एक फूल की चाह

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एक फूल की चाह कविता Ek phool ki chah By Siyaramsharan Gupt


बहुत रोकता था सुखिया को,
‘न जा खेलने को बाहर’,
नहीं खेलना रुकता उसका
नहीं ठहरती वह पल भर।
मेरा हृदय काँप उठता था,
बाहर गई निहार उसे;
यही मनाता था कि बचा लूँ
किसी भाँति इस बार उसे।

भीतर जो डर रहा छिपाए,
हाय! वही बाहर आया।
एक दिवस सुखिया के तनु को
ताप तप्त मैंने पाया।
ज्वर में विह्वल हो बोली वह,
क्या जानूँ किस डर से डर,
मुझको देवी के प्रसाद का
एक फूल ही दो लाकर।

क्रमश: कंठ क्षीण हो आया,
शिथिल हुए अवयव सारे,
बैठा था नव नव उपाय की
चिंता में मैं मनमारे।
जान सका न प्रभात सजग से
हुई अलस कब दोपहरी,
स्वर्ण घनों में कब रवि डूबा,
कब आई संध्या गहरी।

सभी ओर दिखलाई दी बस,
अंधकार की ही छाया,
छोटी सी बच्ची को ग्रसने
कितना बड़ा तिमिर आया।
ऊपर विस्तृत महाकाश में
जलते से अंगारों से,
झुलसी जाती थी आँखें
जगमग जगते तारों से।

देख रहा था जो सुस्थिर हो
नहीं बैठती थी क्षण भर,
हाय! वही चुपचाप पड़ी थी
अटल शांति सी धारण कर।
सुनना वही चाहता था मैं
उसे स्वयं ही उकसाकर
मुझको देवी के प्रसाद का
एक फूल ही दो लाकर।

ऊँचे शैल शिखर के ऊपर
मंदिर था विस्तीर्ण विशाल;
स्वर्ण कलश सरसिज विहसित थे
पाकर समुदित रवि कर जाल।
दीप धूप से आमोदित था
मंदिर का आँगन सारा;
गूँज रही थी भीतर बाहर
मुखरित उत्सव की धारा।

भक्त वृंद मृदु मधुर कंठ से
गाते थे सभक्ति मुद मय,
‘पतित तारिणी पाप हारिणी,
माता तेरी जय जय जय।‘
‘पतित तारिणी, तेरी जय जय’
मेरे मुख से भी निकला,
बिना बढ़े ही मैं आगे को
जाने किस बल से ढ़िकला।

मेरे दीप फूल लेकर वे
अंबा को अर्पित करके
दिया पुजारी ने प्रसाद जब
आगे को अंजलि भरके,
भूल गया उसका लेना झट,
परम लाभ सा पाकर मैं।
सोचा, बेटी को माँ के ये,
पुण्य पुष्प दूँ जाकर मैं।

सिंह पौर तक भी आँगन से
नहीं पहुँचने मैं पाया,
सहसा यह सुन पड़ा कि – “कैसे
यह अछूत भीतर आया?
पकड़ो देखो भाग न जावे,
बना धूर्त यह है कैसा;
साफ स्वच्छ परिधान किए है,
भले मानुषों के जैसा।

पापी ने मंदिर में घुसकर
किया अनर्थ बड़ा भारी;
कलुषित कर दी है मंदिर की
चिरकालिक शुचिता सारी।“
ऐं, क्या मेरा कलुष बड़ा है
देवी की गरिमा से भी;
किसी बात में हूँ मैं आगे
माता की महिमा के भी?

माँ के भक्त हुए तुम कैसे,
करके यह विचार खोटा?
माँ के सम्मुख ही माँ का तुम
गौरव करते हो छोटा।
कुछ न सुना भक्तों ने, झट से
मुझे घेरकर पकड़ लिया;
मार मारकर मुक्के घूँसे
धम्म से नीचे गिरा दिया।

मेरे हाथों से प्रसाद भी
बिखर गया हा! सबका सब,
हाय! अभागी बेटी तुझ तक
कैसे पहुँच सके यह अब।
अंतिम बार गोद में बेटी,
तुझको ले न सका मैं हा!
एक फूल माँ का प्रसाद भी
तुझको दे न सका मैं हा!


एक फूल की चाह कविता की व्याख्या



उद्वेलित कर अश्रु-राशियाँ,
हृदय-चिताएँ धधकाकर,
महा महामारी प्रचंड हो
फैल रही थी इधर-उधर | 
क्षीण-कंठ मृतवत्साओं का
करुण रुदन दुर्दांत नितांत,
भरे हुए था निज कृश रव में
हाहाकार अपार अशांत | 

भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ एक फूल की चाह कविता से उद्धृत हैं, जो कवि 'सियारामशरण गुप्त' जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कहते हैं कि लोगों के अंदर एक भयानक महामारी का डर समाया हुआ था | क्योंकी इस महामारी ने अपने चपेट में मासूम बच्चों को ले लिया था | जिन्होंने अपने बच्चों को महामारी की वजह से खोया था, उनके आँसू थम नहीं रहे थे | निरन्तर रोते-रोते उनकी आवाज़ कमज़ोर पड़ चुकी थी | परन्तु, कहीं न कहीं उस कमज़ोर या करुणा से भरे स्वर में भी अपार अशांति फैलाने वाला हाहाकार छुपा था | 

(2)- बहुत रोकता था सुखिया को,
‘न जा खेलने को बाहर’,
नहीं खेलना रुकता उसका
नहीं ठहरती वह पल-भर | 
मेरा हृदय काँप उठता था,
बाहर गई निहार उसे;
यही मनाता था कि बचा लूँ
किसी भाँति इस बार उसे | 

भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ एक फूल की चाह कविता से उद्धृत हैं, जो कवि 'सियारामशरण गुप्त' जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि अपनी पुत्री सुखिया को घर से बाहर खेलने जाने से मना करते हैं | परन्तु, सुखिया हठी प्रवृत्ति अपनाकर बाहर खेलने चली ही जाती थी | सुखिया को बाहर खेलते जाते देख पिता का हृदय काँप उठता था | पिता सिर्फ इसी सोच में रहते हैं कि वे किसी भी तरह इस बार अपनी पुत्री को महामारी के प्रकोप से बचा लें | 
  
(3)- भीतर जो डर रहा छिपाए,
हाय! वही बाहर आया | 
एक दिवस सुखिया के तनु को
ताप-तप्त मैंने पाया | 
ज्वर में विह्वल हो बोली वह,
क्या जानूँ किस डर से डर,
मुझको देवी के प्रसाद का
एक फूल ही दो लाकर | 

भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ 'एक फूल की चाह' कविता से उद्धृत हैं, जो कवि 'सियारामशरण गुप्त' जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कहना चाह रहे हैं कि सुखिया के पिता के मन में जो डर छुपा था, दरअसल वही हुआ | जब एक दिन सुखिया बुखार से तप रही थी | तेज बुखार से विचलित होकर वह बोली कि उसे किसी बात का भय नहीं है | तत्पश्चात्, सुखिया अपने पिता से कहती है कि वे उसे देवी माँ के प्रसाद का एक फूल ही लाकर दे दे, ताकि वह ठीक जाए | 

(4)- क्रमश: कंठ क्षीण हो आया,
शिथिल हुए अवयव सारे,
बैठा था नव-नव उपाय की
चिंता में मैं मनमारे | 
जान सका न प्रभात सजग से
हुई अलस कब दोपहरी,
स्वर्ण घनों में कब रवि डूबा,
कब आई संध्या गहरी | 

भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ 'एक फूल की चाह' कविता से उद्धृत हैं, जो कवि 'सियारामशरण गुप्त' जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि सुखिया का गला सूख गया था गले से आवाज़ नहीं निकल रही थी | वह शारीरिक रूप से कमज़ोर पड़ने लगी थी | सुखिया के पिता किसी उम्मीद में नए-नए उपाय करके देख चुके थे | वे गहरी चिंता में मन मार के बैठे थे | तत्पश्चात्, वे यह न जान सके कि कब सुबह हो गई, कब आलस से भरी दोपहर ढल गई, कब सुनहरे बादलों में सूर्य डूबा और कब संध्या हो गई | 

(5)- सभी ओर दिखलाई दी बस,
अंधकार की ही छाया,
छोटी सी बच्ची को ग्रसने
कितना बड़ा तिमिर आया !
ऊपर विस्तृत महाकाश में
जलते-से अंगारों से,
झुलसी-सी जाती थी आँखें
जगमग जगते तारों से | 

भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ 'एक फूल की चाह' कविता से उद्धृत हैं, जो कवि 'सियारामशरण गुप्त' जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि चारों तरफ़ सिर्फ अंधेरा ही छाया हुआ था, जिसे देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो छोटी सी बच्ची को निगलने चला आ रहा था इतना बड़ा घना अंधेरा | सुखिया के पिता को आकाश में जगमगाते तारे जलते अंगारों के समान प्रतीत हो रहे थे | तारों की चमक देखकर पिता की आँखें झुलस-सी गई हैं | क्योंकि पिता को रातों में नींद नहीं आती थी, वे चिंता में डूबे रहते थे | 

(6)- देख रहा था-जो सुस्थिर हो
नहीं बैठती थी क्षण-भर,
हाय! वही चुपचाप पड़ी थी
अटल शांति सी धारण कर | 
सुनना वही चाहता था मैं
उसे स्वयं ही उकसाकर-
मुझको देवी के प्रसाद का
एक फूल ही दो लाकर !

भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ 'एक फूल की चाह' कविता से उद्धृत हैं, जो कवि 'सियारामशरण गुप्त' जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि जो बच्ची एक स्थान पर कभी भी शान्त नहीं बैठती थी, हमेशा उछलकूद करती रहती थी, आज वही बच्ची इस तरह न टूटने वाली अटल शांति धारण किए चुपचाप पड़ी थी | तत्पश्चात्, सुखिया के पिता खुद सुखिया को उकसा कर यही सुनना चाह रहे थे कि वह उन्हें कहे कि उसे देवी माँ के प्रसाद का एक फूल चाहिए | उस फूल को लाकर दो | 

(7)- ऊँचे शैल-शिखर के ऊपर
मंदिर था विस्तीर्ण विशाल;
स्वर्ण-कलश सरसिज विहसित थे
पाकर समुदित रवि-कर-जाल | 
दीप-धूप से आमोदित था
मंदिर का आँगन सारा;
गूँज रही थी भीतर-बाहर
मुखरित उत्सव की धारा | 

भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ 'एक फूल की चाह' कविता से उद्धृत हैं, जो कवि 'सियारामशरण गुप्त' जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि ऊँची पहाड़ी के शिखर पर एक विशाल मंदिर था, जिसके आँगन में खिले कमल के फूल सूर्य की किरणों में ऐसे प्रतीत हो रहे थे, मानो सूर्य की किरणों में सोने के कलश चमक रहे हों | मंदिर का सारा आँगन दीपकों की जगमगाहट और धूपों की महक से सजा हुआ था | कवि कहते हैं कि मंदिर के अंदर और बाहर ऐसा आभास हो रहा था, मानो मंदिर में कोई उत्सव गतिमान हो | 

(8)- भक्त-वृंद मृदु-मधुर कंठ से
गाते थे सभक्ति मुद -मय,-
‘पतित-तारिणी पाप-हारिणी,
माता, तेरी जय-जय-जय!‘
‘पतित-तारिणी, तेरी जय जय’-
मेरे मुख से भी निकला,
बिना बढ़े ही मैं आगे को
जाने किस बल से ढिकला!

भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ 'एक फूल की चाह' कविता से उद्धृत हैं, जो कवि 'सियारामशरण गुप्त' जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि सुखिया के पिता जब मंदिर पहुँचे तो वँहा भक्तों का समूह मधुर आवाज़ में साथ मिलकर देवी माँ की पूजा कर रहे थे -- ‘सब गा रहे थे पतित तारिणी पाप हारिणी, माता तेरी जय जय जय...|' देवी माँ की स्तुति में सुखिया के पिता भी मग्न हो गए | तत्पश्चात्, बिना कोशिश के ही वे अपने-आप मंदिर के अंदर चला गए, उन्हें ऐसा आभास हुआ मानो उसे किसी अदृश्य शक्ति ने मंदिर के अंदर धकेला हो | 

(9)- मेरे दीप-फूल लेकर वे
अंबा को अर्पित करके
दिया पुजारी ने प्रसाद जब
आगे को अंजलि भरके,
भूल गया उसका लेना झट,
परम लाभ-सा पाकर मैं | 
सोचा, -बेटी को माँ के ये
पुण्य-पुष्प दूँ जाकर मैं | 

भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ 'एक फूल की चाह' कविता से उद्धृत हैं, जो कवि 'सियारामशरण गुप्त' जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि पुजारी ने पिता के हाथों से दीप और फूल लेकर देवी माँ की प्रतिमा को अर्पित कर दिया | तत्पश्चात्, पुजारी ने जब सुखिया केे पिता को देवी माँ का प्रसाद दिया, तो उसने कल्पना वश पल भर के लिए तात्कालीन क्षण के आनंद में प्रसाद लेना ही भूल जाता है | पिता सोचने लगे कि यह पूण्य पुष्प वह अपनी बेटी को जाकर दे | 

(10)- सिंह पौर तक भी आँगन से
नहीं पहुँचने मैं पाया,
सहसा यह सुन पड़ा कि – “कैसे
यह अछूत भीतर आया?
पकड़ो देखो भाग न जावे,
बना धूर्त यह है कैसा;
साफ स्वच्छ परिधान किए है,
भले मानुषों के जैसा !

भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ 'एक फूल की चाह' कविता से उद्धृत हैं, जो कवि 'सियारामशरण गुप्त' जी के द्वारा रचित है | कवि इन पंक्तियों के माध्यम से यह बताना चाहते हैं कि निम्न जाति वालों का मंदिर में जाना प्रतिबंधित है | कवि कहते हैं कि सुखिया के पिता प्रसाद लेकर मंदिर के द्वार तक भी नहीं पहुँच पाए थे कि यकायक पीछे से आवाज़ आई – ‘यह अछूत मंदिर के अंदर कैसे प्रवेश किया | इसे पकड़ों, कहीं यह भाग ना जाए | यह तो भले मानुष के जैसा बनकर आया है और देखो तो कैसे साफ-सुथरे कपड़े पहनकर हमें मुर्ख बना रहा है | 

(11)- अच्छा नहीं माना जाता था | 
पापी ने मंदिर में घुसकर
किया अनर्थ बड़ा भारी;
कलुषित कर दी है मंदिर की
चिरकालिक शुचिता सारी |“
ऐं, क्या मेरा कलुष बड़ा है
देवी की गरिमा से भी;
किसी बात में हूँ मैं आगे
माता की महिमा के भी ?

भावार्थ   - प्रस्तुत पंक्तियाँ 'एक फूल की चाह' कविता से उद्धृत हैं, जो कवि 'सियारामशरण गुप्त' जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि सुखिया के पिता का मंदिर में प्रवेश करना अच्छा नहीं माना जाता था | लोग कहने लगे कि यह पापी मंदिर में घुसकर बहुत बड़ा अनर्थ कर दिया है | साथ में यह भी कहने लगे कि वर्षों से बनी मंदिर की परम्परा और पवित्रता को इसने अशुद्ध करने का काम किया है | उक्त घटना से आहत होकर सुखिया के पिता यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि क्या मेरा अछूतपन देवी माँ की गरिमा से भी बड़ा है ? क्या मेरी महिमा इतना बलशाली है कि मेरे इस अछूतपन से देवी माँ की महिमा धूमिल हो गई | 

(12)- माँ के भक्त हुए तुम कैसे,
करके यह विचार खोटा ?
माँ के सम्मुख ही माँ का तुम
गौरव करते हो छोटा !
कुछ न सुना भक्तों ने, झट से
मुझे घेरकर पकड़ लिया;
मार मारकर मुक्के घूँसे
धम्म से नीचे गिरा दिया !

भावार्थ  - प्रस्तुत पंक्तियाँ 'एक फूल की चाह' कविता से उद्धृत हैं, जो कवि 'सियारामशरण गुप्त' जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि लोगों की ओछी सोच का उजागर किए हैं | सुखिया के पिता ने भीड़ से कहा कि तुम देवी माँ के कैसे भक्त हो, जो स्वयं माँ के गौरव को मुझसे तुलना करते हुए छोटेपन की संज्ञा दे रहे हो | कवि कह रहे हैं कि तत्पश्चात्, सुखिया के पिता की एक भी बात नहीं सुनी गई और भक्तों ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया | तत्पश्चात्, उसे मार-मारकर नीचे जमीन पर गिरा दिया | 

(13)- मेरे हाथों से प्रसाद भी
बिखर गया हा ! सबका सब,
हाय! अभागी बेटी तुझ तक
कैसे पहुँच सके यह अब | 
न्यायालय ले गए मुझे वे,
सात दिवस का दंड-विधान
मुझको हुआ; हुआ था मुझसे
देवी का महान अपमान ! 

भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ 'एक फूल की चाह' कविता से उद्धृत हैं, जो कवि 'सियारामशरण गुप्त' जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि जब भीड़ ने सुखिया के पिता को मार-मारकर जमीन पर फेंक दिया, तब उनके हाथों से सारा  प्रसाद  बिखर गया | तभी वे सोचने लगे कि आखिर वे अपनी अभागी बेटी तक देवी माँ के प्रसाद का फूल कैसे पहुँच सकेगा | उसके बाद सुखिया के पिता को पकड़कर न्यायलय ले जाया गया | उन्हें देवी माँ के अपमान के अपराध हेतु सात दिवस के कारावास का दंड मिला | अत: पिता सोचने पर मजबूर हो गए कि जरूर उनसे देवी माँ का अपमान हो गया होगा | इसलिए उसे सजा सुनाई गई | 

(14)- मैंने स्वीकृत किया दंड वह
शीश झुकाकर चुप ही रह;
उस असीम अभियोग, दोष का
क्या उत्तर देता, क्या कह ? 
सात रोज ही रहा जेल में
या कि वहाँ सदियाँ बीतीं,
अविश्रांत बरसा करके भी
आँखें तनिक नहीं रीतीं | 

भावार्थ   - प्रस्तुत पंक्तियाँ 'एक फूल की चाह' कविता से उद्धृत हैं, जो कवि 'सियारामशरण गुप्त' जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि सुखिया के पिता ने चुपचाप सिर  झुकाकर दंड को स्वीकार किया | आखिर, उस असीम दोष का उत्तर भी क्या देता | कहता भी तो क्या कहता कि पूरे सात दिन जेल में बिताने पड़े, जो सात सदियों के बराबर थे | तत्पश्चात् कवि कह रहे हैं कि सुखिया के पिता पुत्री के वियोग में आँसू रोक नहीं पा रहे थे | उनकी आँखें अनवरत् बरसने के बावजूद भी सूखी नहीं थी | 

(15)- दंड भोगकर जब मैं छूटा,
पैर न उठते थे घर को;
पीछे ठेल रहा था कोई
भय-जर्जर तनु पंजर को | 
पहले की-सी लेने मुझको
नहीं दौड़कर आई वह;
उलझी हुई खेल में ही हा !
अबकी दी न दिखाई वह | 

भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ 'एक फूल की चाह' कविता से उद्धृत हैं, जो कवि 'सियारामशरण गुप्त' जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि भावात्मक चित्रण करते हुए कह रहे हैं कि जब सुखिया के पिता जेल से बाहर आए, तो भय के कारण उनके पैर घर की ओर नहीं जा रहे थे, ऐसा प्रतीत हो रहा था की डर से भरे शरीर को कोई उनके घर की तरफ़ धकेल रहा हो | तत्पश्चात्, वे कहते हैं कि जब मैं घर पर पहुंचा, तो हर बार की तरह उनकी बेटी (सुखिया) दौड़ कर उन्हें लेने नहीं आई तथा न  ही वह खेलती हुई कहीं बाहर नज़र आई | 

(16)- उसे देखने मरघट को ही
गया दौड़ता हुआ वहाँ,
मेरे परिचित बंधु प्रथम ही
फूँक चुके थे उसे जहाँ।
बुझी पड़ी थी चिता वहाँ पर
छाती धधक उठी मेरी,
हाय! फूल-सी कोमल बच्ची
हुई राख की थी ढ़ेरी!

अंतिम बार गोद में बेटी,
तुझको ले न सका मैं हा!
एक फूल माँ का प्रसाद भी
तुझको दे न सका मैं हा!

भावार्थ - प्रस्तुत पंक्तियाँ 'एक फूल की चाह' कविता से उद्धृत हैं, जो कवि 'सियारामशरण गुप्त' जी के द्वारा रचित है | इन पंक्तियों के माध्यम से कवि कह रहे हैं कि जब पिता को घर पर उनकी बेटी (सुखिया) दिखाई नहीं देती है, तब वे फौरन दौड़कर बेटी को देखने मरघट जा पहुँचे | लेकिन अफ़सोस कि उनके रिश्तेदार आदि पहले ही उनकी बेटी का अंतिम संस्कार कर चुके थे | वहाँ पर अब तो उसकी चिता भी बुझ चुकी थी, जिसे एहसास करके पिता का छाती धधक उठा | उनकी सुंदर फूल जैसी कोमल बच्ची राख के ढेर में बदल चुकी थी | 

सुखिया के पिता का दिल यह सोचकर दुखी हो उठता है कि वे अपनी मासूम बेटी को अंतिम बार गोद में भी नहीं ले सके | उन्हें अफ़सोस है कि वे अपनी बेटी की अंतिम इच्छा के रूप में, माँ के प्रसाद का एक फूल भी उसे लाकर नहीं दे सका | 

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एक फूल की चाह कविता का सार

प्रस्तुत पाठ एक फूल की चाह लेखक सियारामशरण गुप्त जी के द्वारा रचित है | पूरी कविता छुआछूत की समस्या पर आधारित है | इस पाठ के अनुसार, एक मरणासन्न अछूत कन्या के मन में यह चाह उठती है कि देवी के चरणों में अर्पित किया हुआ एक फूल लाकर उसे कोई दे देता | जब पुत्री की चाह पिता को मालूम पड़ा तो पिता भी चिंतित हो गए कि वे आखिर मंदिर में कैसे जाए | मंदिर के पुजारी तो उसे अछूत मानते हैं और मंदिर के अंदर प्रवेश भी नहीं करने देते | किन्तु, फिर भी पिता अपनी पुत्री की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए मंदिर में जाते हैं | जब पिता मंदिर से फूल लेकर लौटने लगते हैं, तब लोग उसे पहचान लेते हैं और उसपर आरोप लगाते हैं कि उसने वर्षों से बनाई हुई मंदिर की परम्परा व पवित्रता को नष्ट कर दिया है | यहाँ तक कि लोग पिता को ख़ूब प्रताड़ित करते हैं और उसे पीट-पीटकर बाहर कर देते हैं | 

इसी उलझन में फूल भी उसके हाथों से छूट जाता है | न्यायालय तक बात पहुँच जाती है | उसे सात दिन की सज़ा सुनाई जाती है | जब सजा काट कर पिता कैद से बाहर आते हैं, तब उसे अपनी बेटी की ज़गह उसकी राख नसीब होती है | इस तरह पिता अछूत होने की वजह से अपनी मरणासन्न बेटी की अंतिम इच्छा भी पूरी न कर सके...|| 


सियारामशरण गुप्त की जीवन परिचय

प्रस्तुत पाठ के रचयिता सियारामशरण गुप्त जी हैं | इनका जन्म झांसी के निकट चिरगांव में 1895 में हुआ था | इनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि की बात करें तो राष्ट्रकवि 'मैथिलीशरण गुप्त' जी इनके बड़े भाई थे और इनके पिता श्री भी कविताएं लिखा करते थे | लेखक सियारामशरण गुप्त जी महत्मा गांधी और विनोबा भावे के अनुयायी भी रहे, जिसका संकेत इनकी रचनाओं में भी मिलता है | इनकी रचनाओं का मुख्य गुण कथात्मकता है | गुप्त जी की काव्य रचनाओं में आधुनिक मानवता की करुणा , यातना और द्‍वंद्‍व समन्वित रूप में उभरा है | अत: हम कह सकते हैं कि गुप्त जी ने अपनी कविताओं के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों पर करारी चोट किया है | इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं --- आर्द्रा , पाथेय, मौर्य विजय , मृण्मयी , उन्मुक्त ,  दूर्वादल, नकुल और आत्मोत्सर्ग...| 


एक फूल की चाह कविता के प्रश्न उत्तर


प्रश्न-1 निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए --- 

(क)- कविता की उन पंक्तियों को लिखिए, जिनसे निम्नलिखित अर्थ का बोध होता है --- 

(i)- सुखिया के बाहर जाने पर पिता का हृदय काँप उठता था | 

उत्तर- प्रश्नों के उत्तर -  

मेरा हृदय काँप उठता था,
बाहर गई निहार उसे ;
यही मनाता था कि बचा लूँ
किसी भाँति इस बार उसे | 

(ii)- पर्वत की चोटी पर स्थित मंदिर की अनुपम शोभा | 

उत्तर- प्रश्नों के उत्तर -  

ऊँचे शैल शिखर के ऊपर
मंदिर था विस्तीर्ण विशाल ; 
स्वर्ण कलश सरसिज विहसित थे
पाकर समुदित रवि कर जाल | 

(iii)- पुजारी से प्रसाद/फूल पाने पर सुखिया के पिता की मनःस्थिति | 

उत्तर- प्रश्नों के उत्तर -  

भूल गया उसका लेना झट,
परम लाभ सा पाकर मैं | 
सोचा, बेटी को माँ के ये,
पुण्य पुष्प दूँ जाकर मैं | 

(iv)- पिता की वेदना और उसका पश्चाताप | 

उत्तर- अंतिम बार गोद में बेटी,
तुझको ले न सका मैं हा ! 
एक फूल माँ का प्रसाद भी
तुझको दे न सका मैं हा | 

(ख)- बीमार बच्ची ने क्या इच्छा प्रकट की ? 

उत्तर- प्रस्तुत कविता के अनुसार, बीमार बच्ची ने अपने पिता से यह इच्छा प्रकट की कि वे उसे देवी माँ के प्रसाद का फूल चाहिए | 

(ग)- सुखिया के पिता पर कौन सा आरोप लगाकर उसे दंडित किया गया ? 

उत्तर- प्रस्तुत कविता के अनुसार, सुखिया के पिता पर मंदिर को अशुद्ध करने का आरोप लगाकर तथा उसे अछुत होने का संबोधन देकर उसे दंडित किया गया | साथ ही यह भी कहा गया कि वह देवी माँ की गरिमा व पवित्रता को कहीं न कहीं भंग भी किया है | 

(घ)-  जेल से छूटने के बाद सुखिया के पिता ने बच्ची को किस रूप में पाया ? 

उत्तर- प्रस्तुत कविता के अनुसार, जेल से छूटने के बाद सुखिया के पिता ने बच्ची को मृत अवस्था में पाया | पिता-पुत्री का मिलन हो पाता, इससे पहले ही सुखिया का अंतिम संस्कार हो चुका था | 



एक फूल की चाह पाठ से संबंधित शब्दार्थ 


• तनु - शरीर
• शिथिल – कमज़ोर
• अवयव - अंग
• विह्वल – बेचैन
• स्वर्ण घन - सुनहले बादल
• ग्रसना - निगलना
• तिमिर – अंधकार 
• विस्तीर्ण – फैला हुआ 
• उद्‍वेलित – भाव–विह्वल
• अश्रु- राशियाँ – आँसुओं की झड़ी 
• प्रचंड – तीव्र 
• क्षीण – दबी आवाज़ 
• मृतवत्सा – जिस माँ की संतान मर गई हो 
• रुदन – रोना 
• दुर्दांत – जिसे दबाना या वश में करना करना हो 
• कॄश – कमज़ोर 
• रव – शोर 
• शुचिता – पवित्रता
• सरसिज – कमल 
• अविश्रांत – बिना थके हुए 
• कंठ क्षीण होना - रोने के कारण स्वर का क्षीण या  कमजोर होना 
• प्रभात सजग - हलचल भरी सुबह 
• रविकर जाल - सूर्य किरणों का समूह
• अमोदित - आनंदपूर्ण
• ढिकला - ठेला गया
• सिंह पौर - मंदिर का मुख्या द्वार
• परिधान - वस्त्र  | 




एक फूल की चाह कविता का केन्द्रीय भाव Ek phool ki chah Summary

एक फूल की चाह कविता ,सियारामशरण गुप्त जी द्वारा रचित तत्कालीन समाज में छुआछूत की भावना को बड़े ही मार्मिक ढंग से दर्शाती है . कविता में कवि ने समाज में व्याप्त छुआछूत की पीड़ा को एक कथा के माध्यम से समझाया गया है .पूरे गाँव में महामारी फैली हुई थी . एक पिता अपनी बेटी सुखिया को घर से बाहर खेलने जाने से रोकता है ,लेकिन बेटी नहीं मानती और बुखार से पीड़ित हो जाति है .उसके मन में विचार आता है कि शायद ईश्वर की कृपा से बेटी ठीक हो जाय .बेटी ने देवी के मंदिर के प्रसाद के रूप में एक फूल की चाह प्रकट की . बेटी की इच्छा को पूरी करने के लिए पिता पर्वत इस्थित मंदिर गया .मंदिर में उसने दीप और फूल माला माँ को बेंट चध्ये .उसे पुजारी द्वारा फूल भी प्राप्त हुए .लेकिन मुख्य द्वार पर लोगों द्वारा उसे पकड़ लिया जाता है . अछूत होने के कारण लोग उसे गालियाँ देते और मारते हैं . इस मारपीट के कारण वह फूल हाथों से गिर गया जिसे वह अपनी बेटी को देने जा रहा हैं . वह लहूलुहान हो जाता हैं . जब वह किसी प्रकार अपनी बेटी के पास पहुँचती है , तो तब तक बेटी अपने प्राण त्याग चुकी होती हैं . इस प्रकार एक अछूत पिता , अपनी बेटी को अंतिम इच्छा को पूरी नहीं कर पाया .बेटी को देखकर पिता पछताने लगता हैं . वह सोचता है कि वह व्यर्थ ही मंदिर गया था . वह न तो अपनी बेटी से मिल सका और न ही उसकी अंतिम इच्छा पूरी कर सका . 

इस प्रकार एक अछूत पिता की बीमार बेटी की एक फूल की चाह की इच्छा पूरी न हो सकी .यह कविता हमें समाज में व्याप्त ऊँच - नीच , छुआछूत जैसी बुराइयाँ को नष्ट करने की प्रेरणा देती हैं . 

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  1. कविता किस प्रकार अत्यंत ममस्पर्शी कविता है? विषयवस्तु के आधार पर उदाहरण सहित सिद्ध कीजिए ।

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एक फूल की चाह
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