगे। जी मंाजी। अभी तक नास्ता नहीं बनाया ? सास की आवाज में बहुत क्रोध झलक रहा था। जी वो गाय की......। तो क्या गाय ही है सब कुछ??? मां जी वो बच्चे सुबह उठकर दूध पियेंगे? हां..... तो वो स्कूल भी तो जाऐंगे। सुबह जल्दी नहीं उठ सकती?’’ 

रसोई घर में काम करते हुए सिर्फ यही सोच रही थी कि अभी तक गौशाला से लेकर घर की सफाई सभी काम तो कर चुकी फिर कितनी देर कर दी है? पर यह बेरूखी तो देखने की आदत सी हो गई है। जब पति ही बात नहीं करता , घर वापस नहीं आता तो किसी और की बेरूखी क्या मायने रखती है?? 

घर के सारे काम निबटा कर खेतों में घास काटने को चल दी । कभी कभार गांव की महिलाओं से कह कर अपना दुख हल्का कर लेती। घर पर दिन पर दिन जुल्म बढ़ते ही जा रहे थे। जब सहन नहीं हुआ तो सास से प्रश्न कर ही बैठी कि आखिर क्या कारण है , जो पति घर नहीं आता कभी बात नहीं करता आखिर क्यों ??? उसकी इस हरकत के लिये उसे मार भी पड़ी। रोती रही पर अपना सवाल पूछती रही। अगले ही दिन पति घर लौट आया। जो समय और दूरी का बहाना बनाता था वह एक ही दिन में घर आ गया। पति का मुंह देखते ही उसकी पीड़ा जाने कहां चली गई। दिन भर कभी चाय , खाना खिलाती ; आगे पीछे डोलती रही, पर पति है कि जैसे उसकी ओर देखे ही नहीं।

रात में कमरे में जाने पर पति मंुह घुमा कर सोने का बहाना करने लगा अब सहन न कर सकी मन का गुबार बहार निकल आया ....फूट फूट कर रोने लगी।’’ आखिर मेरी गलती क्या है ? जब से ब्याह कर आई हूं मुझे पत्नी का दर्जा ही नहीं दिया तुमने। पूरे परिवार के लिये कुछ न कुछ लाए किन्तु मेंरे लिये कुछ भी नहीं ? सब से फोन पर बात करते हो लेकिन मेरी बारी आने पर फोन ही काट देते हो। आखिर किया क्या है मैंने???

 गुस्से से भन्नाता हुआ पति उठा और बालों से घसीटता हुआ मां के पास ले गया। मां.....मां.... क्या अभी तक इसे ठीक नहीं कर सकी?? इसे बताया नहीं कि यह नौकरानी है , और नौकरानी बन कर रहे।मेरी बीवी बनने की कोशिश न करे। सन्न सा रह गया दिमाग। कानों में सन्नाटा सा गूंजने लगा। जोर - जोर से रोने लगी। ऐसा क्यों कहते हो? मुझसे अगर कोई गलती हुई है तो बताओ ? बौखलाते हुए पति बोला शकल देखी है अपनी........।’’ में तेरी ओर देखूं भी न । तू गरीब है , यहां खाना पीना मिलता है । शालू ......अपने पुराने कपड़े दे दिया कर। हमें नौकर चाहिये था। इसलिये तुझे यहां लाए हैं ,यहां रह और काम कर इससे अधिक कुछ भी नहीं। 

क्यों किया ऐसा...... लगभग चीख सी उठी।..........चटाक.....चटाक से थप्पड़ पड़े । कानों में अब सन्नाटा भी नहीं गूंज रहा था । कुछ पल को लगा कि शायद सुनने की शक्ति जाती रही। फिर पति बोला माॅं...... अगर मुंह लगाएगी तो यह सर पर चढ़ जाएगी। ’’बेटा धीरे बोल आस- पास के लोगों को पता चल जाएगा।मैं अपनी तरह से काम चला रही थी न जा सो जा .....। अब इसे सब समझ आ गया होगा । सब अपने कमरों में लौट गए, उसका तो इतने बड़े घर में कोई कमरा ही न था, जिसे वह अब तक अपना समझ रही थी वह भी अपना न निकला। कोने में पड़ी रोती रही फिर थक कर सो गई आॅंख खुली तो फिर उम्मीद करने लगी कि शायद पति का मन बदल गया हो, वह फिर उसकी ओर देखे ? 

सुबह ही पति लौट गया शहर की ओर। वह केवल निराश निगाहों से उसकी ओर तकती रही। अब तो उस पर होने वाले जुल्मांे की कोई कमी न थी। माता - पिता को संदेश भेजे भी तो कैसे फिर भी उम्मीद थी कि कभी न कभी शायद पति का मन बदल जाए। 

एक दिन सासू मां की फोन पे हो रही बातें सुन कर उम्मीद की बचीखुची इमारत भी ढह गई। पता चला कि पति तो शहर में पहले से ही शादी शुदा है अब तो उनकी सन्तान भी होने वाली है। कुछ देर वहीं अचेत हो गई। उठाने सम्भालने वाला तो कौन था? जब सम्भली तो स्वयं से ही प्रश्न पूछ रही थी कि उसके परिवार ने उनका क्या बिगाड़ा था??? इतना बड़ा धोखा अभी तक तो केवल अपने रूप ओर गरीबी को कोसती थी , अब किसे कोसे????

कुछ दिनों तक उसके चारों ओर मृत्यु का सन्नाटा पसरा रहा। किसी से न बोलती न ही भोजन करती । सामान्य सी दिखती और सामथ्र्य रहने तक काम करती रही। सास की इस हरकत पर नजर पड़ी तो कारण पूछने लगी????? जैसे कुछ हुआ ही न हो।’’ कुछ हुआ है क्या खाना भी नहीं खा रही है काम भी नहीं हो रहा तुझसे ? जा नीचे बाजार से दवा ले आ । अब तक वह बाजार से अक्सर सामान लाया ही करती तो चिंता का कोई विषय ही न था। आज इन्दू के पास चंद रूपय थे बाकी तो उसके पास कुछ धरा नहीं था, इसलिये घर से दवा लेने निकली फिर लौटी ही नहीं। 

सांझ तक न लौटने पर परिवार में हडकंप मच गया। खोजबीन करने पर पता चला कि वह अपने मायके जा पहुंची । सास फिर वही भोली सूरत लिये उसके पीछे पहुंच गई । किन्तु आज वह इन्दू पर ही दोष मढ़ रही थी , माता - पिता भी लोक लाज और परंपरा की बात पर घबरा उठे किन्तु अब इन्दु लौटने वाली नहीं थी। अब उसका एक ही उत्तर था कि यदि मजदूरी ही करनी है तो वह कहीं भी काम करके अपना पेट पाल लेगी किन्तु वापस नही जाएगी, यह कहकर वह वहां से भी निकल गई कभी न लौटने के लिये। अब उसके पास नया संघर्ष था जहां शायद धोखा और प्रताड़ना न हो।
     





- चंचल गोस्वामी 
                                                                   ग्राम-सन्न,
                                                                पो0 ऑ0- वडडा,पिथौरागढ़
                                                                     उत्तराखण्ड
                                                                                                          

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