राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में सुबह से शाम तक महिलाएं अपने काम में जुटी रहती हैं। कोई घर के काम निपटाने के बाद पापड़ और अचार बनाने बैठती है .
महिलाओं के श्रम को आर्थिक पहचान देने की ज़रूरत है
राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में सुबह से शाम तक महिलाएं अपने काम में जुटी रहती हैं। कोई घर के काम निपटाने के बाद पापड़ और अचार बनाने बैठती है, तो कोई खेतों में बुवाई, निराई और कटाई करती है। कई महिलाएं पशुपालन के साथ-साथ मनरेगा के तहत सड़क निर्माण, तालाब की खुदाई, सफाई, पौधारोपण और खेतों की मेड़ बनाने जैसे कामों में पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करती हैं। उनकी मेहनत ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके बावजूद सवाल यह है कि क्या इस मेहनत के बदले उन्हें उचित आमदनी, आर्थिक पहचान और अपने फैसले लेने की स्वतंत्रता मिल पा रही है?
ग्रामीण राजस्थान में पापड़ और अचार बनाना महिलाओं के लिए रोजगार का एक जाना-पहचाना माध्यम है। घरों में तैयार होने वाले इन उत्पादों की स्थानीय बाजारों में मांग रहती है। कई जगह महिलाएं समूह बनाकर इनका उत्पादन और बिक्री भी करती हैं। इस काम की खासियत यह है कि महिलाएं अपने पारिवारिक दायित्वों के साथ इसे कर सकती हैं। उनके पास पारंपरिक स्वाद, अनुभव और हुनर की पूंजी होती है। लेकिन समस्या यह है कि इस काम का बड़ा हिस्सा छोटे और असंगठित स्तर पर होता है। महिलाओं को उत्पादों का उचित मूल्य, बाजार तक पहुंच और नियमित आमदनी नहीं मिल पाती।
इसके अलावा कई महिलाएं जॉब कार्ड के जरिए भी रोज़गार से जुड़ी होती हैं. वे गांव में सड़क निर्माण, तालाबों की मरम्मत, जल संरक्षण, पौधारोपण और मेड़बंदी जैसे कार्यों में हिस्सा लेती हैं। इससे उन्हें गांव के आसपास मजदूरी का अवसर मिलता है और मजदूरी सीधे उनके बैंक खाते में पहुंचती है। यह व्यवस्था महिलाओं को अपनी कमाई पर नियंत्रण बनाने का अवसर देती है।
देश में महिलाओं के रोजगार की स्थिति को समझने के लिए आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के आंकड़े महत्वपूर्ण हैं। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय की पीएलएफएस 2025 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी से दिसंबर 2025 के दौरान देश में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की लगभग 20 करोड़ महिलाएं रोजगार में थीं। इनमें पुरुष कामगारों की संख्या 41.6 करोड़ थी। इस तरह देश के कुल 61.6 करोड़ कामगारों में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई थी।
रोजगार में भागीदारी के बावजूद महिलाओं की आमदनी में बड़ा अंतर दिखाई देता है। रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार से जुड़ी महिलाओं की औसत मासिक सकल आमदनी 5,540 रुपये थी, जबकि देशभर की स्वरोजगार वाली महिलाओं की औसत आमदनी 6,374 रुपये थी। यानी ग्रामीण महिलाओं की आमदनी राष्ट्रीय औसत से 834 रुपये, लगभग 13.1 प्रतिशत कम थी। रिपोर्ट यह भी बताती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कामकाजी महिलाओं में 70.7 प्रतिशत स्वरोजगार से जुड़ी थीं। इनमें परिवार के व्यवसाय में बिना अलग वेतन के सहयोग करने वाली महिलाएं भी शामिल हैं। इसलिए रोजगार में भागीदारी का बढ़ना हमेशा आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ने का संकेत नहीं होता।
ग्रामीण महिलाओं के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी है कि वे अपने हुनर को रोजगार में कैसे बदलें, इसकी जानकारी उनके पास नहीं होती। बहुत सी महिलाएं सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, मेहंदी लगाने, पापड़, अचार और दूसरे तरह की खाद्य सामग्री बनाने में कुशल होती हैं। कुछ महिलाएं पशुपालन और दुग्ध उत्पादन का काम भी अच्छी तरह जानती हैं। लेकिन जब इन कामों को छोटे व्यवसाय के रूप में शुरू करने की बात आती है, तो उन्हें लागत, उत्पाद की कीमत, पैकेजिंग और बिक्री की जानकारी नहीं मिलती। कई बार उन्हें यह भी पता नहीं होता कि अपने उत्पादों को गांव से बाहर के बाजारों तक कैसे पहुंचाया जाए? नतीजतन, उनका हुनर घरेलू जरूरतों तक सीमित रह जाता है।
स्वयं सहायता समूह महिलाओं के लिए रोजगार के नए रास्ते खोल सकते हैं। इसके माध्यम से महिलाएं छोटी-छोटी बचत करती हैं, एक-दूसरे को आर्थिक सहयोग देती हैं और सामूहिक रूप से व्यवसाय शुरू कर सकती हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत महिलाओं को समूहों से जोड़ने, प्रशिक्षण देने और बैंक ऋण तक पहुंच बनाने का प्रयास किया जा रहा है। इसके बावजूद कई गांवों में महिलाएं स्वयं सहायता समूहों से जुड़ने और उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी से वंचित हैं। इसलिए जरूरी है कि सरकारी विभागों और स्थानीय संस्थाओं के प्रतिनिधि गांवों में जाकर उन्हें इन अवसरों की जानकारी दें।
महिलाओं को केवल प्रशिक्षण देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि ऐसा प्रशिक्षण जरूरी है जिससे वे अपना काम शुरू कर सकें। पापड़ और अचार बनाने वाली महिलाओं को खाद्य प्रसंस्करण, स्वच्छता, पैकेजिंग, उत्पाद की गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के पंजीकरण की जानकारी दी जा सकती है। उन्हें लागत का हिसाब रखने और उत्पादों की कीमत तय करने का प्रशिक्षण भी मिलना चाहिए। इसके साथ ही बैंक ऋण की प्रक्रिया सरल बनाना और उनके उत्पादों की बिक्री के लिए बाजार उपलब्ध कराना जरूरी है।
महिलाओं के रोजगार की चर्चा करते समय उनके घरेलू श्रम को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं घर, बच्चों, बुजुर्गों, पशुओं और खेती से जुड़े काम करती हैं। इनमें से बहुत से कामों के लिए उन्हें कोई आर्थिक भुगतान नहीं मिलता। कई बार परिवार और समाज उनकी मेहनत को जिम्मेदारी मानकर स्वीकार करते हैं, आर्थिक योगदान के रूप में नहीं। जरूरी है कि घरेलू काम और देखभाल की जिम्मेदारी परिवार के सभी सदस्यों के बीच साझा हो, ताकि महिलाओं को रोजगार के लिए समय और अवसर मिल सके।
आज जरूरत इस बात की है कि ग्रामीण महिलाओं को रोजगार के अवसरों की जानकारी उनके गांव में ही मिले। पंचायत स्तर पर कौशल प्रशिक्षण और रोजगार से जुड़े शिविर लगाए जाएं। स्वयं सहायता समूहों के गठन और संचालन में सहयोग मिले। बैंक और सरकारी विभाग महिलाओं को ऋण तथा योजनाओं की जानकारी दें। महिलाओं को केवल काम करने का अवसर ही नहीं, बल्कि अपनी कमाई और व्यवसाय से जुड़े फैसले लेने का अधिकार भी मिलना चाहिए।
वास्तव में, ग्रामीण महिलाओं के पास मेहनत करने की क्षमता और हुनर की कमी नहीं है। जरूरत है ऐसे अवसरों की, जिनसे वे अपनी मेहनत को नियमित आमदनी में बदल सकें। जब कोई महिला अपने बनाए पापड़ और अचार को बाजार में बेचकर कमाई करेगी, अपना बैंक खाता स्वयं संचालित करेगी या अपने छोटे व्यवसाय का विस्तार करेगी, तब उसकी मेहनत को आर्थिक पहचान भी मिलेगी। इससे केवल एक महिला की आर्थिक स्थिति नहीं बदलेगी, बल्कि परिवार और पूरे गांव की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। (यह लेखिका के निजी विचार हैं)
- सरिता गोदारा,
लूणकरणसर, राजस्थान

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