कैकसी: उस माँ की कहानी जिसके गर्भ से रावण जन्मा रात काफी उतर चुकी थी। समुद्र की तरफ से आती हवा में नमक की गंध थी और दूर कहीं लहरें चट्टानों से टकराकर
कैकसी: उस माँ की कहानी जिसके गर्भ से रावण जन्मा
रात काफी उतर चुकी थी।
समुद्र की तरफ से आती हवा में नमक की गंध थी और दूर कहीं लहरें चट्टानों से टकराकर लौट रही थीं। उस समय लंका वैसी नहीं थी जैसी बाद के वर्षों में लोगों ने उसके बारे में सुनी। सोने की दीवारें थीं, ऊँचे भवन थे, राक्षसों का पुराना वैभव था, लेकिन उस वैभव पर किसी और का अधिकार था।
कैकसी को यह बात बचपन से मालूम थी।
उसने लंका को अपने घर की तरह देखा था, पर अपना घर नहीं कह सकी थी।
उसके पिता सुमाली कभी उस लंका के स्वामी रहे थे। फिर परिस्थितियाँ बदलीं। देवताओं और राक्षसों के बीच संघर्ष हुआ। विष्णु के भय से सुमाली अपने लोगों के साथ रसातल चला गया। लंबे समय तक उसने वहीं रहकर समय काटा। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में सुमाली के इस पलायन और बाद में दशग्रीव के बल प्राप्त करने के बाद उसके पुनः उभरने का वर्णन मिलता है।
लेकिन बच्ची कैकसी के लिए इन घटनाओं का अर्थ इतना सरल नहीं था।
उसे केवल इतना समझ आता था कि उसके पिता के चेहरे पर जब भी लंका का नाम आता, उनकी आँखों में कोई पुरानी आग चमक उठती थी।
वह आग उसे डराती भी थी और खींचती भी।
सुमाली की सभा में बैठे बूढ़े राक्षस जब पुराने दिनों की बातें करते, तब कैकसी चुपचाप सुनती रहती।
वह समय फिर आएगा।
लंका वापस लेनी होगी।
हमारे लोग दूसरों के अधीन कब तक रहेंगे?
ऐसी बातें वह बहुत छोटी उम्र से सुनती आई थी।
कभी-कभी उसे लगता, लंका कोई नगर नहीं है। वह उसके पिता के मन में दबा हुआ एक घाव है।
और घाव जितना पुराना होता है, उतना ही चुपचाप दर्द करता है।
कैकसी बड़ी हुई तो उसके भीतर भी एक अजीब बेचैनी पैदा होने लगी।
वह अपने पिता जैसी नहीं थी। उसमें सुमाली की तरह हर समय शक्ति की बात करने का स्वभाव नहीं था। लेकिन उसने अपने चारों ओर जो देखा था, उससे वह यह जरूर समझ गई थी कि इस संसार में केवल अच्छा होना काफी नहीं है।
जिसके पास शक्ति नहीं होती, उसकी अच्छाई भी दूसरे की इच्छा पर निर्भर हो जाती है।
शायद यही विचार उसके मन में सबसे गहरे बैठा।
वह अपने लिए ऐसा जीवन नहीं चाहती थी जिसमें उसे किसी के सामने हाथ फैलाना पड़े।
लेकिन जीवन अपने फैसले केवल इच्छा से नहीं करता।
एक दिन सुमाली ने उसे बुलाया।
कैकसी उसके सामने जाकर बैठ गई।
पिता ने कुछ देर तक उसे देखा।
तुम अब बच्ची नहीं रहीं।
कैकसी मुस्कराई नहीं।
यह बात मुझे मालूम है।
सुमाली ने उसके उत्तर पर ध्यान नहीं दिया।
तुम्हें अपने विवाह के बारे में सोचना होगा।
कैकसी चुप रही।
कुछ देर बाद उसने पूछा, आपने सोच लिया है?
सुमाली ने पहली बार उसकी आँखों में देखा।
हाँ।
किससे?
विश्रवा से।
कैकसी के चेहरे पर हल्का-सा बदलाव आया।
विश्रवा।
नाम उसने सुना था।
वह किसी सामान्य पुरुष का नाम नहीं था। वह ऋषि था। पुलस्त्य का पुत्र। तपस्वी। विद्वान। उसका पुत्र वैश्रवण अर्थात कुबेर था, जो उस समय वैभव और प्रतिष्ठा के शिखर पर था।
कैकसी ने धीमे से पूछा, वही विश्रवा?
हाँ।
और उन्होंने मुझे देखा भी नहीं।
सुमाली के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
हर विवाह पहले देख लेने से नहीं होता।
कैकसी ने पिता की तरफ देखा।
तो फिर यह विवाह किसलिए होगा?
सुमाली ने उत्तर देने में देर की।
तुम्हारे लिए भी और हमारे लिए भी।
बस इतना।
लेकिन कैकसी समझ गई।
उस रात उसे नींद नहीं आई।
वह अपने पिता से नाराज नहीं थी। शायद नाराज होने का अधिकार भी उसे नहीं लगता था। उसने सुमाली की आँखों में वह बेचैनी देखी थी जिसे कोई बेटी पूरी तरह अनदेखा नहीं कर सकती।
लेकिन उसके मन में एक सवाल था।
क्या वह केवल किसी पुराने राज्य को वापस पाने की योजना का हिस्सा बनने जा रही है?
क्या उसका अपना जीवन उसका अपना रहेगा?
और अगर वह ऐसे पुरुष के साथ जाएगी जिसे उसने कभी जाना तक नहीं, तो क्या वह उसे स्वीकार करेगा?
इन सवालों का कोई उत्तर उसके पास नहीं था।
अगले दिन सुमाली ने उसे फिर बुलाया।
विश्रवा तप में रहते हैं।
मुझे पता है।
उनके पास धन नहीं है।
कैकसी ने पिता को देखा।
आपको धन चाहिए भी नहीं।
सुमाली हँसा।
मुझे धन से ज्यादा कुछ चाहिए।
क्या?
ऐसी संतान जो हमारे वंश को फिर से खड़ा कर सके।
कैकसी बहुत देर तक चुप रही।
फिर उसने पूछा, अगर संतान वैसी न हुई तो?
सुमाली ने उत्तर नहीं दिया।
यही चुप्पी कैकसी को सबसे अधिक याद रही।
क्योंकि उस चुप्पी में एक पूरा भविष्य छिपा था।
विश्रवा का आश्रम सुमाली की दुनिया से बिल्कुल अलग था।
वहाँ न हथियारों की खनक थी, न विजय की बातें।
सुबह अग्नि जलती।
शिष्य वेदपाठ करते।
वन में पक्षियों की आवाज आती।
कैकसी पहली बार उस संसार में पहुँची तो उसे लगा जैसे वह किसी दूसरे लोक में आ गई है।
वह अपने साथ राक्षस कुल की पहचान लेकर आई थी, लेकिन आश्रम में उसकी पहचान का कोई विशेष अर्थ नहीं था।
यहाँ उसके पिता का नाम किसी को प्रभावित नहीं करता था।
यहाँ तप का अपना नियम था।
विश्रवा ने जब उसे देखा तो कुछ देर शांत रहे।
कैकसी ने सिर झुका लिया।
वह अपने मन की बात कहने आई थी, लेकिन अचानक उसे लगा कि शब्द गले में अटक गए हैं।
विश्रवा ने पूछा, तुम क्या चाहती हो?
कैकसी ने उनकी ओर देखा।
मैं आपके पास आई हूँ।
यह तो मैं देख रहा हूँ।
उनके स्वर में कठोरता नहीं थी।
कैकसी ने धीरे से कहा, मैं ऐसे पुत्र चाहती हूँ जो महान हों।
विश्रवा कुछ क्षण चुप रहे।
फिर उन्होंने कहा, महानता कैसी?
कैकसी उस प्रश्न के लिए तैयार नहीं थी।
जो शक्तिशाली हों।
शक्ति ही महानता है?
वह चुप हो गई।
विश्रवा ने फिर पूछा, तुम्हें पुत्र चाहिए या शक्ति?
कैकसी ने उनकी ओर देखा।
इस बार वह तुरंत उत्तर नहीं दे सकी।
क्योंकि शायद पहली बार किसी ने उसके मन के भीतर छिपी बात उससे पूछ ली थी।
उसने बहुत धीरे कहा, दोनों।
विश्रवा ने आँखें बंद कर लीं।
वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में इसी प्रसंग में कैकसी विश्रवा से अपनी इच्छा व्यक्त करती है। विश्रवा उसके समय और उसके आने के कारण को देखकर यह संकेत देते हैं कि उससे उत्पन्न होने वाली संतानें उग्र स्वभाव की होंगी। कैकसी भयभीत होकर ऐसे पुत्र नहीं चाहती, और तब विश्रवा कहते हैं कि उसके अंतिम पुत्र का स्वभाव उनके वंश के अनुरूप और धर्मात्मा होगा।
यह प्रसंग छोटा है।
लेकिन कैकसी के पूरे जीवन को समझने के लिए शायद यही सबसे महत्वपूर्ण क्षण है।
क्योंकि उसने जिस शक्ति की इच्छा की थी, उसी इच्छा के भीतर भविष्य की त्रासदी का बीज भी था।
समय बीतता गया।
पहले पुत्र का जन्म हुआ।
वह सामान्य बालक जैसा नहीं था।
वाल्मीकि रामायण में उसके रूप का वर्णन असाधारण और भयंकर रूप में मिलता है। उसे दशग्रीव कहा गया है।
कैकसी ने जब पहली बार उसे अपनी गोद में लिया तो उसके भीतर भय नहीं था।
माँ अपने बच्चे को देखकर पहले उसका भविष्य नहीं देखती।
वह केवल उसका चेहरा देखती है।
उँगलियाँ देखती है।
उसकी साँस सुनती है।
कैकसी ने भी यही किया।
उसने बच्चे की हथेली अपने अंगूठे से छुई।
इतना छोटा।
उसने धीरे से कहा।
विश्रवा पास खड़े थे।
उन्होंने बच्चे को देखा।
यह छोटा है, उन्होंने कहा, लेकिन इसके भीतर बहुत कुछ होगा।
कैकसी ने पूछा, अच्छा?
विश्रवा ने उसकी तरफ देखा।
यह तुम्हारे हाथ में नहीं होगा।
कैकसी ने कुछ नहीं कहा।
माँ के लिए यह सुनना आसान नहीं होता कि उसका बच्चा उसके हाथ में नहीं होगा।
वह उसे दूध पिलाती है, उसके रोने पर उठती है, रात में उसकी नींद देखती है। लेकिन उसी समय कोई ऋषि कह दे कि यह बालक अपने रास्ते का स्वयं चुनाव करेगा, तो मन में एक अनजाना डर बैठ जाता है।
कैकसी के मन में भी बैठा।
फिर कुंभकर्ण आया।
उसका शरीर विशाल था, भूख प्रचंड।
कैकसी अक्सर उसे देखकर हँस देती।
यह तो घर का सारा अन्न खा जाएगा।
विश्रवा कभी-कभी कहते, तुम्हें अभी से चिंता होने लगी?
आपको नहीं होती?
मुझे उसकी भूख से नहीं, उसके मन से होगी।
कैकसी उन्हें देखती।
आप हर बात को इतना गंभीर क्यों बना देते हैं?
विश्रवा मुस्करा देते।
क्योंकि तुम हर बात को माँ की आँख से देखती हो।
कैकसी के पास इसका कोई उत्तर नहीं था।
फिर एक कन्या जन्मी।
शूर्पणखा।
उसका जन्म घर के भीतर एक अलग हलचल लेकर आया।
कैकसी ने उसे अपनी छाती से लगा लिया।
मेरी बेटी।
यह कहते हुए उसके चेहरे पर पहली बार वैसी प्रसन्नता आई जैसी उसने लंबे समय बाद महसूस की थी।
वह चाहती थी कि उसकी बेटी भाइयों से अलग जीवन पाए।
लेकिन कौन जानता था कि वही लड़की आगे चलकर पंचवटी में राम और लक्ष्मण से मिलेगी और उसके जीवन की एक घटना पूरे राक्षस वंश को युद्ध की ओर धकेल देगी।
फिर सबसे छोटा पुत्र आया।
विभीषण।
उसके जन्म के बारे में वाल्मीकि रामायण कहती है कि वह धर्मात्मा था, स्वाध्याय और संयम में स्थित रहता था।
कैकसी ने उसे देखा तो उसे कुछ अलग लगा।
वह खुद यह नहीं बता सकती थी कि क्या।
दशग्रीव को गोद में लेने पर उसे लगता था जैसे कोई अग्नि हाथ में है।
कुंभकर्ण को उठाने पर लगता था जैसे कोई पहाड़ उसके घर में जन्मा है।
शूर्पणखा को देखकर उसे अपनी ही बेचैनी का प्रतिबिंब दिखाई देता था।
और विभीषण को देखकर उसके भीतर शांति उतरती थी।
एक शाम उसने विश्रवा से पूछा, चारों इतने अलग क्यों हैं?
विश्रवा ने कहा, क्योंकि जन्म एक हो सकता है, स्वभाव नहीं।
तो क्या हम उन्हें बदल नहीं सकते?
तुम माँ हो। तुम उन्हें दिशा दे सकती हो।
और अगर वे मेरी बात न मानें?
विश्रवा कुछ देर चुप रहे।
तब तुम्हें उन्हें उनके निर्णयों के साथ जीना सीखना होगा।
कैकसी को यह उत्तर अच्छा नहीं लगा।
माँ को यह स्वीकार करना कठिन होता है कि बच्चे उसके अधिकार में हमेशा नहीं रहते।
लेकिन जीवन यही करता है।
बच्चे धीरे-धीरे माँ की गोद से निकलकर अपने निर्णयों के संसार में चले जाते हैं।
बचपन के वे वर्ष शायद कैकसी के जीवन के सबसे शांत वर्ष थे।
उसे तब यह नहीं मालूम था कि एक दिन उसका बड़ा बेटा तीनों लोकों को चुनौती देगा।
उसे यह भी नहीं मालूम था कि उसका सबसे छोटा बेटा उसी भाई के विरुद्ध खड़ा होगा।
उस समय तो घर में रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातें थीं।
दशग्रीव को पढ़ाई से अधिक तर्क करना पसंद था।
वह विश्रवा से प्रश्न पर प्रश्न करता।
यह मंत्र ऐसा ही क्यों है?
देवताओं को यह अधिकार किसने दिया?
यदि कोई बलवान है तो वह शासन क्यों न करे?
विश्रवा कई बार उसे देखते रहते।
तुम्हें हर बात का उत्तर चाहिए?
हाँ।
और अगर उत्तर तुम्हारे मन का न हो?
दशग्रीव मुस्कराता।
तो मैं दूसरा प्रश्न पूछूँगा।
कैकसी दूर बैठी सुनती रहती।
उसे अपने बेटे की बुद्धि पर गर्व होता।
कभी-कभी वही गर्व उसे डराता भी।
कुंभकर्ण का संसार अलग था।
उसे भोजन, बल और नींद से प्रेम था।
लेकिन वह केवल भोगी नहीं था। उसके भीतर अपने भाइयों के लिए गहरा स्नेह था।
विभीषण सबसे अधिक शांत था।
वह प्रश्न करता तो प्रश्न के पीछे विचार होता।
शूर्पणखा सबसे जल्दी नाराज होती और सबसे जल्दी हँस भी देती।
चारों के बीच कभी झगड़ा होता, कभी खेल।
कैकसी कभी उन्हें डाँटती।
बस करो तुम लोग।
दशग्रीव कहता, पहले कुंभकर्ण ने शुरू किया।
कुंभकर्ण तुरंत जवाब देता, झूठ बोल रहा है।
शूर्पणखा हँसती।
विभीषण चुप रहता।
तुम कुछ बोलोगे भी?
कैकसी उसे देखती।
विभीषण मुस्कराकर कहता, माँ, मैं किसका पक्ष लूँ?
कैकसी भी हँस पड़ती।
किसी का नहीं। बस चुप रहो।
उस समय कौन जानता था कि यही शांत लड़का आगे चलकर अपने ही भाई के सामने धर्म की बात करेगा।
एक दिन लंका से एक अद्भुत दृश्य उनके जीवन में आया।
कुबेर पुष्पक विमान पर बैठकर अपने पिता विश्रवा से मिलने आया।
वह वैभव से घिरा हुआ था।
उसकी उपस्थिति ने आश्रम का वातावरण बदल दिया।
कैकसी ने उसे देखा।
फिर अपने बच्चों को देखा।
दशग्रीव कुछ दूर खड़ा था।
उसकी आँखें कुबेर के वस्त्रों, आभूषणों और विमान पर टिक गईं।
कैकसी के भीतर कुछ हिला।
वह भावना शायद मातृत्व थी।
शायद तुलना।
शायद अपने पिता की पुरानी आकांक्षा।
या शायद तीनों।
वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में यही वह प्रसंग है जहाँ कैकसी दशग्रीव को उसके सौतेले भाई वैश्रवण अर्थात कुबेर को देखकर प्रेरित करती है। वह उससे कहती है कि अपने भाई को देखो और अपने आपको भी उसी तरह तेजस्वी बनाओ। इसके बाद दशग्रीव के भीतर एक नई आकांक्षा जन्म लेती है।
कैकसी ने बेटे को पास बुलाया।
देखा?
दशग्रीव ने कुछ नहीं कहा।
वह तुम्हारा भाई है।
मुझे मालूम है।
देखो उसके पास क्या है।
दशग्रीव की आँखें विमान पर थीं।
बहुत कुछ।
कैकसी की आवाज धीमी हो गई।
और तुम?
दशग्रीव ने उसकी ओर देखा।
यहीं वह क्षण था जिसने उसके जीवन की दिशा बदल दी।
लेकिन कैकसी को उस समय इसका अनुमान नहीं था।
उसने अपने बेटे में अपमान की भावना पैदा की या महत्वाकांक्षा?
या दोनों?
शायद वह स्वयं भी नहीं जानती थी।
माँ कभी-कभी बच्चे को आगे बढ़ाने के लिए ऐसी बात कह देती है जिसका असर उसकी कल्पना से बहुत दूर चला जाता है।
कैकसी ने कहा, तुम्हें भी वैसा ही होना चाहिए।
दशग्रीव ने पूछा, क्यों?
कैकसी कुछ क्षण चुप रही।
क्योंकि तुम उसके भाई हो।
बस।
इतना ही।
लेकिन दशग्रीव ने उस एक वाक्य को अपने भीतर बहुत दूर तक उतार लिया।
उस रात उसने भोजन कम किया।
कैकसी ने पूछा, क्या हुआ?
कुछ नहीं।
तुम्हें देखकर लगता है कुछ हुआ है।
दशग्रीव ने उसकी तरफ देखा।
माँ, क्या मैं कुबेर से कम हूँ?
कैकसी चौंकी।
वह प्रश्न उसके पास वापस आ गया था।
जिस बात को उसने सहज भाव से कहा था, वह अब बेटे के मन में प्रश्न बन चुकी थी।
तुम कम क्यों होगे?
तो फिर उसके पास इतना सब क्यों है?
कैकसी के पास उत्तर नहीं था।
वह चाहती तो कह सकती थी कि कुबेर ने अपने कर्मों से प्राप्त किया है।
वह कह सकती थी कि हर व्यक्ति का भाग्य अलग है।
वह कह सकती थी कि धन ही सब कुछ नहीं।
लेकिन उसके अपने पिता ने उसे बचपन से क्या सिखाया था?
शक्ति।
सम्मान।
अपना अधिकार।
अपना स्थान।
उसके भीतर वर्षों से दबे शब्द अचानक बेटे के प्रश्न के सामने खड़े हो गए।
कैकसी ने धीरे से कहा, अगर तुम्हें लगता है कि तुम्हारे पास कम है, तो उसे पाने के लिए योग्य बनो।
दशग्रीव ने पूछा, कैसे?
तप करो।
विश्रवा ने दूर से यह बात सुनी।
उन्होंने कैकसी की ओर देखा।
कुछ नहीं कहा।
लेकिन उस दृष्टि में चिंता थी।
कैकसी ने भी वह चिंता देख ली।
उस रात पति-पत्नी के बीच बहुत देर तक बात नहीं हुई।
फिर विश्रवा ने कहा, तुमने उसे क्या दिया है?
कैकसी ने पूछा, क्या मतलब?
इच्छा?
हाँ।
और अगर इच्छा सीमा न जाने?
कैकसी चुप रही।
विश्रवा ने कहा, शक्ति पाने की इच्छा और शक्ति का उपयोग करने की समझ अलग चीजें हैं।
कैकसी ने धीरे से कहा, मैंने अपने बेटे को अपमानित नहीं देखा।
लेकिन तुमने उसे तुलना करना सिखा दिया।
कैकसी की आँखें भर आईं।
क्या माँ को अपने बेटे को बड़ा देखने का अधिकार नहीं?
विश्रवा ने उत्तर नहीं दिया।
कुछ देर बाद बोले, अधिकार है।
फिर वे शांत हो गए।
लेकिन बड़ा होना और सबसे बड़ा होना एक बात नहीं।
कैकसी ने करवट बदल ली।
उसे उस समय लगा कि विश्रवा उसकी भावना नहीं समझ रहे।
आज पीछे मुड़कर देखें तो शायद यही उनके बीच का सबसे बड़ा अंतर था।
कैकसी जीवन को अपने परिवार की दृष्टि से देखती थी।
विश्रवा परिणामों की दृष्टि से।
कुछ समय बाद दशग्रीव ने तपस्या का निश्चय कर लिया।
कुंभकर्ण और विभीषण भी उसके साथ चले।
तीनों भाइयों ने अलग-अलग संकल्प लिए।
कैकसी उन्हें जाते हुए देखती रही।
शूर्पणखा उसके पास खड़ी थी।
माँ।
क्या?
भैया कब आएँगे?
कैकसी ने दूर जाते तीनों को देखा।
जब उनका काम पूरा हो जाएगा।
कितने दिन?
कैकसी मुस्कराने की कोशिश करती है।
तुम्हारे लिए बहुत दिन।
शूर्पणखा ने उसका हाथ पकड़ लिया।
आप रो रही हैं?
नहीं।
झूठ।
कैकसी ने आँखें पोंछ लीं।
जा, अंदर जा।
शूर्पणखा नहीं गई।
माँ, क्या भैया वापस आएँगे?
कैकसी ने उसकी तरफ देखा।
इस बार उसने उत्तर देने में देर की।
हाँ।
उसे विश्वास था।
माँ को हमेशा होता है।
लेकिन कभी-कभी वही विश्वास भविष्य के सामने बहुत छोटा पड़ जाता है।
दशग्रीव की तपस्या बढ़ती गई।
उसके भीतर शक्ति पाने की इच्छा अब केवल व्यक्तिगत नहीं रही थी।
उसे लंका चाहिए थी।
उसे प्रतिष्ठा चाहिए थी।
उसे देवताओं के सामने अपना स्थान चाहिए था।
उत्तरकाण्ड की परंपरा में आगे बताया गया है कि दशग्रीव और उसके भाइयों की तपस्या के बाद ब्रह्मा से वर प्राप्त हुए और उसके बाद राक्षस शक्ति फिर से उभरने लगी। सुमाली भी इस परिवर्तन को पहचानकर रसातल से बाहर आया और दशग्रीव के पास पहुँचा।
कैकसी उस समय घर में थी।
उसका बेटा दूर था।
वह रोज उसके बारे में सोचती।
कभी उसे गर्व होता।
कभी डर।
कभी वह सोचती कि क्या उसने सचमुच उसे उस राह पर भेजा है जहाँ से लौटना कठिन होगा।
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
मनुष्य के कुछ निर्णय ऐसे होते हैं जिन्हें लेने के बाद वापस जाकर मिटाया नहीं जा सकता।
कैकसी के जीवन में वह निर्णय वही था।
कुबेर को देखकर उसने अपने बेटे से कहा था:
तुम्हें भी वैसा ही होना चाहिए।
उसने यह नहीं कहा था कि उससे आगे निकलो।
उसने यह नहीं कहा था कि उसका राज्य छीन लो।
उसने केवल इतना कहा था कि तुम भी वैसे ही तेजस्वी बनो।
लेकिन महत्वाकांक्षा को जब दिशा मिलती है तो वह अक्सर अपनी राह खुद चुन लेती है।
दशग्रीव लौटा तो वह वही बालक नहीं था जिसे कैकसी ने कभी गोद में उठाया था।
उसके चेहरे पर आत्मविश्वास था।
उसकी आँखों में कठोरता आ गई थी।
उसके पीछे राक्षसों की शक्ति थी।
कैकसी ने उसे देखा और कुछ क्षण के लिए गर्व से भर गई।
आ गए।
दशग्रीव ने माँ के चरण छुए।
कैकसी ने उसके सिर पर हाथ रखा।
तुम्हें देखकर लगता है जैसे बहुत दूर चले गए थे।
दशग्रीव मुस्कराया।
दूर गया था।
और अब?
अब मुझे कोई दूर नहीं कर सकता।
कैकसी ने उसकी आँखों में देखा।
वह कुछ कहना चाहती थी।
लेकिन उसने नहीं कहा।
क्योंकि कभी-कभी माँ अपने बड़े हो चुके बेटे के चेहरे में वह बच्चा खोजती रहती है जिसे वह जानती थी।
पर बच्चा जा चुका होता है।
उसके सामने अब एक पुरुष खड़ा होता है, जिसके अपने निर्णय होते हैं।
फिर वह समय आया जब लंका का प्रश्न उठा।
सुमाली ने दशग्रीव को समझाया कि लंका उसके पूर्वजों का नगर है।
पुत्र ने पहले संकोच किया।
कुबेर उसका भाई था।
लेकिन शक्ति बढ़ चुकी थी।
सुमाली ने उसे याद दिलाया कि राक्षसों का पुराना अधिकार क्या था।
उत्तरकाण्ड के सर्ग 11 में सुमाली स्वयं दशग्रीव के पास जाकर उसे लंका प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है और कहता है कि उसके द्वारा राक्षस वंश फिर उठ खड़ा हुआ है। प्रारंभ में दशग्रीव अपने मातामह की बात स्वीकार करने में संकोच करता है और कुबेर को अपना बड़ा भाई मानता है।
यहाँ कैकसी की कहानी फिर सामने आती है।
क्योंकि जिस तुलना ने उसके बेटे के मन में पहली बार प्रश्न जगाया था, अब वही प्रश्न राज्य की राजनीति बन चुका था।
कुबेर और दशग्रीव केवल दो भाई नहीं रहे थे।
वे दो अधिकारों के प्रतीक बन गए थे।
एक के पास लंका थी।
दूसरे के पास उसे पाने की शक्ति।
और माँ?
माँ अब बीच में नहीं थी।
कैकसी ने बेटे को जिस दिन कुबेर से तुलना करना सिखाया था, उसी दिन शायद अनजाने में उसने उस दूरी की पहली रेखा खींच दी थी।
लेकिन कैकसी की कहानी केवल अपराध की कहानी नहीं है।
उसे केवल रावण की महत्वाकांक्षा की जननी कहना भी अन्याय होगा।
वह एक ऐसी स्त्री थी जिसने अपने जीवन में असुरक्षा देखी थी।
जिसने अपने पिता को सत्ता से गिरते देखा।
जिसने अपने परिवार को छिपकर जीते देखा।
जिसने दूसरी ओर एक ऐसे भाई को देखा जिसके पास वैभव था।
उसने अपने बच्चों के लिए सुरक्षा चाही।
सम्मान चाहा।
शक्ति चाही।
लेकिन उसने यह नहीं समझा कि शक्ति का सबसे बड़ा खतरा उसकी कमी नहीं, उसका नशा होता है।
और शायद यही कैकसी की त्रासदी थी।
वह अपने बेटे को कमजोर नहीं देखना चाहती थी।
उसने उसे मजबूत बनने को कहा।
वह नहीं जानती थी कि एक दिन वही शक्ति उसके सामने उसके दूसरे बेटे को घर से निकाल देगी।
वही शक्ति उसके दूसरे पुत्र को युद्ध में भेज देगी।
वही शक्ति उसकी बेटी के अपमान को पूरे वंश के विनाश का कारण बना देगी।
और वही शक्ति अंत में उसके सबसे बड़े बेटे को अकेला कर देगी।
वर्षों बाद जब लंका में युद्ध की आहट थी, तब कैकसी के पास गर्व करने के लिए बहुत कुछ था।
उसका बेटा लंकाधिपति था।
उसकी शक्ति से देवता भी सावधान रहते थे।
राक्षस कुल ने अपना खोया हुआ वैभव पा लिया था।
लेकिन माँ की आँखें शायद उन दिनों दूसरी चीजें देख रही थीं।
घर में भय था।
विभीषण और रावण के बीच मतभेद बढ़ चुके थे।
कुंभकर्ण अपने भाई से प्रेम करता था, लेकिन हर बात से सहमत नहीं था।
मंदोदरी बार-बार रावण को समझाती थी।
शूर्पणखा की घटना ने सबको एक ऐसे युद्ध में पहुँचा दिया था जिसकी कीमत कोई ठीक से नहीं समझ पा रहा था।
और कैकसी?
वह अपने बेटे को देखती थी।
वही बेटा जिसके जन्म पर उसने उसकी छोटी-सी हथेली अपनी उँगली से छुई थी।
वही बेटा जो कभी पूछता था, माँ, क्या मैं कुबेर से कम हूँ?
अब वही रावण लंका का स्वामी था।
लेकिन उसके चारों ओर भाई कम होते जा रहे थे।
सत्ता बढ़ रही थी।
परिवार घट रहा था।
और शायद यही किसी भी साम्राज्य की सबसे बड़ी विडंबना होती है।
बाहर से वह जितना बड़ा दिखाई देता है, भीतर से उतना ही अकेला हो सकता है।
कैकसी ने अपने जीवन में यह बात बहुत देर से समझी।
जब विभीषण रावण का साथ छोड़कर राम के पास चला गया, तब कैकसी के लिए यह केवल राजनीतिक घटना नहीं रही होगी।
वह उसका छोटा बेटा था।
वही पुत्र जिसे विश्रवा ने धर्मात्मा होने का संकेत दिया था।
एक तरफ बड़ा बेटा।
दूसरी तरफ छोटा।
माँ किसे सही कहे?
किसे गलत?
अगर वह रावण को गलत कहती तो क्या वह अपने ही गर्भ को नकारती?
अगर विभीषण को गलत कहती तो क्या वह धर्म को नकारती?
यहीं कैकसी का चरित्र सबसे मानवीय बनता है।
क्योंकि जीवन में हमेशा दो पक्ष नहीं होते।
कई बार दोनों पक्ष अपने-अपने सत्य लेकर सामने खड़े होते हैं।
रावण का सत्य था परिवार, राज्य, अपमान और सत्ता।
विभीषण का सत्य था धर्म।
कैकसी का सत्य था माँ होना।
और माँ होना सबसे कठिन पक्ष था।
क्योंकि वह किसी एक को पूरी तरह खोना नहीं चाहती थी।
लेकिन युद्ध ने उससे यह चुनाव छीन लिया।
रावण का अंत हुआ।
लंका का वैभव बचा रहा, पर उसका स्वामी चला गया।
कैकसी ने अपने जीवन के सबसे बड़े पुत्र को खो दिया।
उस दिन शायद उसे अपने पुराने प्रश्न का उत्तर मिल गया होगा।
क्या शक्ति महानता है?
नहीं।
शक्ति केवल शक्ति है।
महानता उसके उपयोग से बनती है।
उसका बेटा महान शक्तिशाली था।
लेकिन उसकी शक्ति ने उसे महान नहीं बनाया।
और शायद यही कैकसी की सबसे बड़ी सीख थी।
वह अपने बेटे को महान बनाना चाहती थी।
लेकिन उसने उसे केवल शक्तिशाली बनने की राह दिखाई।
उसके बाद इतिहास ने बाकी काम स्वयं कर दिया।
कैकसी की कहानी को यदि केवल रावण की माँ कहकर समाप्त कर दिया जाए तो हम उस स्त्री के साथ न्याय नहीं करेंगे।
वह एक ऐसी माँ थी जिसके सामने अपने समय की राजनीति, अपने कुल का अपमान, अपने पिता की महत्वाकांक्षा, अपने पति की तपस्वी दृष्टि और अपने बच्चों के अलग-अलग स्वभाव एक साथ खड़े थे।
उसने गलतियाँ कीं।
उसने प्रेम किया।
उसने महत्वाकांक्षा जगाई।
उसने डर महसूस किया।
उसने अपने बच्चों पर गर्व किया।
और अंत में उसने यह भी देखा कि बच्चे केवल माँ की इच्छा से नहीं चलते।
कैकसी ने रावण को जन्म दिया था।
लेकिन रावण केवल कैकसी का बनाया हुआ नहीं था।
उसमें विश्रवा की विद्या थी।
सुमाली की महत्वाकांक्षा थी।
राक्षस कुल का पुराना अपमान था।
उसका अपना तेज था।
उसकी अपनी इच्छाएँ थीं।
और उसके अपने निर्णय थे।
यही बात इस कथा को अधिक सच्चा बनाती है।
किसी मनुष्य की पूरी नियति उसके माता-पिता अकेले नहीं लिखते।
वे उसे कुछ संस्कार देते हैं, कुछ घाव देते हैं, कुछ सपने देते हैं।
बाकी रास्ता वह स्वयं बनाता है।
कैकसी ने अपने बेटे को एक सपना दिया था।
उसे शायद यह अंदाजा नहीं था कि वह सपना एक दिन लंका के आकाश से भी बड़ा हो जाएगा।
और जब वह बहुत बड़ा हुआ, तो उसी में पूरा परिवार समा गया।
फिर वही सपना धीरे-धीरे सबको निगल गया।
समाप्त
स्रोत-संदर्भ
मुख्य पौराणिक स्रोत: वाल्मीकि रामायण, उत्तरकाण्ड, सर्ग 9। इसमें विश्रवा और कैकसी का प्रसंग, दशग्रीव का जन्म, कुंभकर्ण और शूर्पणखा का जन्म तथा विभीषण के धर्मनिष्ठ स्वभाव का वर्णन मिलता है। इसी सर्ग में कुबेर के आगमन और कैकसी द्वारा दशग्रीव को प्रेरित करने का प्रसंग भी है।
संबंधित स्रोत: वाल्मीकि रामायण, उत्तरकाण्ड, सर्ग 8। इसमें सुमाली के रसातल में रहने तथा बाद में राक्षस वंश के पुनरुत्थान की पृष्ठभूमि दी गई है।
संबंधित स्रोत: वाल्मीकि रामायण, उत्तरकाण्ड, सर्ग 11। इसमें सुमाली द्वारा दशग्रीव को लंका प्राप्त करने के लिए प्रेरित करना, दशग्रीव का प्रारंभिक संकोच और आगे लंका के प्रश्न का उठना वर्णित है।
कथा-निर्माण संबंधी टिप्पणी: ऊपर संवाद, वातावरण, मनोभाव, घरेलू दृश्य और पात्रों की आंतरिक प्रतिक्रियाएँ रचनात्मक पुनर्निर्माण हैं। उन्हें वाल्मीकि रामायण के प्रत्यक्ष उद्धरण या ऐतिहासिक तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। मूल घटनाओं और वंश-संबंधों को उपलब्ध पौराणिक स्रोतों के अनुरूप रखा गया है।
- राहत टीकमगढ़


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