त्रिशिरा: लंका के उस राजकुमार की कथा जिसके तीन सिरों में तीन संसार थे
त्रिशिरा: लंका के उस राजकुमार की कथा जिसके तीन सिरों में तीन संसार थे
समुद्र के उस पार एक नगरी थी, जो दिन में सूर्य की तरह चमकती थी और रात में तारों को अपने महलों के भीतर उतार लेती थी।
उसका नाम था; लंका।
सोने की ऊँची प्राचीरें, मणियों से जड़े राजमहल, आकाश को छूते हुए शिखर और समुद्र की अथाह लहरों से घिरी वह नगरी किसी स्वप्न की तरह दिखाई देती थी। लेकिन उस स्वर्णिम चमक के भीतर एक और लंका थी—एक ऐसी लंका, जहाँ शक्ति का सम्मान था, भय का शासन था और राजा की इच्छा ही सबसे बड़ा विधान समझी जाती थी।
उस लंका का स्वामी था रावण। वह केवल एक राजा नहीं था। वह महापंडित था, तपस्वी था, शिव का अनन्य भक्त था, महान योद्धा था और संगीत का ज्ञाता था। उसने देवताओं को चुनौती दी थी, अनेक लोकों में अपना प्रभाव स्थापित किया था और अपनी शक्ति पर उसे इतना विश्वास था कि कभी-कभी उसे स्वयं से अधिक किसी और पर विश्वास नहीं रहता था। उसके महल में अनेक पुत्र थे।
मेघनाद: जिसे संसार बाद में इंद्रजीत के नाम से जानने लगा।
अतिकाय: असाधारण बल का स्वामी।
नरान्तक।
देवान्तक।
और उनमें एक ऐसा राजकुमार भी था, जिसके तीन सिर थे।
उसका नाम था:
त्रिशिरा।
तीन चेहरों वाला बालक:
कहा जाता है कि त्रिशिरा का जन्म धन्यमालिनी के गर्भ से हुआ था। धन्यमालिनी रावण की पत्नियों में से एक थी। वह केवल राजमहल की स्त्री नहीं थी। उसमें ऐसी निर्भीकता थी कि आवश्यकता पड़ने पर वह रावण के सामने भी अपनी बात कह सकती थी। त्रिशिरा के जन्म की विस्तृत कथा प्राचीन मूल ग्रंथों में नहीं मिलती। लेकिन बाद की रामायण-परम्पराओं और लोककथाओं ने उसे धन्यमालिनी का पुत्र माना।
उस रात लंका में समुद्र असामान्य रूप से शांत था। राजमहल में दीपक जल रहे थे। महल की दासियाँ धीमी आवाज में बातें कर रही थीं। दूर कहीं वीणा बज रही थी। और धन्यमालिनी अपने नवजात पुत्र को गोद में लिए बैठी थी। उसने जब पहली बार अपने पुत्र का चेहरा देखा, तो कुछ क्षणों के लिए उसकी आँखें ठहर गईं।
शिशु के तीन मुख थे।
तीन छोटे-छोटे चेहरे।
तीन अलग दिशाओं में खुलती हुई आँखें।
एक चेहरा शांत था।
दूसरे पर जैसे जन्म से ही कठोरता थी।
और तीसरे पर एक ऐसी हल्की मुस्कान थी, जिसे देखकर धन्यमालिनी के मन में अनजाना भय पैदा हुआ।
लेकिन माँ का हृदय भय से अधिक प्रेम जानता है। उसने बच्चे को अपने सीने से लगा लिया।
धीरे से उसके माथे को चूमा और कहा,
“लोग तुम्हें देखकर डरेंगे।”
कुछ देर वह उसे देखती रही। फिर मुस्कराई।
“लेकिन मैं तुम्हारे इन तीन चेहरों में तीन अलग-अलग जीवन देख रही हूँ।”
शिशु कुछ नहीं समझता था, लेकिन शायद उसी क्षण उसकी माँ ने उसके भाग्य की पहली पंक्ति पढ़ ली थी।
तीन सिर, तीन स्वभाव:
समय बीतता गया, बालक बड़ा होने लगा, और लंका ने पहली बार महसूस किया कि त्रिशिरा के तीन सिर केवल उसके शरीर की विचित्रता नहीं थे। उसका मन भी जैसे तीन दिशाओं में बँटा हुआ था।
उसका एक स्वर शांत था। वह शास्त्रों की बातें सुनना चाहता था। ऋषियों के बारे में जानना चाहता था। संगीत उसे अच्छा लगता था। समुद्र की लहरों को घंटों देख सकता था।
दूसरा स्वर युद्धप्रिय था। उसे धनुष की टंकार पसंद थी। तलवार की चमक उसे आकर्षित करती थी। घोड़ों की दौड़ और रथों की गर्जना सुनकर उसके भीतर जैसे कोई अग्नि जल उठती थी।
लेकिन तीसरा स्वर सबसे अलग था। वह प्रश्न करता था। बहुत प्रश्न करता था।
राजा को इतना अधिक चाहिए क्यों?
जिसे सब कुछ मिल चुका हो, वह और अधिक क्यों चाहता है?
क्या शक्तिशाली होना और सही होना एक ही बात है?
यदि कोई राजा अपने शत्रु को हरा दे, तो क्या वह धर्मात्मा भी हो जाता है?
ये प्रश्न कभी-कभी इतने असहज होते कि धन्यमालिनी उसे चुप करा देती, लेकिन वह जानती थी; जिस बच्चे को प्रश्न पूछने की आदत लग जाए, उसे हमेशा के लिए चुप कराना संभव नहीं होता।
पिता की सभा:
एक दिन रावण ने त्रिशिरा को अपने दरबार में बुलाया। स्वर्ण सिंहासन पर रावण बैठा था। चारों ओर मंत्री, सेनापति और राजपरिवार के लोग उपस्थित थे। त्रिशिरा धीरे-धीरे सभा के बीच पहुँचा। तीनों सिरों पर छोटे-छोटे मुकुट चमक रहे थे। रावण ने उसे देखा और मुस्कराया।
तुम्हें पता है, त्रिशिरा, राजकुमार होने का अर्थ क्या है?
त्रिशिरा ने बिना झिझक उत्तर दिया,
दायित्व।
सभा में कुछ लोगों ने एक-दूसरे की ओर देखा। रावण की मुस्कान कुछ क्षणों के लिए गायब हो गई। फिर वह सिंहासन से उठा।
नहीं।
उसने कहा।
राजकुमार होने का अर्थ है—शक्ति।
त्रिशिरा शांत रहा। रावण उसके सामने आकर खड़ा हो गया।
जिसके पास शक्ति नहीं होती, उसके धर्म का निर्णय भी दूसरे करते हैं।
त्रिशिरा ने पिता की आँखों में देखा।
रावण चुप रहा।
त्रिशिरा ने पूछा,
क्या उसके लिए कोई सीमा नहीं होती?
सभा में अचानक सन्नाटा छा गया। रावण की आँखों में चमक आई। वह क्रोधित नहीं हुआ, बल्कि हँस पड़ा; लंबे समय तक हँसता रहा।
फिर उसने कहा,
तुम मेरे पुत्र हो।
त्रिशिरा ने कुछ नहीं कहा।
रावण लौटकर सिंहासन पर बैठ गया। लेकिन उस दिन से उसे अपने इस पुत्र के भीतर छिपे प्रश्नों का पता चल गया था।
युद्ध की शिक्षा:
त्रिशिरा को लंका के श्रेष्ठ आचार्यों से शिक्षा मिली।
धनुर्वेद।
तलवार।
गदा।
शक्ति।
रथ संचालन।
अस्त्रों का ज्ञान।
युद्धनीति।
वह जो सीखता, उसे दूसरों से कहीं अधिक तेजी से आत्मसात करता। उसके तीन सिरों के कारण उसकी दृष्टि असाधारण थी। एक ओर से आने वाले शत्रु को रोकते हुए वह दूसरी दिशा पर भी निगाह रख सकता था। एक हाथ में धनुष होता तो दूसरा अस्त्र सँभालता। उसका शरीर जैसे एक योद्धा का नहीं, तीन योद्धाओं का संयोजन था। रावण अपने पुत्र को देखकर प्रसन्न होता। उसे विश्वास था कि एक दिन त्रिशिरा लंका के सबसे भयंकर योद्धाओं में गिना जाएगा। लेकिन त्रिशिरा को युद्ध से अधिक एक और चीज परेशान करती थी।
युद्ध क्यों?
वह अक्सर सोचता, हर शक्ति को स्वयं को सिद्ध करने के लिए किसी दूसरे को नष्ट करना क्यों पड़ता है?
माँ और पुत्र:
एक शाम वह राजमहल की ऊँची छत पर बैठा समुद्र देख रहा था। धन्यमालिनी उसके पास आई।
फिर वही समुद्र?
त्रिशिरा मुस्कराया।
समुद्र कभी प्रश्न नहीं करता, माता।
और तुम?
मैं करता हूँ।
धन्यमालिनी उसके पास बैठ गई।
आज क्या प्रश्न है?
त्रिशिरा कुछ देर मौन रहा।
फिर उसने कहा,
मैं कौन हूँ?
माँ ने उसकी ओर देखा।
तुम रावण के पुत्र हो।
यह मेरी पहचान है?
हाँ।
और यदि मैं रावण का पुत्र न होता?
धन्यमालिनी कुछ क्षण चुप रही।
त्रिशिरा ने फिर पूछा,
तब मैं कौन होता?
माँ ने उसके सिर पर हाथ रख दिया।
शायद यही प्रश्न तुम्हें दूसरों से अलग बनाता है।
त्रिशिरा हँस पड़ा।
मेरे तीन सिर हैं, माता। अलग तो होना ही था।
धन्यमालिनी भी मुस्करा दी।
लेकिन उसकी आँखों में चिंता थी।
क्योंकि वह जानती थी—
जिस पुत्र के भीतर अपने अस्तित्व का प्रश्न जाग जाए, उसका जीवन कभी सरल नहीं रहता।
सीता का आगमन:
फिर लंका में वह घटना हुई जिसने सब कुछ बदल दिया। एक दिन समाचार आया कि रावण एक स्त्री को लंका लेकर आया है।
वह स्त्री थी; सीता।
उसे अशोक वाटिका में रखा गया था। पूरी लंका में इस घटना की चर्चा थी। कोई राजा के निर्णय की प्रशंसा कर रहा था। कोई भय से चुप था, और कुछ लोग भीतर ही भीतर समझ रहे थे कि यह निर्णय लंका के लिए भारी पड़ सकता है। त्रिशिरा भी अशोक वाटिका के निकट गया। दूर से उसने सीता को देखा।
वह अकेली थीं, चारों ओर राक्षसियाँ थीं।
लेकिन उनके चेहरे पर ऐसा भय नहीं था जैसा किसी बंदी के चेहरे पर होना चाहिए।
उनके पास न सेना थी, न अस्त्र, न कोई राजसिंहासन; फिर भी उनके भीतर ऐसी दृढ़ता थी कि त्रिशिरा कुछ देर उन्हें देखता ही रह गया।
उसके भीतर का पहला सिर बोला,
वह शत्रु की पत्नी है।
दूसरे ने कहा—
वह रावण के अधिकार को चुनौती दे रही है।
लेकिन तीसरा सिर चुप था।
फिर उसने धीरे से कहा,
वह बंदी है।
उस रात त्रिशिरा ने भोजन नहीं किया।
धन्यमालिनी ने पूछा,
क्या हुआ?
त्रिशिरा ने कहा,
माता, क्या किसी को केवल इसलिए पा लेना उचित है क्योंकि हमारे पास उसे पाने की शक्ति है?
धन्यमालिनी का चेहरा बदल गया।
वह समझ गई कि उसका पुत्र किस ओर सोच रहा है, उसने केवल इतना कहा,
कुछ प्रश्नों के उत्तर महलों में नहीं मिलते, पुत्र।
विभीषण की विदाई:
समय बीतता गया। राम समुद्र के उस पार थे। लंका युद्ध की तैयारी कर रही थी।
रावण के भाई विभीषण ने बार-बार उसे समझाया कि सीता को वापस कर देना चाहिए।
राजसभा में एक दिन विभीषण ने स्पष्ट शब्दों में कहा,
भ्राता, यह मार्ग लंका के विनाश की ओर जा रहा है।
रावण क्रोधित हो गया। सभा में तनाव फैल गया। त्रिशिरा सब सुन रहा था। विभीषण चला गया।
लंका की सीमा पर खड़े होकर त्रिशिरा ने उसे जाते देखा।
उसका एक सिर कह रहा था,
वह परिवार छोड़कर जा रहा है।
दूसरा कह रहा था.
वह भयभीत है।
लेकिन तीसरा कह रहा था,
या शायद वह अपने सत्य के साथ जा रहा है।
त्रिशिरा ने आँखें बंद कर लीं। वह पिता को छोड़कर नहीं गया, उसने लंका में रहने का निर्णय लिया।
शायद पुत्रधर्म ने उसे बाँध लिया था।
शायद रक्त ने।
शायद प्रेम ने।
और शायद उस समय तक वह यह समझ नहीं पाया था कि कभी-कभी परिवार के साथ खड़ा होना और सत्य के साथ खड़ा होना एक ही बात नहीं होती।
युद्ध:
फिर समुद्र पर सेतु बना। वानर सेना लंका के सामने आ खड़ी हुई। शंख बजने लगे। नगाड़े गूँजने लगे। महलों की छतों से सैनिकों ने समुद्र की ओर देखा। लंका पहली बार सचमुच भयभीत हुई। युद्ध आरंभ हुआ। एक-एक करके राक्षस योद्धा रणभूमि में उतरने लगे। वानर सेना पहाड़ों और वृक्षों को अस्त्र बनाकर टूट पड़ी। धूल से आकाश भर गया। धरती पर रक्त बहने लगा।
और उसी युद्ध में एक दिन त्रिशिरा भी अपने रथ पर सवार होकर रणभूमि में उतरा।
उसके तीन मुकुट सूर्य के प्रकाश में चमक रहे थे।
हाथ में धनुष था।
आँखों में अग्नि थी।
उसके बाणों ने वानर सेना में हलचल मचा दी।
अंगद उसके सामने आया।
नील उसके सामने आया।
लेकिन त्रिशिरा पीछे नहीं हटा।
वह अकेला कई योद्धाओं का सामना करता रहा।
उसकी गति इतनी तीव्र थी कि सामने वाले को समझ ही नहीं आता था कि उसका अगला प्रहार किस दिशा से आएगा; तभी रणभूमि में हनुमान आए।
हनुमान और त्रिशिरा:
हनुमान ने त्रिशिरा को देखा। तीन सिर। तीन मुकुट। एक विशाल रथ, और असाधारण युद्धकौशल।
त्रिशिरा ने बिना समय गँवाए हनुमान पर बाण चलाए। हनुमान ने उन्हें रोक दिया। फिर दूसरा प्रहार हुआ। फिर तीसरा। दोनों के बीच युद्ध भयंकर होता गया। त्रिशिरा ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। हनुमान भी पीछे हटने वाले नहीं थे। एक क्षण ऐसा आया जब दोनों आमने-सामने खड़े थे। चारों ओर युद्ध चल रहा था। लेकिन उन दोनों के बीच जैसे समय रुक गया था।
त्रिशिरा ने हनुमान की ओर देखा।
तुम कौन हो?
हनुमान ने उत्तर दिया—
राम का दास।
त्रिशिरा कुछ क्षण उन्हें देखता रहा, उसने पहली बार किसी योद्धा को अपनी शक्ति का परिचय देते हुए नहीं, अपने समर्पण का परिचय देते हुए देखा था। वह समझ नहीं पाया कि यह कैसी शक्ति थी। जिस व्यक्ति ने स्वयं को किसी का दास कहा था, वही उसके सामने पर्वत की तरह अडिग खड़ा था।
त्रिशिरा ने फिर अस्त्र उठाया।
उसने युद्ध चुना, क्योंकि अब लौटना संभव नहीं था।
अंतिम क्षण:
युद्ध अपने चरम पर पहुँच गया।
त्रिशिरा ने पूरी शक्ति से हनुमान पर प्रहार किया।
हनुमान ने उसका सामना किया।
एक प्रहार हुआ।
त्रिशिरा पीछे हटा।
वह फिर उठा।
दूसरा प्रहार हुआ।
उसका मुकुट टूट गया।
लेकिन वह फिर खड़ा हो गया।
उसके भीतर अभी भी वही राजकुमार जीवित था जिसने बचपन में पिता से पूछा था,
क्या शक्ति की भी कोई सीमा होती है?
लेकिन अब उस प्रश्न का उत्तर देने का समय नहीं था।
हनुमान ने उसे देखा।
उनकी आँखों में क्रोध था, लेकिन उसके भीतर उस वीर के प्रति सम्मान भी था जो अंत तक युद्ध करता रहा।
अंतिम संघर्ष हुआ।
और फिर हनुमान का प्रहार त्रिशिरा पर पड़ा।
वह धरती पर गिर पड़ा।
उसके तीनों सिर शांत हो गए।
तीनों मुकुट मिट्टी में जा गिरे।
जिस राजकुमार ने जीवन भर तीन दिशाओं में देखा था, उसकी आँखें अब हमेशा के लिए बंद हो चुकी थीं।
धन्यमालिनी की रात:
जब यह समाचार राजमहल पहुँचा, तब रात हो चुकी थी। धन्यमालिनी ने कुछ नहीं पूछा। शायद उसे उत्तर पहले ही मिल चुका था। वह अपने कक्ष में गई। तीन दीपक जलाए।
एक दीपक अपने पुत्र के लिए।
दूसरा उसके योद्धा रूप के लिए।
और तीसरा उस प्रश्न के लिए जो उसने बचपन में उससे सुना था,
मैं कौन हूँ?
धन्यमालिनी ने तीसरे दीपक को बहुत देर तक देखा।
फिर धीरे से बोली,
तुम रावण के पुत्र थे।
उसकी आँखों में आँसू आ गए।
तुम लंका के राजकुमार थे।
उसकी आवाज काँपने लगी।
तुम एक योद्धा थे।
कुछ क्षण वह मौन रही।
फिर उसने तीसरे दीपक की ओर देखा।
लेकिन तुम केवल इतने ही नहीं थे।
उस रात लंका में बहुत से लोग सोए नहीं। लेकिन एक माँ की रात सबसे लंबी थी।
रावण:
रावण ने अपने जीवन में अनेक मृत्यु देखी थीं।
उसके योद्धा मरे थे।
उसके भाई मरे थे।
उसके पुत्र मरे थे।
लेकिन हर मृत्यु के बाद उसका क्रोध बढ़ता गया। उसने कभी मृत्यु को चेतावनी की तरह नहीं देखा। वह उसे अगले युद्ध का कारण बना देता था।
त्रिशिरा की मृत्यु का समाचार सुनकर भी उसकी आँखों में आँसू नहीं आए।
उसकी मुट्ठियाँ बँध गईं।
उसने आकाश की ओर देखा।
राम।
बस इतना ही कहा।
फिर उसकी आँखों में वही अग्नि लौट आई।
लेकिन शायद उस रात पहली बार उसके भीतर एक बहुत छोटा-सा प्रश्न जन्मा था’
क्या यह युद्ध सचमुच विजय के लिए है?
या अब केवल अहंकार के लिए?
उस प्रश्न का उत्तर उसने स्वयं को कभी नहीं दिया।
त्रिशिरा कौन था?:
इतिहास उसे रावण के पुत्र के रूप में याद करता है।
रामायण उसे एक पराक्रमी योद्धा के रूप में याद करती है।
कथा उसे तीन सिरों वाले राक्षस के रूप में याद करती है।
और लोकपरम्परा उसे धन्यमालिनी के पुत्र के रूप में भी स्मरण करती है।
लेकिन इन सबके पीछे एक और त्रिशिरा था।
एक ऐसा युवक जो अपने पिता की शक्ति को देखता था और उसकी सीमा खोजता था।
एक ऐसा पुत्र जो माँ से पूछता था कि उसकी अपनी पहचान क्या है।
एक ऐसा योद्धा जो युद्ध में उतरता तो था, लेकिन युद्ध के अर्थ पर प्रश्न भी करता था।
शायद इसी कारण त्रिशिरा की कथा केवल राक्षस-वध की कथा नहीं है।
यह उस मनुष्य की कथा है जो अपने जन्म, अपने परिवार, अपने कर्तव्य और अपनी आत्मा के बीच फँस गया था।
उसके तीन सिर थे।
लेकिन शायद उन तीन सिरों का अर्थ उसके शरीर से कहीं अधिक गहरा था।
एक सिर कहता था,
मैं रावण का पुत्र हूँ।
दूसरा कहता था,
मैं लंका का योद्धा हूँ।
और तीसरा पूछता था,
लेकिन मैं स्वयं कौन हूँ?
शायद यही उसका सबसे बड़ा संघर्ष था, और शायद यही उसकी सबसे बड़ी त्रासदी भी।
- राहत टीकमगढ़


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