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बादल को घिरते देखा है 
Badal Ko Ghirte Dekha Hai Poem By Nagarjun


अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है।
छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

व्याख्या - हिमालय पर्वत की ऊँची चोटियाँ बर्फ से ढकी रहती हैं उन बर्फ से ढकी एकदम सफ़ेद चोटियों पर घिरे हुए बादलों की सुन्दरता को कवि ने खूब देखा है . हिमालय की चोटियाँ बर्फ के कारण सफ़ेद हैं और धूप के करण उज्जवल हैं ,उन पवित्र चोटियाँ पर घिरे बादल बहुत सुन्दर प्रतीत होते हैं .छोटे छोटे ओस की बूँदे मोतियाँ के समान दिखाई देती हैं , मानसरोवर के सुनहरे रंग के कमलों पर गिरती हैं तो वह बहुत ही प्यारी लगती हैं . वे सुनहरे कमल और अधिक सुन्दर और मनोहर हो जाते हैं . कवि कहता हैं कि उसने उस सौन्दर्य का जी भरकर पान किया है .


२. तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी बड़ी कई झीलें हैं,
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की उमस से आकुल
तिक्त-मधुर विषतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

व्याख्या - पर्वतीय प्रदेश में बादलों के घिरने पर वहाँ की झीलों में तैरते हुए हंसों के सौन्दर्य का वर्णन इन पंकितियाँ में किया गया हैं .हिमालय की ऊँची ऊँची चोटियाँ के मध्य अनेक छोटे - बड़ी कई स्वच्छ झीलें हैं . उन झीलों पर बहने वाला जल एकदम पवित्र और नीला हैं . उस नीले निर्मल जल में पावस ऋतु की गर्मी और घुटन से दुखी हंस तैरते दिखाई देते हैं . ये हंस समतल देशों की गर्मी से व्याकुल होकर हिमालय की ठंडी झीलों में उगे कमलों के खट्टे - मीठे तन्तुवों का स्वाद लेने की इच्छा से इन झीलों में चले आते हैं . 

३. ऋतु वसंत का सुप्रभात था
मंद-मंद था अनिल बह रहा
बालारुण की मृदु किरणें थीं
अगल-बगल स्वर्णाभ शिखर थे
एक-दूसरे से विरहित हो
अलग-अलग रहकर ही जिनको
सारी रात बितानी होती,
निशा-काल से चिर-अभिशापित
बेबस उस चकवा-चकई का
बंद हुआ क्रंदन, फिर उनमें
उस महान् सरवर के तीरे
शैवालों की हरी दरी पर
प्रणय-कलह छिड़ते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

व्याख्या - वसंत की ऋतु थी . प्रभात की सुंदर बेला थी .वायु धीमी धीमी गति से चल रही थी .उगते सूरज की मीठी - मीठी किरने धरती पर पड़ रही थी.सूर्य की कोमल किरने अगल - बगल की चोटियाँ पर पड़ रही थी .कवि कहते हैं कि ऐसे सुन्दर सुनहले वातावरण में उन्होंने एक चकवा - चकवी के जोड़े को प्रेम की किल्लोरे करते हुए देखा हैं . उन्हें रात में परस्पर न मिलने का शाप मिला हुआ हैं इसीलिए उन्हें मजबूरन अलग - अगल रहकर अपनी रातें बितानी पड़ती हैं .सुबह होते ही उनकी वियोग भरी पुकार समाप्त हो जाति हैं .तब उनमें मिलन होता हैं .ऐसा लगता हैं कि मानों वे जोर - जोर से बोलकर एक दूसरे को रात भर न मिलने का उलाहना दे रहे हों .


४. शत-सहस्र फुट ऊँचाई पर
दुर्गम बर्फानी घाटी में
अलख नाभि से उठने वाले
निज के ही उन्मादक परिमल-
के पीछे धावित हो-होकर
तरल-तरुण कस्तूरी मृग को
अपने पर चिढ़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

व्याख्या - बर्फ से ढकी घाटियों में सैकड़ों हजारों फुट की ऊँचाई पर कवि ने एक युवा कस्तूरी मृग को देखा हैं . वह मृग अपनी नाभी में से आती हुई नशीली सुगंध के पीछे - पीछे पागल होकर दौड़ रहा था .उसे भ्रम था कि वह सुगंध कहीं बाहर से आ रही हैं .अतः भागने और सुगंध न मिलने के कारण वह अपने आप पर ही चिढ रहा हैं . उसका वह अपने आप पर चिढना कितना मनोरम था .कवि कहता हैं कि हिमालय की बर्फीली चोटियों पर घिरते बादलों के नीचे यह दृश्य अत्यंत आकर्षक लगता हैं .

५. कहाँ गय धनपति कुबेर वह
कहाँ गई उसकी वह अलका
नहीं ठिकाना कालिदास के
व्योम-प्रवाही गंगाजल का,
ढूँढ़ा बहुत किन्तु लगा क्या
मेघदूत का पता कहीं पर,
कौन बताए वह छायामय
बरस पड़ा होगा न यहीं पर,
जाने दो वह कवि-कल्पित था,
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर,
महामेघ को झंझानिल से
गरज-गरज भिड़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

व्याख्या - हिमालय का बर्फीला आंगन अतीव सुन्दर हैं .इसे देखकर कवि ने बहुत सोचा कि धन का स्वामी कुबेर यही कही रहता होगा . उसकी वह अलकानगरी कहाँ है ? परन्तु पता नहीं चल सका .कवि कालिदास ने अपने मेघदूत में जिस आकाश नदी गंगा के जल का वर्णन किया उसका भी यहाँ कोई पता नहीं चलता हैं . न ही उसके उस मेघदूत का पता चलता हैं कि वहाँ कहाँ बरसा होगा ? . कवि कहता हैं कि वह तो यहाँ के प्रत्यक्ष देखे गए सौन्दर्य की बात करता हैं . उसने यहाँ घोर सर्दी के दिनों में , आकाश को छूते हुए कैलाश पर्वत की सबसे ऊँची पर एक बड़े बादल को वायु के अन्दर से गरज - गरज कर टकराते हुए देखा हैं .

६. शत-शत निर्झर-निर्झरणी कल
मुखरित देवदारु कनन में,
शोणित धवल भोज पत्रों से
छाई हुई कुटी के भीतर,
रंग-बिरंगे और सुगंधित
फूलों की कुंतल को साजे,
इंद्रनील की माला डाले
शंख-सरीखे सुघड़ गलों में,
कानों में कुवलय लटकाए,
शतदल लाल कमल वेणी में,
रजत-रचित मणि खचित कलामय
पान पात्र द्राक्षासव पूरित
रखे सामने अपने-अपने
लोहित चंदन की त्रिपटी पर,
नरम निदाग बाल कस्तूरी
मृगछालों पर पलथी मारे
मदिरारुण आखों वाले उन
उन्मद किन्नर-किन्नरियों की
मृदुल मनोरम अँगुलियों को
वंशी पर फिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

व्याख्या - कवि कहता हैं कि हिमालय पर्वत पर देवदारु के घने जंगल हैं उनमें सैकड़ों छोटे छोटे बड़े झरनों का कल - कल स्वर गूंजता रहता है . वहीँ लाल और सफ़ेद भोज पत्रों से सजी हुई कुटियाँ हैं ,जिनमे अन्दर हिमालय निवासी रहते हैं . वे निवासी कलाओं में रूचि रखते हैं . वे अपने केशों को रंग बिरंगे और खुशबूदार फूलों से सजाये रहते हैं . वे नीलम पत्थर की माला पहने रहते हैं . यहाँ की कन्याएँ अपने कानों में नीले कमल लटकाए घूमती है तथा खिले हुए लाल कमलों को अपनी चोटी में लगाये रहती हैं . यहाँ के किन्नर नर और नारियाँ नशे में लीन रहते हैं . ऊनि आँखों में नशे की लाली है , वे मृग की खाल से बनी मृगछाला के आसन पर पालथी मारे बैठे हैं .उनके सामने लाल चन्दन से बनी तिपाई रखी है .उनके सामने कलात्मक सुराहियाँ हैं . किन्नर और किन्नरियाँ अपनी कोमल आकर्षक अंगुलियाँ से वंशी की मधुर तान छेड़ रहे हैं . कवि ने ऐसे कलात्मक जीवन को देखा हैं . वह जीवन कितना अच्छा हैं .ऐसे वातावरण में हिमालय की श्वेत चोटियों पर घिरते हुए बादलों की सुन्दरता इस वातावरण को और भी मादक बना देती हैं .



बादल को घिरते देखा है कविता का सारांश summary badal ko ghirte dekha hai nagarjun summary


बादल को घिरते देखा है , कविता में कवि नागार्जुन जी ने प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य का मनमोहक चित्र प्रस्तुत किया है . कवि का कहना है कि हिमालय की चोटियों पर बादल बहुत ही स्वच्छ है . ये चोटियों वर्फ से ढकी होने के कारण सफ़ेद दिखाई पड़ रही है . मानसरोवर में सोने जैसे सुनहरे कमल खिले हुए है . उन कमल की पंखुडियों पर कवि ओस की बूंदें झर - झर कर देखते हैं . ऊँचे हिमालय पर्वतों पर मैदानी भागों से जहाँ वर्षा के कारण भीषण गर्मी पड़ती है . हंस अपने भोजन की तलास में यहाँ सरोवरों में तैरते दिखाई पड़ते हैं . कवि देखता है कि बादलों के घिरते समय मैंने इनको तैरते हुए देखा है . कवि ने वसंत ऋतु के सुन्दर प्रभात का वर्णन किया है .उस समय मंद मंद हवा चल रही है . उस समय उगता सूरज अपनी कोमल किरणों से पर्वत की चोटियों को सुनहरा बना रहा है . कवि ने यहाँ पर पुराने श्राप से श्रापित चकवा - चकवी को देखा है  जो रात के समय आपस में मिलन नहीं कर पाते हैं . सुबह होने पर उनका मधुर मिलन सरोवर के किनारे पाई में उगने वाली घास पर होता है .इस प्रकार चकवा - चकवी के प्रेमा लाप और कलह एक अनोखे दृश्य को उत्पन्न कर रहा है . 
कवि ने दुर्गम बर्फानी घाटी पर विचरण करने वाले कस्तूरी हिरणों का वर्णन किया है .हिरण की नाभी पर कस्तूरी की सुगंध आने पर वह दौड़ - दौड़ कर इधर उधर ढूंढ रहा है .कवि कहता है कि हिमालय पर्वत की इतनी ऊँचाई पर होने के कारण धन के स्वामी कुबेर की नगरी अलकापुरी नहीं मिली . कालिदास के मेघदूत का मेघ भी बहुत खोजने पर नहीं मिला . भीषण जाड़ों में भी आकाश को छूने वाली चोटियों पर बड़े - बड़े बादलों को आपस में टकराते हुए देखा है . 
कवि को सैकड़ो झरने और नदियों का कलनाद अभिभूत कर रहा है .देवदार बन में लाल और सफ़ेद भोजपत्रों से सजी झोपड़ी का सुन्दर वर्णन किया है .यहाँ पर किन्नर और किन्नरियाँ निवास करते हैं .वे फूलों का गहना ,गले में नीलम की माला धारण किये हुए है .वे सभी मदिरा का पान कर रहे हैं .मदमस्त होकर बाँसुरी बजा रहे हैं . उस समय चारों ओर बादल छाये हुए हैं . 


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