व्यंग्य

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पति-पत्नी की नोक –झोंक ,मित्रो के साथ चक्कलस ,बॉस के तुगलकी फरमानों के मुकाबले को व्यंग्य की कटार ही काम आती है जो सामने वाले की जान भले ही ना ले पर प्रतिद्वंद्वी की मारकता का एहसास जरुर कराती है .मेरी समझ में व्यंग्य बात कहने की विशिष्ट शैली है ,जिसमे शिष्ट रहना कतई जरूरी नहीं.

व्यंग्य 

जब मैं कहता हूँ ‘मेरी समझ में व्यंग्य’ तो इसे दो भागों में बांटा जा सकता है-पहला –‘मेरी समझ’ और दूसरा –‘व्यंग्य’ .जब मैं अपनी समझ के बारे में सोचता हूँ तो हंसी आती है .मुझे समझदार कोई और तो खैर क्या मानेगा मैं खुद ही नहीं मानता .अपने अब तक के किये पर नजर दौड़ता हूँ तो समझदारी से किया हुआ एक आधा काम
व्यंग्य
भी नजर नहीं आता फिर वह लिखाई-पढाई हो ,नौकरी हो, प्रेम हो या फिर रोज के झगड़े- टंटे, सबके सब नासमझी का दस्तावेज़ ही नजर आते हैं .पहले कविता लिखना और पढना भी नासमझी में ही किया और अब ये व्यंग्य लेखन भी नासमझी में ही हो रहा है या यूँ कहें मैं कुछ और करने लायक हूँ ही नहीं इसलिए लेखन कर लेता हूँ .अत: मोटे तौर पर ‘मेरी समझ का ’ अर्थ हुआ ‘नासमझी’ अब व्यंग्य पर आते हैं .जब ये आलेख जो मेरी समझ में व्यंग्य हैं (अपनी समझ के बारे में अपनी राय का खुलासा ऊपर की पंक्तियों में कर ही चुका हूँ अत: जहाँ जहाँ मेरी समझ या हमारी समझ का ज़िक्र हो उसे ‘नासमझी ‘ समझा जाये ) इनके बारे में दो शब्द लिखने कहने के लिए एक जाने माने व्यंग्यकार से दरख्वास्त की तो उन्होंने हमारी समझदारी का संज्ञान लेते हुए सुझाव दे दिया कि बेहतर हो आपके व्यंग्यों पर कोई और राय ज़ाहिर करे ‘व्यंग्य ‘ पर आप अपनी राय ज़ाहिर कर दो .अब राय बनाने के लिए समझ होना भी ज़रूरी है इसलिए मैंने भी ‘मेरी समझ में व्यंग्य’ लिखने का मन बना लिया .मुआमला कविता या कहानी का होता तो राय रेडीमेड होती पर व्यंग्य में राय ज़ाहिर करने से पहले व्यंग्य की समझ भी होनी चाहिए .लीजिये फिर बात ‘समझ’ पे आकर टिक गयी अब परसाई जी तो कहते हैं ---“व्यंग्य जीवन की आलोचना करना है .जीवन के प्रति व्यंग्यकार की उतनी ही निष्ठां होती है ,जितनी कि गम्भीर रचनाकार की .बल्कि ज्यादा ही .इसमें खालिस हंसना या खालिस रोना जैसी कोई चीज़ नहीं होती .”--परसाई जी के इस कथन के पहले भाग से यही ध्वनित होता है कि आमतौर पर पढ़े लिखे
अरविन्द कुमार
अरविन्द कुमार
लोगों के लिए व्यंग्य गम्भीर चीज़ है नहीं पर इसे गम्भीर से भी गम्भीर चीज़ माना जाना चाहिए .मुझे परसाई जी की बात से इत्तेफाक ना रखने की कोई वज़ह नज़र नहीं आती .एक वक्त था जब मैं व्यंग्य को गम्भीरता से नहीं लेता था और बॉस से लेकर पप्पू पान वाले तक पर गाहे- बगाहे व्यंग्य कर लेता था पर मेरी व्यंग्यबाज़ी का असर ये हुआ कि कार्यालय से लेकर मुहल्ले तक हर कोई सतर्क रहने लगा कि कहीं भूल से भी माइक मेरे हाथ में ना आने पाए .पहले तो मैंने इसे संयोग समझ के नज़रंदाज़ किया पर जब हर जगह से बार बार पत्ता कटने लगा तो समझ में आया कि ये तो मेरे भीतर छिपे व्यंग्यकार का कमाल है .किसी ने कहा है कि सबसे खतरनाक और साहसी व्यक्ति वह होता है जिसके पास खोने केलिए कुछ नहीं होता .अब व्यंग्य की बदौलत अपने पास खोने को तो कुछ है नहीं इसलिए आज की तारीख में मुझसे खतरनाक और साहसी कलम घिस्सू भी शायद ही कोई दूसरा हो .व्यंग्य की आंच को स्वयं झुलसकर महसूसने के बाद व्यंग्य को गम्भीर विधा ना मानने की अगर कहीं कोई गुंजायश रही भी होगी तो वह भी समाप्त हो गयी .फिर जीवन की दाल और तरकारी में नमक की तरह शामिल व्यंग्य से परहेज़ भोजन रुपी जीवन को बेस्वाद भी तो बना सकता है .पति-पत्नी की नोक –झोंक ,मित्रो के साथ चक्कलस ,बॉस के तुगलकी फरमानों के मुकाबले को व्यंग्य की कटार ही काम आती है जो सामने वाले की जान भले ही ना ले पर प्रतिद्वंद्वी की मारकता का एहसास जरुर कराती है .मेरी समझ में व्यंग्य बात कहने की विशिष्ट शैली है ,जिसमे शिष्ट रहना कतई जरूरी नहीं. अब कौन इस शैली का कितनी नफासत और नजाकत से इस्तेमाल करता है ये इस्तेमाल करने वाले पर निर्भर करता है.व्यंग्य के साथ एक दिक्कत और है –और वो है इस्तेमाल करने वाले के साथ साथ जिस पर इस हथियार का इस्तेमाल किया गया है उसे भी व्यंग्य की समझ होना .वरना व्यंग्य का वार रेत के बोरे पर बंदूक की गोली चलाने जैसा बेअसर सिद्ध होता है . व्यंग्य की पुरातनता तो कबीर के –‘कंकर पत्थर जोरिके मस्जिद लई बनाय’ से तुलसी के –“ विन्ध्य के वासी उदासी महा बिनु नारी दुखारे –“ तक जाती है .भक्तिकालीन साहित्य की गंगोत्री से निकली व्यंग्य की भागीरथी में आधुनिक काल के साहित्यक हरिद्वार तक आते आते विविध रसों और रसायनों का विशेष कर हास –उपहास और परिहास का मिश्रिण हुआ.इस मिश्रण के पश्चात यह भागीरथी बेशक गंगा हो गयी हो पर इस मिश्रण से व्यंग्य विधा दूषित भी हुयी है इसे नकारा नहीं जा सकता .व्यंग्य में हास्य स्वाभाविक रूप से आये तो किसे आपत्ति हो सकती है, पर व्यंग्य को ‘हास्य –व्यंग्य ‘ कहना तो किरायेदार का खुद को जबरिया ‘मकान मालिक’ घोषित करना है ,अनैतिक है . व्यंग्य तो लगती हुई बात है, अब लगती हुयी बात को हंसकर कहने के चक्कर में बात की धार ही कुंद कर दी जाये इसका औचित्य मेरी समझ से परे है .
       मेरे व्यंग्य कैसे हैं ?वे व्यंग्य हैं भी या नहीं इसका फतवा तो व्यंग्य के मदरसों के मौलाना और इमाम जब देंगे तब देंगे पर साल सवा साल पहले एक जमे-जमाये व्यंग्यकार ने मेरे आलेखों में व्यन्ग्याणुओं के होने की तस्दीक करते हुए एक फतवा दे डाला था –“ बरखुदार व्यंग्य तो है इनमे पर इन्हें कोई छापेगा नहीं ?”अब अपन की ऊपर की साँस ऊपर तो नीचे की नीचे अटक गयी डरते डरते पूछा—“ हुजुर ऐसा भी क्या नुक्स है इन बेचारों में ?” अपनी अल्पसंख्यक लटो को सुलटाते हुए व्यंग्याचार्य ने रहस्य से पर्दा उठाया –“ बालक तुमने एक लाइन में पंजे को तो दूसरी में फूल, तीसरे में साईकिल और चौथे में हाथी को चित्त कर दिया .अब ऐसे में किस सम्पादक की मति मारी गयी जो तुम्हारे इन युगांतरकारी लेखों को छाप कर विज्ञापन रस के स्रोत में सायनाइड मिलाने की मूर्खता करेगा “. बहुत प्रक्टिकल बात कही थी आचार्य ने और अपन इतने खौफजदा हुए इस फतवे से कि किसी बड़े अख़बार या पत्रिका में इन व्यंग्यों को मोक्ष हेतु भेजने की हिम्मत ही ना जुटा पाए .

- अरविन्द कुमार

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