पुस्तक मेला: पाठकों-लेखकों का उत्सव या सिर्फ़ एक व्यावसायिक बाज़ार?

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पुस्तक मेला पाठकों और लेखकों का उत्सव है या सिर्फ़ व्यावसायिक आयोजन? जानिए हिंदी साहित्य, छोटे प्रकाशकों और पठन-संस्कृति पर मेलों का असर।

पुस्तक मेला: पाठकों-लेखकों का उत्सव या सिर्फ़ एक व्यावसायिक बाज़ार?

हर साल जनवरी की ठंड में दिल्ली के प्रगति मैदान में, फरवरी में कोलकाता की सर्द हवा के बीच या चेन्नई और हैदराबाद के मैदानों में जब पुस्तक मेले सजते हैं, तो एक अजीब-सा उत्साह वातावरण में घुल जाता है। हजारों लोग कतार में खड़े होते हैं, बच्चे अपने माता-पिता की उँगली थामे रंग-बिरंगी बाल-पुस्तकों के स्टॉल की ओर खिंचे चले जाते हैं, कोई बुज़ुर्ग पाठक वर्षों पहले पढ़ी किसी पुस्तक का नया संस्करण खोजता दिखता है, और किसी कोने में कोई नया लेखक अपनी पहली किताब के विमोचन पर संकोच और गर्व के मिले-जुले भाव से खड़ा होता है। यह दृश्य देखकर सहज ही प्रश्न उठता है कि क्या पुस्तक मेला वास्तव में पढ़ने-लिखने की संस्कृति का उत्सव है, या यह बाज़ार का एक और सुनियोजित आयोजन बनकर रह गया है जहाँ किताब भी अन्य वस्तुओं की तरह बस बिकने वाला उत्पाद है?

इस प्रश्न का उत्तर किसी एक पक्ष में देना कठिन है, क्योंकि सच्चाई दोनों के बीच कहीं बसती है। पुस्तक मेला एक साथ उत्सव भी है और बाज़ार भी, और असली चुनौती इन दोनों के संतुलन को बनाए रखने की है।

उत्सव की परंपरा और उसका महत्त्व

पुस्तक मेला: पाठकों-लेखकों का उत्सव या सिर्फ़ एक व्यावसायिक बाज़ार?
पुस्तक मेलों की जड़ें बहुत पुरानी हैं। यूरोप में फ्रैंकफर्ट का पुस्तक मेला सदियों पुरानी परंपरा का वाहक है, जहाँ मुद्रण के आरंभिक दिनों से ही प्रकाशक और विक्रेता एकत्र होते थे। भारत में विश्व पुस्तक मेले की शुरुआत 1972 में हुई, जब राष्ट्रीय पुस्तक न्यास ने दिल्ली में इसका आयोजन किया। तब से यह आयोजन भारतीय बौद्धिक जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया। कोलकाता का अंतरराष्ट्रीय पुस्तक मेला तो एशिया के सबसे बड़े पुस्तक आयोजनों में गिना जाता है, जहाँ बंगाल की साहित्य-प्रेमी चेतना अपने पूरे वैभव के साथ दिखाई देती है। वहाँ किताबें खरीदना केवल लेन-देन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक अनुष्ठान जैसा लगता है।

उत्सव के रूप में पुस्तक मेले का सबसे बड़ा योगदान यह है कि वह पाठक को किताब के साथ आमने-सामने का अनुभव देता है। ऑनलाइन खरीदारी में हम वही किताब खरीदते हैं जिसे हम पहले से जानते हैं या जिसे एल्गोरिदम हमारे सामने रख देता है। मेले में स्थिति उलट होती है। यहाँ आप अनजानी अलमारियों के बीच भटकते हुए किसी ऐसी पुस्तक से टकरा जाते हैं जिसकी आपने कल्पना भी नहीं की थी। पन्ने पलटना, आवरण को छूना, कुछ पंक्तियाँ खड़े-खड़े पढ़ लेना और फिर उसे थैले में डाल लेना, यह अनुभव किसी डिजिटल स्क्रीन पर संभव नहीं। यही संयोगवश होने वाली खोज साहित्य के प्रति नई रुचि जगाती है।

लेखक और पाठक का संवाद

पुस्तक मेले का दूसरा बड़ा आकर्षण लेखक और पाठक के बीच सीधा संवाद है। सामान्य दिनों में लेखक एक दूरस्थ नाम होता है, जो किताब के आवरण पर छपा रहता है। मेले में वही लेखक मंच पर बैठकर अपनी रचना-प्रक्रिया के बारे में बताता है, पाठकों के प्रश्नों के उत्तर देता है और हस्ताक्षर करके पुस्तक पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। इस संवाद से पाठक को रचना की पृष्ठभूमि समझने का अवसर मिलता है और लेखक को यह जानने का कि उसका लिखा हुआ पाठकों के मन में किस रूप में उतरा है।

हिंदी जैसी भाषाओं के लिए यह संवाद और भी महत्त्वपूर्ण है। हिंदी साहित्य के सामने पाठकों की घटती संख्या, अंग्रेज़ी के बढ़ते प्रभाव और प्रकाशन उद्योग की कठिनाइयों जैसी अनेक चुनौतियाँ हैं। ऐसे समय में पुस्तक मेले वे मंच हैं जहाँ नई पीढ़ी को हिंदी की रचनाओं से जोड़ा जा सकता है। विमोचन समारोह, कविता-पाठ, कहानी-सत्र, परिचर्चाएँ और बाल-साहित्य की कार्यशालाएँ भाषा को जीवित और गतिशील बनाए रखती हैं। दक्षिण भारत जैसे क्षेत्रों में, जहाँ हिंदी पाठक अपेक्षाकृत सीमित हैं, ऐसे आयोजन हिंदी को नया पाठक-वर्ग दिलाने में विशेष भूमिका निभाते हैं।

छोटे प्रकाशकों और नए लेखकों के लिए अवसर

पुस्तक मेला उन छोटे प्रकाशकों के लिए भी वरदान है जिनके पास बड़े वितरण-तंत्र नहीं होते। बड़ी प्रकाशन संस्थाएँ तो पुस्तक-विक्रेताओं की अलमारियों में जगह बना लेती हैं, पर छोटे प्रकाशकों की अच्छी पुस्तकें अक्सर पाठकों तक पहुँच ही नहीं पातीं। मेले में एक छोटा-सा स्टॉल भी उन्हें सीधे पाठकों से जोड़ देता है। इसी प्रकार पहली बार लिखने वाले लेखकों के लिए मेला एक ऐसा मंच है जहाँ उनकी पुस्तक का विमोचन हो सकता है, उन पर चर्चा हो सकती है और उन्हें पहचान मिल सकती है। कितने ही लेखकों की साहित्यिक यात्रा किसी पुस्तक मेले के छोटे-से सत्र से आरंभ हुई है।

बाज़ार का दबाव और बदलती प्राथमिकताएँ

परंतु इस उजले चित्र का एक दूसरा पहलू भी है, और उसे अनदेखा करना ईमानदारी नहीं होगी। पुस्तक मेला अंततः एक ऐसा आयोजन है जिसमें बड़ी पूँजी लगती है। स्टॉल का किराया, प्रचार का खर्च, परिवहन और सजावट, इन सबका बोझ प्रकाशकों पर पड़ता है, और उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि वे बिक्री के माध्यम से इसकी भरपाई करें। परिणामस्वरूप जो पुस्तकें तुरंत बिकती हैं, वे सामने रखी जाती हैं और जिनकी माँग कम होती है, वे पीछे सरका दी जाती हैं। गंभीर शोध-ग्रंथ, अनुवाद, कविता-संग्रह या प्रयोगधर्मी साहित्य अक्सर लोकप्रिय उपन्यासों, प्रेरक पुस्तकों और आत्म-सहायता की किताबों की चमक के आगे फीके पड़ जाते हैं।

इसी बाज़ारी प्रवृत्ति का एक रूप यह भी है कि मेलों में अब सेलिब्रिटी संस्कृति हावी होती जा रही है। फ़िल्मी हस्तियों, सोशल मीडिया के चर्चित चेहरों और यूट्यूबरों की पुस्तकें भीड़ खींचती हैं, जबकि गंभीर लेखक अपने सत्रों में कुछ गिने-चुने श्रोताओं से संतोष कर लेते हैं। कई बार यह देखकर पीड़ा होती है कि किसी प्रसिद्ध चेहरे के साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए घंटों कतार लगती है, पर उसी परिसर में किसी वरिष्ठ साहित्यकार का व्याख्यान खाली कुर्सियों के सामने संपन्न हो जाता है। सेल्फ़ी की होड़ में किताब कहीं पीछे छूट जाती है और मेला 'पढ़ने' का नहीं, 'दिखने' का अवसर बन जाता है।

छूट और रियायतों का प्रश्न भी विचारणीय है। मेलों में पाठकों को अच्छी छूट मिलती है, जो उन्हें सुखद लगती है, किंतु इसी छूट के कारण कई बार स्थानीय पुस्तक-विक्रेताओं का व्यवसाय प्रभावित होता है। साथ ही, कुछ पाठक किताबें पढ़ने के लिए कम और संग्रह करने के लिए अधिक खरीदते हैं। थैले भरकर किताबें घर ले जाई जाती हैं, पर वे वर्षों तक अलमारियों में अनखुली पड़ी रहती हैं। यह प्रवृत्ति पुस्तक-प्रेम की नहीं, बल्कि खरीदारी के उत्साह की उपज होती है।

संतुलन की खोज

तो क्या पुस्तक मेले को केवल बाज़ार कह देना उचित होगा? मेरे विचार से नहीं। बाज़ार का होना अपने-आप में बुराई नहीं है। किताबें लिखी जाती हैं, छपती हैं और उन्हें पाठकों तक पहुँचाने के लिए एक तंत्र की आवश्यकता होती है। यदि लेखक और प्रकाशक को उनके श्रम का उचित प्रतिफल न मिले, तो साहित्य का सृजन ही ठप हो जाएगा। इसलिए व्यावसायिकता पुस्तक-संस्कृति की शत्रु नहीं, बल्कि उसकी आवश्यक शर्त है। समस्या तब पैदा होती है जब व्यावसायिकता साधन न रहकर साध्य बन जाती है और मेले का मूल उद्देश्य, यानी पढ़ने की संस्कृति का संवर्धन, गौण हो जाता है।

इस संतुलन को साधने के लिए आयोजकों की भूमिका निर्णायक है। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि साहित्यिक सत्रों को केवल औपचारिकता न समझा जाए, बल्कि उन्हें सुविधाजनक समय, उपयुक्त स्थान और समुचित प्रचार मिले। छोटे प्रकाशकों और भारतीय भाषाओं के प्रकाशकों के लिए स्टॉल की दरों में रियायत दी जानी चाहिए, ताकि मेला केवल बड़े घरानों का मंच न बन जाए। स्कूलों और कॉलेजों के विद्यार्थियों को मेले तक लाने के संगठित प्रयास होने चाहिए, ताकि वे किताबों की दुनिया से परिचित हो सकें। बाल-साहित्य और किशोर-साहित्य के लिए अलग मंडप तथा पठन-कार्यशालाएँ नई पीढ़ी में पढ़ने की आदत डाल सकती हैं।

पाठकों का दायित्व भी कम नहीं है। यदि हम केवल लोकप्रियता के पीछे भागेंगे, तो बाज़ार वही परोसेगा जो हमारी माँग होगी। यदि हम गंभीर और नई तरह की रचनाओं की माँग करेंगे, उन्हें खरीदेंगे और उन पर चर्चा करेंगे, तो प्रकाशक भी उन्हें छापने का साहस जुटाएँगे। पाठक की रुचि ही अंततः बाज़ार की दिशा तय करती है।

निष्कर्ष

पुस्तक मेला दरअसल एक दर्पण है जिसमें हमारे समाज की पठन-संस्कृति का असली चेहरा दिखाई देता है। यदि वहाँ किताबों पर बातचीत हो रही है, बच्चे कहानियों में डूबे हैं, नए लेखक सुने जा रहे हैं और गंभीर साहित्य के लिए भी जगह है, तो वह निस्संदेह पाठकों और लेखकों का उत्सव है। यदि वहाँ केवल बिक्री के आँकड़े, प्रचार की चकाचौंध और तस्वीरों की होड़ शेष रह जाए, तो वह बाज़ार का एक और मेला भर है।

सच यह है कि पुस्तक मेला दोनों ही हो सकता है, और उसे दोनों ही होना भी चाहिए। उत्सव की आत्मा और बाज़ार की व्यावहारिकता, जब ये दोनों साथ चलती हैं, तभी पुस्तक मेला अपनी सार्थकता सिद्ध करता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम आयोजक, प्रकाशक, लेखक और पाठक, सब मिलकर यह सुनिश्चित करें कि किताबों के इस मेले में किताब ही केंद्र में रहे।जिस दिन मेले से लौटता हर पाठक थैले के साथ-साथ मन में भी कुछ नया लेकर लौटेगा, उसी दिन हम कह सकेंगे कि पुस्तक मेला अपने सच्चे स्वरूप में जीवित है।

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