उपभोक्तावाद की चकाचौंध में मानवीय मूल्य और साहित्य कैसे पीछे छूट रहे हैं? विज्ञापन, भाषा और समाज पर पड़ते असर का गहन विश्लेषण और समाधान यहाँ जानिए।
उपभोक्तावाद बनाम मानवीय मूल्य: विज्ञापनों की चमक में खोता साहित्य
आज का मनुष्य सुबह आँख खुलते ही जिस पहली चीज़ को देखता है, वह अक्सर उसके हाथ में रखा मोबाइल होता है, और उस स्क्रीन पर पहला संदेश किसी न किसी विज्ञापन का। दिन भर वह होर्डिंग, टीवी, अख़बार, सोशल मीडिया और यूट्यूब के बीच से गुज़रता है, और हर जगह एक ही स्वर उसे सुनाई देता है कि तुम्हारे पास जो है वह काफ़ी नहीं है, और जो ख़रीदने योग्य है वही सुख का द्वार है। यही उपभोक्तावाद है। यह केवल वस्तुओं की ख़रीद-फ़रोख़्त का नाम नहीं, बल्कि जीवन को देखने का एक ढंग है, जिसमें मनुष्य की पहचान उसके गुणों से नहीं, उसकी क्रयशक्ति से तय होने लगती है। इस बदलते परिदृश्य में सबसे गहरी चोट उन मूल्यों को पहुँची है जिन्हें साहित्य युगों से सींचता आया है।
उपभोक्तावाद का स्वरूप और उसकी जड़ें
औद्योगिक क्रांति के बाद जब उत्पादन बहुत बढ़ा, तो बाज़ार के सामने एक नई समस्या खड़ी हुई कि इतना माल बिकेगा कैसे। इसका उत्तर विज्ञापन ने दिया। उसने ज़रूरत और चाह के बीच की रेखा को धुँधला कर दिया। पहले मनुष्य वही ख़रीदता था जिसकी उसे आवश्यकता होती थी, अब उसे वे आवश्यकताएँ सिखाई जाती हैं जो उसके भीतर थीं ही नहीं। भारत में 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद यह प्रक्रिया तेज़ी से फैली। जो समाज कभी संयम, संतोष और सादगी को जीवन का आदर्श मानता था, वह धीरे-धीरे ब्रांड, फ़ैशन और सुविधा की भाषा में सोचने लगा। घर की दीवारों पर आज परिवार के चित्र कम और उपकरणों की चमक अधिक दिखती है।
विज्ञापन की भाषा और मनुष्य का मनोविज्ञान
विज्ञापन की सबसे बड़ी ताक़त यह है कि वह तर्क से नहीं, भावना से बात करता है। वह हमारे भय, हमारी असुरक्षा, हमारी तुलना करने की आदत और सबसे बढ़कर हमारे भीतर के अधूरेपन को पकड़ता है। किसी क्रीम का विज्ञापन गोरेपन को आत्मविश्वास से जोड़ देता है, किसी गाड़ी का विज्ञापन रुतबे को सुख से, और किसी उपहार का विज्ञापन प्रेम को क़ीमत से। धीरे-धीरे मन में यह धारणा बैठ जाती है कि रिश्ते निभाने के लिए वस्तुएँ चाहिए और सम्मान पाने के लिए ब्रांड। जिस भाषा में कभी माँ की लोरी और दादी की कहानी थी, वहाँ अब जिंगल और स्लोगन हैं। छोटे, चटकीले और तुरंत याद हो जाने वाले वाक्य हमारी स्मृति में इस तरह बैठते हैं कि गहरी कविता की पंक्तियों के लिए जगह ही नहीं बचती।
मानवीय मूल्यों पर प्रभाव
मानवीय मूल्य, जैसे करुणा, सहानुभूति, त्याग, ईमानदारी, संतोष और आपसी विश्वास, बाज़ार की गणित में फ़ायदे का सौदा नहीं माने जाते। इसलिए उपभोक्तावादी संस्कृति उन्हें धीरे-धीरे अप्रासंगिक बना देती है। जब सफलता का अर्थ अधिक कमाना और अधिक ख़रीदना हो जाता है, तो पड़ोसी का दुख हमें विचलित नहीं करता, क्योंकि हमारा ध्यान अपनी अगली इच्छा पर टिका होता है। रिश्तों में भी लेन-देन की प्रवृत्ति घर करने लगती है। बुज़ुर्ग बोझ लगने लगते हैं, क्योंकि वे उत्पादक नहीं हैं, और मित्रता 'नेटवर्किंग' में बदल जाती है। कबीर ने कहा था कि इतना दीजिए जिसमें कुटुंब का पेट भर जाए और साधु भूखा न लौटे। यह संतोष की जो अवधारणा थी, आज के बाज़ार के लिए वह सबसे बड़ा शत्रु है, क्योंकि जो संतुष्ट है वह ग्राहक नहीं बनता।
साहित्य की भूमिका और उसका संकट
साहित्य का काम मनुष्य को उसके भीतर झाँकना सिखाना है। प्रेमचंद की 'ईदगाह' का हामिद अपने पैसों से मिठाई या खिलौना नहीं, दादी के जलते हाथों के लिए चिमटा ख़रीदता है। यह कहानी बताती है कि सच्चा मूल्य वस्तु की चमक में नहीं, उसके पीछे की संवेदना में होता है। ऐसी रचनाएँ पाठक के भीतर वह दृष्टि जगाती हैं जिससे वह चीज़ों और रिश्तों का फ़र्क़ समझ सके। लेकिन आज साहित्य स्वयं संकट में है। पाठक की सीमित होती एकाग्रता, तुरंत मनोरंजन की चाह और स्क्रीन की चकाचौंध ने किताबों को हाशिये पर धकेल दिया है। जिस समाज के पास विज्ञापन देखने का समय है, उसके पास उपन्यास पढ़ने का धैर्य घटता जा रहा है।
यह संकट केवल पाठकों की ओर से नहीं है, लेखन की ओर से भी है। बाज़ार का दबाव साहित्य को भी उत्पाद बनाने लगा है। पुस्तकों की सफलता उनकी गहराई से नहीं, बिक्री के आँकड़ों, लोकार्पण के तमाशे और सोशल मीडिया की लोकप्रियता से मापी जाने लगी है। कई बार लेखक भी यह सोचकर लिखता है कि क्या बिकेगा, यह नहीं कि क्या कहा जाना ज़रूरी है। इस तरह साहित्य अपनी उस आलोचनात्मक भूमिका से दूर होने लगता है, जिसमें वह समाज को आईना दिखाता था। हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाएँ सीमित पाठकों और घटते संसाधनों से जूझ रही हैं, जबकि विज्ञापन उद्योग करोड़ों के बजट के साथ हर घर में प्रवेश कर चुका है।
भाषा का क्षरण
उपभोक्तावाद का एक सूक्ष्म प्रभाव भाषा पर भी पड़ा है। विज्ञापन की भाषा अक्सर अधूरे, मिश्रित और चलताऊ वाक्यों पर टिकी होती है, जिसमें शब्दों की गरिमा से अधिक उनकी चटक महत्वपूर्ण है। जब यही भाषा रोज़मर्रा की बोलचाल में उतर आती है, तो सूक्ष्म भावों को व्यक्त करने वाले शब्द चलन से बाहर होने लगते हैं। साहित्य की शक्ति उसकी भाषा में है, और यदि भाषा ही उथली हो जाए तो गहरी अनुभूति का वाहक कौन बनेगा। लोकभाषाओं, मुहावरों और लोकगीतों की जो समृद्ध परंपरा थी, वह भी बाज़ारू हिंदी-अंग्रेज़ी की खिचड़ी के आगे कमज़ोर पड़ती दिखती है।
क्या बाज़ार सर्वथा दोषी है
निष्पक्ष होकर देखें तो उपभोक्तावाद ने जीवन को सुविधाजनक भी बनाया है, और रोज़गार, तकनीक तथा जीवन-स्तर में सुधार भी उसी की देन है। यह भी सच है कि इंटरनेट ने साहित्य को नए मंच दिए हैं। ब्लॉग, ई-पुस्तकें, ऑडियोबुक और पॉडकास्ट के ज़रिये आज नए लेखक और नए पाठक जुड़ रहे हैं, जो पहले संभव नहीं था। समस्या बाज़ार के होने में नहीं, बाज़ार के सर्वग्रासी हो जाने में है, यानी उस स्थिति में जब वह जीवन के हर क्षेत्र को, यहाँ तक कि भावनाओं और रिश्तों को भी, अपने पैमाने से तौलने लगे।
समाधान की दिशा
इस द्वंद्व से निकलने का रास्ता बाज़ार को नकारना नहीं, उसके सामने विवेक को खड़ा करना है। सबसे पहले ज़रूरत है कि हम अपनी आवश्यकताओं और इच्छाओं के बीच फ़र्क़ करना सीखें और विज्ञापन देखते समय यह प्रश्न पूछें कि यह वस्तु मेरे जीवन में सचमुच क्या जोड़ेगी। परिवारों और विद्यालयों में बच्चों को पुस्तकों से जोड़ना, उन्हें कहानियाँ सुनाना और अच्छी रचनाओं के प्रति रुचि जगाना इस दिशा में सबसे कारगर उपाय है। साहित्यकारों का दायित्व भी बढ़ जाता है कि वे समय की चुनौतियों को अपनी रचनाओं में जगह दें और पाठक की भाषा में गहरी बात कहने का साहस करें। समाज और सरकार को भी पुस्तकालयों, साहित्यिक आयोजनों और लघु पत्रिकाओं को सहारा देना होगा, ताकि विचार की दुनिया केवल बाज़ार के भरोसे न रहे।
उपसंहार
उपभोक्तावाद और मानवीय मूल्यों का यह टकराव वास्तव में इस प्रश्न का टकराव है कि मनुष्य के जीवन का लक्ष्य क्या है, अधिक पाना या बेहतर होना। विज्ञापन की चमक क्षणिक होती है, जबकि साहित्य की रोशनी पीढ़ियों तक राह दिखाती है। यदि हमने अपने भीतर की संवेदना, अपनी भाषा और अपनी पढ़ने की आदत को बचाए रखा, तो बाज़ार की चकाचौंध के बीच भी हम मनुष्य बने रह सकेंगे। साहित्य का खोना केवल किताबों का खोना नहीं है, वह उस दृष्टि का खोना है जिससे हम दूसरों के दुख को अपना समझते हैं। इसलिए इस चमक के बीच दीया जलाए रखना ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।


COMMENTS