न्याय का महाप्रहसन

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भारतीय न्यायिक व्यवस्था में अमीर और गरीब अपराधियों के साथ होने वाले भेदभाव पर तीखा व्यंग्य। क्या कानून सचमुच सबके लिए समान है? पढ़िए यह लेख।

न्याय का महाप्रहसन


अपराध करने के अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा कीजिए, अपराधियों के सामने सुविधाओं के दरवाजे खुले रखिए और फिर न्याय के देवालय में बैठकर नैतिकता के महान उपदेश दीजिए! यह हमारे समय के सबसे बड़े विरोधाभासों में से एक है। इससे भी अधिक दिलचस्प बात यह है कि यदि किसी अपराधी के पास अकूत संपत्ति हो, सामाजिक प्रतिष्ठा का चमचमाता कवच हो, जाति-धर्म की श्रेष्ठताबोधपूर्ण सत्ता का मजबूत सहारा हो और सत्ता के गलियारों तक पहुँच रखने वाली प्रभावशाली सिफारिशें हों, तो उसके सामने न्याय की भाषा तक बदलती हुई दिखाई देने लगती है।

इस प्रकार सौभाग्यशाली अपराधियों के लिए जेल की चारदीवारी भी कभी-कभी किसी सुख-सुविधा वाले विश्रामगृह से कम नहीं रह जाती। उनके मामले में सजा आत्मपरीक्षण, चरित्र-परिवर्तन और प्रायश्चित का अवसर होती है। आखिरकार, उन्हें भी अपनी अंतरात्मा से संवाद करने के लिए कुछ समय चाहिए, है न! और यदि यह संवाद सुविधाओं से संपन्न वातावरण में हो, तो इसमें हर्ज ही क्या है? संभव है कि आरामदेह गद्दे पर लेटे-लेटे ही उनके भीतर पश्चात्ताप की कोई दिव्य कली खिल उठे!

न्यायदेवता, तुम्हारी भी कैसी-कैसी विचित्र लीलाएँ हैं!

जब अपराध की गंभीरता से अधिक अपराधी की सामाजिक हैसियत को महत्त्व मिलने लगता है, तब न्याय और विशेषाधिकार के बीच की सीमाएँ धुँधली पड़ने लगती हैं।

दूसरी ओर, यदि अपराधी आर्थिक रूप से कमजोर हो, सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर उसके पास केवल गरीबी हो और जाति-धर्म की सत्ता-व्यवस्था में उसका कोई प्रभावशाली स्थान न हो, तो न्याय का चेहरा अचानक बदल जाता है। यहाँ करुणा की संभावनाएँ सिकुड़ जाती हैं। परिस्थितियों की पड़ताल महत्त्वहीन हो जाती है। कानून अपनी समूची कठोरता के साथ मंच पर उतर आता है।

न्याय का सिंह अपनी पूरी शक्ति से दहाड़ता है। दुर्भाग्य से, उसकी दहाड़ सबसे अधिक उन्हीं लोगों को सुननी पड़ती है, जिनके पास उससे बच निकलने का कोई रास्ता नहीं होता।

न्याय का महाप्रहसन
धनवान अपराधी के मामले में चरित्र-परिवर्तन की संभावनाओं पर विचार किया जाता है, जबकि गरीब अभियुक्त के मामले में कठोरतम सजा की माँग करना नैतिकता का अनिवार्य प्रश्न बन जाता है। एक के मामले में मानवीय परिस्थितियाँ महत्त्वपूर्ण होती हैं; दूसरे के मामले में अपराध का आरोप ही उसकी संपूर्ण पहचान बन जाता है।

यह कैसी समानता है? यह कैसी निष्पक्षता है? सबको कानून की एक ही पुस्तक थमा देना, लेकिन उस पुस्तक के पन्नों के बीच छिपे लाभों तक सबकी समान पहुँच न होने देना, आखिर इस महान न्याय-प्रक्रिया का औचित्य क्या है?

भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है। न्याय की मूल अवधारणा भी यही है कि किसी व्यक्ति की संपत्ति, जाति, धर्म, राजनीतिक प्रभाव या सामाजिक प्रतिष्ठा उसे अनुचित लाभ दिलाने का माध्यम नहीं बननी चाहिए।

लेकिन जब यह धारणा मजबूत होने लगती है कि प्रभावशाली लोगों के लिए कानून में रियायतें हैं और कमजोर लोगों के लिए कठोर सजाएँ, तब सवाल केवल अदालतों के कामकाज पर नहीं उठता, बल्कि संपूर्ण न्यायिक संस्कृति ही कठघरे में खड़ी हो जाती है।

यहाँ एक बात स्पष्ट कर देना आवश्यक है। सभी अमीर लोग अपराधी नहीं होते और सभी गरीब लोग निर्दोष भी नहीं होते। केवल जमानत या पैरोल मिल जाने से ही अन्याय सिद्ध नहीं हो जाता। जमानत, अपील, सजा में छूट और चरित्र-परिवर्तन के अवसर, इन सभी का कानून की दृष्टि से अपना महत्त्व है।

लेकिन जब ऐसे लाभों की उपलब्धता में असमानता को लेकर समाज में गहरा असंतोष पैदा होने लगता है, तभी वास्तविक समस्या सामने आती है। जब लोगों को यह महसूस होने लगता है कि न्याय पाने की क्षमता भी किसी व्यक्ति की आर्थिक और सामाजिक हैसियत पर निर्भर करती है, तब न्यायिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगते हैं।

न्याय का संकट केवल गलत फैसलों में नहीं है; वह उस व्यवस्था में भी है, जो नागरिकों के मन में यह विश्वास पैदा करती है कि सबको समान रूप से न्याय नहीं मिलता।

इस संकट का एक और विरोधाभासी पहलू है। अदालतों और सार्वजनिक मंचों से दिए जाने वाले भाषणों तथा घोषणाओं में समानता का जितना ऊँचा जयघोष सुनाई देता है, वास्तविक जीवन में विशेषाधिकारों की दीवारें उतनी ही मजबूती से खड़ी दिखाई देती हैं।

अपराधियों के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा होने दीजिए; अपराध सामने आने पर नैतिकता के लंबे-लंबे प्रवचन दीजिए! यह किसी हास्य-नाटक से कम नहीं है।

पहले व्यवस्था अपराधों के लिए रास्ते खोलती है। फिर अपराध सामने आने पर जाँच की औपचारिकताएँ शुरू होती हैं। उसके बाद मुकदमे की लंबी यात्रा आरंभ होती है। अंततः न्याय-प्रक्रिया स्वयं एक जटिल और उलझी हुई भूलभुलैया बन जाती है। इसमें संसाधनहीन व्यक्ति को वर्षों तक भटकना पड़ता है।

इसी बीच आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति अपने अधिकारों का उपयोग करने के लिए महँगे वकीलों, अनुभवी कानूनी टीमों और अन्य संसाधनों की सहायता ले सकता है।

यह अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। प्रत्येक अभियुक्त को अपना पक्ष रखने और अपना बचाव करने का अधिकार है। लेकिन जब एक व्यक्ति के पास अपने बचाव के लिए पर्याप्त धन हो और दूसरे को मुकदमे की अगली तारीख पर अदालत पहुँचने तक के लिए संघर्ष करना पड़े, तब कानून के समान अधिकारों और वास्तव में न्याय प्राप्त करने की संभावनाओं के बीच का अंतर उजागर हो जाता है।

कानून की पुस्तक में दोनों बराबर हो सकते हैं, लेकिन कानून तक पहुँचने के रास्ते दोनों के लिए समान रूप से चौड़े नहीं हैं!

जाति और धर्म का प्रश्न भी इसी संदर्भ में प्रासंगिक हो जाता है। जब किसी व्यक्ति के अपराध से अधिक उसकी सामाजिक पहचान को महत्त्व दिया जाने लगता है, तब न्याय का प्रश्न विवेकपूर्ण निर्णय से भटककर सामुदायिक प्रतिष्ठा, धार्मिक भावनाओं और राजनीतिक सुविधाओं का विषय बन सकता है।

यदि किसी प्रभावशाली समुदाय से संबंधित अभियुक्त के प्रति नरम रुख अपनाने को सामाजिक गौरव की रक्षा के रूप में प्रस्तुत किया जाए और किसी कमजोर समुदाय के अभियुक्त के प्रति कठोरता को न्याय का स्वाभाविक परिणाम बताया जाए, तो न्याय की सार्वभौमिकता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अपराध की कोई जातिगत महिमा नहीं होती। अन्याय को कोई धार्मिक पवित्रता प्राप्त नहीं होती। किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा के सहारे कानून के उल्लंघन को नैतिक उपलब्धि में भी नहीं बदला जा सकता।

फिर भी सार्वजनिक जीवन में कभी-कभी ऐसी परिस्थितियाँ दिखाई देती हैं, जहाँ अभियुक्त के कृत्यों से अधिक उसकी पहचान को महत्त्व दिया जाता है। उसके पक्ष में खड़े होने का आधार उसके कर्म नहीं, बल्कि वह जाति, धर्म या राजनीतिक समूह बन जाता है, जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है। उसके विरुद्ध आलोचना को पूरे समुदाय के अपमान के रूप में पेश किया जाता है। न्याय की माँग को राजनीतिक षड्यंत्र करार दिया जाता है।

इस प्रकार अपराध पर होने वाली चर्चा धीरे-धीरे पहचान की राजनीति में विलीन हो जाती है। पीड़ित की पीड़ा पीछे धकेल दी जाती है। साक्ष्यों पर होने वाली बहस शोर-शराबे में डूब जाती है। न्याय सुनिश्चित करने से अधिक अपने पक्ष की प्रतिष्ठा बचाने की लड़ाई महत्त्वपूर्ण हो जाती है।

न्याय की ऐसी व्याख्या में अपराधी के पक्ष में सहानुभूति जुटाने वाले लोग तो मिल जाते हैं, लेकिन पीड़ित को न्याय दिलाने की जिम्मेदारी उठाने वाले लोग कम रह जाते हैं।

यदि किसी अपराधी के पास धन, प्रभाव, जातिगत समर्थन और राजनीतिक संरक्षण हो, तो उसके लिए सार्वजनिक सहानुभूति का बाजार भी खूब सक्रिय रहता है। उसका बचाव करने के लिए तर्कों की कोई कमी नहीं होती।

कभी उसकी सामाजिक सेवाओं की गिनती कराई जाती है। कभी उसकी प्रतिष्ठा का बखान होता है। कुछ लोग उसकी पारिवारिक परिस्थितियों का हवाला देते हैं। दूसरे लोग उसके आलोचकों की नीयत पर सवाल उठाने लगते हैं।

क्या अब अपराध की गंभीरता का निर्धारण कानून और साक्ष्यों के आधार पर नहीं, बल्कि अपराधी की सामाजिक उपयोगिता और उसके साथ खड़े लोगों की संख्या के आधार पर किया जाना चाहिए?

दूसरी ओर, संसाधनहीन अभियुक्त के पक्ष में इसी स्तर की सार्वजनिक सहानुभूति जुटाना आसान नहीं होता। उसके पास प्रतिष्ठा की ढाल नहीं होती, प्रभाव का कवच नहीं होता और अपनी आवाज को दूर तक पहुँचाने के साधन भी नहीं होते। जिस तेजी से उसके विरुद्ध आरोप मजबूत होते दिखाई देते हैं, उसी तेजी से उसका पक्ष कमजोर पड़ता जाता है।

यहीं न्याय का विरोधाभास अपने सबसे विकृत रूप में सामने आता है।

आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति को अपनी निर्दोषता सिद्ध करने के लिए अधिक संघर्ष करना पड़ सकता है। इसके विपरीत, आर्थिक रूप से संपन्न व्यक्ति के पास अपना पक्ष अधिक मजबूती से प्रस्तुत करने के बेहतर साधन होते हैं।

ऐसी परिस्थितियों में न्यायिक व्यवस्था की वास्तविक महानता केवल कठोर सजाएँ देने में नहीं है। उसकी महानता इस बात को सुनिश्चित करने में है कि अभियुक्त की आर्थिक, सामाजिक या धार्मिक पहचान के आधार पर उसके साथ कोई भेदभाव न हो।

न्याय का उद्देश्य प्रत्येक अभियुक्त को अपराधी घोषित कर देना नहीं है। न ही प्रभावशाली अपराधियों के लिए विशेष उदारता का वातावरण तैयार करना है। उसका उद्देश्य निष्पक्ष सुनवाई, साक्ष्यों पर आधारित निर्णय, कानून के अनुरूप सजा और पीड़ित को न्याय सुनिश्चित करना है।

दोष सिद्ध हो जाने के बाद किसी व्यक्ति को चरित्र-परिवर्तन का अवसर देना एक सभ्य न्यायिक व्यवस्था की विशेषता हो सकती है। लेकिन ऐसा अवसर केवल धनवानों और प्रतिष्ठित लोगों का विशेषाधिकार नहीं होना चाहिए।

यदि सजा का उद्देश्य चरित्र-परिवर्तन है, तो यह सिद्धांत सभी दोषियों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। यदि अपराध की गंभीरता कठोर सजा की माँग करती है, तो उस कठोरता का निर्धारण भी कानून और परिस्थितियों के आधार पर होना चाहिए, न कि अभियुक्त की सामाजिक हैसियत के आधार पर।

विशेषाधिकारों को कानूनी वैधता प्रदान करने के बाद संवैधानिक समानता का गुणगान करना नैतिकता का एक विचित्र प्रहसन है।

मंच पर आदर्शों की प्रतिमाएँ सजी हुई हैं, लेकिन पर्दे के पीछे अवसरों का वितरण किन्हीं दूसरी ही व्यवस्थाओं के अनुसार हो रहा है।

इस नाटक का सबसे मनोरंजक दृश्य तब सामने आता है, जब व्यवस्था स्वयं अपनी उपलब्धियों का उत्सव मनाती है। कानून का शासन स्थापित होने की घोषणा की जाती है। न्याय की विजय का जश्न मनाया जाता है। संविधान की महानता पर भाषण दिए जाते हैं।

लेकिन आम नागरिक के मन में असुविधाजनक सवाल अब भी बाकी रहता है:

यदि कानून सबके लिए समान है, तो न्याय पाने की यात्रा में कुछ लोगों के सामने इतने सारे दरवाजे क्यों खुल जाते हैं, जबकि दूसरों के लिए रास्ते इतने संकरे क्यों हो जाते हैं?

इस सवाल का जवाब केवल नारों से नहीं दिया जा सकता।

इसके लिए पारदर्शी न्यायिक प्रक्रियाओं, निष्पक्ष जाँच, प्रभावी कानूनी सहायता, मुकदमों के समयबद्ध निपटारे और अभियुक्तों के प्रति समान मानदंडों की आवश्यकता है।

न्यायिक फैसलों की आलोचना भी तथ्यों, तर्कों और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर होनी चाहिए, न कि किसी समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह के आधार पर।

क्योंकि न्यायिक व्यवस्था की प्रतिष्ठा अंधी प्रशंसा से कायम नहीं रहती। उसकी नींव नागरिकों के उस विश्वास पर टिकी होती है, जो उसकी निष्पक्षता में व्यक्त होता है।

यह विश्वास तभी कायम रह सकता है, जब कानून की कठोरता और उदारता का वितरण किसी व्यक्ति की पहचान और प्रभाव से स्वतंत्र होकर किया जाए।

अन्यथा, यदि न्याय का सिंहासन कितना भी ऊँचा क्यों न हो, उसकी छाया में विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए अलग कुर्सियाँ और कमजोरों के लिए अलग कतारें दिखाई देने लगें, तो व्यवस्था की नैतिक विश्वसनीयता पर नागरिकों का सवाल उठाना स्वाभाविक है।

ऐसी स्थिति में संविधान में उल्लिखित समानता एक सुंदर घोषणा बनकर रह जाती है। न्याय की महानता उत्सवों की सजावट बन जाती है। कानून का शासन ऐसा आदर्श बनकर रह जाता है, जिसकी प्रशंसा तो सभी करते हैं, लेकिन जिसका अनुभव सभी को समान रूप से नहीं होता।

ऐसी परिस्थिति में बस इतना ही कहना है:

वाह, मेरे महान भारत!

अकूत संपत्ति, सामाजिक प्रतिष्ठा, जातिगत प्रभाव और धार्मिक वर्चस्व के कवच धारण किए हुए भाग्यशाली अपराधियो, तुम्हारी जय हो!

तुम्हारे रास्तों पर सुविधाओं के फूल खिलते रहें! तुम्हारे लिए चरित्र-परिवर्तन के दरवाजे खुले रहें! तुम्हारी सामाजिक प्रतिष्ठा पर खरोंच तक न आए!

न्याय की उदारता का अमृत तुम्हारे हिस्से में आता रहे! कानून की कठोरता का विष उन लोगों के हिस्से में खिसकता रहे, जिनके पास न धन है, न प्रभाव!

क्योंकि लोकतंत्र में सबको समान अवसर मिलने ही चाहिए, है न! और जिनके पास अवसर खरीदने के लिए पर्याप्त धन है, उनकी इस क्षमता को भी मान्यता क्यों न दी जाए!

मेरा भारत महान!

धनबल और प्रभाव को अपनी पूँजी बनाने वाले अपराधियो, तुम्हें सादर सलाम!

तुम्हारी सफलता के सामने न्याय की समानता की अवधारणा को बार-बार सिर झुकाने के लिए विवश न होना पड़े!

क्योंकि न्याय की समानता महज संविधान के पन्नों पर छपा कोई सुंदर वाक्य नहीं है। वह एक ऐसा लोकतांत्रिक मूल्य है, जिसे सत्ता, संपत्ति और जाति-धर्म के वर्चस्व से ऊपर उठकर प्रत्येक व्यक्ति को समान रूप से अनुभव करने का अवसर मिलना चाहिए।

इसी समानता को वास्तविकता में बदलना ही एक सच्ची न्यायिक व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा है।

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