निराला की कविता 'सम्राट अष्टम एडवर्ड के प्रति' का भावार्थ और व्याख्या: ऐतिहासिक संदर्भ, मूल भाव, व्यंग्य, साम्राज्यवाद-विरोधी स्वर और काव्य-सौष्ठव।
सम्राट अष्टम एडवर्ड के प्रति का भावार्थ व्याख्या | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की कविता ‘सम्राट अष्टम एडवर्ड के प्रति’ छायावादी और प्रगतिवादी भावधारा के संधिकाल की एक अत्यंत विशिष्ट और विचारोत्तेजक रचना है। यह कविता उनके प्रसिद्ध काव्य-संग्रह ‘अनामिका’ (द्वितीय संस्करण, 1938) में संकलित है।
यह रचना ब्रिटेन के सम्राट एडवर्ड अष्टम द्वारा अमेरिकी महिला वालिस सिम्पसन के प्रेम में ब्रिटिश राजसिंहासन के ऐतिहासिक त्याग (दिसंबर 1936) की पृष्ठभूमि पर आधारित है।
अष्टम एडवर्ड सन् 1936 में इंग्लैण्ड के सम्राट बने किन्तु कुछ समय के बाद ही उन्होंने ताज को ठुकरा दिया। वे जिस युवती से प्रेम करते थे उसे राजपरिवार ने उनकी पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं किया और यह कहा कि वे यदि उससे विवाह करेंगे तो इंग्लैण्ड की राजगद्दी उन्हें त्यागनी होगी। सम्राट ने प्रेम को महत्त्व दिया और अपनी प्रेयसी के लिए इंग्लैण्ड का सिंहासन त्याग दिया। इसी घटना से प्रभावित होकर निराला ने इस कविता की रचना की और प्रेम के लिए राजगद्दी त्यागने वाले सम्राट का अपनी कविता के माध्यम से अभिनंदन किया।
1. वीक्षण अराल ....मानव के वर ।
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावादी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित- कविता 'सम्राट् अष्टम एडवर्ड के प्रति' से ली गई हैं। यहाँ कवि ने इंग्लैण्ड के सम्राट् अष्टम एडवर्ड के त्याग की महानता का प्रतिपादन किया है जिसने प्रेम के लिए साम्राज्य का ताज ठुकरा दिया था।
व्याख्या- यह एक अद्भुत बात है। प्रायः ऐसा देखा नहीं जाता कि प्रेम के लिए कोई इतना बड़ा त्याग कर दे। सम्राट् एडवर्ड अष्टम ने प्रेम के लिए इतने बड़े साम्राज्य का ताज ठुकरा दिया। उनके इस त्याग में जीवन के स्वर, छंद, ताल भरे हैं और इसमें 'मन्द्र' स्वर मौन भाव से व्याप्त है। इस सृष्टि में चमकते सूर्य, चंद्र उस परमात्मा के दीपक जैसे हैं। उसने सम्पूर्ण दिशाओं को देशकाल में आबद्ध कर रखा है। परमात्मा की इस सृष्टि में 'सम्राट् एडवर्ड अष्टम' जैसे लोग भी हैं जिन्होंने अपनी प्रेयसी के लिये. इंग्लैण्ड के ताज को ठुकराकर प्रेमरूपी वृक्ष की प्रत्येक डाल को पुष्पित-पल्लवित कर दिया। इस बीसवीं शताब्दी में अपार वैभव और सम्मान को प्रेम के लिए त्यागने का साहस दिखाकर उन्होंने जो महान कार्य किया उसने प्रेम की महत्ता को स्थापित कर गर्जना करते हुए ज्ञान सागर को सर्वत्र प्रसारित कर दिया।
चारों ओर उनके त्याग की धूम मच गई और साहित्यिक गोष्ठियों में यह कहा जाने लगा कि जो गंध मधु की वर्जना स्वीकार करे उसे भ्रमर नहीं कहा जा सकता। अर्थात् भ्रमर की मूल प्रवृत्ति सुगंध और मकरंद का पान करना है। अतः सम्राट् सच्चे प्रेमी हैं जिन्होंने प्रेम पर लगी वर्जनाओं को स्वीकार नहीं किया और अपने प्रेम को पाने के लिए राज्य को भी ठुकरा दिया।
.
संसार के किसी भी देश में रहने वाला व्यक्ति चाहे वह गोरा हो या काला, एक है। मानव-मानव में कोई भेद नहीं है। गोरे-काले का यह रंगभेद बनावटी है। जो कमल कीचड़ में खिलता है वह पानी में रहकर भी उस कीचड़ से अलिप्त रहता है। चाहे वह कोई भी सरोवर हो उसमें खिला कमल निष्कलंक ही होता है। सम्राट् एडवर्ड भले ही अंग्रेज हों किन्तु उन्होंने प्रेम के लिए ताज को ठोकर मारकर प्रेम की महत्ता को प्रतिपादित तो किया ही, साथ ही ऐसा करके वे अमर हो गए और श्रेष्ठ मानवों में गिने जाने योग्य बन गए। निश्चय ही वे मानवता के सरोवर में खिले हुए निष्कलंक कमल हैं।
विशेष- उपरोक्त पंक्तियों में निम्नलिखित विशेषताएं हैं -
- अलंकार-ये दीपक जिसके सूर्य चंद्र में उत्प्रेक्षा, प्रणय के प्रियंगु एवं निकलता कमल जो मानव का में रूपक तथा डाल-डाल में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार है।
- सम्राट् एडवर्ड अष्टम के त्याग को महिमामंडित किया गया है।
- भाषा संस्कृतनिष्ठ शब्दावली से युक्त खड़ी बोली है।
2. वैभव विशाल ..........चढ़ जहाँ बड़ा सम्भ्रम ।
प्रसंग- 'सम्राट् अष्टम एडवर्ड के प्रति' नामक इस कविता के रचयिता छायावादी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' हैं। इस कविता में उन्होंने इंग्लैण्ड के सम्राट् अष्टम एडवर्ड के महान् त्याग पर प्रकाश डाला है जिन्होंने इतने बड़े साम्राज्य को अपने प्रेम की खातिर ठुकरा दिया।
व्याख्या - इंग्लैण्ड के सम्राट् अष्टम एडवर्ड ने अपने प्रेम को पाने के लिए उस विशाल वैभव संपन्न राज्य के ताज को ठोकर मार दी जिसकी सीमाएँ दुनिया के सात समुद्रों तक फैली हुई थीं। इंग्लैण्ड के उपनिवेश पूरी दुनिया में फैले थे। सप्त महासागर की तरंगें माला की तरह उसके कंठ कों सुशोभित कर रही थीं। कहा जाता था कि इंग्लैण्ड का साम्राज्य इतना विशाल था कि उसमें सूरज नहीं डूबता था। एक भाग में जब सूरज निकलता था तब दूसरे भाग में सूरज अस्त हो रहा होता था। इस प्रकार सूर्य क्षत्र (मुकुट) बनकर मस्तक पर सदा विराजमान रहता था और सेवक की भाँति हाथ में छत्र (छाता) लेकर उसकी सेवा में लीन रहता था। जिस सिंहासन की छटा सर्वत्र जल थल नभ में विराजती थी, जिस साम्राज्य की विजयिनी सेना घटाओं की भांति उमड़ती थी और सभी दिशाओं में इन्द्रधनुषी आभा विकीर्ण करती थी उस महान राज्य का सिंहासन अत्यंत वैभवशाली मणियों, रत्नों से जड़ा हुआ लाल कमल प्रतीत होता था। सम्राट् अष्टम एडवर्ड ऐसे रत्नजड़ित सिंहासन पर विराजमान हुए और सारे विश्व के द्वारा इस प्रकार अभिनंदित हुए जैसे देवराज इन्द्र स्वर्ग में पूजे जाते हैं।
किन्तु इस सिंहासन पर अधिक दिनों तक वे रह नहीं पाए। वे जिस प्रेयसी से प्रेम करते थे, वह राजपरिवार को उनकी पत्नी के रूप में स्वीकार्य नहीं थी। उन्होंने ताज को ठोकर मार दी, सम्राट् पद को त्याग दिया और प्रेम को वरीयता देते हुए अपनी प्रेयसी को पत्नी के रूप में अपना लिया। प्रेम के लिए इतना बड़ा साम्राज्य ठुकरा कर उन्होंने मुक्ति का अनुभव किया। अपने हृदय की पुकार को उन्होंने सुना और प्रेम की जिस नवीन संस्कृति को गढ़ा उसने उनकी उदारता, विशद्ता एवं त्याग को सारे विश्व में फैला दिया। उन्होंने अपने इस कार्य से जन-जन के जीवन में साहस का संचार किया, प्रेम की महत्ता को स्थापित किया तथा व्यक्ति को उसके धर्म (कर्त्तव्य) का बोध कराया। निश्चय ही उन्होंने मानव के मन में व्याप्त भ्रम और संदेह का निवारण करते हुए यह प्रतिपादित किया कि प्रेम से ऊपर, कुछ भी नहीं है। प्रेम ही जीवन का मूल तत्व है, इसी से मानव का बड़प्पन व्यक्त होता है।
विशेष- उपरोक्त पंक्तियों में निम्नलिखित विशेषताएं हैं -
(1) अलंकार-ज्यों रक्त पद्म, नरेन्द्र वंदित ज्यों देवेश्वर में उपमा तथा सूर्य क्षत्र, साम्राज्य सदा......एवं विजयिनी वाहिनी विपुल घटा में रूपक अलंकार है।
(2) इस अवतरण में तत्कालीन अंग्रेजी शासन के विश्वव्यापी विस्तार तथा उसके वैभव का अंकन किया गया है।
(3) संस्कृतनिष्ठ भाषा का प्रयोग है।
3. सिंहासन तज .......उतरे.सभ्यता यह नूतन ।
प्रसंग- प्रस्तुत पंक्तियाँ सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा रचित कविता 'सम्राट् अष्टम एडवर्ड के प्रति' से ली गई हैं। इस कविता में कवि ने इंग्लैण्ड के सम्राट् अष्टम एडवर्ड के त्याग को अपूर्व बताया है जिसने अपने प्रेम के लिए ताज ठुकरा दिया।
व्याख्या- अपने प्रेम के लिए इंग्लैण्ड के सिंहासन को त्यागकर तुमने राजपद छोड़ दिया और एक सामान्य मानव बनकर जमीन पर आना पसंद किया। निश्चय ही तुम्हारा यह त्याग अद्वितीय एवं अनूठा है। तुमने इस प्रश्न का समाधान कर दिया कि प्रिया और ताज में किसका साथ सुंदर है। प्रेम सबसे महान है और प्रिया चाहे वह अनामिका ही क्यों न हो ताज से भी बड़ी है। तुमने प्रेम के लिए सिंहासन छोड़ दिया ऐसा करके तुमने जिस शालीनता, शिष्टता, संस्कृति एवं सभ्यता का सूत्रपात किया उसने यूरोप और अमेरिका को भी नव-संस्कृति का पाठ पढ़ा दिया। यूरोप और अमेरिका भी तुम्हारे समक्ष तुच्छ साबित हो गए। तुम्हारे इस त्याग से प्रेम की महत्ता स्थापित हुई। तुम्हारे प्रेम की सुगंध चतुर्दिक व्याप्त हो गई, प्रेयसी के हृदय से तुम जुड़ गए और यह नूतन सभ्यता तुमसे मिलकर निश्चय ही गौरवान्वित हुई।
विशेष - उपरोक्त पंक्तियों में निम्नलिखित विशेषताएं हैं -
- अलंकार-प्रेयसी के हृदय से हो तुम प्रतिदेशयुक्त में उपमा तथा सम्राट् दिखाया सत्य कौनसा वह सुन्दर में प्रश्न अलंकार है।
- प्रेम की महत्ता ताज से भी बढ़कर है यही सत्य यहाँ प्रतिपादित किया गया है।
- संस्कृतनिष्ठ भाषा का प्रयोग किया गया है।


COMMENTS