मैं जो हूँ जॉन एलिया हूँ

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जॉन से पहले कहन का ये तरीका नही देखा गया था। जॉन एक खूबसूरत जंगल हैं, जिसमें झरबेरियाँ हैं, काँटे हैं, उगती हुई बेतरतीब झाड़ियाँ हैं, खिलते हुए बनफूल हैं, बड़े-बड़े देवदारु हैं, शीशम हैं, चारों तरफ़ कूदते हुए हिरन हैं, कहीं शेर भी हैं, मगरमच्छ भी हैं।

मैं जो हूँ जॉन एलिया हूँ


        
                                                                                                                                  दिनाँक : 12.01.2017 
                                प्रेस–विज्ञप्ति 
                 परिचर्चा :  ‘मैं जो हूँ जॉन एलिया हूँ’ : कुमार विश्वास 
कार्यक्रम : मैं जो हूँ ‘जॉन एलिया’ हूँ : कुमार विश्वास 
समय : गुरुवार 12 जनवरी 2017, 2 : 00 बजे,
स्थान : विश्व पुस्तक मेला हॉल नंबर -12 ए
(वाणी प्रकाशन के स्टॉल 277 से 288 पर)

हिन्दी की सर्वाधिक लोकप्रिय और चर्चित ग़ज़ल सीरीज दास्ताँ कहते-कहते  की नवीनतम पुस्तक है ‘इतवार छोटा पड़ गया’। ‘दास्ताँ कहते कहते’ वाणी प्रकाशन की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और लोकप्रिय प्रकाशन शृंखला है जिसमें नये और पुराने के साथ-साथ वरिष्ठ और नामचीन शायर और ग़ज़लकारों को पहली बार बहुत आकर्षक और नये कलेवर में प्रस्तुत किया गया है। इस सीरीज में प्रताप सोमवंशी के अलावा जॉन एलिया की ‘मैं जो हूँ जॉन एलिया हूँ,’ मुनीर नियाज़ी की ‘देर कर देता हूँ मैं’ और हरिओम की ‘ख़्वाबों की हँसी’ का प्रकाशन किया जा चुका है। शीन काफ़ निज़ाम और कुमार विश्वास ने जॉन एलिया और मुनीर नियाज़ी की ग़ज़लों के लिप्यन्तरण और सम्पादन का कार्य किया है। वाणी प्रकाशन इस शृंखला को आगे बढाते हुए इसके तहत अन्य समकालीन शायर और ग़ज़लकारों की पुस्तकें भी शीघ्र ही प्रकाशित कर रहा है। दास्ताँ कहते-कहते  की इसी कड़ी में प्रस्तुत है प्रसिद्ध कवि कुमार विश्वास ने संपादित  मैं जो हूँ ‘जॉन एलिया’ हूँ।    

                                            ‘मैं जो हूँ जॉन एलिया हूँ’ जनाब        
                                             मेरा बेहद लिहाज़ कीजिएगा।

ये जो जॉन एलिया के कहने की खुद्दारी है कि मैं एक अलग फ्रेम का कवि हूँ, यह परंपरागत शायरी में बहुत कम ही देखने को मिलती है। जैसे –
                        साल हा साल और इक लम्हा,
                        कोई भी तो न इनमें बल आया 
                        खुद ही इक दर पे मैंने दस्तक दी, 
                        खुद ही लड़का सा मैं निकाल आया। 
जॉन से पहले कहन का ये तरीका नही देखा गया था। जॉन एक खूबसूरत जंगल हैं, जिसमें झरबेरियाँ हैं, काँटे हैं, उगती हुई बेतरतीब झाड़ियाँ हैं, खिलते हुए बनफूल हैं, बड़े-बड़े देवदारु हैं, शीशम हैं, चारों तरफ़ कूदते हुए हिरन हैं, कहीं शेर भी हैं, मगरमच्छ भी हैं। उनकी तुलना में आप यह कह सकते हैं कि बाक़ी सब शायर एक
मैं जो हूँ ‘जॉन एलिया’ हूँ
मैं जो हूँ ‘जॉन एलिया’ हूँ
उपवन हैं, जिनमें सलीके से बनी हुई और करीने से सजी हुई क्यारियाँ हैं इसलिए जॉन कि शायरी में प्रवेश करना ख़तरनाक भी है। लेकिन अगर आप थोड़े से एडवेंचरस हैं और आप फ्रेम से बाहर आकर सब कुछ करना चाहते हैं तो जॉन की दुनिया आपके लिए है। जॉन आपको दो तरह से मिलते हैं। एक दर्शन में और एक प्रदर्शन में। प्रदर्शन का जॉन वह है जो आप आमतौर पर किसी भी मंच से पढ़ें तो श्रोताओं में खूब कोलाहल मचता है। दर्शन का जॉन वो है जो आप चुनिंदा मंचों पर पढ़ सकते हैं और वे शे’र ऐसे होते हैं जिन्हें श्रोता अपने साथ अपने घर ले जा सकते हैं। जहाँ मजमा हो वहाँ प्रदर्शन सुनाइये और जहाँ महफ़िल हो वहाँ दर्शन सुनाइये।
जॉन जहाँ पहुँच गए हैं, उसकी ख़बर उन्हें ख़ुद भी नहीं है। वे स्वयं को कई बार फँसा हुआ महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि वो जितनी आज़ादी से अपनी बात कहना चाह रहे हैं, वैसे कह नहीं पा रहे और यदि कह भी पा रहे हैं तो लोग उस तरह से समझ नहीं पा रहे। 
कुल मिलकर ज़िन्दगी के हर उतार-चढ़ाव को न सिर्फ शायरी में ढालना, बल्कि उसको एंजॉय करना और श्रोताओं-पाठकों से एंजॉय करवाना –- ये जॉन होते हैं। 
डॉ. कुमार विश्वास का जन्म 10 फ़रवरी (वसंत पंचमी), 1970 को पिलखुआ, (ग़ाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश) में हुआ था। चार भाइयों और एक बहन में सबसे छोटे कुमार विश्वास ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा ‘लाला गंगा सहाय विद्यालय’, पिलखुआ से प्राप्त की। उनके पिता डॉ॰ चन्द्रपाल शर्मा, आर एस एस डिग्री कॉलेज (चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ से सम्बद्ध), पिलखुआ में प्रवक्ता रहे। उनकी माता श्रीमती रमा शर्मा गृहिणी हैं। राजपूताना रेजिमेंट इंटर कॉलेज से बारहवीं में उत्तीर्ण होने के बाद उनके पिता उन्हें इंजीनियर (अभियंता) बनाना चाहते थे। डॉ॰ कुमार विश्वास का मन मशीनों की पढ़ाई में नहीं लगा और उन्होंने बीच में ही वह पढ़ाई छोड़ दी। साहित्य के क्षेत्र में आगे बढ़ने के ख्याल से उन्होंने स्नातक और फिर हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर किया, जिसमें उन्होंने स्वर्ण-पदक प्राप्त किया। तत्पश्चात उन्होंने "कौरवी लोकगीतों में लोकचेतना" विषय पर पीएच.डी. प्राप्त की। उनके इस शोध-कार्य को 2001 में पुरस्कृत भी किया गया।
डॉ॰ कुमार विश्वास ने अपना करियर राजस्थान में प्रवक्ता के रूप में 1994  में शुरू किया। डॉ॰ विश्वास हिन्दी कविता मंच के सबसे व्यस्ततम कवियों में से हैं। उन्होंने अब तक हज़ारों कवि-सम्मेलनों में ‘कविता पाठ’ किया है। साथ ही वह कई पत्रिकाओं में नियमित रूप से लिखते रहे हैं। डॉ॰ विश्वास मंच के कवि होने के साथ साथ हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री के गीतकार भी हैं। उन्होंने आदित्य दत्त की फ़िल्म 'चाय-गरम' में अभिनय भी किया है।

वाणी प्रकाशन ने  55 वर्षों से हिन्दी प्रकाशन के क्षेत्र में कई प्रतिमान स्थापित किए हैं। वाणी प्रकाशन को फेडरेशन ऑफ इंडियन पब्लिशर्स द्वारा ‘डिस्टिंग्विश्ड पब्लिशर अवार्ड’ से नवाजा गया है। वाणी प्रकाशन अब तक 6000 से अधिक पुस्तकें और 2500 से अधिक लेखकों को प्रकाशित कर चुका है। हिन्दी के अलावा भारतीय और विश्व साहित्य की श्रेष्ठ रचनाओं का प्रकाशन कर इसने हिन्दी जगत में एक
उदाहरण प्रस्तुत किया है। नोबेल पुरस्कार, साहित्य अकादेमी पुरस्कार, भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार और अनेकों लब्ध प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त लेखक वाणी प्रकाशन की गौरवशाली परंपरा का हिस्सा हैं। हाल के वर्षों में वाणी प्रकाशन ने अंग्रेजी में भी महत्त्वपूर्ण शोधपरक पुस्तकों का प्रकाशन किया है। भारतीय परिदृश्य में प्रकाशन जगत की बदलती हुई भूमिका और पाठक वर्ग की बदलती हुई जरूरतों को ध्यान में रखते हुए वाणी प्रकाशन ने अपने गैर-लाभकारी उपक्रम वाणी फाउंडेशन के तहत हिन्दी के विकास के लिए पहली बार ‘हिन्दी महोत्सव’ और अनुवाद के लिए ‘डिस्टिंग्विश्ड ट्रांस्लेटर अवार्ड’ की भी नींव रखी है। इस बार 3-4 मार्च को ‘हिन्दी महोत्सव’ का आयोजन दिल्ली विश्वविद्यालय के इन्द्रप्रस्थ कॉलेज के साथ मिलकर किया जा रहा है।

वाणी प्रकाशन विश्व पुस्तक मेला 2017 में अपने पाठकों के लिए 75 नई पुस्तकें लेकर उपस्थित हुआ है। विश्व पुस्तक मेले की थीम महिला सशक्तिकरण ‘मानुषी’ से कदमताल करते हुए वाणी प्रकाशन ने अपने स्टॉल का मुख्य भाग स्त्री-विमर्श को समर्पित किया है। वाणी प्रकाशन का लोगो ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की प्रतिमा है, जिसे मशहूर कलाकार स्व. मकबूल फिदा हुसैन ने बनाया है।
उम्मीद है कि विश्व पुस्तक मेला में ‘मैं जो हूँ ‘जॉन एलिया’ हूँ’ पर होने वाले इस कार्यक्रम में अधिक से अधिक पाठक और बुद्धिजीवी हिस्सा लेंगे तथा पूरे आयोजन को सफल और यादगार बनायेँगे।
विस्तृत जानकारी के लिए हमें ई मेल करें Marketing@vaniprakashan.in
या वाणी प्रकाशन के इस हेल्पलाइन नम्बर पर सम्पर्क करें : +919643331304

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जॉन से पहले कहन का ये तरीका नही देखा गया था। जॉन एक खूबसूरत जंगल हैं, जिसमें झरबेरियाँ हैं, काँटे हैं, उगती हुई बेतरतीब झाड़ियाँ हैं, खिलते हुए बनफूल हैं, बड़े-बड़े देवदारु हैं, शीशम हैं, चारों तरफ़ कूदते हुए हिरन हैं, कहीं शेर भी हैं, मगरमच्छ भी हैं।
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