2
Advertisement
अब आदत सी हो गयी

गिरते सँभलते चलने की
अब आदत सी हो गयी
रेत पर नाम लिखने की
ख्वाइश भी अब खो गयी

तैरते नए किनारो तक
पहुँचने की चाहत तो चली गयी
दुनिया का सफर करते
सफर की उम्मीद भी मिट गयी

लगता है अब क्यों ना
समंदर के बीच ही रह जाऊं
लहरों के साथ खेलते
पानी में समां जाऊं

लगता हैं अब दिल में
श्रेया एन चोपड़ा



यूँही कही रुक जाऊं
समां का मज़ा लेते
यूँही वक़्त में समां जाऊं








यह रचना श्रेया चोपड़ा जी द्वारा लिखी गयी है। आप अभी छात्रा हैं। आप कविता - कहानी आदि विधाओं में अपनी लेखनी का प्रयोग करती हैं। लेखन से आप अपने विचारों को व्यक्त करना चाहती हैं।

एक टिप्पणी भेजें


  1. आप की लिखी ये रचना....
    02/09/2015 को लिंक की जाएगी...
    http://www.halchalwith5links.blogspot.com पर....
    आप भी इस हलचल में सादर आमंत्रित हैं...


    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया रचना !www.gyanipandit.com की और से शुभकामनाये !

    उत्तर देंहटाएं

आपकी मूल्यवान टिप्पणियाँ हमें उत्साह और सबल प्रदान करती हैं, आपके विचारों और मार्गदर्शन का सदैव स्वागत है !
टिप्पणी के सामान्य नियम -
१. अपनी टिप्पणी में सभ्य भाषा का प्रयोग करें .
२. किसी की भावनाओं को आहत करने वाली टिप्पणी न करें .
३. अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .

 
Top