सेज जानते हैं न आप? नहीं जानते? अरे, शादी में सजी सेज नहीं जी... सरकार की सेज, स्पेशल इकोनॉमिक जोन वाला फंडा। अब यह फंडा है या फंदा, राम जाने।
विकास करके मानेंगे – सेज
सेज जानते हैं न आप? नहीं जानते? अरे, शादी में सजी सेज नहीं जी... सरकार की सेज, स्पेशल इकोनॉमिक जोन वाला फंडा। अब यह फंडा है या फंदा, राम जाने। सरकार है, कुछ सोच ले तो फिर मजाल कि उसकी सोच में कोई मीन-मेख निकाल सके। आखिर सरकार ने सब काम छोड़कर सोचा है। इस बार सेज को हर जिले में पहुंचाने का सोचा है, राज्य के विकास का सोचा है। भाई, अभी सोचा है और अपनी इस सोच को प्रदेश भर के सभी महकमों में पहुंचा भी दिया है।
अब सरकार क्या सोच रही है, यही सोच सभी महकमों के लिए सोचनीय विषय बन गई है। सरकार काम क्यों नहीं करती, यह सोच कर हमारी स्थिति सोचनीय बना दी गई है।तो जनाब, सरकार ने इस बार सोचा है कि प्रदेश के सभी इन्वेस्टर्स, बिल्डर्स, कॉर्पोरेट हाउसेज़, उद्यमियों और विदेश में बसे प्रदेश के एनआरआई इन्वेस्टर्स को इनवाइट किया जाएगा। वैसे तो हर साल सरकार यह काम राज्य स्तर पर एक इन्वेस्टर समिट कराकर निपटा देती थी। तीन दिन की कार्यशाला में आंकड़ों का तिलस्मी प्रदर्शन, बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर के लुभावने स्लोगन, बजट की बंदरबांट, और कुछ रंगीन कागजों पर हस्ताक्षर करवाकर प्रोजेक्ट्स के नए-नए नाम देकर इतिश्री कर लेती थी।
लेकिन इस बार सरकार पीछे ही पड़ गई है। अब तो जिला स्तर पर, तहसील स्तर पर यह कार्यक्रम कराए जाएंगे। सरकार लोकल इन्वेस्टर्स के पीछे पड़ गई है।
हमारा शहर भी आ गया लपेटे में। पता लगा कि शहर के विकास के लिए सरकार कितनी बड़ी सोच रखती है। न जाने कितने करोड़ों के प्रोजेक्ट्स का आंकड़ा सभी महकमों को दे दिया गया है। सभी से कहा गया है, "पकड़ कर लाओ इन्वेस्टर्स को। लिस्ट बनाओ।"
बस, इसी सिलसिले में सभी सरकारी विभागों की लगातार बैठकें चल रही हैं। आये दिन शहर में हाई-लेवल मीटिंग के लिए प्रदेश के उच्चाधिकारी दौरे पर हैं। उच्चाधिकारी प्रोजेक्ट समझा रहे हैं, साथ ही धमका भी रहे हैं। डेडलाइन दी जा रही है। आखिर शहर का विकास जो करवाना है! सभी महकमों को अप्रत्यक्ष रूप से यह समझाया जा रहा है कि उनका विकास भी शहर के विकास पर निर्भर है।
सेज नाम की बीमारी अब शहर में भी पूरी तरह घुस चुकी है। शहरवासी भी उत्सुक हैं, इस सेज योजना पर बैठने के लिए। ये दीगर बात है कि यह कांटों की सेज है या फूलों की, इसका पता किसी को नहीं है।
इधर उच्चाधिकारियों का दौरा और उधर स्थानीय अधिकारियों को भी जैसे दौरा पड़ गया है। हर विभाग में बैठकों का दौर शुरू हो गया है। उद्देश्य एक है—निवेशकों को आकर्षित करना। उन्हें लुभावने प्रस्ताव देना ताकि वे सरकारी योजनाओं का लाभ उठाएं।
सरकार का मानना है कि जब तक निवेशक कोई बड़ा उद्योग नहीं लगाएंगे, तब तक सरकारी दफ्तरों में लालफीताशाही और भ्रष्टाचार का खेल कैसे चलेगा?सभी विभाग, चाहे नहर परिषद हो, फायर विभाग हो, प्रदूषण नियंत्रण विभाग हो, तहसील हो या कलेक्ट्रेट, इस योजना को लेकर बड़े उत्साहित हैं। सभी चाहते हैं कि निवेशक आएं।
लेकिन निवेशक, जाने क्यों, मन में शंका लिए बैठे हैं और आगे नहीं बढ़ रहे। सरकार ने बार-बार भरोसा दिलाया कि 'सिंगल विंडो' प्रणाली लागू है। कोई भाई-भतीजावाद या लालफीताशाही नहीं होगी। एक क्लिक पर सभी एनओसी मिल जाएंगी, लोन मिलेगा, अनुदान मिलेगा, वह भी गैर-वापसी योग्य। सस्ते दरों पर कर्ज और न जाने क्या-क्या ऑफर दिए गए।
फिर भी, निवेशक अज्ञात आशंकाओं में घिरे रहे और आगे नहीं आए। जब निवेशकों पर यह सब असर नहीं हुआ, तो उन्हें डराने-धमकाने का काम शुरू हुआ। उनके पुराने रिकॉर्ड खंगाले गए, नोटिस भेजे गए। उन्हें कहा गया कि या तो सरकार की योजना का लाभ उठाओ, वरना तुम्हारा व्यापार बंद कर दिया जाएगा।
बिल्डरों के चल रहे प्रोजेक्ट्स पर अड़चनें डाली गईं। उद्योगपतियों पर आयकर निरीक्षण और पेनल्टी लगाने की तलवार लटकाई गई। पुलिस की मदद ली गई और थानों से अपराधियों और हिस्ट्रीशीटरों की सूची निकाली गई।
जब सूची थानाधिकारी ने उच्चाधिकारी के सामने रखी, तो उच्चाधिकारी भड़क गए।
"इस लिस्ट में अस्पतालों के नाम क्यों नहीं हैं?"
थानाधिकारी घबरा गया। बोला, "साहब, महीने की बंधी आ रही है। सभी से कोई अड़चन नहीं है। फिर क्यों उन्हें लिस्ट में रखें?"
उच्चाधिकारी बोले, "देखो, जब तक ये नए अस्पताल नहीं खोलेंगे और सेवाओं का विस्तार नहीं करेंगे, तब तक सभी महकमों के नए सोर्स कहां से आएंगे? बात सिर्फ पुलिस विभाग की नहीं है। हमें अन्य विभागों का भी ध्यान रखना है। सभी जगह से शिकायतें आ रही हैं। प्रदूषण विभाग, स्वास्थ्य विभाग, सीएमएचओ विभाग—सभी का धंधा मंदा पड़ा हुआ है। ये छोटे-मोटे अस्पतालों से क्या आशा करोगे? नंगा नहाएगा क्या, निचोड़ेगा क्या? ये बड़े अस्पताल खोलेंगे, तभी तो फायदा होगा।"
हर छोटे-बड़े अस्पताल को इस सूची में शामिल कर लिया गया। पुलिस हर दिन अस्पतालों पर छापे मारती, कर्मचारियों को डराया-धमकाया जा रहा था। अस्पताल मालिकों पर लगाम कसने का यह नया तरीका पुलिस को मिल गया था।
जिन अस्पतालों ने पहले से सरकारी योजनाओं का लाभ लिया हुआ था, उनसे योजनाओं को वंचित करने की धमकी दी गई, अगर उन्होंने शहर के विकास में योगदान नहीं दिया।अस्पताल वाले गिड़गिड़ा रहे थे, "हमें बख्श दो। हमसे नहीं बनेगा नया अस्पताल। जो पहले से बने हुए है, उसी से जितना बन पा रहा है,हम आप सभी लोगों की सेवा कर तो रहे हैं।"
बड़े जिद्दी लोग हैं ये अस्पताल वाले भी बताओ –सरकार तो चाहती है ये विकास करें ,इन्हें इंटरेस्ट फ्री लोन,सिंगल विंडो अप्रोवल,नो लाल फीताशाही वाले सुविधा का वायदा कर तो रही है और क्या जान लोगे सरकार की ।
आखिरकार एक समन्वय बैठक बुलाई गई। सभी विभागों के अधिकारी जुटे। हॉस्पिटल एसोसिएशन के प्रतिनिधि भी पहुंचे। तय हुआ कि सरकार के टारगेट को पूरा करने के लिए बस प्रोजेक्ट बनाकर दे दें। प्रोजेक्ट भी बने बनाये टेम्पलेट हैं ,बस आप लोग तो साइन कर दो.. । तीन साल का समय वैसे भी सरकार ने दिया है। उसके बाद चुनाव साल आ जाएगा और आचार संहिता लग जाएगी।
सरकार की सोच की लाज भी रह जाएगी और आपका भी कुछ नहीं बिगड़ेगा।प्रस्ताव अच्छा था। हॉस्पिटल वाले इसके लिए तैयार हो गए। उन्होंने यहां तक वायदा किया कि आप सभी महकमों को दी जाने वाली सेवाओं में भी बढ़ोतरी करेंगे। आखिरकार मदद तो दोनों तरफ से ही हो तो अच्छा रहता है न ।
विकास तो हो ही रहा है शहर में।आखिर शहर के सरकारी महकमे भी तो शहर का ही हिस्सा हैं। विकास जहां भी हो, बस होना चाहिए।
- डॉ मुकेश असीमित,
गंगापुर सिटी राजस्थान ,mail id-drmukeshaseemit@gmail.com
mobile number -9785007828


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