आषाढ़ का एक दिन नाटक में इतिहास और कल्पना का सुन्दर समन्वय आषाढ़ का एक दिन नाटक में इतिहास और कल्पना का सुन्दर समन्वय आषाढ़ का एक दिन नाटक में इतिहास और कल्पना का सुन्दर समन्वय दिखाई देता है नाटककार मोहन राकेश मूल रूप से ऐतिहासिक नाटककार नहीं माने जाते हैं।महाकवि कालिदास का ऐतिहासिक वृत्त जितना मिलता है, वह यह है कि वे कोमल हृदय, प्रकृति-प्रेमी और संस्कृत के अप्रतिहत कवि थे। वे प्रकृति से अधिक प्रेम करते थे, उनका हृदय उदार एवं कोमल था और वे संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् थे।
आषाढ़ का एक दिन नाटक में इतिहास और कल्पना का सुन्दर समन्वय आषाढ़ का एक दिन नाटक में इतिहास और कल्पना का सुन्दर समन्वय दिखाई देता है नाटककार मोहन राकेश मूल रूप से ऐतिहासिक नाटककार नहीं माने जाते हैं।हिन्दी नाट्य-साहित्य में जयशंकर प्रसाद और हरिकृष्ण प्रेमी का नाम ही ऐतिहासिक नाट्यकार के रूप में अधिक विख्यात है।राकेश जी ने इस ऐतिहासिक वृत्त को बहुत.ही सूक्ष्म और मौलिक दृष्टि से ग्रहण किया है।आषाढ़ का एक दिन हिन्दी नाटकों में से एक विशिष्ट शिल्प रचना के लिए स्मरण किया जाता है।स्थूल-दृष्टि से लोग इसे ऐतिहासिक नाटक कहते हैं और कुछ अन्य लोग ऐसा मानते हैं कि राकेश जी ने ऐतिहासिक कथा-भूमि पर आधुनिक भाव-बोध अथवा समकालीन युग धर्म को नाटक के रूप में खड़ा कर दिया है।अब प्रश्न यह उठता है कि प्रस्तुत नाटक का कथानक किन स्रोतों पर आधारित है? इस नाटक में नाटककार के वस्तु-विन्यास की छानबीन करने पर यह पता चलता है कि इसके तीन स्रोत हैं, जो इस प्रकार से गिने जा सकते हैं।
भारतीय इतिहास में प्राप्त महाकवि कालिदास का जीवनवृत्त। कालिदास के जीवन से सम्बन्धित एक जनश्रुति। काल्पनिक घटनाएँ। इस प्रकार इन तीनों की अलग-अलग पृष्ठभूमि देखी जा सकती है -
इस नाटक में महाकवि कालिदास का ऐतिहासिक वृत्त जितना मिलता है, वह यह है कि वे कोमल हृदय, प्रकृति-प्रेमी और संस्कृत के अप्रतिहत कवि थे। वे प्रकृति से अधिक प्रेम करते थे, उनका हृदय उदार एवं कोमल था और वे संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् थे।अतः उससे कभी भी वे हारते नहीं थे। उज्जैनी से उनका गहरा सम्बन्ध जुड़ा हुआ था और वे गुप्त राजदरबार में होने के कारण बहुत ही सम्मानित थे। उन्हें मातृगुप्त की संज्ञा प्रदान की गयी थी। कालान्तर में उन्हें कश्मीर का शासन भी सौंप दिया गया था।
इस नाटक में कालिदास की जिन रचनाओं का नामोल्लेख हुआ है, वे 'साहित्येतिहास' के साक्ष्यों के अनुसार नहीं हैं, जैसे कि ऋतु-संहार, मेघदूतम्, कुमारसम्भवम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम् तथा रघुवंशम्। 'मालविकाग्निमित्रम्' तथा 'विक्रमोर्वशीयम्' कालिदास की दो ऐसी रचनाएँ हैं, जिनके नाम का उल्लेख यहाँ नहीं है। उनके जीवन के सम्बन्ध में जितनी खोजें हो चुकी हैं और उनके माध्यम से जितने भी नवीन और परस्पर विरोधी तथ्य सामने आ चुके हैं, उनमें से अधिकांश का उल्लेख इस नाटक में किसी भी रूप में नहीं मिलता है। जिस गाँव को नाटककार ने महाकवि कालिदास की जन्मभूमि और निवासभूमि के रूप में इस नाटक में ग्रहण किया है उसका परिवेश इसमें तो बार-बार चित्रित होता है, किन्तु उसका नाम पूरे नाटक में कहीं नहीं मिलता है। इसके बारे में केवल यही संकेत मिलता है कि वह उज्जैनी से काफी दूर, किन्तु उसकी राज्यसीमा के अन्तर्गत पर्वतीय अंचल में विद्यमान है। कालिदास के माता-पिता और विवाह के सम्बन्ध में भी नाटक से कोई सूचना प्राप्त नहीं होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी व्यक्ति विशेष के. सम्बन्ध में जो महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक तत्त्व हो सकते हैं, उनमें से अधिकतर इस नाटक में नहीं मिलते हैं। सम्पूर्ण कृति में उनका अद्वितीय कवित्व ही अनेक प्रकार से उभरकर सामने आया हुआ है। इसलिए इस नाटक को कालिदास सम्बन्धी तथ्यों के आधार पर विशुद्ध ऐतिहासिक नाटक स्वीकार करने में बड़ी कठिनाई है। नाटक में कालिदास एक सांस्कृतिक व्यक्तित्व के रूप म स्पष्ट दिखायी देते हैं, इसलिए कुछ विद्वान इसे ऐतिहासिक नाटक न मानकर सांस्कृतिक अथवा प्रागैतिहासिक वृत्त पर आधारित समकालीन चेतना का प्रतिनिधि नाटक कहना अधिक उपयुक्त समझते हैं।
कालिदास के सम्बन्ध में कुछ जनश्रुतियाँ प्राप्त हुई हैं, जिसके आधार पर कहा जाता है कि उनका प्रेम-सम्बन्ध फूलों का काम करने वाली किसी कन्या से था।कभी-कभी तो यहाँ तक सुना जाता है कि वह कन्या इनके काव्य की प्रेरक थी। आलोचकों ने इस जनश्रुति पर पर्याप्त विचार-विमर्श किया है और फिर यह निष्कर्ष निकाला कि अनेक रचनाओं में प्रेम के विविध-पक्षों का जैसा सजीव और मार्मिक वर्णन हुआ है, इसको देखते हुए उन्हें एक प्रेमी के रूप में कल्पित करके यह जनश्रुति गढ़ी गयी होगी।
इस जनश्रुति को नाटककार ने अपने लिये उपयोगी समझकर ग्रहण कर लिया है।आयोगिता यह है कि नाटककार को भी यह अभीष्ट था कि कालिदास का प्रादुर्भाव इस नाटक में एक सहृदय, भावुक और कुशल प्रेमी के रूप में हो तथा इसकी पूर्ति के लिए नायिका की भी कल्पना अनिवार्य थी।अतः उस नायिका का प्रादुर्भाव मल्लिका के रूप में सोच-समझकर इस नाटक में हुआ है। जनश्रुति के आधार पर नाटककार ने बड़ी बारीकी से सोच-समझकर अपने नाटक में कालिदास के चरित्र को उभारा है। इसमें लेखक ने अनेक ऐसे पक्षों को पिरोया है जिससे सत्यता प्रमाणित हो जाती है।
कालिदास के यत्किंचित् ऐतिहासिक वृत्त और उपयुक्त जनश्रुति के अतिरिक्त इस नाटक में जितना कुछ है वह काल्पनिक है। प्रमुख पात्रों अम्बिका, मल्लिका, मातुल, विलोम तथा दन्तुल भी काल्पनिक ही हैं। यह एक विचित्र बात है कि विलोम जैसे व्यक्ति को नाटक का प्रतिस्पर्धी बनाकर चित्रित किया गया है, जो एकदम काल्पनिक और औसत व्यक्ति है। नाटक के तीनों अंकों में जितने भी मार्मिक प्रसंग हैं, वे भी कल्पना-प्रसूत हैं। आषाढ़ के पहले दिन की वर्षा में मल्लिका का भीगना, उज्जैनी के राजपुरुषों का ग्राम-प्रदेश में आना, हरिशावक के शिकार को पकड़ना, उज्जैनी जाने के सम्बन्ध में कालिदास जी का अन्तईन्द्व, बीच में पुन: एक दिन ग्राम के निकटवर्ती शिखरों को देखने के लिए उनका आगमन और तस्वीर को छोडकर कालिदास का चुपचाप अपने गाँव लौट आना- ये सभी घटनाएँ नाटककार की निजी शैली और निजी कल्पना पर पूर्णरूप से आधारित हैं। इसीलिए प्रस्तुत नाटक का कथा-विन्यास अधिक-से-अधिक काल्पनिकता पर आधारित है। इसके पात्रों के साथ-साथ इसकी घटनाएँ भी काल्पनिक हैं। इसके तीनों अंकों में कल्पना का अधिकाधिक समावेश हआ है।
मोहन राकेश के पूर्व जयशंकर प्रसाद ने अपने एक नाटक में कालिदास को मातृगुप्त के नाम से एक प्रमुख पात्र के रूप में अपनाया और उस नाटक की कथा में कालिदास के शासन करने का संकेत किया है। प्रस्तुत नाटक में कालिदास को मातृगुप्त के नाम से कश्मीर का शासक बनाया तो गया है, परन्तु यह ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हुए भी इतिहास से प्रभावित नहीं है। यदि इसको तर्कपूर्ण ढंग से देखा जाये तो यह प्रसाद जी के नाटक की कथावस्तु से अधिक प्रभावित लगता है। इसमें उन्हीं सारी वस्तु-कथाओं का समावेश हुआ है, जो प्रसाद ने अपने नाटकों में प्रयोग किया है। इस नाटक के कथातत्त्व में ऐतिहासिक आधार लेना नाटककार के लिए अधिक कठिनाइयाँ उत्पन्न करता है और वह पात्र को मौलिक ढंग से अवतरित करने में उतना स्वतन्त्र नहीं रह जाता है।मोहन राकेश ने इतिहास को साहित्य में ग्रहण करने से सम्बन्धित अपनी इस विचारधारा को स्पष्ट करते हुए अपने दूसरे नाटक 'लहरों के राजहंस' की भूमिका में कहा है कि- "इतिहास या ऐतिहासिक व्यक्तित्व का आश्रय साहित्य को इतिहास नहीं बना देता है।इतिहास तथ्यों का संकलन करता है और उन्हें एक समय-तालिका में प्रस्तुत करता है। साहित्य का ऐसा उद्देश्य कभी नहीं रहा। साहित्य कभी समय में नहीं बँधता।"
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