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राम काव्य की विशेषता 
Ram Bhakti Shakha


राम काव्य की विशेषता ram bhakti shakha राम भक्ति काव्य की विशेषता राम भक्ति धारा की विशेषता रामभक्ति शाखा राम काव्य परम्परा रामभक्ति शाखा के कवि रामभक्ति शाखा की प्रवृत्तियाँ - निर्गुण भक्ति नीरस और कठिन थी .अतः परमत्मा के साकार रूप की कल्पना की गयी . यह साकार रूप श्री कृष्ण और राम के रूप में माना जाता है .कुछ कवियों ने कृष्ण के जीवन की विविध लीलाओं और क्रीडाओं का वर्णन करते हुए उनके लोकरंजक रूप को दर्शाया है .कुछ कवियों ने श्रीराम के शील और उनकी मर्दाया दिग्दर्शन करते हुए उनके लोकरक्षक रूप का चित्रण किया है .परामत्मा के दोनों ही रूप जनता के आकर्षण के केंद्र बने रहे . निराशमयी एवं कष्टमयी स्थिति में प्रभु की वंदना ,स्तुति और उनके ध्यान से जनता को बहुत ही सहारा एवं सांत्वना मिली तथा कष्टों से दूर एवं मुक्त होने की शक्ति प्राप्त हुई .

रामभक्ति का प्रचार - 

रामानंद ने समस्त देश में भ्रमण करके राम भक्ति का प्रचार किया .जिस प्रकार बल्लभाचार्य ने कृष्णभक्ति का प्रचार किया .उसी प्रकार रामानंद ने रामभक्ति का . रामानंद ने राम के शील ,शक्ति और सौन्दर्य से युक्त मर्यादापूर्ण जीवन को प्रस्तुत कर जनता के सामने एक आदर्श चित्र प्रस्तुत किया .प्रभु के इस रूप ने निराश जनता को नवीन जीवन शक्ति प्रदान की और उन्हें विश्वास हो गया कि कष्टमयी स्थिति से परमात्मा अवश्य रक्षा करेंगे .

रामभक्ति शाखा की विशेषताएँ - 

भक्तिकाल में रामभक्ति शाखा में निम्नलिखित विशेषताएँ  हैं ,जिनका संक्षेप में वर्णन निम्न है - 

१. राम का स्वरुप - इस धारा के कवियों ने राम को विष्णु का अवतार और ब्रह्म का स्वरुप माना है .इनके राम दशरथ के पुत्र और शक्ति शील तथा सौन्दर्य के पुंज है .मानव का रूप धारण कर उन्होंने धर्म तथा संतों की रक्षा की है और दुष्टों तथा राक्षसों का संहार किया है . राम को अवतारी पुरुष वे मानते थे -

विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। 
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार ।।

२. आदर्श चरित्र - इनके राम मर्यादा पुरषोत्तम तथा आदर्श चरित्र प्रधान हैं .भाई ,पुत्र ,पति आदि सभी रूपों में आदर्श हैं . राम के साथ - साथ अन्य पात्रों को भी आदर्श चित्रित किया है .दशरथ आदर्श पिता ,कौशल्या आदर्श माता ,सीता आदर्श पत्नी ,भरत आदर्श भाई ,हनुमान आदर्श भक्त हैं .

३. भक्ति की प्रधानता - राम भक्ति काव्य में भक्ति की प्रधानता है .ये कवि ज्ञान और कर्म से भक्ति को श्रेष्ठ बताते हैं . भक्ति द्वारा जीव का लोक - परलोक दोनों सुधरता हैं . तुलसीदास तो यहाँ तक कहते हैं -

तुलसीदास सब भाँति सकल सुख जो चाहसि मन मेरो। 
तो भज राम काम सब पूरण करहिं कृपानिधि तेरो।।

४. समन्वय की भावना - राम काव्य धारा में विविध प्रकार की समनवय की भावना दिखाई पड़ती हैं .तुलसी काव्य तो समनवय की विराट चेष्टा है .इसमें ज्ञान ,भक्ति तथा कर्म के साथ - साथ विविध देवी - देवताओं की स्तुति में समनवय के चेष्टा की गयी है . उपासना में समनवय दिखलाते हुए तुलसीदास लिखते हैं -

सिव द्रोही मम भगत कहावा। सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा॥ 
संकर बिमुख भगति चह मोरी। सो नारकी मूढ़ मति थोरी॥

५. जन जीवन के कवि - राम काव्य की परंपरा के कवि सही अर्थ में जन कवि हैं .किसी राजा के आश्रय में रहकर उसकी खुशामद में ये काव्य नहीं लिखे गए हैं .यही कारण हैं कि इनके काव्य जीवन का प्रतिनिधित्व करते हैं .ये कवि विनीत और विनम्र हैं .इनकी रचना लोक रक्षा के लिए  हुई हैं .

6. काव्य भाषा - राम काव्य परंपरा की अधिकाँश रचनाएँ अवधी भाषा में लिखी गयी है .ब्रजभाषा में लिखी जाने वाली रचनाएँ संख्या में कम है .

७. सेवक सेव्य भाव - इस शाखा के कवियों में राम की भक्ति सेवक सेव्य भावना से की है .इस भावना से वह मोक्ष में विश्वास करते हैं .तुलसीदास लिखते हैं -

सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि। 
भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि॥

८. छंद - इन कवियों ने उस समय की प्रचलित सभी शैलियों दोहा ,सोरठा ,चौपाई ,छप्पय ,कवित्त ,सवैया ,वरवे पद आदि को अपनाया हैं .


रामभक्ति शाखा के प्रमुख कवि -
इस काल के प्रमुख कवियों में तुलसीदास सबसे आगे हैं.इसके अतिरिक्त केशवदास ,सेनापति ,नाभादास ,अग्रदास ,प्राणचंद चौहान एवं ह्रदय राम प्रमुख है .

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