पलायन की पीड़ा

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पलायन की पीड़ा न मिटने वाली टीस है, ऐ मेरे मन! घर छूटा, आँगन छूटा, छूट गया गाँव अपना, छूट गईं वे पगडंडियाँ, जहाँ बीता था बचपन अपना।

पलायन की पीड़ा


न मिटने वाली टीस है, ऐ मेरे मन!
घर छूटा, आँगन छूटा, छूट गया गाँव अपना,
छूट गईं वे पगडंडियाँ, जहाँ बीता था बचपन अपना।
वही टेढ़े-मेढ़े रास्ते, वही पहाड़ों की ढलान,
जिस मिट्टी में जन्म लिया, वही थी मेरी पहचान।

याद आते हैं बचपन के वे अल्हड़ और सुहाने दिन,
संग-संग खेली होली, हँसते-गाते बीते दिन।
चांचरी के मधुर गीतों में जब थिरकते थे पाँव,
गायों की घंटियों से गूँज उठता था सारा गाँव ।
ग्वाल-बालों के संग बिताए वे निश्छल पल,
सर्दियों की गुनगुनी धूप और प्रेम से भरे वे कल।
कितना सुंदर था वह अपना छोटा-सा संसार,
जहाँ हर चेहरे पर बसता था अपनापन और प्यार।

तब कहाँ मालूम था, ऐ मेरे मन!
एक दिन छोड़ना होगा अपना घर-आँगन।
रोज़गार की तलाश में भटकना होगा दर-दर,
और जीवनभर सहनी होगी पलायन की यह पीड़ा निरंतर।

पलायन की पीड़ा
आज आ तो गए हैं हम किसी पराए मुल्क में,
जहाँ सुविधाएँ हैं, सुख-साधन हैं, हर चीज़ है उपलब्ध।
लेकिन कहाँ मिलता है अपने पहाड़-सा अपनापन,
कहाँ मिलता है वह परिवेश, वह संस्कृति और बचपन?
यहाँ रहकर भी मन अपना कहीं और ही रहता है,
हँसते चेहरों के पीछे जाने कितना दर्द छिपा रहता है।
अपने मन की व्यथा को स्वयं में समेटकर,
जीना पड़ता है हमें अपनों से दूर रहकर।

हे विधाता! कैसे कटेगा यह जीवन का वनवास?
हृदय में आज भी जीवित है घर लौटने की आस।
बंजर हो गई हैं खेतों की वे उपजाऊ क्यारियाँ,
सूनी पड़ी हैं गाँव की गलियाँ और चौपालें सारी।
अब न खेतों में मड़ुवा लहलहाता है,
न धान की बालियों से आँगन महकता है।
सूने पड़े हैं गाड़-गधेरे, वीरान हुए मकान,
किससे कहें जाकर अब अपने गाँव का हाल?

हे विधाता! प्रभु राम ने भी चौदह वर्ष का वनवास बिताया,
लेकिन उस वनवास ने भी उनके अपनों को कितना रुलाया।
आज हम भी अपनों से दूर वही विरह सहते हैं,
घर की यादों में हर पल चुपचाप आँसू बहते हैं।
हृदय में एक अनकही आग सुलगती रहती है,
आँखों में घर लौटने की चाह छलकती रहती है।
मन में उठती है एक अजीब-सी बेचैनी,
यादों की आहट बन जाती है जीवन की सहचरी।

हे विधाता! तुम क्या समझोगे मेरे मन का दर्द,
पहाड़ से बिछुड़ने की पीड़ा और अपनों से दूर रहने का मर्म!

नौकरी और रोज़गार की उम्मीद लेकर,
आए थे हम अपने गाँव-घर को पीछे छोड़कर।
समय के साथ बदल गई वेशभूषा और पहचान,
बदल गए रहन-सहन, बदल गए तौर-तरीके और खान-पान।
पर मन के किसी कोने में आज भी वही पहाड़ बसा है,
जहाँ मेरा बचपन, मेरी स्मृतियाँ और मेरा अस्तित्व रहा है।

यह पलायन केवल घर छोड़ने की कहानी नहीं,
यह अपनी जड़ों से बिछुड़ने की एक अनकही पीड़ा है।
यह मिट्टी की महक से दूर होने का दर्द है,
यह अपने ही गाँव में पराया हो जाने का मर्म है।

आज भी मन के आँगन में एक प्रश्न खिलता है,
हर साँस के साथ एक सपना पलता है।
कब लौटूँगी मैं अपने उस प्यारे गाँव में,
जहाँ बचपन मुस्कुराता है हर गली और हर छाँव में?

कब फिर महकेंगे मेरे घर-आँगन के फूल,
कब फिर पुकारेगी मुझे मेरी पहाड़ी धूल?
कब लौटेगा वह अपनापन, वह बचपन, वह प्यार,
कब फिर आबाद होगा मेरा उजड़ा हुआ संसार?

पलायन की पीड़ा केवल वही जानता है,
जो अपनी मिट्टी से दूर रहकर भी
हर पल उसी मिट्टी में जीता है।




- लक्ष्मी भट्ट,
पिथौरागढ़ (उत्तराखंड)
वर्तमान निवास : देहरादून

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