सूअर की औलाद

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उसने अपनी फटी हुई चोली से छाती को ढकना चाहा और घुटनों के ऊपर खिंची हुए पेटीकोट और साड़ी को पैरों तक खींचने की नाकाम कोशिश की, पर जूते वाले के पैर ने एक झटके से साड़ी को ऊपर कर दिया और उसके खुले रानों पर जूता रख दिया। चमड़े के जूते में लगे कील उसके नर्म माँस में घूमने लगे और वह उठकर बैठ गई। उसके उठते ही बच्चा रोने लगा। अपने नंगे अंगों को ढकने की कोशिश करते हुए वह बच्चे को थपथपाने लगी।

सूअर की औलाद

 ग़लती उसने पहले दिन भी नहीं की थी। अब उसे याद नहीं कि पहला दिन कब था। यह सब यादों की तख़्ती से धुँधला पड़ चुका है। कैसे सब-कुछ हुआ था? सब उसके ज़ह्न में उतर आया।
पिछली रात भी यही हुआ था। इससे पहले वाली रात भी ऐसा ही हुआ था। सब कुछ समान, बिना किसी तब्दीली
चित्र सौजन्य  गूगल .कॉम 
के बीच-बीच में यूँ ही होता रहता है, फिर कुछ दिन खिसक जाते हैं और फिर अचानक यही सब होता रहता है, अरुचिकर, संतापी, घृणादायक।
उसने करवट बदलकर सरकने की कोशिश की। स्तनपान करते बच्चे के मुँह में उसका स्तन था, जो वह चूसते-चूसते सो गया था। अब जब उसने पलटने की कोशिश की, तो बच्चा फिर से स्तन चूसने लगा। उसने बच्चे को थपथपाते हुए सुलाना चाहा ताकि उसकी नींद न टूटे और उसे आधी रात को परेशान न करे। वह ख़ुद भी गहरी नींद में सोई थी। उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे।
वह बाजू बदलना चाह रही थी, लेकिन लेटे-लेटे ही उसने गर्दन फिराकर देखना चाहा जैसे स्तन बच्चे के मुँह से बाहर न निकल जाए और वह रोना शुरू न करे। गहरी नींद में होने के बावजूद भी उसने महसूस किया कि कोई चीज़ उसकी नाभि के नीचेवाले हिस्से में घिसे जा रही थी। रगड़ ने वाली चीज़ और कोई नहीं, बल्कि वही रोज़ वाली चीज़ ही है, जो उसे गहरी नींद में झकझोरकर उठा देती है और उसकी मांसपेशियों को तकलीफ़ देती रहती है। उसने चाहा था कि वह संघर्ष करके उस वस्तु को दूर हटा दे, लेकिन ऐसा मुमकिन न था।
पता नहीं भगवान कौन से जन्म का फल उसे भुगतने के लिए मजबूर कर रहा था। लेकिन भगवान है....ऐसी शंका गहरे साँस के साथ उसके शरीर में समा गई। वह मन-ही-मन में दुःख, पीड़ा की अनुभूति से भर गई। उसने भीतर-ही-भीतर साहस जुटाकर कहना चाहा-‘ओ पापी! ये क्या कर रहे हो? क्यों इस दुखियारी को, इस गंदगी और इस अँधेरे में भोगने पर मजबूर कर रहे हो।’ लेकिन लगातार चुभती उस चीज़ ने उसके साहस को मार डाला। वह सपना देख रही थी। ख़ुद खुले आसमान के नीचे फुटपाथ पर किसी रानी समान सो रही थी, लेकिन आँखे खुलते ही उसका भ्रम टूट गया। उसके ऊपर एक छाया थी। उसे ख़्याल आया कि वह बस स्टैंड के एक अंधकारपूर्ण कोने में खड़ी थी। बस स्टैंड का यह काला हिस्सा, इस चाँद को अपने भीतर समाकर ख़ुश हो रहा था।
हाँ, ऐसा ही अंधकार है उसकी तक़दीर में, जिसमें कहीं भी, कोई भी रोशनी नहीं है। कहीं भी कोई सफेद टुकड़ा नहीं। सिर्फ काले और अंधकारपूर्ण टुकड़े, डीज़ल ऑइल जैसे यहाँ-वहाँ लटक रहे हैं। जैसे भयंकर दुर्घटना में हुए इंसानों को चेहरे, हाथ-पाँव, मांस के टुकड़े, रक्त के फव्वारे, ख़ून के धब्बे, काला ख़ून, बिल्कुल काला, अँधेरे भी ऐसा जैसा उसका नसीब है, बिल्कुल ऐसा।
चुभन बराबर बरकरार थी। वह शिद्दत से महसूस कर रही थी। अब वह उसे पहचानने लगी है और सिर्फ़ हाज़िरी मात्र से वह समस्त घटनाचक्र को समझ जाती है। अब वह कहीं भी, कोई भी ग़लती नहीं करती है और मशीन की तरह वह सब-कुछ करने लगती है। हटकर सो जाती है। साड़ी और पेटीकोट ऊपर कर लेती है। उसे अस्पष्ट घटनाचक्र याद है...।
उस दिन वह कैसे नींद में से अचानक चौंककर थरथराती उठी थी और कैसे उस जूते चुभानेवाले आदमी के सामने खड़ी हो गई थी और गालियाँ देने लगी थी। उसे याद है, तब एक ज़ोरदार चाँटा गाल पर पड़ा था। वह लड़खड़ा कर लगभग गिर ही रही थी कि उस जूतेवाले आदमी ने अपना डंडा उसकी चोली में फँसाकर उसे उठाकर खड़ा करने में मदद की थी। उसके एक झटके से ही चोली के बटन टूट गए थे और वह अपनी छाती को हाथों से ढाँपती डर के मारे काँपने लगी थी और उसको घूरने लगी थी।
‘क्यों मार रहे हो एक दुखियारी औरत को, एक औरत पर हाथ उठाते शर्म नहीं आती?’
जैसे पत्थर से टकराकर आवाज़ वापस उसके ही कानों में गूँज उठी। उसका शरीर काफ़ी मजबूत था। उसकी लाल आँखों में हिंसा और वहशियत नाच रही थी। हिंसक पशु की तरह वह उसके चेहरे और छाती को चाट रहा था। उसका डंडा अभी तक उसकी चोली में फँसा था।
‘यह जगह क्या तुम्हारे बाप की है, जो यहाँ मस्ती से सोई हुई हो?’
वह बेहद घबराई हुई थी, भागना चाह रही थी। ये इतने आदमी इन बेंचों पर सरकारी रोशनी के नीचे जो सोए पड़े हैं, क्यों वह उन्हें कुछ नहीं कहता। पर जब उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई, तो वहाँ कोई भी न था। सब कभी के भाग गए थे। वह अकेली ही बची थी, इसका जुल्म सहने के लिए। गहरी नींद में डूबी वह घर बसाने के सपने देख रही थी। वह अपनी मदहोश नींद को कोसते हुए अपनी गठरी लेकर चलने लगी, तब आदमी ने उसकी बाँह को इतना ज़ोर से पकड़ा कि वह कराहने लगी। उसे लगा कि उसकी बाँह कहीं बीच से ही टूट जाएगी और टूटी छत की मानिंद लटकने लगेगी और कोहनी से अलग हो जाएगी। वह बेहोश होने जैसी अवस्था में थी।
देवी नागरानी
देवी नागरानी
‘अब मुझे छोड़ते क्यों नहीं? तुम्हारी जगह है, तो तुम ही जाकर सो जाओ।’
‘और इसका किराया कौन देगा...?’ देख नहीं रही हो, अंधी हो, मैं सरकारी आदमी हूँ। इतनी रातें सरकारी ज़मीन पर सोते मज़ा  किया और अब भाग रही हो। मुझे पहचानती नहीं हो..? चलो सो जाओ तो किराया वसूल करूँ।’
और उस दिन उसने पहली बार चुपचाप ऐसा किया।
बस, उसके बाद तबसे आज तक सब-कुछ ऐसे ही होता रहता है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि बस स्टॉप के कोने और स्थान बदलते रहते हैं और कभी सतानेवालों की सरकारी पोशाकें।
उसने अपनी फटी हुई चोली से छाती को ढकना चाहा और घुटनों के ऊपर खिंची हुए पेटीकोट और साड़ी को पैरों तक खींचने की नाकाम कोशिश की, पर जूते वाले के पैर ने एक झटके से साड़ी को ऊपर कर दिया और उसके खुले रानों पर जूता रख दिया। चमड़े के जूते में लगे कील उसके नर्म माँस में घूमने लगे और वह उठकर बैठ गई। उसके उठते ही बच्चा रोने लगा। अपने नंगे अंगों को ढकने की कोशिश करते हुए वह बच्चे को थपथपाने लगी।
कुछ देर के लिए जूतेवाला आदमी उसे देखता रहा। उसके मुँह से गंदे और सस्ते दारू की बदबू आ रही थी। वह अपने बच्चे की नींद ख़राब होने की वजह से दुखी थी। अपनी नींद खराब होने का इतना दुख न था। कल भी उसे नींद नसीब न हुई थी। कल रात एक कंडक्टर और मुसाफ़िर का किसी बात पर झगड़ा हो गया था। उसके पश्चात जो हंगामा हुआ, तो वह सो न पाई। आज रात भी अगर उसे नींद न मिली, तो वह दिन की रोशनी में कैसे सो पाएगी। ऐसी कितनी ही रातें उसने मासूम बच्चे को छाती से लगाए जागते गुज़ारी हैं। वह मन-ही-मन रोती रही है, पर कर कुछ भी न पाई है। बिल्कुल लाचार, बेबस कभी-कभी हिम्मत करके वह एस॰टी॰ आफ़िसर के पास भी गई है। अपनी तकलीफ़ें रो-रोकर बयान की हैं। आफ़िसर के पैरों पर गिरी है, हाथ जोड़कर विनती भी की है, पर जवाब में उसे मिली है-डाँट।
‘यहाँ बस स्टॉप पर तुम्हें सोने की क्या ज़रूरत है?’ जिसका जवाब उसके पास नहीं है। आहिस्ता-आहिस्ता ये सब तकलीफ़ें वह इच्छा के विरुद्ध सहती रहती है और रोज़मर्रा के जीवन में ये सब दिक्कतें, दुश्वारियाँ, जिल्लतें जैसे शामिल हो गई हैं।
उसने बच्चे को उठाया, अपना स्तन उसके मुँह से लगाया। बच्चा चहक-चहक करता हुआ दूध पीने लगा।
तब जूतेवाले आदमी ने उसे ज़ोरदार लात मारी, तो बच्चा उसके हाथों से छूट गया और वह उससे दूर जा गिरी। बच्चा ज़ोर-ज़ोर  से रोने लगा। जूतेवाले आदमी ने बच्चे को उठाना चाहा, तो वह लपककर उसके सामने जाकर खड़ी हुई एक शेरनी की तरह, अपना सब दुःख, दर्द, पीड़ा भूलकर।
‘बच्चे को हाथ मत लगाना’, वह चीख़ते हुए कह उठी।
‘बच्चे को हाथ लगाया तो बहुत बुरा होगा।’ मैं कहे देती हूँ। मुझे मार लो...माँ के साँढ, बहन के...मुझे मार डाल...। मेरे साथ जो करना है कर, लेकिन बच्चे से दूर रह, इसे हाथ न लगाना। मैं भीख माँगती हूँ, पाँव पड़ती हूँ, उसे कुछ मत करना, हाथ मत लगाना।’
वह झुकते हुए उसके पैरों पर गिर पड़ी। ‘दया कर, दया कर...’ कहते हुए वह सिसकने लगी और ऐसे में उसकी हिचकियाँ बँध गईं। वह दया की भीख माँगती हुई विनम्र आँखों से उस जूतेवाले आदमी को देखने लगी।
‘हरामज़ादी!’ वह ख़ौफ़नाक ढंग से दहाड़ा। बालों से पकड़कर उसे उठाकर खड़ा किया और दूसरे पल एक ज़ोरदार लात उसके पेट पर दे मारी। वह पलटियाँ खाती हुई अपने बच्चे पर जा गिरी। उसकी चीख़ निकल गई। उसकी नाक और मुँह से ख़ून बहने लगा। एक लात और पड़ने पर वह दूसरी ओर जा गिरी। बेहोशी की हालत में बच्चा ज़ोर-ज़ोर से रो रहा था। उस आदमी ने ग़ुस्से में पास पड़े एक ख़ाली टीन के डब्बे को लात लगाई। डब्बा लात लगते ही अजीबो-ग़रीब आवाज़ करता हुआ कोने में जाकर थम गया।
गुस्से से उसके मुँह से बद्-लफ्जों की बारिश हो रही थी। ‘साली, बदचलन, भड़वी! खाने के लिए कुछ नहीं है और बिना सोचे भिखारियों की फ़ौज बढ़ाते जाते हो। कब तक बाप की बस्ती समझकर मौज मनाओगे। मरने दे साली, हराम की औलाद को मरने दे!’ ऐसा कहते हुए वह आगे बढ़ा, बच्चे को बाँह से उछालते हुए ऊपर उठाया। बच्चा निरंतर रो रहा था। घायल शेरनी बनी माँ ने ज़ोर से दाँतों के बीच उसकी बाँह को दबोच लिया और पूरे ज़ोर के साथ काटा। वह लड़खड़ाता, दर्द से चीख़ने लगा। बच्चा अलग होकर दूर जा पड़ा।
बच्चे का रोना बंद हो गया।
वह जैसे बेहोशी से होश में आई। उसे उस कुत्ती की याद आई। जिसने कुछ वक़्त पहले ही पिल्लों को जन्म दिया था और वह किसी को उन पिल्लों की ओर जाते देखती, तो भौंककर उन्हें दूर भाग जाने के लिए मजबूर कर देती थी। किसी बच्चे ने उसके एक पिल्ले को उठाने की कोशिश की, कुत्ती ने उसे काटकर हलाक कर दिया।
पागलपन की इस मदहोशी में, सुध-बुध खोकर वह उसके सामने आई, नाक और मुँह से ख़ून टपकाती वह तड़पती रही। पर अब उसने रोना बंद कर दिया। चुप, बिल्कुल चुप। आँखों से जैसे अंगारे बरस रहे थे। उसने चारों ओर नज़र फिराई। एक टूटी हुई ख़ाली बोतल उसके हाथ में आ गई। उसने एक ख़ौफ़नाक गर्जना की, जो फ़िज़ा में गूँज बनकर फैल गई। वह कुछ सोचे, समझे उसके पहले, टूटी हुई बोतल की तेज़  नोंक पूरी ताक़त के साथ उसके पेट में घुसा दी। वह तड़पने लगा। वह उसे देखकर बरबस कहने लगी-‘हरामज़ादो, सालो! भिखारियों की फ़ौज बढ़ाने का कारण तो तुम ख़ुद हो-सूअर की औलाद।’

लेखक:तीर्थ चाँदवाणी
अनुवाद: देवी नागरानी
Devi Nangrani
09987928358
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