अष्टछाप पर टिप्पणी

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अष्टछाप अष्टछाप पर टिप्पणी लिखिए अष्टछाप पर टिप्पणी हिन्दी साहित्य में कृष्ण भक्ति काव्य को प्रेरणा देने का बहुत कुछ श्रेय श्री वल्लभाचार्य (१४७८ ई.-१५३० ई,) को है ,जो कि पुष्टिमार्ग के संस्थापक एवं प्रवर्तक थे। इनके द्वारा प्रवर्तित पुष्टिमार्ग में दीक्षित होकर सूरदास आदि आठ कवियों की मंडली ने अत्यन्त महत्वपूर्ण साहित्य की रचना की।

अष्टछाप


अष्टछाप पर टिप्पणी अष्टछाप पर टिप्पणी लिखिए हिन्दी साहित्य में कृष्ण भक्ति काव्य को प्रेरणा देने का बहुत कुछ श्रेय श्री वल्लभाचार्य (१४७८ ई.-१५३० ई,) को है ,जो कि पुष्टिमार्ग के संस्थापक एवं प्रवर्तक थे। इनके द्वारा प्रवर्तित पुष्टिमार्ग में दीक्षित होकर सूरदास आदि आठ कवियों की मंडली ने अत्यन्त महत्वपूर्ण साहित्य की रचना की। गोस्वामी बिट्ठलनाथ ने सं.१६०२ के लगभग अपने पिता वल्लभ के ८४ शिष्यों में से चार और अपने २५२ शिष्यों में चार को लेकर अष्टछाप के प्रसिद्ध भक्त कवियों की मंडली की स्थापना की।
अष्टछाप
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इन आठ भक्त कवियों में चार वल्लभाचार्य के शिष्य थे - कुम्भनदास,सूरदास ,परमानंददास और कृष्णदास। अन्य चार गोस्वामी बिट्ठलनाथ के शिष्य थे - गोविंदस्वामी ,नंददास,छीतस्वामी और चतुर्भुजदास। ये आठों भक्त कवि श्रीनाथजी के मन्दिर की नित्य लीला में भगवान श्रीकृष्ण के सखा के रूप में सदैव उनके साथ रहते थे,इस रूप में इन्हे "अष्टसखा" की संज्ञा से भी अभिहित किया जाता है।

अष्टछाप के कवियों की रचनाएँ 


अष्टछाप के भक्त कवियों में सबसे ज्येष्ठ कुम्भनदास थे और सबसे कनिष्ठ नंददास थे। काव्यसौष्ठव की दृष्टि से सर्वप्रथम स्थान सूरदास का है तथा द्वितीय स्थान नंददास का है। सूरदास पुष्टिमार्ग के जहाज कहे जाते है। ये वात्सल्य रस एवं श्रृंगार रस के अप्रतिम चितेरे माने जाते है। इनकी महत्वपूर्ण रचना सूरसागर मानी जाती है। नंददास काव्य सौष्ठव एवं भाषा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इनकी महत्वपूर्ण रचनाओ में "रासपंचाध्यायी","भवरगीत" एवं "सिन्धांतपंचाध्यायी" है। परमानंददास के पदों का संग्रह "परमानन्द-सागर" है। कृष्णदास की रचनायें "भ्रमरगीत" एवं "प्रेमतत्व निरूपण" है। कुम्भनदास के केवल फुटकर पद पाये जाते है। इनका कोई ग्रन्थ नही है। छीतस्वामी एवं गोविंदस्वामी का कोई ग्रन्थ नही मिलता । चतुर्भुजदास की भाषा प्रांजलता महत्वपूर्ण है। इनकी रचना द्वादश-यश, भक्ति-प्रताप आदि है।

आशिर्वाद की छाप - अष्टछाप 

सम्पूर्ण भक्तिकाल में किसी आचार्य द्वारा कवियों -गायकों तथा कीर्तनकारों के संगठित मंडल का उल्लेख नही मिलता। अष्टछाप जैसा मंडल आधुनिककाल में भारतेंदु मंडल,रसिकमंडल,मतवाला मंडल,परिमल तथा प्रगतिशील लेखक संघ और जनवादी लेखक संघ के रूप में उभर कर आए। अष्टछाप के आठों भक्त-कवि समकालीन थे। इनका प्रभाव लगभग ८४ बर्ष तक रहा । ये सभी श्रेष्ठ कलाकार,संगीतज्ञ एवं कीर्तनकार थे। गोस्वामी बिट्ठल नाथ ने इन अष्ट भक्त कवियों पर अपने आशीर्वाद की छाप लगायी , अतः इनका नाम "अष्टछाप" पड़ा।


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COMMENTS

LEAVE A REPLY: 4
  1. बहुत अच्छी जानकारी लिये आलेख -
    -- लावण्या

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  2. हिंदी साहित्य के इतिहास के बारे में आपके ब्लौग पर पढना रोचक है.
    हिंदी में प्रेरक कथाओं और संस्मरणों का एकमात्र ब्लौग http://hindizen.com ज़रूर देखें.

    जवाब देंहटाएं
  3. aapne bahut hi moolyavaan jaankari di..........hum to kuch gine chune kaviyon ke baare mein jante the aapne poora sahitya bata diya ab unki rahchnayein padhungi,bahut dinon se talaash thi aisi hi jankari ki.dhanyavaad.

    जवाब देंहटाएं
  4. ek aisa blog banaye jisme sirf ashtchhap ke kavi aur unki pramkh kritiyan ho aur unke likhe likhe hue ek do mahatvapurna shloka
    thank you for the above information

    जवाब देंहटाएं
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