रामरक्षा कवच

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रामरक्षास्तोत्रम् Shree Ram Raksha Stotra रामरक्षा कवच ram raksha kavach रामरक्षास्तोत्रम् Shree Ram Raksha Stotra सभी प्रकार की भव बाधाओं व दुखों को दूर करने के लिए अमोघ मन्त्र हैं यह राम रक्षा कवच .भगवान् श्रीराम के कल्याणकारी स्वरूप में चित्त को एकाग्र करके इस महान् फलदायी स्तोत्र का कम-से-कम ग्यारह बार और यदि यह न हो सके तो सात बार और नियमित रूप से प्रतिदिन पाठ कीजिए।

रामरक्षास्तोत्रम्
Shree Ram Raksha Stotra


रामरक्षा कवच ram raksha kavach रामरक्षास्तोत्रम्  Shree Ram Raksha Stotra सभी प्रकार की भव बाधाओं व दुखों को दूर करने के लिए अमोघ मन्त्र हैं यह राम रक्षा कवच .यदि आप किसी मुश्किल में फंसे हैं और कोई उपाय काम नहीं कर रहा।  किसी शत्रु का भय सता रहा हो या लड़ाई झगडे का डर हो।असाधारण रूप से आप भय का अनुभव कर रहे हों।ऐसी परिस्थिति  में श्री राम रक्षा स्त्रोत एक अमोघ अस्त्र सिद्ध होता है।आपके व्यक्तिगत जीवन व सामाजिक जीवन में हर प्रकार के दुखों को दूर कर प्रभु श्रीराम का आशीर्वाद आपको प्राप्त होता है और आप जीवन के हर क्षेत्र में सफल होते हैं।


रामरक्षाकवच की सिद्धि की विधि 

नवरात्र में प्रतिदिन नौ दिनों तक ब्राह्म-मूहूर्त में नित्य-कर्म तथा स्नानादि से निवृत हो शुद्ध वस्त्र धारणकर कुशाके आसन पर सुखासन लगाकर बैठ जाइए। भगवान् श्रीराम के कल्याणकारी स्वरूप में चित्त को एकाग्र करके इस महान् फलदायी स्तोत्र का कम-से-कम ग्यारह बार और यदि यह न हो सके तो सात बार और नियमित रूप से प्रतिदिन पाठ कीजिए। पाठ करने वाले की श्रीराम की शक्तियों के प्रति जितनी अखण्ड श्रद्धा होगी, उतना ही फल प्राप्त होगा। वैसे ‘रामरक्षाकवच' कुछ लंबा है, पर इस संक्षिप्त रूप से भी काम चल सकता है। पूर्ण शांति और विश्वास से इसका जाप होना चाहिए, यहाँ तक कि यह कण्ठस्थ हो जाए।

विनियोगः 

अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रस्य बुधकौशिक ऋषिः श्रीसीतारामचन्द्रो देवता अनुष्टुप् छन्दः सीता शक्तिः श्रीमान् हनुमान कीलकं श्रीरामचन्द्रप्रीत्यग्रे रामरक्षास्तोत्रजपे विनयोगः।

ध्यानम्

ध्यायेराजनुबाहं धृतशरधनुषं बद्धपद्यासनस्थं पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् । वामक्ङारूढ़ सीतामुखकमलमिल्लोचनं नीरदाभं नानालंकारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥


स्तोत्रम् 

चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् ।
एकैकमक्षरं पुसा महापातकनाशनम् ॥१॥
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं राम राजीवलोचनम् ।
जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥२॥
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तचरान्तकम्।
स्वलीलया जगत्त्रातुमविर्भूतमजं विभुम् ॥३॥
रामरंक्षां पठेत्प्राज्ञः पाप सर्वकामदाम्।
भगवान् श्रीराम
भगवान् श्रीराम
शिरो में राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥४॥
कौसल्येयो दृशो पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती।
घ्राणं पातु मखयात्रा मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥५॥
जिहां विद्यानिधिः पातु कण्ठं भरतवन्दितः।
स्कन्धौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥६॥
करो सीतापतिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित्।।
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जाम्बवदाश्रयः ॥७॥
सुग्रीवेशः कटी पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ।
ऊरु रघूत्तमः पातु रक्षःकुलविनाशकृत् ॥८॥
जानुनी सेतुकृत्पातु जथ्डे दशमुखान्तुकः।।
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रारमोऽखिलं वपुः ॥९ ॥
एतां रमबलोपतां रक्षां यः सुकृति पठेत् ।।
स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥१०॥
पातालभूतलव्योमचारिणश्छझचारिणः ।
न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनाभिः ॥११॥
रोति रामभद्रेति रामचन्द्रेति वा स्मरन् ।
नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्ति च विन्दति ॥१२॥
जगज्जैत्रैकमन्त्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् ।
यः कण्ठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥१३॥
वज्रपज्जरनामेदं यो रामकवचं स्मरेत् ।
अवहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥१४॥
आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षमिनां हरः।
तथा लिखितवान्प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥१५॥
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् ।
अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान्स नः प्रभुः ॥१६॥
तरूणें रूपसम्पनौ सुकुमारौ महाबलौ।
पुण्डरीकविशालाक्षी चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥
फलमूलशिनौ दान्तौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ।
पुत्रौ । दशरथस्यैऔ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥
शरण्यौ सर्वसत्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।
रक्षः कुलनिहन्तारौ त्रायेतं नो रघूत्तमौ ॥१६॥
आत्तसज्जधनुषविषुस्पृशा-वक्षयाशनिषडगृसन्डिनौ।
रक्षाणाय मम रामलक्ष्मणा-वग्रतः पथि सदैव गच्छताम् ॥२०॥
संनद्ध कवची खण्डगी चापबाणधरो युवा।
गच्छन्मनोरथान्नश्च रामः पातु सलक्ष्मणः ॥२१॥
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली।
काकुत्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूत्तमः ॥२२॥
वेदान्तवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः।
जानकीवल्लभं श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥२३॥
इत्येथिनि जपन्नियं मभद्रक्तः श्रद्वयान्वितः ।
अश्वमेधाधिकं पुण्यं सम्प्रान्त्रोति न संशयः ॥२४॥
रामं दूर्वादलश्यामं पद्याक्षं पीतवाससम् ।
स्तवन्ति नामाभिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नराः ॥२५॥
राम लक्ष्मणपूर्वजं रघुवरं सीतापति सुन्दरं ।
काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिम् ॥
राजेन्द्रं सत्यसंधं दशरथतनयं श्यामलं शान्तमूर्ति
वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ॥२६॥
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे ।
रघुनथायं नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥२७॥
श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम, श्रीराम भरताग्रज राम राम।
राम राम रणकर्कश राम राम, श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥
श्रीरामचन्द्रचरणौ मनसा स्मरामि, श्रीरामचन्द्रचरणौ वचसा गृणामि।
‘श्रीरामचन्द्रचरणौ शिरसा नमामि, श्रीरामचन्द्रचरणौ शरणं प्रपद्ये ॥२६॥
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः, स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।
सर्वस्वं में रामचन्द्रो दयालु-र्नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा।
पुरतो मारुतिर्यस्य तं वन्दे रघुन्दनम् ॥३१॥ ।
लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् ।
कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३३॥
कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।
आरुह्म कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिल्म् ॥३४॥
आपदामपहर्तारं दातारं सर्वसम्दाम् ।
लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्हम् ॥३५॥
भर्जनं भवबीजानामर्जनं सुखसम्दासम् । ।
तर्जनं यमदूतानां रामरामेति गर्जनम् ॥३६॥
रामो राजमणिः सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नमः।
रामान्नास्ति परायणं परतरं रामस्य दासोऽस्म्हं
रामेचित्तलयः सदा भवतु से भो राम मामुद्धर ॥३७॥
राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमें।
सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३८॥


इति श्रीबुधकौशिकमुनिविरचितं श्रीरामक्षास्तोत्र सम्पूर्णम् ।



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