एक गौ जैनेन्द्र कुमार

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एक गौ जैनेन्द्र कुमार Ek Gau Jainendra Kumar एक गौ जैनेन्द्र कुमार ek gau jainendra kumar summary ek gau jainendra kumar एक गौ कहानी जैनेन्द्र कुमार जी द्वारा लिखी गयी एक प्रसिद्ध कहानी है। गाय के प्रति हीरा सिंह की ममता और प्रेम को दर्शाया है।हीरा सिंह हरियाणा के किसी जमींदार परिवार का सभ्रांत व्यक्ति है।

एक गौ जैनेन्द्र कुमार
Ek Gau Jainendra Kumar


एक गौ जैनेन्द्र कुमार ek gau jainendra kumar summary ek gau jainendra kumar एक गौ कहानी जैनेन्द्र कुमार जी द्वारा लिखी गयी एक प्रसिद्ध कहानी है।प्रस्तुत कहानी में आपने गाय के प्रति हीरा सिंह की ममता और प्रेम को दर्शाया है।हीरा सिंह हरियाणा के किसी जमींदार परिवार का सभ्रांत व्यक्ति है। इस समय वह आर्थिक संकट से गुजर रहा है। उसके पास एकमात्र सम्पत्ति सुन्दरिया गाय रह गयी है। इसे भी अपने वरिष्ठ पुत्र जवाहिर सिंह के विरोध के कारण बेच नहीं सकता। एक दिन वह नौकरी की खोज में दिल्ली पहुँच जाता है जहाँ किसी सेठ के यहाँ उसे चौकीदारी मिल जाती है। 

एक दिन सेठ हरियाणा की कोई गाय खरीदने की बात हीरा सिंह से करता है। वह अपनी गाय की प्रशंसा कर बैठता है परन्तु अपने पुत्र के विरोध की बात करता है कि वह बेचने के लिए तैयार नहीं होगा। परन्तु उसके मन में यह भी विचार उठता है कि यदि वह अपनी गाय सेठ के यहाँ बेच देगा तो कम से कम अपनी आँखों के सामने उसे देख सकेगा। किसी तरह जवाहिर को समझा-बुझाकर वह अपनी गाय सेठ के यहाँ ले जाता है। हीरा सिंह ने सुन्दरिया को स्वयं चारा दिया परन्तु दुःख की बात हुई कि सेठ ने उसी दिन गाय को अपनी घेसी को सौंप दिया। गाय हीरा सिंह को छोड़कर जाना नहीं चाहती थी। हीरा सिंह ने गाय की सेवा करने की स्वयं इच्छा व्यक्त की परन्तु सेठ नहीं माना। हीरा सिंह ने कारुणिक स्वर में कहा – “जाओ बहिनी जाओ” परन्तु उसका हृदय ग्लानि तथा विषाद से रो उठा और गाय ने विषादभरा मुँह उठाकर मानो ऐसा कहा कि “क्या तुम कहते हो कि मैं जाऊँ ? हीरा सिंह ने उस (गाय की) मूक वाणी को समझा, उसने प्यार भरी आवाज में गाय को थपथपाते हुए जाने की विनती की और गाय सचमुच रोती हुई चली गयी। हीरा सिंह का हृदय ग्लानि और विषाद से भर उठा। 

दूसरे दिन गाय 15 सेर के स्थान पर 5 सेर दूध भी नहीं देती है। हीरा सिंह को सेठ के अनेक आरोप सुनने पड़ते हैं।हीरा सिंह गाय के पास जाकर रो-रोकर अपनी व्यथा सुनाता है और कहता है कि बहिन तू उसे इतना बेआबरू और रुसवा न कर।वह दूध दुही गयी उस गाय से पुनः 13 सेर दध निकाल कर दे देता है। गाय किसी प्रकार दूसरे के हाथ से दूध देना नहीं चाहती थी।सेठ उसे भला-बुरा कहकर रुपयों को वापस करने की बात करता है परन्तु उसके पास अब रुपये कहाँ थे? रुपये रखने के होते तो वह अपनी सुन्दरिया को बेचता ही क्यों ? एक दिन ड्योढ़ी पर दूध को फैला हआ देखकर लोगों को शंका होती है।हीरा सिंह पर चोरी का आरोप लगता है।गाय के व्यवहार ने सिद्ध कर दिया था कि प्रयत्न करके भी कोई दूध नहीं उतार सकेगा।हीरा सिंह सब समझ जाता है।अन्त में दो सौ पचास रुपये का तावान देने को तैयार होकर हीरा सिंह सुन्दरिया को अपने गाँव भेज देता है। 

हीरा सिंह का चरित्र चित्रण 

एक गौ कहानी का प्रमुख पात्र है - हीरा सिंह। हीरा सिंह एक ऐसा पात्र है जिसमें ईमानदारी, उदारता, प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी हुई है। हीरा सिंह ने हरियाणा के एक रईस जमींदार परिवार में पैदा होकर भौतिक सुखों की गोद में हँसता-खेलता जीवन बिताया था। लेकिन बदलते समय के साथ उनके परिवार को आर्थिक दशा बिगड़ती गई और एक समय ऐसा भी आ गया कि खाने-पीने के लिए भी संकट के बादल दिखाई देने लगे। इस परिवार में हीरा सिंह के अतिरिक्त उसकी पत्नी, दो बच्चे और एक अच्छी प्यारी सुन्दरिया नामक गाय थी। अतः हीरा सिंह का परिवार  बहुत छोटा था- फिर भी हीरा सिंह के परिवार चलाना कठिन हो गया था। लाचार होकर हीरा सिंह गाँव छोड़कर दिल्ली शहर में नौकरी करने चला जाता है। वह कर्मशील और ईमानदार व्यक्ति है। अतः जल्द ही शहर के एक सेठ के यहाँ उसे नौकरी मिल जाती है।इस घोर विप्पति  में भी उसने अपनी ईमानदारी और वफादारी को त्यागा नहीं बल्कि हरिश्चन्द्र बना रहा। उसके निम्नांकित चारित्रिक गुण हमेशा उसके साथ रहे - 
एक गौ
एक गौ

ईमानदार - 
हीरा सिंह का चरित्र एक ई मानदार व्यक्ति एवं स्वामिभक्त सेवक का चरित्र है।  इस गुण के कारण एक ओर वह अपने सेठ की नजर में विश्वासपात्र दिखता है, जबकि वहीं दूसरी ओर अपने सहयोगियों (अन्य नौकरों) की नजर में वह अधिक कौरा बन गया है। हीरा सिंह का व्यवहार, विश्वास, कर्म दूसरे नौकरों के समान नहीं था। नौकरी से आगे एक अगला कदम बढ़कर स्वामिभक्ति का भी एक चाव था, आजकल अन्य नौकरों में जिसकी गन्ध भी नहीं दिखाई देती। कभी हीरा सिंह की ईमानदारी पर शंका नहीं की जाती है।उसके मालिक सेठ जी उसकी ईमानदारी और अच्छे गुण एवं व्यवहार का प्रमाण-पत्र इन शब्दों में देते हुए कहते हैं-"हीरा सिंह, तुम्हारे जैसा ईमानदार चौकीदार हमें दूसरा नहीं मिल सकता । तनख्वाह तो तुम्हारी एक रुपया और बढ़ सकती है; पर तुमको ड्योढ़ी पर ही रहना होगा।” हीरा सिंह ईमानदार और वफादार है। वह सत्य से कभी पीछे नहीं हट सकता और सत्य को छिपाने को वह अपराध मानता है। सेठ को गाय की जरूरत होने पर जब वह कहता है, “एक तो मेरी निगाह में है पर उसका मालिक बेचे जब ।” यह कहकर उसको लगता है जैसे सत्य को छिपाकर वह पाप कर रहा है। सच्ची बात न कहने का कष्ट उसे भीतर से कोसता रहता है। उसे तब तक शान्ति नहीं आती जब तक सच्ची बात कह नहीं पाता। अपनी इसी ईमानदारी और वफादारी के कारण वह अपने मालिक सेठ का सबसे बड़ा प्रिय और चहेता बना हुआ है। 

भाग्यवादी और कर्मवादी -
हीरा सिंह एक ओर सभी भारतीय किसान की तरह भाग्यवादी तथा दूसरी ओर एक बीहड कर्मवादी और कर्त्तव्यपरायण व्यक्ति है। वह अपने उत्थान-पतन को भाग्य का खेल समझता है। हीरा सिंह भाग्यवादी होने के साथ-साथ घोर संघर्षशील कर्मवादी भी है। यही कारण है कि इस संकट में भी भाग्य को कोसता और रोता नहीं, बल्कि उसे सही रास्ते पर लाने के लिए घोर परिश्रम करता है और दिल्ली जाकर सेठ जी के यहाँ दरबान का काम करता है। 

पशु के प्रति प्रगाढ़ प्रेम - 
हीरा सिंह में पशु-प्रेम की भावना पूर्णरूप से कूट-कूट कर भरी हई है। उसके घराने का गौरव उसको दयनीय अवस्था में कहीं खो गया है। उसको अपने परिवार के पालन-पोषण की चिन्ता से अपनी सुन्दरिया की अधिक चिन्ता है, जिसे उसने बछिया के रूप से लेकर एक सम्पूर्ण गाय तक अत्यन्त प्रेम और दुलार से पाला था। गाय के खिलाने में मजबूर होने पर उसे बड़ा कष्ट होता है। यही कारण है कि यह दुर्दिन भाँपकर भी गाय को बेचने की इच्छा उसके मन में उठती ही नहीं क्योंकि गाय के प्रति स्वाभाविक दुलार-प्रेम उसे ऐसा नहीं करने देता है। वह उसी गाँव में दसरे दरवाजे के खूटे पर अपनी गाय को बँधे देखने को उसकी आत्मा तैयार नहीं। हीरा सिंह गाय बेचने को इसलिए तैयार हो जाता है कि सेठ के यहाँ गाय की सेवा करने का मौका उसे अवश्य मिलेगा और मेरी सुन्दरिया बहन मेरी आँखों के सामने हमेशा दिखाई देती रहेगी।गाय को घोसी के साथ करते समय हीरा सिंह का पशु-प्रेम अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है और जब उसकी गाय उससे विलग होने लगती है तो वह वेदना से भर जाता है- हीरा सिंह उसके पास आ गया।उसके गले पर थपथपाकर, माथे पर हाथ फेरा, गलबंध सहलाया और काँपती वाणी में कहा- "जाओ बहिनी सुन्दरिया, जाओ। कहीं दूर थोड़े ही हैं।" 

एक गौ कहानी की शीर्षक की सार्थकता 

कहानी का शीर्षक "एक गौ” एक उपयुक्त तथा सार्थक शीर्षक है। यह शीर्षक देखते ही 'एक गौ' के बारे में तरह-तरह की भावनाएँ करवट लेने लगती हैं। कहानीकार ने इस शीर्षक का इस्तेमाल करके इस कहानी को पूर्णरूप से संवेदनशील बनाया है। गौ के प्रति कहानी के नायक की ममता और प्रेम इस शीर्षक को सांस्कृतिक गौरव एवं शिक्षाप्रद स्थान प्रदान करती है। 



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