जयशंकर प्रसाद की गुंडा कहानी का सारांश

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जयशंकर प्रसाद की गुंडा कहानी का सारांश कहानी का केंद्रीय पात्र नन्हकूसिंह है, जो काशी के प्रतिष्ठित जमींदार बाबू निरंजनसिंह का साहसी पुत्र है।

जयशंकर प्रसाद की गुंडा कहानी का सारांश


यशंकर प्रसाद की कहानी गुंडा हिन्दी साहित्य की उन कहानियों में गिनी जाती है जो प्रेमचंद-युग के आदर्शवाद से हटकर एक नए तरह के नायक को गढ़ती हैं, जिसे समाज अपराधी कहता है मगर जिसके भीतर वीरता, त्याग और निष्ठा जैसे गुण छिपे रहते हैं। गुंडा कहानी जयशंकर प्रसाद के पाँचवें कहानी-संग्रह "इन्द्रजाल" में संकलित है, जिसका प्रकाशन सन् 1936 ई. में भारती भंडार, इलाहाबाद से हुआ था, और इसमें कुल चौदह कहानियाँ संकलित हैं। यह कहानी अठारहवीं सदी के अंतिम दौर की काशी नगरी की पृष्ठभूमि पर रची गई है, ऐसे समय में जब अंग्रेजी शासन अपने पैर पसार रहा था, न्याय और तर्कशक्ति शस्त्रबल के आगे झुक रही थी, और तत्कालीन सामंती व्यवस्था अपनी ही जनता पर तरह-तरह के अत्याचार कर रही थी। ऐसी अराजकता और भय के माहौल में काशी में एक नया वर्ग उभरता है, जिसे आम लोग "गुंडा" के नाम से पुकारते हैं। इस वर्ग के लोगों का अपना एक विशिष्ट स्वभाव होता है, वे निडर होकर अन्याय और अत्याचार के खिलाफ खड़े होते हैं और निर्बलों तथा असहायों की रक्षा करना अपना धर्म मानते हैं, भले ही समाज की नजर में वे अपराधी या उपद्रवी समझे जाते हों।

जयशंकर प्रसाद की गुंडा कहानी का सारांश
कहानी का केंद्रीय पात्र नन्हकूसिंह है, जो काशी के प्रतिष्ठित जमींदार बाबू निरंजनसिंह का साहसी पुत्र है। एक संपन्न और सम्मानित परिवार में जन्म लेने के बावजूद नन्हकूसिंह का जीवन एक गहरे मानसिक आघात से प्रभावित होता है। वह मन ही मन पन्ना नाम की स्त्री से प्रेम करता था, परंतु राजा बलवंतसिंह ने बलपूर्वक पन्ना को अपनी रानी बना लिया। यह अधूरी और असफल प्रेम-कथा नन्हकूसिंह के जीवन की दिशा ही बदल देती है। उसके भीतर की टूटन और प्रतिशोध की भावना उसे साधारण नन्हकूसिंह से "गुंडा नन्हकूसिंह" में बदल देती है। यद्यपि वह राजा बलवंतसिंह से सीधा बदला कभी नहीं ले पाता, फिर भी उस अन्याय के प्रति उसके भीतर पनपी घृणा उसे संपत्ति और समाज दोनों से विरक्त कर देती है, और वह अपना धन-वैभव पानी की तरह लुटाने लगता है। वह अपने साथियों के साथ स्वाभिमान और निर्भयता से काशी की गलियों में विचरण करता है, समाज की सुव्यवस्थित संरचना और उसके भीतर छिपे अन्याय दोनों से बेपरवाह।

कहानी में एक और महत्वपूर्ण पात्र है दुलारी, जो एक गायिका है और जिसके माध्यम से नन्हकूसिंह और राजमाता पन्ना के बीच का सूक्ष्म भावनात्मक सम्बन्ध पाठकों के सामने आता है। पन्ना, जो अब राजा चेतसिंह की माता और रामनगर की राजमाता बन चुकी है, अपने पुत्र चेतसिंह के साथ काशी में उस समय के आतंक और अनिश्चितता भरे माहौल में लगभग बंदी जैसी स्थिति में रहती है, क्योंकि अंग्रेज अधिकारी हेस्टिंग्स के आदेश पर उन्हें बलपूर्वक कलकत्ता भेजे जाने की तैयारी हो रही होती है। दुलारी से नन्हकूसिंह का बखान सुनकर पन्ना का मन अतीत की उस अधूरी संभावना की ओर लौट जाता है, जब उसका विवाह बलवंतसिंह के बजाय नन्हकूसिंह से हो सकता था। यह हल्की सी कसक उसके मन में हमेशा बनी रहती है, भले ही वह इसे कभी खुलकर व्यक्त नहीं कर पाती।

जब दुलारी के माध्यम से नन्हकूसिंह को यह पता चलता है कि राजमाता पन्ना और राजा चेतसिंह संकट में हैं और अंग्रेजी सैनिक उन्हें बलपूर्वक ले जाने की तैयारी में हैं, तो उसका मन बेचैन हो उठता है। बरसों की दूरी और सामाजिक भेद को भुलाकर वह तुरंत अपने साथियों को लेकर उनकी रक्षा के लिए निकल पड़ता है। शिवालय घाट पर पहुँचकर जब नन्हकूसिंह और पन्ना की आँखें एक क्षण के लिए मिलती हैं, तो उस क्षण में वर्षों पुराना अव्यक्त विश्वास और स्नेह जैसे फिर से जाग्रत हो उठता है। यही क्षण कहानी का सबसे मार्मिक बिंदु है, जहाँ नन्हकूसिंह का "गुंडापन" पूरी तरह "सेवाभाव" में बदल जाता है। वह अपने प्राणों की परवाह किए बिना पन्ना और चेतसिंह को खिड़की के रास्ते नदी में खड़ी नाव तक पहुँचाकर सुरक्षित निकाल देता है, और स्वयं फाटक पर डटकर अंग्रेज सैनिकों की संगीनों का सामना अकेले करता है।असंख्य वार सहते हुए भी वह पीछे नहीं हटता, अंततः अपने ही रक्त से लथपथ होकर वह वीरगति को प्राप्त होता है।

इस तरह "गुंडा" कहानी में जयशंकर प्रसाद ने काशी के उस विशेष वर्ग की मार्मिक झलक प्रस्तुत की है, जो सामाजिक दृष्टि से भले ही उपेक्षित और तिरस्कृत रहा हो, परन्तु जिसके भीतर स्वाभिमान, साहस, त्याग और निष्ठा जैसे मानवीय गुण गहराई से बसे हुए हैं। नन्हकूसिंह का चरित्र एक ऐसे विद्रोही नायक के रूप में उभरता है जो व्यक्तिगत पीड़ा और सामाजिक अन्याय दोनों से जूझते हुए भी अंततः प्रेम और कर्तव्य के लिए अपना सर्वस्व अर्पित कर देता है। साथ ही यह कहानी उस दौर की सामंती निरंकुशता, साम्राज्यवादी दमन, और स्त्री की पराधीनता जैसे गंभीर सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों को भी परोक्ष रूप से छूती है, जिससे यह केवल एक प्रेम या वीरता की कथा न रहकर अपने समय के व्यापक ऐतिहासिक यथार्थ का प्रतिबिंब बन जाती है।

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