बाबूजी की पुरानी डायरी | हिंदी लघु कथा

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रिटायरमेंट के बाद बाबूजी की पुरानी डायरी में दर्ज थीं परिवार की यादें। जब बेटे ने कहा, "फोन में रख लीजिए," तो बाबूजी ने जो जवाब दिया, वह दिल छू लेगा।

बाबूजी की पुरानी डायरी


दीवार पर टंगी पुरानी लकड़ी की घड़ी हर सेकंड के साथ हल्की-सी खट-खट करती। कमरे में पसरे सन्नाटे में वह आवाज अकेली नहीं थी, उसके साथ मेज पर रखी किताबों के पन्नों की फड़फड़ाहट भी शामिल थी।

रिटायरमेंट के बाद बाबूजी का अधिकांश समय इसी कमरे में बीतता था। धूप जब आंगन से सिमटकर पश्चिम की खिड़की पर ठहरती, तब वे अपनी पुरानी, गहरे भूरे रंग की चमड़े की डायरी खोलते। उसमें कोई हिसाब-किताब नहीं था, न ही कोई वसीयत। उसमें दर्ज थीं परिवार की छोटी-छोटी तारीखें—किस दिन बिटिया ने पहली बार घुटनों के बल चलना सीखा था, किस तारीख को बेटे की पहली नौकरी लगी थी, और किस साल के जाड़ों में मां का हाथ पहली बार चाय की केतली उठाते हुए कांप गया था।

बाबूजी की पुरानी डायरी
शाम की चाय लेकर अनिकेत कमरे में आया, तो देखा बाबूजी चश्मा माथे पर चढ़ाए डायरी के एक मुड़े हुए पन्ने को बहुत आहिस्ता से सीधा कर रहे थे। पन्ना इतना पुराना पड़ चुका था कि तनिक-सी असावधानी से उसके दो टुकड़े हो सकते थे।

"बाबूजी, आप यह सब फोन में क्यों नहीं रख लेते? आजकल तो सब डिजिटल हो जाता है, जिंदगी भर सुरक्षित रहेगा, न फटने का डर न खोने का।" अनिकेत ने कप मेज पर रखते हुए कहा। उसके लहजे में नई पीढ़ी की सहज व्यावहारिकता थी।

बाबूजी ने धीरे से सिर उठाया। चेहरे की झुर्रियों के बीच एक शांत मुस्कान उभरी। उन्होंने अनिकेत को देखा, फिर अपनी उंगलियों से उस पीले पड़ चुके कागज के किनारे को छुआ।

"बेटा, सुरक्षित तो शायद रह जाए, पर टिकेगा नहीं," बाबूजी ने धीमी आवाज में कहा।

"मतलब? क्लाउड पर डेटा कभी मिटता थोड़ी है।" अनिकेत ने तर्क दिया।

"डेटा नहीं मिटता, पर उसके साथ जुड़ा अहसास मिट जाता है।" बाबूजी ने डायरी का वह पन्ना अनिकेत की ओर घुमा दिया।

पन्ने पर कोई लंबी बात नहीं लिखी थी। केवल एक तारीख थी—'१४ मार्च, १९९८' और उसके नीचे एक गोल, हल्का-सा फीका निशान था।

"यह देख रहे हो?" बाबूजी बोले, "उस दिन जब तुम्हारी मां ने अपनी पहली रसोई से मेरे लिए खीर बनाई थी, तो कटोरी का तला इसी पन्ने पर टिक गया था। यह निशान उसी दिन का है। इसे जब भी छूता हूँ, मुझे उस दिन की सोंधी खुशबू याद आती है। जब कोई अक्षर हाथ से लिखा जाता है, तो उसमें लिखने वाले की सांसें, उसकी हड़बड़ाहट और उसका ठहराव सब दर्ज हो जाता है। मशीनें जानकारी सहेज सकती हैं अनिकेत, जज़्बात नहीं।"

अनिकेत कुछ देर तक उस हल्के गोल निशान को देखता रहा। उसने कभी इस नज़रिए से सोचा ही नहीं था। उसकी स्क्रीन पर हजारों तस्वीरें थीं, अनगिनत संदेश थे, लेकिन उनमें से किसी में भी वक्त की वह खुशबू नहीं थी जो उस पन्ने से उठ रही थी।

बाबूजी ने आहिस्ता से डायरी बंद की और अपने दोनों हाथों के बीच उसे ऐसे थाम लिया, जैसे कोई नाज़ुक चिड़िया की जान बचा रहा हो।

कमरे में शाम गहराने लगी थी। अनिकेत ने चुपचाप चाय का घूंट भरा।पहली बार उसे महसूस हुआ कि पुरानी चीजों को संभालना महज़ आदत नहीं, बल्कि गुज़रे हुए वक्त को जिंदा रखने की एक मूक इबादत होती है।

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