सौंदर्य का समाजशास्त्र

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सौंदर्य का समाजशास्त्र सौंदर्य यदि विज्ञान है, तो कला का दर्शन है, सौंदर्य अनुभव वैज्ञानिक अनुसंधान और कलात्मक सौंदर्य का केंद्र है, यह भाषा विश्लेषण के शब्दावली से संबंधित है । नाट्यशास्त्र के रचियता भरत की सौन्दर्य चेतना की महत्वपूर्ण विशेषता उनकी रसवादी दृष्टि है।भरत कहते है- यो अर्थो हृदयसंवादी तस्य भावो रसोद्भव:। शरीरं व्याप्ते तेन शुष्कं काष्ठमिवाग्निना।।[ना.शा.] कोई वस्तु या कृति सुन्दर है अथवा उदात्त है यह उस वस्तु के आस्वाद पर निर्भर करेगा।

सौंदर्य का समाजशास्त्र 


सौंदर्य यदि विज्ञान है, तो कला का दर्शन है, सौंदर्य अनुभव वैज्ञानिक अनुसंधान और कलात्मक सौंदर्य का केंद्र है, यह भाषा विश्लेषण के शब्दावली से संबंधित है । 

नाट्यशास्त्र के रचियता भरत की सौन्दर्य चेतना की महत्वपूर्ण विशेषता उनकी रसवादी दृष्टि है।भरत कहते है- यो अर्थो हृदयसंवादी तस्य भावो रसोद्भव:। शरीरं व्याप्ते तेन शुष्कं काष्ठमिवाग्निना।।[ना.शा.] कोई वस्तु या कृति सुन्दर है अथवा उदात्त है यह उस वस्तु के आस्वाद पर निर्भर करेगा।रस आस्वाद होने के साथ-साथ आस्वाद्य भी है।कलाकार को सृजनात्मकता का आनन्द मिलता है और सहृदय या रसिक को साधारणीकरण की प्रक्रिया मे रसानुभूति का आनन्द मिलता है।वह रस की अनुभूति मनुष्य को आमूल प्रभावित करती है।रसचर्या के क्षणविशेष मे नट और सहृदय सामाजिक दोनो अपनी निजता से ऊपर उठ जाते हैं। भरत की यह रसदृष्टि ही भारतीय मनोविज्ञान की सैद्धांतिकी के रूप मे विकसित हुई। 

भरत का रससूत्र___ [विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगात रसनिष्पत्ति:] ही भारतीय मनोविज्ञान का पहला सूत्र है।रस का स्थायी भाव,स्थायी भावो के विभाव,अनुभाव और व्यभिचारी भाव आदि की परिकल्पना भरत ने जिस समय की होगी वह न केवल उस समय मौलिक रही होगी, वरन आज भी उस रसदृष्टि को चुनौती देने वाला विश्वसाहित्य मे कोई नही है।भरत की रस चेतना अपने आप मे संपूर्ण है।

सामान्यतया सौंदर्य शब्द सु+√उन्द+अरन + ष्यञ से व्युत्पन्न और मनोहरता ,लावण्य व लालित्य आदि अर्थों को समाहृत करने वाला माना जाता है। साथ ही सौंदर्य का अर्थ 'शब्द कल्पद्रुम ' के अनुसार -- "सुष्ठु उनत्ति आद्रीकरोति चित्त मिति भी स्वीकृत है । व्यावहारिक दृष्टि से वे वस्तुएं ,कर्म ,और भाव सुंदर होते हैं जो दर्शनीय, प्रशंसनीय तथा आनंद की अनुभूति कराते हैं। गोचरीभूत आकर्षक वस्तु ,परोपकार्थ कृत कर्म तथा चित्त को रासार्द्र करने वाले भाव प्रकृत्या सौंदर्य की प्रतीति कराते हैं।

डॉ फतेह सिंह ने इसे बहुत रोचक तरीके से व्याख्यायित करने का प्रयत्न किया है। जब आप किसी सुंदर संगीत
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से प्रभावित होकर सचमुच झूमने लगे या जब आप किसी सुंदर दृश्य को देखकर उछल पड़े उस समय यदि आप अपनी आंखों और कानों को बंद करके एकाग्रचित्त होकर बैठ जाएं तो आपको एक ध्वनि सुनाई पड़ेगी जिसको 'सु' या सुम, 'हु ' या हुम् तथा ' उ ' या उम द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। इसलिए जो वस्तुएं हमें प्रिय होती हैं उनके नाम के पहले हम सु लगा देते हैं। जैसे सुकोमल , सुमधुर सुगंधितआदि । 'सुम ,सोम ,सोमल जैसे बहुत से मनोनुकूल पदार्थों के संस्कृत नाम सुम से निकले हुए हैं। सूफी लोग भी ध्यान अवस्था में सुनी जाने वाली एक ध्वनि को 'हु-हु की आवाज कहते हैं ।फारसी में हुम् से निकले हुए हुमा होम आदि शब्द अत्यंत प्रिय पदार्थों के नाम हैं। संस्कृत में ' उ ' शिव , ब्रह्मा का नाम होने के अतिरिक्त चंद्र मंडल का भी द्योतक है तथा 'उम' अन्य अर्थों के साथ शांति तथा नम्रता का सूचक है और 'उम' से निष्पन्न उमा ,उम: ,ओम , ओमन आदि शब्द आनंद कारी पदार्थों के नाम है। परंतु संस्कृत में उक्त आनंदा भूति के लिए सुम शब्द का ही प्रयोग अधिक व्यापक रहा जिसके फलस्वरूप जिस वस्तु के साथ इंद्रिय सन्निकर्ष होने पर उक्त 'सुम' नामक आनंदानुभूति होती थी उसको सुंदर कहा जाता था।

संभवतः योगियों के द्वारा सरलतया अनुभव गम्य उस ध्वनि को संकेतित किया गया है जो संपूर्ण ब्रह्मांड में फैली हुई है तथा समाधि की अवस्था में सहस्त्रारचक्र में अनुगूँजीत अनुभूत होती है। यह अति मधुर व रम्य होती है । अनुकरण के आधार पर 'सुम' में उसी की कल्पना है।

यद्यपि सौंदर्य को परिभाषित करने के लिए व्यक्ति अथवा वस्तु को दृष्टि में रखकर कुछ विद्वानों ने विचार किया है। परंतु वे प्रायः और अनिर्णय की स्थिति में ही रह गए । कला प्रसंग में भी सौंदर्य चिंतन अधिकतर अतिवादी रहा है। वास्तव में सौंदर्य की वृहद एवं व्यापक सत्ता पर जितने भी जिसने भी किसी सीमित विचार बिंदु से बंध कर निर्णय देने का प्रयास किया है, वह असफल रहा है । सौंदर्याकन अन्तः या बाह्य की सीमाओं में रहकर संभव ही नहीं है। वास्तव में सौंदर्य वह तत्व है जिसकी पहचान केवल मानसिक क्षमता सम्पन्न मानव को ही नहीं वरन पशु पक्षियों तक को है । और है उन पौधों और वृक्षों को भी -जो स्पर्श व ध्वनि के प्रति संवेदनशीलता प्रकट करते हैं । तथा रमणीय नारी का पदाघात , आलिंगन या दृष्टिनिपात पा कर विकास को प्राप्त करते हैं । भौंवरा कभी चम्पा के फूल पर नहीं बैठता और मधुमक्खी कभी मेहंदी के फूलों का रस नही पीती । 

इसीलिए जितना परिचित शब्द सौंदर्य है उतना ही कठिन है इसे परिभाषित करना ।क्योंकि किसी भी परिभाषा की सीमा में निबद्ध होने के बजाय यह असीमता में परिव्याप्त होता जाता प्रतीत होता है । सरल शब्दों में सौंदर्य ऐंद्रिक एवं आत्मिक आनंदानुभूति का विधायक तत्व है।

सुन्दर आलंबन का सामीप्य पाने की उत्कंठा किसमे नहीं होती ? परन्तु सौन्दर्यानुभूति में समीपता और दूरी का संतुलन आवश्यक है । वास्तव में सौंदर्य स्वयं को अनेक रूपों में प्रत्यक्षीकृत करता है परंतु अन्ततः यह एक रहस्य ही रहता है और इसी रहस्य में सौंदर्य है। सौंदर्य कहाँ स्थित है ? 

सौंदर्य वस्तुनिष्ठ भी है , और व्यक्तिनिष्ठ भी । अंतर सिर्फ़ इतना है कि सौंदर्य की वस्तुनिष्ठता में सौंदर्य के अंग के रूप में सानुपातिकता , आकृति ,वर्ण आदि को स्वीकार करते हैं । वस्तुनिष्ठ सौंदर्य में आभूषण का कोई महत्व नहीं है । जबकि व्यक्तिनिष्ठ सौंदर्य में वस्तु का धर्म नहीं है .  उसकी स्थिति व्यक्ति के अंत:करण या उसकी रुचि में है । जैसा भर्तृहरि ने श्रृंगार शतकम में लिखा है - 

यद्यस्य नास्ति रुचिरं तस्मिस्तथा स्पृहा मनोज्ञेऽपि ।

रामणियेऽपि  सुधांशो न मन:कामा सरोजिन्य:।।

अर्थात --जो वस्तु जिसको प्रिय नहीं वह चाहे जितनी सुंदर क्यों न हो उसको अच्छी नहीं लगती , जैसे चंद्रमा
डॉ.निरुपमा वर्मा
डॉ.निरुपमा वर्मा
सबको प्रिय है परंतु  सूर्यविकासिनी कमलनियों की प्रीति उस पर नहीं होती । ये सर्व विदित है की कमल का पुष्प रात को बंद हो जाता है ।

तीसरा विचार ये भी है कि सौंदर्य प्रमेय व प्रमाता दोनो में स्थित है ।प्रमाता और प्रमेय , आत्मा एवं विश्व की एकता में विश्वास करते हैं । अर्थात ‘अहं ‘  और ‘इदं‘  एक आत्यन्तिक प्रज्ञा द्वारा अभिन्न रूप से एकत्व में  सम्बंध है ......और उसकी स्पष्ट अभिव्यक्ति कला में होती है ।

वस्तु और व्यक्ति के एकत्व की स्थिति को कवि बिहारी ने —“ रूप रिझावनहार वह ,ए नैना रिझवार “—-कह कर तथा आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने  तदाकार परिणती कह कर व्यक्त किया है ।

सौंदर्य की उभयनिष्ठ स्थिति को इस उदाहरण से समझिए —-एक खिला गुलाब का फूल हमारी दृष्टि के सामने हैं , उसके सौंदर्य ने हमें आकृष्ट किया है — उस की सुंदरता हम अनुभव कर रहे । इस अनुभव का विश्लेषण करने पर हमारे हाथ क्या लगता है ? सोचिए , यह सौंदर्य कहाँ हैं ?यह क्या गुलाब में है, अथवा हम में है अथवा दोनो में है  । इस अनुभव का स्वरुप क्या है ? 

आपातत: यही प्रतीत होता है कि वह केवल एक गुलाब में नहीं है । यदि वहीं होता तो सब ही गुलाब को सुंदर देखते । किंतु सभी उसे सुंदर नहीं कहते । और यह  केवल द्रष्टा में है ,यह भी कहना उचित नहीं है । यदि ऐसा होता तो हम अर्थात द्रष्टा सब वस्तुओं को सुन्दर देखते ,किंतु हम सब वस्तुओं को सुन्दर नहीं देखते । .......यथार्थ रस स्फूर्ति के समय .....। सौंदर्य द्रष्टा में नहीं रहता , गुलाब (वस्तु )में भी नहीं रहता । द्रष्टा और गुलाब तब एकरस साम्यावस्थापन्न हो जाते हैं । केवल सौंदर्य ही , स्वप्रकाशमान सौंदर्य ही तब रहता है । यही पूर्ण सौंदर्य है , जिसमें भोक्ता और भोग्य दोनो ही नित्यसम्भोगरूप से विराजमान रहते हैं । स्पष्टत: सौंदर्य का मात्र वस्तु या व्यक्ति में  अवलोकन करना अधूरापन है । निश्चित ही सौंदर्य की सत्ता उभयनिष्ठ है ।


भारतीय मनीषा ने आत्मा तथा प्रकृति के सौंदर्य को भिन्न माना है । प्रकृति में स्वयं का कोई सौंदर्य ना होकर आध्यात्मिक अभिव्यक्ति का सौंदर्य है । अंगों के अनुपात होने पर भी शरीर सुंदर तभी लगता है जब वह आत्मिक सौंदर्य का संकेतन करता है। आध्यात्मिक विवेचन से प्रतीत होता है कि आंतरिक सौंदर्य,बाह्य सौंदर्य से पूर्णतया भिन्न है। परंतु यथार्थ में भिन्न होते हुए भी इनमें कुछ बातें समान हैं। ऐसा नहीं है कि अंतःसौंदर्य अंतः करण या आत्मा के द्वारा सीधा स्वतः गृहीत हो जाता है। वास्तव में यह भी इंद्रियों के माध्यम से ही मानस-ग्राह्य बनता है तथा रूपाकार में प्रतिबिंबित होता है। सौंदर्य रूपाश्रित है। रूप रहित उसकी अभिव्यक्ति नहीं हो सकती । ईश्वर सृष्टि और कलाकृति दोनों में सौंदर्य का प्रकाशन रूप के माध्यम से ही संभव है । दार्शनिक दृष्टि से रूप के बिना सृष्टि ही संभव नहीं है। सर्जना की प्रक्रिया ही 

रूप -धारणा की प्रक्रिया है। रूप के दो पहलू हैं -बाह्य और आंतरिक । इसके आधार पर ही सौंदर्य का भी बाह्य सौंदर्य और अंतःकरण कह कर वर्गीकरण किया जा सकता है। मानवीय संदर्भ में विचार करें तो आंगिक (नख -शिख )सौंदर्य बाह्य तथा शरीर से छन कर आता हुआ दिव्य लोक मंडल अन्तः सौंदर्य के परिचायक हैं। यहां यह ध्यान रखना आवश्यक है कि आध्यात्मिक या दार्शनिक शब्दों का प्रयोग काव्य में वर्णित अन्तः सौंदर्य की व्याख्यार्थ किया है, क्योंकिज्ञानियों की दृष्टि में जो आध्यात्मिक सौंदर्य है वह इन्द्रिय -ग्राह्य न हो कर सीधा आत्मा के द्वारा ही गृहीत होता है। इसका इंद्रियों से कोई संबंध नहीं । उनकी दृष्टि में यह सौंदर्य अशरीरी ,सूक्ष्म व आत्मिक है । काव्यादि ललित कलाओं में व्यक्त रहस्यमय रूपात्मक आभ्यन्तरिक सौंदर्य इन्द्रिय - ग्राह्य होता है। यही कारण है कि कलात्मक सौन्दर्यानंद व ब्रह्मानंद एक नहीं हैं । फिर भी कालिदास के अनुसार लौकिक सौंदर्य भी अलौकिक सौंदर्य के समान शिवत्व या सौभग्य का कारण होता है --'कुमार सम्भवम में कालिदास ने लिखा है --" प्रियेषु सौभग्यफला हि चारुता "---

वास्तविकता तो ये है कि सौंदर्य के स्वरूप का तार्किक विश्लेषण नामुमकिन है ।




- डॉ.निरुपमा वर्मा 
निरूमन विला , वर्मा नगर 
आगरा रोड ,एटा -उत्तर प्रदेश 
207001
मोबाइल नंबर --9412282390

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सौंदर्य का समाजशास्त्र
सौंदर्य का समाजशास्त्र सौंदर्य यदि विज्ञान है, तो कला का दर्शन है, सौंदर्य अनुभव वैज्ञानिक अनुसंधान और कलात्मक सौंदर्य का केंद्र है, यह भाषा विश्लेषण के शब्दावली से संबंधित है । नाट्यशास्त्र के रचियता भरत की सौन्दर्य चेतना की महत्वपूर्ण विशेषता उनकी रसवादी दृष्टि है।भरत कहते है- यो अर्थो हृदयसंवादी तस्य भावो रसोद्भव:। शरीरं व्याप्ते तेन शुष्कं काष्ठमिवाग्निना।।[ना.शा.] कोई वस्तु या कृति सुन्दर है अथवा उदात्त है यह उस वस्तु के आस्वाद पर निर्भर करेगा।
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