प्रत्येक जीवन की अंतिम समस्या उसी के भीतर निहित है; और उसका अंतिम समाधान भी।
मनुष्य की मुक्ति : अपने भीतर की यात्रा
प्रत्येक जीवन की अंतिम समस्या उसी के भीतर निहित है; और उसका अंतिम समाधान भी। बाहर की परिस्थितियाँ केवल उन समस्याओं को आकार देती हैं, जिन्हें भीतर की चेतना अपने ढंग से अनुभव करती है। इसीलिए दो मनुष्य एक ही दुःख से गुजरकर भी एक ही प्रकार से पीड़ित नहीं होते, और एक ही परिस्थिति से निकलकर एक ही मुक्ति तक नहीं पहुँचते। प्रत्येक प्राण अपने अनुभव, स्मृति, वासना, भय, स्वप्न, विवेक और चेतना की विशिष्ट संरचना में एक अलग ब्रह्मांड है।
यही कारण है कि किसी भी दर्शन की सार्वभौमिक मुक्ति-योजना पर संदेह करना आवश्यक है।
दर्शन मार्ग का संकेत दे सकता है, प्रश्न को तीक्ष्ण कर सकता है, अंधकार में एक दिशा खोल सकता है; लेकिन वह किसी दूसरे मनुष्य के भीतर जाकर उसकी अंतिम गाँठ नहीं खोल सकता। धर्म, गुरु, ग्रंथ, विचारधारा या क्रांति किसी मनुष्य को एक निर्धारित साँचे में ढाल सकती है, पर उसके अस्तित्व की विशिष्ट समस्या का अंतिम समाधान उसके स्थान पर नहीं कर सकती।
अंततः प्रत्येक व्यक्ति को अपनी मुक्ति के लिए स्वयं उतरना पड़ता है।
सबसे पहले उसे अपने भीतर के आकाश और मिट्टी का सामंजस्य स्थापित करना होगा।
मनुष्य का मस्तिष्क एक नभोमंडल है। उसमें विचारों के ग्रह हैं, स्मृतियों के धूमकेतु हैं, इच्छाओं के नक्षत्र हैं और अज्ञात के अनगिनत अंधकार हैं। लेकिन यही मनुष्य शरीर नामक मिट्टी में भी बँधा हुआ है। रक्त, भूख, कामना, भय, रोग, श्रम और मृत्यु उसके अस्तित्व की भौतिक सीमाएँ निर्धारित करते हैं।
एक ओर आकाश उसे असीम होने का स्वप्न देता है; दूसरी ओर मिट्टी उसे उसकी सीमितता का स्मरण कराती रहती है।
मनुष्य इसी तनाव का नाम है।
वह पशुता से ऊपर उठना चाहता है, लेकिन पशुता उसके शरीर में जीवित है। वह देवत्व की ओर देखता है, लेकिन देवत्व उसकी उपलब्धि नहीं, उसकी कल्पना है। वह न्याय चाहता है, पर अन्याय की संभावना भी उसी के भीतर रहती है। वह प्रेम की घोषणा करता है और हिंसा का इतिहास रचता है। वह स्वतंत्रता की आकांक्षा करता है और स्वयं अपने लिए बंधन निर्मित करता है।
इसलिए मनुष्य का संकट बाहर से अधिक भीतर का संकट है।
परंतु इस आंतरिक सामंजस्य के मार्ग में केवल उसकी अपनी वृत्तियाँ ही बाधक नहीं हैं। उसके ऊपर दो विराट सत्ताएँ निरंतर दबाव बनाए रखती हैं: प्रकृति की पाशविक सत्ता और अधिभौतिक जगत की ईश्वरीय सत्ता।
प्रकृति उसे भूख, भय, कामना, प्रतिस्पर्धा, स्वार्थ और अस्तित्व-संघर्ष की आदिम भाषा में पुकारती है। दूसरी ओर, ऊपर का वह कल्पित या अनुभूत परमलोक उसे पूर्णता, पवित्रता, नैतिकता और अंतिम सत्य की ओर खींचता है।
एक शक्ति उसे मिट्टी की ओर खींचती है; दूसरी उसे आकाश की ओर।
मनुष्य दोनों के बीच खड़ा है।
और उसकी मुक्ति शायद किसी एक को चुन लेने में नहीं, बल्कि दोनों के दबाव के बीच अपनी स्वतंत्र चेतना की भूमि निर्मित करने में है।
इसी बिंदु पर नैतिकता का विराट संसार उसके सामने खड़ा हो जाता है।
न्याय और अन्याय, धर्म और अधर्म, पुण्य और पाप, सुगंध और दुर्गंध, शुभ और अशुभ, उचित और अनुचित जैसे असंख्य द्वंद्व मनुष्य के चारों ओर अपनी सीमाएँ खींचते रहते हैं। पीढ़ियाँ इन सीमाओं को विरासत में देती हैं; समाज उन्हें नियमों में बदलता है; धर्म उन्हें पवित्रता प्रदान करता है; सत्ता उन्हें कानून में ढालती है और इतिहास उन्हें सत्य का रूप देने की कोशिश करता है।
इन सबको एक विराट महाकाल-वृक्ष की तरह देखा जा सकता है।
उसकी जड़ें अतीत में हैं।
उसका तना परंपरा है।
उसकी शाखाएँ धर्म, नैतिकता, सामाजिक व्यवस्था और सत्ता हैं।
उसकी पत्तियों पर न जाने कितने युगों के निर्णय काँपते रहते हैं।
किसी शाखा पर ‘न्याय’ लिखा है, तो दूसरी पर ‘अन्याय’; कहीं ‘पवित्रता’ है, कहीं ‘अपवित्रता’; कहीं सुगंध है, कहीं दुर्गंध।
मनुष्य जन्म लेते ही इस वृक्ष की छाया में आ जाता है।
वह स्वयं तय करने से पहले ही बहुत कुछ ‘सही’ और ‘गलत’ जान चुका होता है। वह यह भी सीख चुका होता है कि किसे प्रेम करना है, किससे घृणा करनी है, किसे सम्मान देना है, किससे दूरी रखनी है, किस विचार को पवित्र मानना है और किस प्रश्न को पूछना भी अपराध समझना है।
इसलिए मुक्ति का अर्थ इस महाकाल-वृक्ष को जड़ से उखाड़ देना नहीं है। वह न संभव है, न आवश्यक।
आवश्यक है उससे पर्याप्त दूरी बनाना।
क्योंकि वृक्ष की छाया में पूरी तरह विलीन हो जाना आत्मविलोप है; और वृक्ष से पूरी तरह भाग जाना भी संभवतः आत्मप्रवंचना। मनुष्य को उसके नीचे रहकर भी उसकी छाया को अपना आकाश समझने से बचना होगा।
उसे अपनी अंतःभूमि की सीमा विस्तृत करनी होगी।
वही उसका स्वतंत्र प्रदेश होगा।
वहाँ समाज की आवाज़ अंतिम आवाज़ नहीं होगी, धर्म का आदेश अंतिम सत्य नहीं होगा, परंपरा अंतिम प्रमाण नहीं होगी और स्वयं का अहंकार भी अंतिम न्यायाधीश नहीं होगा।
यही स्वतंत्र अंतर्वास है।
अपने भीतर अपना घर बनाना।
लेकिन इस घर की पहली शर्त है प्रश्न।
“मुझे यह सत्य क्यों मानना चाहिए?”
“यह नैतिकता मेरी अपनी है या मुझे विरासत में मिली है?”
“जिसे मैं पाप कहता हूँ, क्या वह वास्तव में पाप है, या किसी युग की सामाजिक सुविधा?”
“जिसे मैं धर्म समझता हूँ, उसमें कितना मेरा अनुभव है और कितना दूसरों का आदेश?”
“मेरी इच्छा सचमुच मेरी है, या प्रकृति और समाज ने मिलकर उसे मेरे भीतर पैदा किया है?”
ऐसे प्रश्न मनुष्य को किसी निश्चित उत्तर तक नहीं, बल्कि अपनी चेतना की ओर ले जाते हैं।
यही कारण है कि मुक्ति का कोई एक राजमार्ग नहीं हो सकता।
किसी के लिए ज्ञान उसका द्वार हो सकता है, किसी के लिए प्रेम, किसी के लिए कला, किसी के लिए मौन, किसी के लिए विद्रोह और किसी के लिए अपने ही अहंकार का विघटन। कोई संसार को बदलते हुए स्वयं को खोजता है; कोई स्वयं को बदलते हुए संसार को नए ढंग से देखता है।
लेकिन दूसरे के लिए निर्धारित मार्ग पर चलकर अपनी मुक्ति प्राप्त करने की संभावना अत्यंत सीमित है।
क्योंकि मुक्ति उधार नहीं ली जा सकती।
यहीं एक व्यंग्यात्मक भाषिक कल्पना उपयोगी हो सकती है।
मनुष्य को वानर-वंश से विकसित जीव मानना विज्ञान का विषय है; लेकिन ‘वानर’ शब्द को लेकर एक दार्शनिक शब्द-खेल किया जा सकता है। ‘वानर’ में ‘नर’ के आगे ‘वा’ है। यदि कल्पना में उस ‘वा’ को मनुष्य की पराधीनता, अनुकरण और झुंड-चेतना का प्रतीक मानें, तो एक विचित्र सूत्र बनता है:
वानर − ‘वा’ = नर।
यह व्युत्पत्ति नहीं है; यह केवल एक दार्शनिक रूपक है।
‘वा’ यहाँ उस अतिरिक्त बोझ का नाम है, जो मनुष्य को स्वयं होने से रोकता है: भीड़ का अनुकरण, विरासत में मिले सत्य का अंधस्वीकार, समूह की मानसिकता, बिना सोचे दोहराई जाने वाली नैतिकता और अपनी स्वतंत्र चेतना को सामूहिक निर्णय के हवाले कर देना।
जब ‘वा’ गिरता है, तब ‘नर’ बचता है।
और यही बात ‘नारी’ पर भी लागू की जा सकती है। यहाँ नर और नारी जैविक श्रेष्ठता या हीनता के प्रतीक नहीं, बल्कि स्वतंत्र अस्तित्व के प्रतीक हैं। दोनों के लिए मुक्ति की पहली शर्त वही है: अपने भीतर आरोपित ‘वा’ को पहचानना।
क्योंकि ‘वा’ केवल भीड़ नहीं है।
अहंकार भी ‘वा’ है।
कट्टरता भी ‘वा’ है।
अपने सत्य को अंतिम सत्य समझ लेना भी ‘वा’ है।
दूसरे की स्वतंत्रता को नकारना भी ‘वा’ है।
और स्वयं को पूर्णतः निर्दोष समझ लेना भी ‘वा’ है।
इसलिए ‘वा’ को हटाना किसी एक विचारधारा या किसी एक सामाजिक संरचना से मुक्ति नहीं, बल्कि निरंतर आत्म-परीक्षण है।
मनुष्य हर दिन अपने भीतर से कोई न कोई ‘वा’ गिरा सकता है।
एक पूर्वाग्रह गिरता है।
एक अंधविश्वास गिरता है।
एक भय गिरता है।
एक borrowed सत्य गिरता है।
एक झूठी पहचान गिरती है।
और तब ‘नर’ थोड़ा और स्पष्ट होता है।
इस अर्थ में मनुष्य बनना कोई पूर्णता प्राप्त कर लेना नहीं है। यह अपने भीतर से उन परतों को हटाते जाना है, जो उसे स्वयं से दूर करती हैं।
मुक्ति कोई तैयार वस्तु नहीं, न कोई अंतिम प्रमाणपत्र।
वह एक सतत प्रक्रिया है।
मनुष्य को अपनी मिट्टी से भागना नहीं है और अपने आकाश में खो जाना भी नहीं है। उसे दोनों के बीच एक जीवित संतुलन बनाना है। प्रकृति की शक्तियों को पहचानना है, पर उनका दास नहीं बनना है। ईश्वरीय सत्ता की कल्पना करनी है तो करनी है, पर उसके नाम पर अपनी विवेक-स्वतंत्रता का परित्याग नहीं करना है। महाकाल-वृक्ष को पहचानना है, उसकी जड़ों का इतिहास समझना है, उसकी छाया का उपयोग करना है, लेकिन उसकी शाखाओं पर लटके प्रत्येक नैतिक निर्णय को अंतिम सत्य मानने से बचना है।
अंततः मनुष्य को अपने लिए एक ऐसी अंतःभूमि बनानी होगी जहाँ वह न पूर्णतः प्रकृति का दास हो, न किसी परम सत्ता का अंध-अनुयायी; न भीड़ का अंग मात्र हो, न अपने अहंकार का देवता।
वहीं उसकी स्वतंत्रता का आरंभ है।
वहीं ‘वा’ के झरने की संभावना है।
और शायद वहीं से वानर का रूपक पीछे छूटकर नर और नारी की स्वतंत्र मनुष्यता सामने आती है।
मनुष्य की अंतिम मुक्ति शायद संसार से बाहर निकलने में नहीं, बल्कि संसार की असंख्य आवाज़ों के बीच अपनी मौलिक आवाज़ पहचानने में है।
महाकाल-वृक्ष खड़ा रहेगा।
न्याय और अन्याय की शाखाएँ फैलती रहेंगी।
सुगंध और दुर्गंध आती-जाती रहेंगी।
प्रकृति अपनी पाशविक भाषा बोलती रहेगी।
आकाश अपनी ईश्वरीय पुकार करता रहेगा।
इन सबके बीच मनुष्य को अपना छोटा-सा स्वतंत्र प्रदेश निर्मित करना है।
इतना कि वह कह सके:
यह मेरा अंतःआकाश है।
यह मेरी अंतःभूमि है।
और यहाँ प्रवेश करने से पहले मुझे स्वयं से अनुमति लेनी होगी।
क्योंकि मनुष्य का अंतिम घर बाहर कहीं नहीं है।
उसे अपने भीतर ही निर्मित करना होगा।
- बिनॉय एम. बी.,
फ्लैट नंबर: 5,डोर नंबर: 12/602/8
प्रथम तल,चेलूर सेवेंथ एवेन्यू
कोरप्पथ लेन,राउंड नॉर्थ
त्रिशूर - 680001,केरल
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