गीता और प्रबंधन: युद्ध के मैदान से जीवन प्रबंधन तक

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गीता वर्तमान में सबसे अधिक छपने, सबसे अधिक बिकने, सबसे अधिक अनुदित होने और सबसे अधिक चर्चित होने वाली पुस्तकों में से एक है।

गीता : प्रबंधन ग्रंथ के रूप में


गीता वर्तमान में सबसे अधिक छपने, सबसे अधिक बिकने, सबसे अधिक अनुदित होने और सबसे अधिक चर्चित होने वाली पुस्तकों में से एक है। गीता के अनुयायी गीता को एक पुस्तक नहीं, धार्मिक ग्रंथ मानते हैं। उसका पाठ करके अपने आपको धन्य मानते हैं। वे गीता पाठ करके परलोक सुधार रहे हैं, ऐसा मानते हैं। मनुष्य यही सबसे बड़ी गलती करता है। अत्यंत महत्वपूर्ण व उपयोगी ग्रंथों को धार्मिक मानकर आचरण से बाहर कर देता है। यही गलती गीता के साथ हुई। गीता को धार्मिक ग्रन्थों की सूची में रखकर उसके वास्तविक व लौकिक लाभों से अपने आप को वंचित कर लिया।
 
आज प्रबंधन की बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ विदेशी किताबों से पढ़ाई जाती हैं। पीटर ड्रकर, एफ. डबल्यू. टेलर, स्टीफन कोवी, साइमन सिनेक आदि प्रबंध शास्त्रियों पर फोकस किया जाता है। हम पत्तों की चमक को लेकर प्रबंधन पर काम करते हैं, किन्तु 5000 वर्ष पहले कुरुक्षेत्र के मैदान में जो प्रबंधन-सूत्र दिया गया; उसे भुला बैठे हैं। गीता प्रबंधन का आधार ग्रंथ है। गीता के प्रबंधन के सूत्र न केवल आज भी प्रासंगिक हैं, वरन किसी एमबीए के पाठयक्रम से भी महत्वपूर्ण व उपयोगी हैं। गीता के रूप में प्रबंधन दुनिया के बड़े से बड़े पाठयक्रमों से भी बड़ा है।

गीता विश्वस्तरीय, विश्वसनीय व सर्व स्वीकृत  धर्मग्रंथ तो है ही, साथ ही, वह दुनिया का पहला और सबसे सफल मैनेजमेंट मैनुअल भी है। श्री कृष्ण दुनिया के प्रथम प्रबंधन गुरु हैं, जिन्होंने अपने प्रबंधन सूत्र युद्ध के मैदान में दिए। श्री कृष्ण कोरे प्रबंधन उपदेशक नहीं थे, उन्होंने उन प्रबंधन सूत्रों का आत्मसातीकरण करके राजा न बनकर राज्यों का प्रबंधन किया। वे विकट से विकट परिस्थितियों में भी सभी समस्याओं का प्रबंधन करते हुए नियोजित परिणाम प्राप्त करते हैं। 
   
श्री कृष्ण का प्रबंधन कौशल अतुलनीय है। उनके प्रबंधन सूत्र केवल राज्य का ही नहीं मनुष्य का प्रबंधन करते हैं। मनुष्य का प्रबंधन सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि शेष सबका प्रबंधन मनुष्य को ही करना है। श्री कृष्ण के प्रबंधन कौशल को निम्न प्रकार समझा जा सकता है-

लक्ष्य का प्रबंधन (Goal Management)

गीता : प्रबंधन ग्रंथ के रूप में
सफलता के लिए एक लक्ष्य होना आवश्यक है। लक्ष्य के लिए योजना बनाकर क्रियान्वयन करके ही सफलता की ओर बढ़ा जा सकता है। अर्जुन के सामने लक्ष्य की ही समस्या है। अर्जुन की समस्या लक्ष्यहीनता नहीं, लक्ष्य-भ्रम थी। उसे अपना कर्तव्य दिख रहा था, पर मोह उसे रोक रहा था। कृष्ण ने पहला सूत्र दिया — धर्म पर लक्ष्य केंद्रित करो, भावना पर नहीं।

प्रबंधन का पहला नियम भी यही है — व्यक्तिगत पसंद से ऊपर संस्थागत लक्ष्य। संस्था या समाज व्यक्ति से ऊपर है। तभी तो कहा गया है-

त्यजेद एकं कुलंस्यार्थे, ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेद। 
ग्राम जनपदस्यार्थे, आत्मार्थे पृथ्वी त्यजेद।।
 
गीता में श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कर्म पर जोर देते हुए, मनुष्य को परिणाम से मुक्त रहने की सीख देते हैं। परिणाम की चिंता से मुक्त होकर ही कर्म पर केन्द्रित रहकर गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सकेगी। गीता का आधारभूत प्रबंधन सूत्र है- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।

समीक्षावाद के प्रतिपादक दार्शनिक कांट इसे कर्तव्य के लिए कर्तव्य कहते हैं। उनके अनुसार यदि कुछ पाने की चाह में कर्तव्य किया तो वह नैतिक नहीं है। अतः हमें कर्म केवल कर्तव्य की भावना से ही करना है। यह परिणाम केन्द्रित (Result Oriented)नहीं, प्रक्रिया केन्द्रित (Process Oriented) प्रबंधन है। फल आएगा, पर तुम्हारा अधिकार सिर्फ श्रेष्ठ प्रक्रिया पर है।

समय का प्रबंधन (Time Management)

समय(Time) व स्थान(space) विज्ञान और दर्शन में सबसे अधिक चर्चित विषयों में गिने जाते हैं।व्यक्ति का जीवन समय की एक धारा ही है। जन्म से लेकर मृत्यु तक का उपयोगी काल ही मनुष्य का वास्तविक जीवन है।

गीता कहती है — न भूत में जियो, न भविष्य की चिंता में मरो। वर्तमान को जिओ, निरंतर कर्मरत रहो। तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।जो होना है, वह होगा। जो बीत गया, वह गया। प्रबंधक का काम है — अभी को ठीक करना। चिंता समय(Time) की सबसे बड़ी चोरी है। प्रबंधक चिंता नहीं करता नियोजन व क्रियान्वयन कर अपने कर्तव्य का निर्वहन करता है। 

मन(स्व) का प्रबंधन (Self Management)

आधुनिक समय में प्रबंधन को लेकर कहा जाता है कि प्रबंधक केवल संसाधनों का ही प्रबंधन नहीं करता; संबंधों का भी प्रबंधन करता है। मन बाहरी संबंधों का ही नहीं, अपने संबंधों का भी आधार होता है। संबंधों के प्रबंधन का सबसे बड़ा कारखाना बाहर नहीं, अंदर है — मन।
            
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।अपना उद्धार तुम्हें खुद ही करना है। कोई मोटिवेशनल स्पीकर नहीं आएगा। गीता स्व-नेतृत्व (Self-Leadership)सिखाती है — इंद्रियों को नियंत्रित करो, तो स्व का नियंत्रण हो जाएगा। स्व का नियंत्रण होने पर पूरा संगठन नियंत्रित हो जाएगा।

टीम का प्रबंधन (Team Management)

प्रबंधन अपनी टीम को आदेश नहीं देता। वह संवाद करता है। कृष्ण ने कभी अर्जुन को आदेश नहीं दिया। उन्होंने प्रश्न, संवाद और तर्क से उसे स्वयं ही तैयार होने का अवसर प्रस्तुत किया। यही है भागीदारी प्रबंधन (Participative Leadership)। अर्जुन अपने किंकर्तव्यविमूढ़ पाता है। अर्जुन को लगा कि वह अकेला है, पर कृष्ण ने बताया — निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्।

तुम सिर्फ निमित्त हो, करने वाला कोई और है। तुझे तो अपनी भूमिका का, अपने कर्तव्य का निर्वहन करना है।  टीम व  प्रक्रिया का संचालन सुनिश्चित करना है। अहंकार छोड़ोगे, तभी टीम साथ चलेगी। कोई भी सफलता व्यक्ति को नहीं, टीम को मिलती है। टीम को ही श्रेय देना अच्छे अभिप्रेरक का काम है।
 

संकट का प्रबंधन (Crisis Management)

सामान्य समय में प्रबंधन कौशल की परीक्षा नहीं होती, वास्तविक रूप से प्रबंधन कौशल की परीक्षा संकट के समय ही होती है। युद्ध के मुहाने पर जब सबसे बड़ा योद्धा ही हथियार डाल दे — इससे बड़ा संकट क्या होगा? कृष्ण ने आदेश नहीं दिया, उपदेश नहीं दिए, लेक्चर नहीं दिया, ऐसे समय आदेश, उपदेश और  भाषण  काम नहीं करते। विश्व के प्रबंधन गुरु ने काउंसलिंग की और काउंसिल काम कर गयी।

पहले सुना, फिर समझा, फिर जगाया। यही आज का  संकट प्रबंधन प्रतिरूप (Crisis Management Model)है। सुनो, परानुभूति और क्रिया— Listen, Empathize, Act.

परिवर्तन का प्रबंधन (Change Management)

परिवर्तन प्रकृति का नियम है। विज्ञान में एंट्रोपी की अवधारणा बताती है कि प्रकृति क्षय की ओर ले जाती है। मन की प्रकृति भी अधोगामी मानी जाती है। निसंदेह परिवर्तन अवश्यंभावी है, किन्तु मनुष्य के सचेतन प्रयास इस परिवर्तन को विकास के पथ पर ले जा सकते हैं। परिवर्तन का प्रबंधन वही तकनीक है।वासांसि जीर्णानि यथा विहाय।

गीता परिवर्तन की चिंता से मुक्त करती है। प्रबंधक को चिंता मुक्त होकर प्रयास करना आवश्यक है। जैसे पुराने वस्त्र बदलते हो, वैसे ही पुरानी रणनीति भी बदलनी पड़ती है। जो संस्था बदलती नहीं, वह मरती है। गीता परिवर्तन को मृत्यु नहीं, नव-जन्म अर्थात नव-प्रवर्तन बताती है।
         
इस प्रकार स्पष्ट है  गीता कोई पूजा-पाठ की पुस्तक नहीं — वह कर्म की पुस्तिका है। वह अप्रतिम प्रबंधन ग्रंथ है। यह पारलौकिक ही नहीं, लोकिक ज्ञान भी देती है। यह युद्ध के साथ जीवन युद्ध में विजय अर्थात आनंद पथ पर यात्रा सुनिश्चित करने का प्रबंधन करती है। गीता हमें सीख देती है कि तिलक-दीप से संस्था नहीं चलतीं, प्रबंधन से चलती हैं। भौतिक विकास विज्ञान व तकनीक से होता है। दुनिया तकनीक से चलती है। हल-कलम-कुदाल से चलती है।

आधुनिक प्रबंधन कहता है —  कार्य ही पूजा है (Work is Worship)। गीता में प्रबंधन गुरु श्रीकृष्ण कहते हैं —  सही भावना के साथ किया गया काम अपने आप में पूजा है। इसलिए जब अगली बार कोई कहे कि गीता पढ़नी चाहिए, तो आप कहिए — पढ़नी नहीं, जीनी चाहिए।

गीता पढ़ना तो सरल, कठिन गीता सी चाल।
कथनी मीठी लगत है, करनी में ही ढाल।।



- डा.संतोष गौड़ राष्ट्रप्रेमी
चलवार्ता - 9996388169

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