यह कहा जा सकता है कि भूस्खलन को पूर्णतः प्राकृतिक आपदा मान लेना उतना ही भ्रामक है, जितना इसे पूर्णतः मानवजनित मान लेना।
भूस्खलन : कितना मानवजनित, कितना प्राकृतिक
पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए भूस्खलन कोई नई घटना नहीं है, किंतु पिछले कुछ दशकों में इसकी आवृत्ति और विनाशकारी क्षमता में जिस तेजी से वृद्धि हुई है, उसने वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं और आम जनमानस के बीच एक गंभीर बहस को जन्म दिया है — क्या भूस्खलन मूलतः प्रकृति की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, अथवा यह मानव की अदूरदर्शी गतिविधियों का परिणाम बनता जा रहा है। सच्चाई यह है कि भूस्खलन एक बहुकारणीय घटना है, जिसमें प्राकृतिक और मानवजनित दोनों कारक इतने गहराई से गुंथे हुए हैं कि किसी एक विशेष घटना के लिए पूर्णतः किसी एक कारण को उत्तरदायी ठहराना अक्सर संभव नहीं होता।
प्रकृति की दृष्टि से देखा जाए तो पर्वत निर्माण की प्रक्रिया स्वयं में अस्थिरता का एक तत्व लिए हुए है। हिमालय जैसी युवा पर्वत श्रृंखलाएँ आज भी भूगर्भीय दृष्टि से सक्रिय हैं, क्योंकि भारतीय प्लेट लगातार यूरेशियाई प्लेट के नीचे धँसती जा रही है। इस निरंतर संचलन के कारण चट्टानों में दरारें पड़ना, भूकंपीय गतिविधियों का होना और भूमि की संरचना का कमजोर होना स्वाभाविक है। इसके अतिरिक्त भारी वर्षा, विशेषकर मानसून के दौरान होने वाली अतिवृष्टि, मिट्टी में जल की मात्रा को इतना बढ़ा देती है कि ढाल पर टिकी हुई मिट्टी और चट्टानें अपनी पकड़ खो बैठती हैं और नीचे की ओर खिसक जाती हैं। हिमनदों का पिघलना, बर्फ के जमने-पिघलने का चक्र, तथा भूकंप के झटके भी इस प्रक्रिया को गति देते हैं। इस अर्थ में यह कहना अनुचित नहीं होगा कि भूस्खलन धरती की आंतरिक और बाह्य शक्तियों के बीच संतुलन बनाने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, जो मनुष्य के धरती पर आने से बहुत पहले से चली आ रही है।
परंतु आधुनिक युग में जिस पैमाने पर और जिस आवृत्ति से भूस्खलन की घटनाएँ सामने आ रही हैं, उसे केवल प्राकृतिक कारणों से नहीं समझाया जा सकता। विकास की अंधी दौड़ में पहाड़ों को जिस निर्ममता से छेड़ा गया है, उसने इस समस्या को कई गुना बढ़ा दिया है। सड़कों और राजमार्गों के निर्माण के लिए पहाड़ों की कटाई करते समय अक्सर वैज्ञानिक सिद्धांतों की उपेक्षा की जाती है। ढाल के प्राकृतिक कोण को बिना समझे भारी मशीनों से पहाड़ काटे जाते हैं, जिससे चट्टानों की स्वाभाविक संरचना टूट जाती है और वे अस्थिर हो जाती हैं। जल-विद्युत परियोजनाओं के लिए बड़ी-बड़ी सुरंगें खोदी जाती हैं और नदियों के प्रवाह को बदला जाता है, जिससे भूमिगत जल स्तर और चट्टानों के भीतर का दबाव असंतुलित हो जाता है। इसके साथ ही वनों की अंधाधुंध कटाई ने स्थिति को और भी विकट बना दिया है, क्योंकि पेड़ों की जड़ें मिट्टी को बांधे रखने का काम करती हैं और जब वृक्षों का आवरण हट जाता है तो मिट्टी ढीली होकर बहने लगती है।
पर्यटन के नाम पर पहाड़ी नगरों में जिस प्रकार अनियोजित निर्माण हो रहा है, वह भी एक बड़ा कारण बनकर उभरा है। होटलों, रिसॉर्ट्स और आवासीय भवनों का निर्माण करते समय भूमि की भार वहन क्षमता का आकलन किए बिना ही निर्माण कार्य किया जाता है। जोशीमठ जैसी घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि किस प्रकार अनियंत्रित निर्माण, जल निकासी व्यवस्था की अनदेखी और भूमिगत जल के अवैज्ञानिक दोहन ने एक संपूर्ण नगर को भू-धंसाव और भूस्खलन के खतरे में डाल दिया। इसके अतिरिक्त जलवायु परिवर्तन, जो स्वयं में काफी हद तक मानवजनित है, वर्षा के पैटर्न को अनियमित और अप्रत्याशित बना रहा है, जिससे अल्प समय में अत्यधिक वर्षा होने की घटनाएँ बढ़ रही हैं। यह अतिवृष्टि, जो मूलतः एक प्राकृतिक घटना प्रतीत होती है, वास्तव में मानव द्वारा उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों और बदलते वैश्विक तापमान का परिणाम है। इस प्रकार यह स्पष्ट होता है कि प्राकृतिक और मानवजनित कारणों के बीच की रेखा कहीं-कहीं इतनी धुंधली हो जाती है कि दोनों को अलग करना लगभग असंभव हो जाता है।
यदि गहराई से विश्लेषण किया जाए तो यह समझ में आता है कि प्रकृति भूस्खलन के लिए मंच अवश्य तैयार करती है, परंतु मनुष्य अपनी गतिविधियों से उस प्रक्रिया को समय से पहले और अधिक विनाशकारी रूप में घटित कर देता है। एक ऐसा ढाल जो शायद अगले सौ वर्षों में स्वाभाविक रूप से धीरे-धीरे स्थिर होता, मानवीय हस्तक्षेप के कारण कुछ ही वर्षों में ढह जाता है। इसलिए विशेषज्ञ प्रायः यह मानते हैं कि आज होने वाले अधिकांश बड़े भूस्खलनों में प्राकृतिक कारण एक पृष्ठभूमि की तरह कार्य करते हैं, जबकि मानवीय गतिविधियाँ उस घटना को गति देने वाला तात्कालिक कारण बनती हैं।
अंततः यह कहा जा सकता है कि भूस्खलन को पूर्णतः प्राकृतिक आपदा मान लेना उतना ही भ्रामक है, जितना इसे पूर्णतः मानवजनित मान लेना। यह वास्तव में प्रकृति की अंतर्निहित अस्थिरता और मनुष्य की अदूरदर्शी विकास नीतियों के मिलन का परिणाम है। यदि हमें पर्वतीय क्षेत्रों को भविष्य में इस बढ़ते हुए खतरे से बचाना है, तो विकास की योजनाओं में भूगर्भीय अध्ययन, पारिस्थितिक संतुलन और सतत विकास के सिद्धांतों को केंद्र में रखना अनिवार्य होगा, अन्यथा प्रकृति की चेतावनियाँ अनसुनी करने का परिणाम मानव सभ्यता को ही भुगतना पड़ेगा।


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