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गिरधर की कुंडलियाँ Giridhar Ki Kundaliya


१.लाठी में गुण बहुत हैं, सदा राखिये संग।
गहरि, नदी, नारी जहाँ, तहाँ बचावै अंग॥
जहाँ बचावै अंग, झपटि कुत्ता कहँ मारै।
दुश्मन दावागीर, होयँ तिनहूँ को झारै॥
कह गिरिधर कविराय सुनो हो धूर के बाठी॥
सब हथियार न छाँड़ि, हाथ महँ लीजै लाठी॥

व्याख्या - कवि गिरिधर कविराय जी ने सीधी सरल भाषा में तथ्यपूर्ण ढंग से जो कुछ भी बताया है उसका पाठक पर सीधा प्रभाव पड़ा है .उन्होंने उदाहरणों के माध्यम से दोहों को प्रभावशाली बनाया है .प्रस्तुत कुंडलियों में उन्होंने लाठी को बहुत गुणकारी बताया है उसे अपने साथ रखने की सलाह दि है क्योंकि रास्ते में यदि नदी या नाला पड़ जाय तो लाठी के सहारे कूद कर नाला पार कर सकते हैं यदि मार्ग में कोई कुत्ता या दुश्मन पीछे पड़ जाए तो यह लाठी बहुत काम ही है .

२.कमरी थोरे दाम की,बहुतै आवै काम।
खासा मलमल वाफ्ता, उनकर राखै मान॥
उनकर राखै मान, बँद जहँ आड़े आवै।
बकुचा बाँधे  मोट, राति को झारि बिछावै॥
कह गिरिधर कविराय, मिलत है थोरे दमरी।
सब दिन राखै साथ, बड़ी मर्यादा कमरी॥

व्याख्या -  दूसरी कुंडली में कवि ने कम्बल का महत्व बताते हुए कहा है किइसका मूल्य कम् होता है लेकिन यह बहुत काम की बस्तु है . यह व्यक्ति का मान बढाती है ,मार्ग में गठरी बाधने के काम आती है तथा रात को बेचकर सोने का काम भी लिया जाता है . 

३.गुन के गाहक सहस, नर बिन गुन लहै न कोय।
जैसे कागा कोकिला, शब्द सुनै सब कोय॥
शब्द सुनै सब कोय, कोकिला सबै सुहावन।
दोऊ के एक रंग, काग सब भये अपावन॥
कह गिरिधर कविराय, सुनो हो ठाकुर मन के।
बिनु गुन लहै न कोय, सहस नर गाहक गुन के॥

व्याख्या - तीसरी कुंडली में कवि गुणवान व्यक्तियों का महत्व बताते है . कौए और कोयल की वाणी की तुलना करते हुए कवि ने कोयल की मधुर वाणी का महत्व बताया है कि कोयल की मधुर आवाज के कारण वह सबकी प्रिय है इसी प्रकार मीठा बोलने वालों को सभी पसंद करते हैं . 

४.साँई सब संसार में, मतलब का व्यवहार।
जब लग पैसा गाँठ में, तब लग ताको यार॥
तब लग ताको यार, यार संग ही संग डोले।
पैसा रहे न पास, यार मुख से नहिं बोले॥
कह गिरिधर कविराय जगत यहि लेखा भाई।
करत बेगरजी प्रीति, यार बिरला कोई साँई॥ 

व्याख्या - चौथी कुंडली में कवि ने संसार के स्वार्थी लोगों के बारे में बताया कि ऐसे लोग मतलबी होते हैं जब तक दूसरे के पास पैसा होते है तब तक उसके मित्र बने रहते है , पैसा न होने पर मुँह फेर लेते हैं .बहुत कम लोग होते है जो निस्वार्थ भाव से प्रेम करते हैं .

५.रहिए लटपट काटि दिन, बरु घामे माँ सोय।
छाँह न बाकी बैठिये, जो तरु पतरो होय॥
जो तरु पतरो होय, एक दिन धोखा देहैं।
जा दिन बहै बयारि, टूटि तब जर से जैहैं॥
कह गिरिधर कविराय छाँह मोटे की गहिए।
पाती सब झरि जायँ, तऊ छाया में रहिए॥

व्याख्या - पाँचवी कुंडली में कवि मज़बूत वृक्ष की छाया में बैठने को कह रहे हैं , कमज़ोर पेड़ तो हलकी से हवा चलने आर स्वयं को नहीं संभाल पाटा तो दूसरों को क्या सहारा देगा अर्थात निर्बल व्यक्ति से सहायता नहीं लेनी चाहिए . 

६.पानी बाढ़ै नाव में, घर में बाढ़े दाम।
दोऊ हाथ उलीचिए, यही सयानो काम॥
यही सयानो काम, राम को सुमिरन कीजै।
पर-स्वारथ के काज, शीश आगे धर दीजै॥
कह गिरिधर कविराय, बड़ेन की याही बानी।
चलिए चाल सुचाल, राखिए अपना पानी॥

व्याख्या - छठी कुंडली में कवि ने परोपकार को महत्व देते हुए कहते हैं कि घर में धन आ जाने से दोनों हाथों से बाट देना चाहिए अपने व्यवहार व आचरण को पवित्र रखना चाहिए इसी से सम्मान बना रहता रहता है . 

७.राजा के दरबार में, जैये समया पाय।
साँई तहाँ न बैठिये, जहँ कोउ देय उठाय॥
जहँ कोउ देय उठाय, बोल अनबोले रहिए।
हँसिये नहीं हहाय, बात पूछे ते कहिए॥
कह गिरिधर कविराय समय सों कीजै काजा।
अति आतुर नहिं होय, बहुरि अनखैहैं राजा॥

व्याख्या - अंतिम कुंडली में कवि गिरिधर जी स्वाभिमान से जीने को कहते हैं .राजा के दरबार में भी यदि आपको सम्मानपूर्वक बैठने को कहा जाय तभी वहाँ रहना चाहिए ,बिना पूछे बेकार के सवाल नहीं बोलना चाहिए . 


गिरिधर की कुंडलियाँ केन्द्रीय भाव / मूल भाव 

गिरिधर कविराय जी ने अपनी कुंडलियाँ में लाठी और कम्बल के प्रति आदरभाव ,मौकापरस्ती ,सबल का सहारा ,समय के अनुसार कार्य का महत्व आदि बातों को लेकर बड़ी ही मार्मिक ढंग से बात कही है . उनकी कविता ने जनमानस पर बहुत ही प्रभाव छोड़ा है और वे आज भी लोकप्रिय हैं . कवि कहते है कि हमें अपने जीवन में परोपकार को  महत्व देना चाहिए तथा बिना बुलाये ऐसी जगह नहीं जाना चाहिए जहाँ हमारा अपमान हो ,इसी प्रकार कवि अपनी बात पाठकों तक पहुँचाने में सफल रहे हैं . 


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