अहसास

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औरत के जीवन का सबसे खूबसूरत किस्सा और वाक्या होता है, जिसे सभी अनुभूतियों का सबसे बड़ा गहना मानती है, एक पूर्ण स्त्री होने का। उस पूर्णता की हत्या के लिए डॉली ने अपनेआप को कभी माफ़ नहीं किया। समाज के तानों और भविष्य में होने वाले आलोचनाओं से तो ख़ुद को बचा लिया था परन्तुं अपने अंतर्मन के ताने और आलोचनाओं से ख़ुद को कैसे बचा पाती।

अहसास


डॉली ने अपना बैग बिस्तर पे पटका और गुसलखाने में आईने के सामने खड़ी होकर अपना मुंह निहारने लगी थी। उसने देखा की आज उसका चेहरा अलग ही तरह के आभा में नहाया हुआ था। मुख पर चंचलता छलांगे लगा रही थी। आँखों में परिपक्वता झांक रही थी। उसने अपने आँखों के बिखरे स्याह को देखा वह भी अपने बिखराव को सरलता के सुन्दर  तराजू के दो पलड़ों में बराबर बराबर बाट जैसे  नपे तुले खूब भा रहे रहे थे मानो फैले स्याह ने आखों को और मनमोहक बना दिया था। डाली की उम्र 28 वर्ष थी। वह एक भावुक लड़की थी। छोटी कहानियां लिखती थी। सही मायने में डॉली एक कलाकार थी।

डॉली को कुछ समझ तो नहीं आया था पर उसको ये अहसास किसी सृजन शक्ति को उत्पन्न करने से पहले जो
अहसास
मानस पटल में एक छवि सी उभरती है उस सा ख़याल मन में एक भिन्न अनुभूति को जन्म दे चुकी थी।  उसने जल्दी से अपने मुख पर पानी की छींटे मारी और बाहर आकर उसने रसोईघर में जाकर काली चाय बनाई और अपने कमरे में किताबों की मेज पर आकर बैठ गयी। उसने सिगरेट के डिब्बी में से एक सिगरेट जलाई, चाय की एक चुस्की ली और सिगरेट का एक कश लेती रही। कुछ देर तक  एक टक सिगरेट के धुएं को निहारती रही  जिसमें वो अपने जीवन में घट चुकी उस सुन्दर सपने को या यूँ कहें कि कुछ पल के उस सुन्दर सपने, जो की अब टूट कर बिखर चुका था अब सुन्दर नहीं बस एक टीस बनाकर सिगरेट के धुंएँ में दर्द बन कर उड़ रही थी। सोचने लगी थी की काश! उस दिन ही वह उस रिश्ते को अलविदा कर देती जिस दिन वो रिश्ता बिना बने टूट चूका था, बिखर चुका था। जिसकी बुनियाद ही खोखले ईंटों पर रखी थी। लेकिन मैंने न जाने किस लालच में इस रिश्ते को आगे बढ़ाया बिना उसके भावनात्मक जुड़ाव के जिसे सिर्फ एक मशीनी रिश्ते का नाम दिया था उसने।

दरअसल डॉली के जीवन की सबसे बड़ी घटना महज़ कुछ चन्द महीने पहले की ही थी। डॉली कुछ महीने पहले एक आदमी से जुडी जिसकी उम्र ३५ साल की थी जिसका नाम विक्रम था। डॉली को शादी में कोई दिलचस्पी नहीं थी परन्तु जब उसने विक्रम से बात की तब उसे ऐसे लगा की आज तक जिस इंसान को वो ढूंढ रही थी... यही तो था वो। डॉली को लगा कि बचपन से लेकर आजतक जिस छवि की कल्पना करती आयी थी वही साक्षात् उसके समक्ष खड़ा था। वही गंभीरता, कला के प्रति आदर भाव, और किताबों से मोहब्बत ये सब था उसमें हाँ बस वो दिखता कैसा हो इसकी परवाह नहीं थी डॉली को। सब कुछ तय कर लिया था दोनों ने बस एक मिलना रह गया था।

वह दिन भी आया जब दोनों एक दूसरे से मिले पर वही हुआ जो शायद नहीं होना चाहिये था। विक्रम ने डॉली को एक झलक देखते ही मन बना लिया था की वो उससे शादी नहीं कर सकता परन्तु डॉली को फ़ौरन  नहीं बताया उसने। दूसरे दिन डॉली को विक्रम ने फ़ोन पर साफ मना कर दिया कि उससे शादी नहीं कर सकेगा। डॉली ने जानने की बहुत कोशिश की.. कि आखिर इतने दिनों से हम बातें की थीं कि शादी के बाद कैसे अपनी दुनियां बासनी है और एक झलक में ही मुझे मना कैसे कर दिया। डॉली बहुत चिल्लाई चीखी, उसके आंसुओं की धारा जाने कितने दिनों के बादल की प्यास बनकर बरस पड़ी थी मनो जन्मों से प्यासी हो आंसुओं की। डॉली को लगाने लगा था की कहीं जाकर वह अपनी जान देदे, समुन्दर में कूद जाये। सिगरेट के धुएं में कहीं उड़ जाये धुआँ बनकर कि किसी को नज़र नहीं आये। डॉली का जीवन  फिर से उस सूखे रेगिस्तान के जैसे तपने लगा था। उसकी आँखे बारिश ख़त्म होने के बाद अंगारे जैसी लाल हो गयी थीं। लेकिन उसके हाँथ से वह छूट गया था जो उसने कभी अपने उंगली में लपेट रखा था - एक घरौंदा बनाने का धागा। जिससे वो अपने सपनो का आशियाना बनाना चाहती थी खूब सुंदर नक़्क़ाशीदार घरौंदा।

जैसे तैसे उसने अपने आपको सँभालने की कोशिश की थी और ख़ुद के सुकून के लिए बस वह विक्रम से जुड़ा रहना चाहती थी, भावनात्मक रूप से। डॉली ने विक्रम को एक मशवरा दिया था कि क्यों न विक्रम जब तक तुम्हें कोई न मिल जाये तब तक हम एक साथ रहें और जब तुम इस संसार में अकेला महसूस करना, थका हुआ, हारा हुआ समझना, खींझ गए हो और मानसिक पीड़ा में हो तो मेरे पास आ जाना और मेरे गोद में अपना सर रखकर जी भर रो लेना। मैं हमेशा उस वक़्त तुम्हारे साथ रहूंगी। लेकिन कहाँ पता था की विक्रम को डॉली पसंद ही नहीं थी और उसने डॉली प्रस्ताव को कुछ और ही समझ लिया था - 'मशीनी रिश्ता' मतलब जरुरत का रिश्ता। हाँ! जरुरत तो थी डॉली को लेकिन सिर्फ़ एक ऐसी जरुरत जिसमें भावना हो, एक सुकून की जरुरत, मन की जरुरत इससे ज्यादा कुछ नहीं। आह! कितना दर्द भरा था यह सब डॉली के लिए फिर क्या था, वो विक्रम से भावनात्मकता से जुडी थी तो उसके होने का अहसास ही डॉली के लिये काफी था। वो उसके होने के अहसास से ही संतुष्ट थी।  उसे इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए था लेकिन विक्रम को ये भी गवारा नहीं था।  इस बात से डॉली बहुत दुखी रहती थी की उसने कभी तो ऐसा नहीं चाहा था।

सोचते सोचते डॉली के मन एक और बात आयी थी कि उसका मासिक धर्म नहीं शुरू हुआ, कई दिन हो गए थे। डॉली ने जैसे ही ऐसे सोचना शुरू किया था कि उसकी साँस फूलने लगी थी कि ऐसे तो कभी नहीं हुआ था उसके साथ। उसने जैसे तैसे अपने हांथो से टटोलते हुए फोन का रिसीवर उठाकर फ़ौरन अपनी बचपन की सहेली को फोन लगाया और उससे सब कुछ बताया। मृदा थोड़ा तो घबराई लेकिन उसने हिम्मत बांधते हुए डॉली को भी हिम्मत बंधाया और कहा कि तू घबरा मत मैं आती हूँ। मृदा डॉली की बचपन की सहेली थी। डॉली मृदा के आने तक बेसुध होकर पड़ी रही। दरवाजे की घंटी बजी डॉली भागकर दरवाजे पर गयी जल्दी से दरवाजा खोला। मृदा को देखते ही डॉली उससे लिपट गयी और फूटफूट कर रोने लगी। मृदा ने डॉली को संभलकर बैठाया और उससे कुछ प्रश्न  पूछे- डॉली! अच्छा ये बता कि क्या तेरे स्तनों में कुछ भारीपन सा है क्या? डॉली ने सर हिलाकर हामी भरी और सोचने लगी कि तभी मेरे स्तन कुछ दिनों से भीनी सी दर्द में हैं और मैं मूरख कुछ समझ नहीं सकी तभी उसने  सिगरेट की डिब्बी से एक और सिगरेट निकालकर जलाया और एक कश लगते हुए आहें भरी और मृदा से पूछा की बता मृदा अब क्या करूँ ? क्या सच में ऐसा है जैसा तुम्हें लग रहा मृदा ? कुछ देर तक दोनों गंभीर मुद्रा में एक दूसरे की तरफ देखते रहे और मृदा ने  सिगरेट के  धुएं को देखते हुए कहा.. सुन डॉली! अब तू बस कर दे ख़ुद को सिगरेट के साथ जलना।


मृदा ने डॉली को टेस्ट करने को कहा और टेस्ट सकारात्मक निकला। डॉली की आंखें जैसे आंसुओं की नांव में चप्पू चला रहीं थी। वह अकेले ही इस अनोखे अहसास का क्या करने वाली थी उसको ख़ुद को कुछ सूझ नहीं रहा था कि वह इस खूबसूरत अहसास का जश्न मनाये की मातम में मैयत पर जा बैठे। एक तरफ उसके जिश्म में हो रहे इस  परिवर्तन से उसका मन एक अनोखे अनुभूति से नहा रहा था, आँखों के चमकीले मोती चांदनी में छान कर आये हों जैसे और नयी सृजन के आने का सपना संजो रहे थे। और एक ओर उस अजन्में को समाज में कोई सम्मान कोई आदर नहीं मिलने की सोच और लोक लाज का भय मन में गोते लगा रहा था।आखिर में डॉली ने बड़े हिम्मत से और कठोरता से ये फैसला किया कि वह इस अहसास को मार डालेगी। अपने जिश्म से निकाल बाहर फेंकेगी। उसने अपने सभी अहसासों को मार दिया और संसार के सबसे खूबसूरत अहसाह का उसने गला घोंटकर अपने आप को आंसुओं के समंदर में बहा दिया था। समाज के तानों और भविष्य में होने वाले आलोचनाओं से तो ख़ुद को बचा लिया था परन्तुं अपने अंतर्मन के ताने और आलोचनाओं से ख़ुद को कैसे बचा पाती।

डॉली अकेले ही सभी तकलीफों से जूझती रही।  मृदा ने  विक्रम को इसके बारे में बताया किन्तु विक्रम के मन में  डॉली के लिए कोई भावना थी ही नहीं उसको तो सिर्फ अपनी जरुरत पूरी करनी थी सो उसने कर ली थी। डॉली भी क्या ढीट माटी की देवी थी।  उसने कभी भी इन सबके लिए विक्रम को ग़लत नहीं ठहराया था। हाँ! परन्तु डॉली ने अपनेआप उस अनोखे अहसास को मारकर ख़ुद को भी मार दिया था। वो न तो किसी से बात करती थी न कोई प्रतिक्रिया करती थी बस वो  फिर कभी कोई सपने नहीं देखना चाहती थी। उसने अपने अनोखे अहसास जो की हर एक औरत के जीवन का सबसे खूबसूरत किस्सा और वाक्या होता है, जिसे सभी अनुभूतियों का सबसे बड़ा गहना मानती है, एक पूर्ण स्त्री होने का। उस पूर्णता की हत्या के लिए  डॉली ने अपनेआप को कभी माफ़ नहीं किया।  

- आभा सिंह 

COMMENTS

BLOGGER: 1
  1. कहानी में वर्तनी की बहुत गलतियां हैं और कहीं कहानी और कहीं आपबीती/ संस्मरण से सर्वनाम प्रयोग किए गए हैं एक बार सिरे से सिरे तक पढकर एकरूपता देने की बहुत जरूरत है.

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