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एक फूल की चाह कविता Ek phool ki chah By Siyaramsharan Gupt


बहुत रोकता था सुखिया को,
‘न जा खेलने को बाहर’,
नहीं खेलना रुकता उसका
नहीं ठहरती वह पल भर।
मेरा हृदय काँप उठता था,
बाहर गई निहार उसे;
यही मनाता था कि बचा लूँ
किसी भाँति इस बार उसे।

भीतर जो डर रहा छिपाए,
हाय! वही बाहर आया।
एक दिवस सुखिया के तनु को
ताप तप्त मैंने पाया।
ज्वर में विह्वल हो बोली वह,
क्या जानूँ किस डर से डर,
मुझको देवी के प्रसाद का
एक फूल ही दो लाकर।

क्रमश: कंठ क्षीण हो आया,
शिथिल हुए अवयव सारे,
बैठा था नव नव उपाय की
चिंता में मैं मनमारे।
जान सका न प्रभात सजग से
हुई अलस कब दोपहरी,
स्वर्ण घनों में कब रवि डूबा,
कब आई संध्या गहरी।

सभी ओर दिखलाई दी बस,
अंधकार की ही छाया,
छोटी सी बच्ची को ग्रसने
कितना बड़ा तिमिर आया।
ऊपर विस्तृत महाकाश में
जलते से अंगारों से,
झुलसी जाती थी आँखें
जगमग जगते तारों से।

देख रहा था जो सुस्थिर हो
नहीं बैठती थी क्षण भर,
हाय! वही चुपचाप पड़ी थी
अटल शांति सी धारण कर।
सुनना वही चाहता था मैं
उसे स्वयं ही उकसाकर
मुझको देवी के प्रसाद का
एक फूल ही दो लाकर।

ऊँचे शैल शिखर के ऊपर
मंदिर था विस्तीर्ण विशाल;
स्वर्ण कलश सरसिज विहसित थे
पाकर समुदित रवि कर जाल।
दीप धूप से आमोदित था
मंदिर का आँगन सारा;
गूँज रही थी भीतर बाहर
मुखरित उत्सव की धारा।

भक्त वृंद मृदु मधुर कंठ से
गाते थे सभक्ति मुद मय,
‘पतित तारिणी पाप हारिणी,
माता तेरी जय जय जय।‘
‘पतित तारिणी, तेरी जय जय’
मेरे मुख से भी निकला,
बिना बढ़े ही मैं आगे को
जाने किस बल से ढ़िकला।

मेरे दीप फूल लेकर वे
अंबा को अर्पित करके
दिया पुजारी ने प्रसाद जब
आगे को अंजलि भरके,
भूल गया उसका लेना झट,
परम लाभ सा पाकर मैं।
सोचा, बेटी को माँ के ये,
पुण्य पुष्प दूँ जाकर मैं।

सिंह पौर तक भी आँगन से
नहीं पहुँचने मैं पाया,
सहसा यह सुन पड़ा कि – “कैसे
यह अछूत भीतर आया?
पकड़ो देखो भाग न जावे,
बना धूर्त यह है कैसा;
साफ स्वच्छ परिधान किए है,
भले मानुषों के जैसा।

पापी ने मंदिर में घुसकर
किया अनर्थ बड़ा भारी;
कलुषित कर दी है मंदिर की
चिरकालिक शुचिता सारी।“
ऐं, क्या मेरा कलुष बड़ा है
देवी की गरिमा से भी;
किसी बात में हूँ मैं आगे
माता की महिमा के भी?

माँ के भक्त हुए तुम कैसे,
करके यह विचार खोटा?
माँ के सम्मुख ही माँ का तुम
गौरव करते हो छोटा।
कुछ न सुना भक्तों ने, झट से
मुझे घेरकर पकड़ लिया;
मार मारकर मुक्के घूँसे
धम्म से नीचे गिरा दिया।

मेरे हाथों से प्रसाद भी
बिखर गया हा! सबका सब,
हाय! अभागी बेटी तुझ तक
कैसे पहुँच सके यह अब।
अंतिम बार गोद में बेटी,
तुझको ले न सका मैं हा!
एक फूल माँ का प्रसाद भी
तुझको दे न सका मैं हा!


एक फूल की चाह कविता का केन्द्रीय भाव Ek phool ki chah Summary

एक फूल की चाह कविता ,सियारामशरण गुप्त जी द्वारा रचित तत्कालीन समाज में छुआछूत की भावना को बड़े ही मार्मिक ढंग से दर्शाती है . कविता में कवि ने समाज में व्याप्त छुआछूत की पीड़ा को एक कथा के माध्यम से समझाया गया है .पूरे गाँव में महामारी फैली हुई थी . एक पिता अपनी बेटी सुखिया को घर से बाहर खेलने जाने से रोकता है ,लेकिन बेटी नहीं मानती और बुखार से पीड़ित हो जाति है .उसके मन में विचार आता है कि शायद ईश्वर की कृपा से बेटी ठीक हो जाय .बेटी ने देवी के मंदिर के प्रसाद के रूप में एक फूल की चाह प्रकट की . बेटी की इच्छा को पूरी करने के लिए पिता पर्वत इस्थित मंदिर गया .मंदिर में उसने दीप और फूल माला माँ को बेंट चध्ये .उसे पुजारी द्वारा फूल भी प्राप्त हुए .लेकिन मुख्य द्वार पर लोगों द्वारा उसे पकड़ लिया जाता है . अछूत होने के कारण लोग उसे गालियाँ देते और मारते हैं . इस मारपीट के कारण वह फूल हाथों से गिर गया जिसे वह अपनी बेटी को देने जा रहा हैं . वह लहूलुहान हो जाता हैं . जब वह किसी प्रकार अपनी बेटी के पास पहुँचती है , तो तब तक बेटी अपने प्राण त्याग चुकी होती हैं . इस प्रकार एक अछूत पिता , अपनी बेटी को अंतिम इच्छा को पूरी नहीं कर पाया .बेटी को देखकर पिता पछताने लगता हैं . वह सोचता है कि वह व्यर्थ ही मंदिर गया था . वह ण तो अपनी बेटी से मिल सका और न ही उसकी अंतिम इच्छा पूरी कर सका . 
इस प्रकार एक अछूत पिता की बीमार बेटी की एक फूल की चाह की इच्छा पूरी न हो सकी .यह कविता हमें समाज में व्याप्त ऊँच - नीच , छुआछूत जैसी बुराइयाँ को नष्ट करने की प्रेरणा देती हैं . 

विडियो के रूप में देखें -



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