खड़ी बोली का उदय : ब्रज और अवधी से खड़ी बोली गद्य तक का सफर हिंदी भाषा का इतिहास वास्तव में अनेक बोलियों के संगम और संघर्ष की कहानी है।
खड़ी बोली का उदय : ब्रज और अवधी से खड़ी बोली गद्य तक का सफर
हिंदी भाषा का इतिहास वास्तव में अनेक बोलियों के संगम और संघर्ष की कहानी है। जिस भाषा को आज हम मानक हिंदी के रूप में जानते हैं, वह अचानक प्रकट नहीं हुई, बल्कि सदियों की साहित्यिक परंपराओं, सामाजिक परिवर्तनों और भाषिक आवश्यकताओं से होकर गुजरते हुए धीरे-धीरे आकार लेती गई। इस लंबी यात्रा में ब्रजभाषा और अवधी का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है, क्योंकि मध्यकाल में यही दोनों बोलियाँ काव्य की मुख्य वाहिका बनीं, जबकि खड़ी बोली को अंततः गद्य और आधुनिक साहित्य की भाषा के रूप में स्वीकार किया गया। यह परिवर्तन कैसे और क्यों हुआ, इसे समझने के लिए हमें भारतीय भाषाओं के विकास क्रम, भक्ति आंदोलन के प्रभाव और आधुनिक काल की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों पर विस्तार से दृष्टि डालनी होगी।
ब्रजभाषा और अवधी: मध्यकालीन काव्य की समृद्ध परंपरा
हिंदी प्रदेश में बोली जाने वाली अनेक उपभाषाओं में ब्रजभाषा और अवधी का साहित्यिक इतिहास अत्यंत समृद्ध रहा है। ब्रजभाषा, जो मथुरा-वृंदावन के आसपास के क्षेत्र में बोली जाती थी, भक्ति काल में कृष्ण भक्ति काव्य की प्रमुख भाषा बनी। सूरदास जैसे महाकवि ने इसी भाषा में सूरसागर की रचना करके कृष्ण की बाल लीलाओं और प्रेम भावनाओं को अमर बना दिया। इसके साथ ही रीतिकालीन कवियों, जैसे बिहारी, केशवदास और घनानंद ने भी ब्रजभाषा को शृंगार रस और अलंकार प्रधान काव्य की उत्कृष्ट भाषा के रूप में स्थापित किया। दूसरी ओर अवधी, जो अवध क्षेत्र यानी आज के पूर्वी उत्तर प्रदेश में प्रचलित थी, सूफी और राम भक्ति काव्य की भाषा बनी। मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत जैसी कालजयी प्रेम-कथा अवधी में लिखी, तो वहीं गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना करके अवधी को जन-जन की आस्था और भक्ति भावना से जोड़ दिया। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि मध्यकाल में काव्य रचना के लिए इन्हीं दोनों बोलियों को सर्वाधिक सम्मान प्राप्त था, और खड़ी बोली उस समय तक मुख्यतः बोलचाल की भाषा के रूप में ही सीमित थी, जिसे साहित्यिक गरिमा प्रदान करने का प्रयास बहुत कम हुआ था।
खड़ी बोली का उद्गम और आरंभिक स्थिति
खड़ी बोली का उद्गम स्थल दिल्ली, मेरठ और आसपास के गंगा-यमुना दोआब का क्षेत्र माना जाता है। यह वह भाषा थी जो सामान्य जनजीवन में, बाजारों में, प्रशासनिक कार्यों में और विभिन्न समुदायों के आपसी संवाद में प्रयुक्त होती थी। दिलचस्प बात यह है कि खड़ी बोली का सबसे पहला साहित्यिक प्रयोग अमीर खुसरो जैसे कवि ने तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दी में ही कर दिया था, जब उन्होंने पहेलियों, मुकरियों और दोहों की रचना इसी भाषा में की। परंतु इसके बावजूद खड़ी बोली को काव्य की मुख्यधारा में वह स्थान नहीं मिल सका जो ब्रज और अवधी को प्राप्त था। इसका एक बड़ा कारण यह था कि भक्ति आंदोलन के कवियों ने अपनी भावनाओं की सहज और मधुर अभिव्यक्ति के लिए उन्हीं बोलियों को चुना जिनमें लोकगीतों, लोककथाओं और सांस्कृतिक स्मृतियों की गहरी जड़ें पहले से मौजूद थीं। खड़ी बोली अपने स्वभाव में अधिक सपाट और व्यावहारिक थी, इसलिए वह भावुक काव्य रचना के लिए उतनी उपयुक्त नहीं समझी गई जितनी दैनिक व्यवहार और गद्यात्मक अभिव्यक्ति के लिए थी।
फोर्ट विलियम कॉलेज और गद्य लेखन की शुरुआत
अठारहवीं शताब्दी के अंत और उन्नीसवीं शताब्दी के आरंभ में भारत की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों में बड़ा परिवर्तन आया, जिसका सीधा प्रभाव भाषा के विकास पर भी पड़ा। अंग्रेजों के आगमन और उनके प्रशासनिक तंत्र के विस्तार के साथ ही एक ऐसी भाषा की आवश्यकता महसूस होने लगी जो सरल, स्पष्ट और गद्य लेखन के अनुकूल हो। इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए सन् 1800 में कोलकाता में फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना हुई, जहाँ भारतीय भाषाओं में प्रशासनिक और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए गद्य साहित्य तैयार करने का कार्य आरंभ हुआ। इसी कॉलेज में लल्लू लाल ने खड़ी बोली में प्रेमसागर की रचना की, जो हिंदी गद्य के आरंभिक और महत्वपूर्ण उदाहरणों में गिना जाता है। इसके साथ ही सदल मिश्र ने नासिकेतोपाख्यान लिखा। ये रचनाएँ भले ही साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत उच्चकोटि की न मानी जाती हों, परंतु इन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि खड़ी बोली गद्य लेखन के लिए एक सक्षम और उपयुक्त माध्यम बन सकती है।
भारतेंदु युग और द्विवेदी युग: गद्य का मानकीकरण
उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में भारतेंदु हरिश्चंद्र के आगमन के साथ खड़ी बोली गद्य के विकास को एक नई दिशा और गति मिली। भारतेंदु ने न केवल नाटक, निबंध और पत्रकारिता के क्षेत्र में खड़ी बोली का व्यापक प्रयोग किया, बल्कि उन्होंने इस भाषा को सामाजिक सुधार, राष्ट्रीय चेतना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम भी बनाया। इसी काल को हिंदी साहित्य के इतिहास में भारतेंदु युग के नाम से जाना जाता है, और इसे आधुनिक हिंदी गद्य की वास्तविक नींव माना जाता है। इसके पश्चात द्विवेदी युग में महावीर प्रसाद द्विवेदी ने सरस्वती पत्रिका के माध्यम से खड़ी बोली को व्याकरणिक शुद्धता और भाषिक अनुशासन प्रदान किया। उन्होंने भाषा की एकरूपता पर विशेष बल दिया और यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि हिंदी गद्य में प्रयुक्त खड़ी बोली स्थान-स्थान पर बदलती हुई अनगढ़ भाषा न रहकर एक व्यवस्थित और मानकीकृत रूप धारण कर ले।
काव्य में खड़ी बोली की स्वीकृति: छायावाद युग
यह ध्यान देने योग्य बात है कि खड़ी बोली के गद्य के रूप में स्थापित होने के बावजूद पद्य रचना में लंबे समय तक ब्रजभाषा का प्रभुत्व बना रहा। उन्नीसवीं शताब्दी के अंत तक भी अधिकांश कवि काव्य रचना के लिए ब्रजभाषा को ही प्राथमिकता देते रहे, क्योंकि वह भाषा शताब्दियों से काव्यात्मक सौंदर्य और लयात्मकता से जुड़ी हुई थी। परंतु बीसवीं शताब्दी के आरंभ में जब छायावाद और उसके बाद के काव्य आंदोलनों ने जन्म लिया, तब कविता में भी खड़ी बोली को अपनाया जाने लगा। जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा जैसे कवियों ने खड़ी बोली में ही अपनी काव्य रचनाएँ प्रस्तुत कीं, जिससे यह भाषा गद्य के साथ-साथ पद्य के क्षेत्र में भी पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित हो गई।
निष्कर्ष: तीन बोलियों का संगम
इस प्रकार खड़ी बोली का यह सफर, जो कभी दिल्ली-मेरठ क्षेत्र की एक साधारण बोलचाल की भाषा मात्र थी, अंततः संपूर्ण भारत की राष्ट्रभाषा और आधुनिक साहित्य की मुख्य वाहिका बनने तक पहुँचा, अत्यंत रोचक और शिक्षाप्रद है। ब्रज और अवधी ने जहाँ मध्यकालीन भक्ति और शृंगार काव्य को अपनी माधुर्यपूर्ण अभिव्यक्ति से समृद्ध किया, वहीं खड़ी बोली ने आधुनिक युग की आवश्यकताओं—स्पष्टता, तर्कशीलता, वैज्ञानिक चिंतन और सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति—को पूरा करने का दायित्व निभाया। यही कारण है कि आज जब हम हिंदी भाषा और साहित्य की बात करते हैं, तो हमें इन तीनों बोलियों के योगदान को समग्रता में समझना आवश्यक हो जाता है, क्योंकि वर्तमान हिंदी वास्तव में इन्हीं भाषिक धाराओं के संगम से निर्मित एक समृद्ध और बहुआयामी भाषा है।


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