वो मलयालम लड़की

SHARE:

वो मलयालम लड़की सन् 1975 की सर्द रात थी. मयंक के दादी की तबियत अब और बिगड़ती जा रही थी. घर पर आये डॉक्टर साहब ने दादी को शहर के बड़े अस्पताल में भर्ती करने की सलाह दे डाली और अपना झोला उठाकर चल दिये. मयंक डॉक्टर साहब को बाहर तक छोड़ने चला गया.

वो मलयालम लड़की


सन् 1975 की सर्द रात थी. मयंक के दादी की तबियत अब और बिगड़ती जा रही थी. घर पर आये डॉक्टर साहब ने दादी को शहर के बड़े अस्पताल में भर्ती करने की सलाह दे डाली और अपना झोला उठाकर चल दिये. मयंक डॉक्टर साहब को बाहर तक छोड़ने चला गया. गांव के ही एक बैल गाड़ी वाले को बुलावा भेजा गया और उसे उसके आठ रुपये किराये पहले ही अदा कर दिये गये.
मयंक अपनी दादी का सिर अपनी गोद में लेकर गाड़ी पर बैठ गया, उसकी मां और बाबू जी भी गाड़ी में चढ़ गये. घर पर मयंक का छोटा भाई और तीनों छोटी बहनें रह गयीं. बैलगाड़ी आगे बढ़ी. सूर्य की पहली किरण के साथ ही दादी को लखनऊ के एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती कर दिया गया, सरकारी अस्पताल पर बाबू जी भरोसा ही नहीं कर पाते थे. बड़े डॉक्टर साहब ने सब ठीक हो जाने का आश्वासन दिया और बाबू जी के हाथ में दवाओं की एक लिस्ट पकड़ा दी. मयंक नीचे के दवाखाने से दवायें लेकर आया और नर्स को दे दिया. नर्स नें मयंक की दादी को लगातार दो इंजेक्शन लगा दिये और मयंक की मां को दवाओं के बारे में बताने लगी. तभी मयंक की नजर उस नर्स के गुलाबी होठों पर पड़ी और मयंक की सांसें मानों कुछ पलों के लिए थम गई. उन्नीस साल के मयंक को ये अनुभव पहली बार हो रहे थे. नर्स एक मलयालम नवयुवती थी जो बेहद खुबसूरत होने के साथ ही साथ बहुत ही प्यार से बातें किया करती थी. अपने मिलनसार स्वभाव के कारण वो सभी को अपनी ओर आकर्षित कर रही थी.  
कुछ दिन बीत गये और नर्स को ताड़ने का ये सिलसिला चलता रहा. अब दादी की तबीयत में भी सुधार आ चुका था और कुछ दिनों के बाद डॉक्टर उन्हे छुट्टी देने वाले थे. मयंक के बाबू जी की गांव में ही कपड़ों की एक पक्की दुकान थी. बाबू जी अब हर दो दिन पर दादी की तबीयत देखने आते और फिर शहर से दुकान का माल लेकर उसी शाम वापस गांव चले जाया करते. मां के रहने की व्यवस्था बाबू जी ने पहले ही अपने एक व्यापारी के घर कर दी थी. जब कभी मां न रहती तो मैं उस नर्स से दवाओं और दादी के स्वास्थ्य को लेकर बाते किया करता और कुछ ही दिनों में हमारे बीच गहरी दोस्ती हो गयी.
आखिरकार वो दिन आ ही गया जब दादी को छुट्टी दे दी गयी. मैने धान्या को एक कागज पर अपनी नयी फाउन्टेन पेन से अपने घर का पता लिख कर दे दिया और वो पेन भी उसे उपहार कर दी. उसने दादी को गाड़ी पर बिठाने में हमारी मदद की और फिर हमारी गाड़ी गांव की ओर चल पड़ी. 
कुछ दिन बीत गये. मेरे छोटे भाई और तीनों बहनों में झगड़ा हो रहा था. क्योंकि जो भी दुकान पर बाबू जी के लिए खाना लेकर जाता था उसे मेहनताना 25 पैसे मिलते थे. अंत में तय ये हुआ कि बीच वाली बहन आज खाना लेकर जायेगी. वो खाना लेकर निकली ही थी की दरवाजे पर किसी दस्तक दी. मां बाहर गयी और फिर मुझे आवाज लगाई. पोस्टमैन आया हुआ था. उसने मेरा नाम पूछा और फिर मेरे हाथ मे एक लिफ़ाफा पकड़ा दिया.
मलयालम लड़की
मलयालम लड़की
फिर वो अपनी खटर – खटर आवाज करती साइकिल पर घण्टी बजाता आगे को निकल गया. मां के पूछने पर मैंने अपने एक पुराने मित्र का नाम ले लिया. चुकिं घर में मेरे और बाबूजी के अलांवा किसी को पढ़ना नहीं आता था इसलिए मुझे किसी का डर भी नहीं था. मैं जो बोल देता वही सब सच मान लेते और मानते भी क्यों न, बारहवीं तक पढ़ाई की थी मैंने, वो भी अंग्रेजी विषय के साथ. उस पूरे  गांव में अंग्रेजी केवल मैं ही जानता था. मेरे और सभी भाई बहनों नें पढ़ाई नहीं की इसलिए मैं अपने को खुशनसीब मानता रहा. अब चिट्ठियों के आने जाने का सिलसिला शुरु हो गया , तीन साल बीत गये. उसके कई संदेश तो मैंनें सैकड़ों बार पढ़े होंगे.

चौथे साल मेरी नौकरी शहर के एक सरकारी दफ्तर में लग गयी, मैने धान्या को बताया, वो बहुत ही खुश हुई. ये नौकरी मेरे बाबूजी ने अपनी साख का इस्तेमाल करके लगवाई थी. मेरी तनख्वाह तय हुई - बारह रुपये और पिच्छत्तर पैसे प्रतिमाह. बाबू जी ने एक नई साइकिल दिला दी. अब मैं रोज साईकिल से शहर जाया करता. लेकिन मेरा दफ्तर और धान्या का अस्पताल शहर के दो अलग – अलग छोरों पर था. इसलिए संवाद का माध्यम अभी भी पत्र ही रहे. एक दिन जब मैं दफ्तर से वापस आया तो मां ने मुझे एक चिट्ठी दी जिसमें धान्या ने चिड़ियाघर घुमाने की जिद की थी. मैने दूसरे ही दिन इसका जवाब भी दे डाला. कुछ दिनों बाद जवाब आया जिसमें एक दिन व समय लिखा था. मैने कुल हिसाब लगाया, एक अच्छा दिन किसी महिला मित्र के साथ बिताने के लिए कमसकम दस रुपये तो होने ही चाहिए. अब इतने पैसे तो मेरे पास थे नहीं क्योंकि अगर मैं अपनी तनख्वाह खर्च कर भी देता तो बाबू जी को क्या जवाब देता? इसलिए मैनें अपने एक सहकर्मी से 7 रुपये उधार मांगे. उसने जानना चाहा कि इतने पैसे मुझे क्यों चाहिये लेकिन मैंने उससे बाते बना दी. अंतत: वो 7 रुपये, पांच प्रतिशत की ब्याज पर मुझे देने को राजी हो गया. तीन रुपये मैने अपनी जेब से लगाने की सोच रखी थी. आखिरकार वो दिन आ ही गया, मैंने आज कुछ अच्छे कपड़े पहने, विलायती परफ्यूम लगाया और निकल पड़ा. तय समय पर वो बस से उतरी. मेरे दिल की धड़कन अचानक ही बढ़ गयी. उसकी पतली कमर और खुबसूरत होठों ने मेरा ध्यान सबसे पहले खींचा. मैने बीस पैसे के दो टिकट लिये और हम दोनों लखनऊ चिड़ियाघर में दाखिल हुए.   
वहां मौजूद सभी नवयुवकों की नज़रे सिर्फ उस पर जा टिक रही थी. मुझे उनसे कोई शिकायत भी नहीं थी क्योंकि मेरे खुद की नज़रें उसके घुंघराले बालो के बीच उसके मासूम से चेहरे से हट ही नहीं रही थी. अंदर ही हम दोनों ने पिच्छत्तर – पिच्छत्तर पैसे के दो डोसे बनवाये और वहीं बैठ कर खाने लगे. इसी वक्त हमारे बीच कई बातें हुईं, ज्यादातर वो ही बोलती रही और मैं सुनता रहा. अचानक से वो बोल बैठी कि वो मुझसे प्यार करती है. मेरे तो हाथ पांव फूलने लगे लेकिन मन में तो लड्डू फूट रहे थे. मैने खुद को संभाला और सहज दिखने की कोशिश की. उसने तुरंत ही आगे बोला कि वो मुझसे शादी करना चाहती है. ये जानकर तो मैं गदगद हो गया. मुझे कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि मैं आगे क्या कहूं. मैने खुद को संभाला और बस यही बोल पाया कि मैं बाबू जी से बात करके बताऊंगा. धान्या ने तपाक से बोला कि वो भी उनसे बात करेगी, मैने भी उसे बाबू जी से मिलाने की बात पर हामी भर दी.
     अंत में मैंने उसे बस स्टैण्ड पर छोड़ा और जैसे ही बस आगे बढ़ी मैं खुशी से उछल पड़ा, ऐसा लगा मानो मेरे पैरों में स्प्रींग लगे हों . मैने कभी ये नहीं सोचा था कि धान्या कभी मुझसे शादी करने को राजी होगी, शायद उस दिन मैं दुनिया का सबसे खुशनसीब इंसान था, या मैं उस दिन तो कमसकम ऐसा समझ ही सकता था. 
मेरी मां थोड़ी सख्त थी और बाबूजी का व्यवहार एकदम दोस्ताना, तीन दिन बीत चुके थे और मैं कुछ भी नहीं कह पाया था. मां से तो बात करने का सवाल ही नहीं उठता और बाबू जी इन दिनों काफी व्यस्त दिख रहे थे. छ: दिन निकल गये, अब मुझसे और नहीं रहा जा रहा था. मैंने दफ्तर से आधे दिन की छुट्टी ली औऱ साइकिल चलाता हुआ सीधे बाबूजी की दुकान पर जा पहुंचा. बाबू जी दुकान पर कुछ हिसाब किताब कर रहे थे. ग्राहक नहीं थे ये अच्छी बात थी. मैंने बाबू जी से अपने साथ चलने को कहा, उन्होंने थोड़ी आना-कानी की लेकिन अंत में वो मेरे साथ चल ही लिये. रास्ते भर वो पूछते रहे कि आखिर मैं उन्हे कहां लेकर जाना चाहता था. अंतत: हम दोनों चलते चलते हनुमान मंदिर जा पहुंचे . मैनें हनुमान जी को मन ही मन बोला कि आज तो कम से कम मेरा साथ दे ही देना. इधर बाबू जी का गुस्सा बढ़ता जा रहा था, मैने एक बार फिर से हनुमान जी की मूर्ति की तरफ देखा और फिर बाबू जी को बिना रुके सारी बात बताना शुरु किया कि मुझे एक लड़की पसंद है और मैं उससे शादी करना चाहता हूं और ये भी कि कल उसे आप से मिलवाना तय किया है. बाबू जी ने कुछ भी जवाब नहीं दिया. वो गुस्से में अपनी धोती संभालते हुए वापस दुकान की ओर जाने के लिए निकल पड़े और मैं उनके पीछे – पीछे. फिर रास्ते में उन्होंने अचानक ही मुझसे पूछा कि मां को इस बारे में क्या पता है? मैने न में सिर हिला दिया क्योंकि बाबू जी भी मां के गुस्सैल स्वभाव को भली भांति जानते थे. मेरी मां इन सभी चीजों के सख्त खिलाफ थी और खासकर प्रेम विवाह के. उन्होंनेनें कल के लिए मुझे छुट्टी लेने को कह दिया. बाबू जी न जाने कैसे धोती में इतनी जल्दी जल्दी चल लिया करते हैं, अब तक हम वापस दुकान आ चुके थे और दुकान में अंदर जाते समय उन्होंने मुझे हिदायत दी कि ये सारी बातें अभी किसी और को नही पता चले. मैने हां में सिर हिलाया और फिर अपनी साईकिल उठाकर  कल छुट्टी की अर्जी देने दफ्तर की ओर चल पड़ा.
दूसरे दिन, तड़के सुबेरे बाबू जी दुकान जाने के लिए तैयार हो रहे थे, मां ने बाबू जी पर व्यंग कसा कि क्या आज कोई खास मौका है जो उनकी लुंगी की जगह पैंट ने ले ली. बाबू जी नें हस कर बात को टाल दिया और अपना छोटा थैला लेकर दुकान की ओर निकल गये. मैं तय समय से पहले ही दुकान पहुंचा फिर बाबू जी को लेता हुआ उस कुल्फी की दुकान पर जा पहुंचा जहां धान्या का आना तय हुआ था. बाबू जी ने मुझसे पूछा कि ये सब कब से चल रहा है? मैने उन्हें सारी बाते सच सच बता दी. मुझे समझ में ही नहीं आ रहा था कि बाबू जी के मन में चल क्या रहा था क्योंकि जब से मैंने उन्हे ये बाते बतायी थीं वो कुछ ज्यादा ही गंभीर हो गये थे. कुछ ही देर में दुकान के सामने एक रिक्शा रुकता है और धान्या एक अच्छी साड़ी पहने आई. उसने आते ही पहले बाबू जी के पैर छुए और बाबू जी ने भी उसे आशिर्वाद दिया. हम सभी बैठ गये और बाबू जी ने तीन कुल्फी का मंगायी. कुछ देर तो कोई कुछ भी नहीं बोला फिर बाबू जी ने धान्या से पूछा कि क्या उसके घर में ये बातें सबको पता है? धान्या का जवाब न में था और उसने ये भी बोला कि अगर वो उसे स्वीकार करेंगे तो वो घर में बात कर लेगी. फिर से थोड़ी देर के लिए एक दम सन्नाटा हो गया. अब तक कुल्फी आ गयी थी. कुछ देर बार फिर से बाबू जी ने पूछा कि तुम तो नानवेज खाती होगी? धान्या ने हां मे सिर हिलाया और नान वेज छोड़ देने की बात रखी. बाबू जी ने कहा कि धान्या तो उन्हे पसंद है लेकिन वो अकेले ये फैसला नहीं ले सकते. बाबू जी ने थोड़ा समय देने की बात कही जिस पर धान्या ने अपनी हामी भर दी. बाबू जी ने फिर दुकान दार को कहा कि ये दोनों बच्चे पढ़ने वाले है और जब तक इनका दिल करे इन्हे बैठने दे. इतना कहकर बाबू जी ने कुल्फी के पैसे दिये और दुकान चले गये. धान्या खुश लग रही थी, मैं भी खुश था. हम दोनों वहां घण्टों बैठ कर बाते करते रहे. फिर धान्या को पास के बस स्टॉप पर छोड़कर मैं भी घर चला गया.
एक हफ्ते बीत गये थें लेकिन बाबू जी ने मां से बात नहीं की थी और न ही मुझसे. इसी तरह एक हफ्ता और बीत गया. अब मुझे घबराहट सी होने लगी थी लेकिन मैं शांत रहा. फिर अचानक एक रात बाबू जी ने मुझे अपने साथ बाहर चहलकदमी करने के लिए बाहर बुलाया. मैं और बाबू जी चलते चलते उसी हनुमान मंदिर पहुंच गये, बाबू जी मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ गये और मुझे भी बैठने का इशारा किया. फिर बाबू जी ने कहा शुरु किया – अगले महीने मैं अखबार में निकलवा दूंगा कि मेरे बड़े बेटे से मेरा कोई रिश्ता नहीं है हालांकि मैं हर तरह से तुम्हारे साथ रहूंगा. तुम्हे और उस लड़की को किसी भी तरह की दिक्कत नहीं होगी. तुम दोनों शहर में ही एक कमरा किराये पर ले लेना और वहीं रहना. कुछ दिनों तक खासकर गांव में मत आना. ये सारी बातें मुझे बिल्कुल समझ नहीं आयीं, तो मैने बाबू जी से ऐसा करने का कारण पूछा तो उन्होंने साफ लफ्ज़ों में बताया कि अगर वो ऐसा नहीं करेंगे तो उनकी तीनों लड़कियों से शादी करने को कोई तैयार नहीं होगा और वो मुझे भी उस लड़की से अलग करके नहीं रखना चाहते थे. बाबू जी ने आगे कहा कि यदि मां को तो वो किसी तरह राज़ी कर भी सकते हैं लेकिन समाज का मुंह कैसे बंद रखेगे. इसलिए उन्हें ये करना पडेगा, एक महीने के वक्त में मुझे अपने को शहर में रहने का रास्ता निकालने की हिदायत दी गयी. मैं चुप रहा. दूसरी सुबह मैंने धान्या को पत्र में सारी बाते बता दी. कुछ दिन में जवाब आ गया, पत्र में एक तारिख और जगह का पता लिखा था जैसा अक्सर होता है. मुझे उस तय समय पर उस जगह पर पहुंचना होगा. तय दिन लिखे हुए समय से पहले मैं पहुंच गया और इंतजार करता रहा. दोप हर के तीन बज रहे थे, मिलने का समय था 3.30. अब घड़ी 3.30 के पार पहुच चुकी थी, धान्या अबतक नहीं पहुंची थी. मुझे लगा बस आने में देर हो रही होगी. 4 बज गये, फिर 5, मैं बस स्टेशन तक चल कर गया, अब 6 बज चुके थे लेकिन वो आयी नहीं थी. जब 7 बज गये तो मुझे लगा कि धान्या कहीं और फंस गयी होगी, इसी वजह से वो नहीं आ पायी होगी. मैं घर वापस आ गया. रात को ही मैने पत्र लिख कर तैयार कर लिया था और दूसरे दिन उसे पोस्ट बॉक्स में डालते हुए ऑफिस निकल गया. जब एक हफ्ते तक मुझे कोई जवाब नहीं मिला तो मैनें एक दिन की फिर से छुट्टी ली और लखनऊ के उसी प्राइवेट हास्पिटल पहुंचा जहां धान्या काम किया करती थी. वहां पता करने पर पता चला कि वो कुछ दिन पहले ही अपने गांव चली गयी है. मैने सोचा कमसकम उसने कोई संदेश छोड़ा होगा मेरे लिए लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था. मेरे पास उसके घर का पता भी नही था  कि मैं उसे पत्र लिख पाता. एक सप्ताह के बाद मैने बाबू जी को चहलकदमी के लिए बुलाया और रास्ते में उन्हे सारी बात बता दी. सारी बातें सुनने के बाद बाबू जी मुस्कुराये और बोले कि उसने तुमसे सच्चा प्यार किया था. 


लेखक - 
विकास सर्राफ 
8808264985

COMMENTS

BLOGGER

Advertisements

आपको ये भी रोचक लगेगा

नाम

अंग्रेज़ी हिन्दी शब्दकोश,3,अकबर इलाहाबादी,11,अकबर बीरबल के किस्से,58,अज्ञेय,27,अटल बिहारी वाजपेयी,1,अदम गोंडवी,3,अनंतमूर्ति,3,अनौपचारिक पत्र,16,अन्तोन चेख़व,2,अमीर खुसरो,6,अमृत राय,1,अमृतलाल नागर,1,अमृता प्रीतम,5,अयोध्यासिंह उपाध्याय "हरिऔध",4,अली सरदार जाफ़री,3,अष्टछाप,2,असगर वज़ाहत,11,आनंदमठ,4,आरती,9,आर्थिक लेख,5,आषाढ़ का एक दिन,10,इक़बाल,2,इब्ने इंशा,27,इस्मत चुगताई,3,उपेन्द्रनाथ अश्क,1,उर्दू साहित्‍य,177,उर्दू हिंदी शब्दकोश,1,उषा प्रियंवदा,1,एकांकी संचय,7,औपचारिक पत्र,31,कबीर के दोहे,19,कबीर के पद,1,कबीरदास,10,कमलेश्वर,5,कविता,652,कहानी सुनो,2,काका हाथरसी,4,कामायनी,5,काव्य मंजरी,11,काव्यशास्त्र,1,काशीनाथ सिंह,1,कुंज वीथि,12,कुँवर नारायण,1,कुबेरनाथ राय,1,कुर्रतुल-ऐन-हैदर,1,कृष्णा सोबती,1,केदारनाथ अग्रवाल,1,केशवदास,1,कैफ़ी आज़मी,4,क्षेत्रपाल शर्मा,34,खलील जिब्रान,3,ग़ज़ल,83,गजानन माधव "मुक्तिबोध",10,गीतांजलि,1,गोदान,6,गोपाल सिंह नेपाली,1,गोपालदास नीरज,8,गोरख पाण्डेय,2,गोरा,2,घनानंद,1,चन्द्रधर शर्मा गुलेरी,2,चित्र शृंखला,1,चुटकुले जोक्स,15,छायावाद,6,जगदीश्वर चतुर्वेदी,9,जयशंकर प्रसाद,18,जातक कथाएँ,10,जीवन परिचय,12,ज़ेन कहानियाँ,2,जैनेन्द्र कुमार,1,जोश मलीहाबादी,2,ज़ौक़,4,तुलसीदास,5,तेलानीराम के किस्से,7,त्रिलोचन,1,दाग़ देहलवी,5,दादी माँ की कहानियाँ,1,दुष्यंत कुमार,7,देव,1,देवी नागरानी,23,धर्मवीर भारती,2,नज़ीर अकबराबादी,3,नव कहानी,2,नवगीत,1,नागार्जुन,16,नाटक,1,निराला,27,निर्मल वर्मा,1,निर्मला,26,नेत्रा देशपाण्डेय,3,पंचतंत्र की कहानियां,42,पत्र लेखन,129,परशुराम की प्रतीक्षा,3,पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र',3,पाण्डेय बेचन शर्मा,1,पुस्तक समीक्षा,63,प्रेमचंद,22,प्रेमचंद की कहानियाँ,89,प्रेरक कहानी,15,फणीश्वर नाथ रेणु,1,फ़िराक़ गोरखपुरी,9,फ़ैज़ अहमद फ़ैज़,24,बच्चों की कहानियां,68,बदीउज़्ज़माँ,1,बहादुर शाह ज़फ़र,6,बाल कहानियाँ,14,बाल दिवस,3,बालकृष्ण शर्मा 'नवीन',1,बिहारी,1,बैताल पचीसी,2,भक्ति साहित्य,100,भगवतीचरण वर्मा,5,भवानीप्रसाद मिश्र,3,भारतीय कहानियाँ,59,भारतीय व्यंग्य चित्रकार,7,भारतीय शिक्षा का इतिहास,3,भारतेन्दु हरिश्चन्द्र,6,भीष्म साहनी,5,भैरव प्रसाद गुप्त,2,मंगल ज्ञानानुभाव,22,मजरूह सुल्तानपुरी,1,मधुशाला,7,मनोज सिंह,16,मन्नू भंडारी,3,मलिक मुहम्मद जायसी,1,महादेवी वर्मा,12,महावीरप्रसाद द्विवेदी,1,महीप सिंह,1,महेंद्र भटनागर,73,माखनलाल चतुर्वेदी,3,मिर्ज़ा गालिब,39,मीर तक़ी 'मीर',20,मीरा बाई के पद,22,मुल्ला नसरुद्दीन,6,मुहावरे,4,मैथिलीशरण गुप्त,8,मोहन राकेश,9,यशपाल,9,रंगराज अयंगर,42,रघुवीर सहाय,5,रणजीत कुमार,29,रवीन्द्रनाथ ठाकुर,21,रसखान,11,रांगेय राघव,2,राजकमल चौधरी,1,राजनीतिक लेख,11,राजभाषा हिंदी,47,राजिन्दर सिंह बेदी,1,राजीव कुमार थेपड़ा,4,रामचंद्र शुक्ल,1,रामधारी सिंह दिनकर,17,रामप्रसाद 'बिस्मिल',1,रामविलास शर्मा,8,राही मासूम रजा,8,राहुल सांकृत्यायन,1,रीतिकाल,3,रैदास,2,लघु कथा,70,लोकगीत,1,वरदान,11,विचार मंथन,60,विज्ञान,1,विदेशी कहानियाँ,19,विद्यापति,4,विविध जानकारी,1,विष्णु प्रभाकर,1,वृंदावनलाल वर्मा,1,वैज्ञानिक लेख,3,शमशेर बहादुर सिंह,5,शरत चन्द्र चट्टोपाध्याय,1,शरद जोशी,3,शिवमंगल सिंह सुमन,5,शुभकामना,1,शैक्षणिक लेख,11,शैलेश मटियानी,2,श्यामसुन्दर दास,1,श्रीकांत वर्मा,1,श्रीलाल शुक्ल,1,संस्मरण,9,सआदत हसन मंटो,9,सतरंगी बातें,33,सन्देश,14,समीक्षा,1,सर्वेश्वरदयाल सक्सेना,16,सारा आकाश,13,साहित्य सागर,21,साहित्यिक लेख,17,साहिर लुधियानवी,5,सिंह और सियार,1,सुदर्शन,1,सुदामा पाण्डेय "धूमिल",6,सुभद्राकुमारी चौहान,6,सुमित्रानंदन पन्त,16,सूरदास,4,सूरदास के पद,21,स्त्री विमर्श,9,हजारी प्रसाद द्विवेदी,1,हरिवंशराय बच्चन,26,हरिशंकर परसाई,21,हिंदी कथाकार,12,हिंदी निबंध,158,हिंदी लेख,297,हिंदी समाचार,63,हिंदीकुंज सहयोग,1,हिन्दी,5,हिन्दी टूल,4,हिन्दी आलोचक,7,हिन्दी कहानी,31,हिन्दी गद्यकार,4,हिन्दी दिवस,49,हिन्दी वर्णमाला,3,हिन्दी व्याकरण,43,हिन्दी संख्याएँ,1,हिन्दी साहित्य,8,हिन्दी साहित्य का इतिहास,22,हिन्दीकुंज विडियो,11,aaroh bhag 2,13,astrology,1,Attaullah Khan,1,baccho ke liye hindi kavita,55,Beauty Tips Hindi,3,English Grammar in Hindi,3,hindi ebooks,5,Hindi Ekanki,6,hindi essay,150,hindi grammar,50,Hindi Sahitya Ka Itihas,37,hindi stories,445,ICSE Hindi Gadya Sankalan,11,Kshitij Bhag 2,10,mb,72,motivational books,10,naya raasta icse,8,NCERT Vasant Bhag 3 For Class 8,11,Notifications,5,question paper,8,quizzes,8,Shayari In Hindi,12,sponsored news,2,Syllabus,7,VITAN BHAG-2,5,vocabulary,15,
ltr
item
हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika: वो मलयालम लड़की
वो मलयालम लड़की
वो मलयालम लड़की सन् 1975 की सर्द रात थी. मयंक के दादी की तबियत अब और बिगड़ती जा रही थी. घर पर आये डॉक्टर साहब ने दादी को शहर के बड़े अस्पताल में भर्ती करने की सलाह दे डाली और अपना झोला उठाकर चल दिये. मयंक डॉक्टर साहब को बाहर तक छोड़ने चला गया.
https://1.bp.blogspot.com/-cB0FNt8lpIw/W6-EtAyzPRI/AAAAAAAAJ-g/pJQYR-X7EK4kwuIW1c7We3Bq9TxQdELIACLcBGAs/s320/ladki.jpg
https://1.bp.blogspot.com/-cB0FNt8lpIw/W6-EtAyzPRI/AAAAAAAAJ-g/pJQYR-X7EK4kwuIW1c7We3Bq9TxQdELIACLcBGAs/s72-c/ladki.jpg
हिन्दीकुंज,Hindi Website/Literary Web Patrika
https://www.hindikunj.com/2018/09/malyalam-ladki.html
https://www.hindikunj.com/
https://www.hindikunj.com/
https://www.hindikunj.com/2018/09/malyalam-ladki.html
true
6755820785026826471
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All आपको ये भी रोचक लगेगा LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS PREMIUM CONTENT IS LOCKED STEP 1: Share to a social network STEP 2: Click the link on your social network Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy Table of Content