गाँव के उस छोटे-से घर के चारों ओर खेत थे, आम और नीम के पेड़ थे, दूर तक फैली हरियाली थी और सुबह होते ही पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को जीवंत बना देता
सुरों से बुना एक अनोखा रिश्ता
गाँव के उस छोटे-से घर के चारों ओर खेत थे, आम और नीम के पेड़ थे, दूर तक फैली हरियाली थी और सुबह होते ही पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को जीवंत बना देता था। उसी घर में जन्मा था आदित्य—एक ऐसा बालक, जिसकी आँखें दुनिया को वैसे नहीं देखती थीं, जैसे अधिकांश लोग देखते हैं। वह हर जीव में जीवन का उत्सव देखता था। जब वह केवल पाँच वर्ष का था, तब भी उसकी बातें बड़े-बड़े लोगों को सोचने पर विवश कर देती थीं। एक दिन वह आँगन में बैठा था। सामने गौरैयों का एक झुंड दाने चुगते-चुगते फुदक रहा था। आदित्य उन्हें देर तक निहारता रहा। फिर अचानक अपने पिता से बोला— "पिताजी, अहा! चिड़ियों की ज़िंदगी कितनी सुंदर होती होगी। न कोई बस्ता, न कोई चिंता, बस खुले आकाश में उड़ना।" उसके पिता मुस्कुरा दिए।
कुछ दिन बाद उसने पेड़ों पर बंदरों को एक डाल से दूसरे डाल पर उछलते देखा। उसकी आँखों में चमक आ गई। "देखिए पिताजी! बंदरों की ज़िंदगी कितनी मज़ेदार है। जहाँ मन किया, वहाँ पहुँच गए। कितना स्वतंत्र जीवन!" एक शाम खेत की मेड़ पर उसने एक बिल्ली को मिट्टी में लोटते, पंजों से खेलते और अपने ढंग से दुनिया का आनंद लेते देखा। वह मंत्रमुग्ध होकर बोला— "वाह! बिल्ली भी अपनी दुनिया में कितनी खुश है। हर जीव का जीवन कितना अलग और कितना सुंदर है।" पिता ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा— "बेटा, सबसे श्रेष्ठ जन्म मनुष्य का होता है। मनुष्य ही प्रेम कर सकता है, सीख सकता है, दूसरों का भला कर सकता है और ईश्वर को प्राप्त कर सकता है।" आदित्य ने सिर तो हिला दिया, पर उसकी जिज्ञासु आँखें अब भी प्रकृति में खोई हुई थीं। और पिता के मन में भी अपने गुरु के शब्द गूँज उठे— "मृत्युलोक केवल आनंद का स्थान नहीं है। आत्मा यहाँ अपने कर्मों का फल भोगने और स्वयं को श्रेष्ठ बनाने आती है। मानव जन्म दंड भी है और अवसर भी।" उनके चेहरे पर क्षणभर के लिए गंभीरता उतर आई। उन्होंने मन ही मन सोचा— "शायद यह बालक जीवन के इस रहस्य को एक दिन स्वयं समझेगा।" समय धीरे-धीरे बहता रहा।
जब आदित्य बारह वर्ष का हुआ, तब उसके घर एक नन्ही-सी कन्या ने जन्म लिया। उसके जन्म से कुछ दिन पहले उसके पिता ने एक विलक्षण स्वप्न देखा। स्वप्न में चारों ओर सुनहरी आभा फैल गई। कमल के पुष्प खिल उठे। उसी प्रकाश के मध्य एक दिव्य स्वर सुनाई दिया— "मैं तुम्हारे घर बेटी के रूप में जन्म ले रही हूँ। उसका सम्मान करना, क्योंकि जहाँ प्रेम, संगीत और सेवा होती है, वहीं मेरा निवास होता है।" पिता की नींद खुल गई। उनका हृदय श्रद्धा से भर उठा। कुछ दिनों बाद जब बालिका ने जन्म लिया, तो उसकी शांत मुस्कान और बड़ी-बड़ी भूरी-कत्थई आँखों को देखकर उन्हें वही स्वप्न याद आ गया। उन्होंने उसका नाम रखा— अदित्री। उनके लिए वह केवल एक बेटी नहीं, ईश्वर का आशीर्वाद थी। परंतु अदित्री के जीवन में सबसे बड़ा वरदान कोई और था— उसका बड़ा भाई आदित्य। रिश्तों की दुनिया में वह उसका भाई था, लेकिन जीवन की यात्रा में वही उसका पहला मित्र, पहला शिक्षक और पहला संरक्षक बन गया।
अदित्री जब पालने में लेटी रहती, तब आदित्य घंटों उसके पास बैठा रहता। उसने अपने छोटे-से कमरे में पुराना गिटार रखा था। कभी वह गिटार के तारों को छेड़ता, तो कभी माउथ ऑर्गन पर मीठी धुनें बजाता। वह मानता था कि शब्दों से पहले संगीत दिल तक पहुँचता है। धीरे-धीरे यह परिवार के लिए आश्चर्य का विषय बन गया। जैसे ही आदित्य गिटार उठाता, पालने में लेटी अदित्री के चेहरे पर मुस्कान खिल जाती। वह अपने नन्हे हाथ हवा में लहराने लगती। उसकी गोल-कत्थई आँखें आधी बंद हो जातीं और कुछ ही क्षणों में वह गहरी नींद में चली जाती। लेकिन यदि किसी दिन पिता या परिवार का कोई अन्य सदस्य वही गिटार उठाकर वही धुन बजाने का प्रयास करता, तो अदित्री तुरंत आँखें खोल देती। वह चारों ओर देखने लगती, मानो पूछ रही हो— "मेरा भैया कहाँ है?" कभी-कभी वह रो भी पड़ती। तब आदित्य मुस्कुराते हुए गिटार अपने हाथ में लेता। जैसे ही उसकी उँगलियाँ तारों को छूतीं, वातावरण बदल जाता। अदित्री शांत हो जाती। उसकी आँखों में फिर वही विश्वास लौट आता।
परिवार समझ गया कि यह केवल संगीत नहीं था। यह दो आत्माओं के बीच पहचान का वह अदृश्य सेतु था जिसे शब्दों में बाँधना संभव नहीं। आदित्य अक्सर अपनी बहन से बातें भी करता, जबकि वह अभी बोलना नहीं सीख पाई थी। "अदित्री, एक दिन मैं तुम्हें पेड़ों की भाषा सिखाऊँगा।" "हम दोनों बादलों को गिनेंगे।" "तुम्हें चिड़ियों के गीत सुनाऊँगा।" "और याद रखना, दुनिया में सबसे बड़ी ताकत किसी को हराना नहीं, बल्कि किसी के चेहरे पर मुस्कान लाना है।" अदित्री उत्तर नहीं दे पाती थी, पर उसकी मुस्कान ही उसका उत्तर होती। धीरे-धीरे पिता को यह समझ आने लगा कि उन्होंने जिस मानव जीवन को केवल कर्मों का फल समझा था, उसका दूसरा पक्ष भी है। यदि मनुष्य में करुणा हो... यदि उसके भीतर संगीत हो... यदि वह किसी दूसरे के जीवन में आशा का दीप जला सके... तो यही मानव जन्म ईश्वर का सबसे सुंदर उपहार बन जाता है। उन्हें अपने गुरु के शब्द फिर याद आए, लेकिन इस बार उनका अर्थ कुछ और ही प्रतीत हुआ।
हाँ, मनुष्य अपने कर्मों का फल भोगने पृथ्वी पर आता है। किन्तु उसी पृथ्वी पर उसे प्रेम करना, सृजन करना, किसी का हाथ थामना और किसी के जीवन में प्रकाश भरना भी सीखना होता है। उस छोटे-से घर में अब दो सुर गूँजते थे— एक गिटार के तारों का... और दूसरा भाई-बहन के निर्मल प्रेम का। शायद ईश्वर भी जब उस घर की ओर देखता होगा, तो मुस्कुराकर कहता होगा— "यही वह संगीत है, जिसमें मानव जीवन की सबसे बड़ी सुंदरता छिपी है।"
- डॉ अतुल गोयल,
सहायक आचार्य, अर्थशास्त्र
बुन्देलखण्ड विश्वविद्यालय, झाँसी
8795745410 ,datulgoyal@gmail.com


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