अप्सरा उपन्यास की तात्विक समीक्षा | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

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छायावाद के प्रमुख स्तंभ सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' का 'अप्सरा' उनका पहला उपन्यास है, जो 1931 ई० में प्रकाशित हुआ था।

अप्सरा उपन्यास की तात्विक समीक्षा | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'


प्सरा निराला कृत एक सामाजिक उपन्यास है जिसका प्रकाशन सन् 1931 ई. में गंगा पुस्तक माला कार्यालय, लखनऊ से पहली बार हुआ था।इस उपन्यास को निराला जी का प्रथम उपन्यास होने का गौरव प्राप्त है तथा इसमें उपन्यासकार ने तत्कालीन समय में अंग्रेजों की निरंकुशता तथा भारतीयों में व्याप्त स्वातंत्र्य चेतना का विवेचन औपन्यासिक कथानक के माध्यम से किया है।
 
सामान्यत: उपन्यास के छः तत्त्व माने गये हैं- 
  • कथावस्तु, 
  • देशकाल और वातावरण, 
  • कथोपकथन अथवा संवाद योजना, 
  • भाषा-शैली, 
  • पात्र और चरित्र-चित्रण, 
  • उद्देश्य ।
यहाँ हम अप्सरा की समीक्षा इन्हीं तत्त्वों के आधार पर करेंगे -

कथावस्तु

कथावस्तु उपन्यास की रीढ़ होती है। कथानक के बिना उपन्यास की रचना नहीं हो सकती है। कथावस्तु में एक मुख्य कथा होती है, शेष प्रासंगिक कथाएँ होती हैं जो मुख्य कथा को पुष्ट करती हैं। वही कथावस्तु अच्छी मानी जाती है जो घटना बहुल हो तथा जिसकी घटनाएँ कार्य-कारण श्रृंखला में जुड़ी हों । उपन्यास की कथावस्तु विस्तृत होती है किन्तु जहाँ तक सम्भव हो उसे अनावश्यक विस्तार से बचना चाहिए । कथावस्तु रोचक, कौतूहलवर्धक एवं सोद्देश्य होनी चाहिए। एक अच्छा कथाकार कथावस्तु का स्थूल ढाँचा पहले ही तैयार कर लेता है और फिर उसमें आवश्यकतानुरूप परिवर्तन-परिवर्द्धन करके उपन्यास की कथावस्तु तैयार करता है।
 
अप्सरा उपन्यास की तात्विक समीक्षा | सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
अप्सरा उपन्यास का कथानक अधिक विस्तृत नहीं है । कथानक का मूल ढाँचा कनक और राजकुमार की प्रेमकथा पर आधारित है । कनक एक अत्यंत रूपवती गंधर्व कुमारिका है । उसकी माता सर्वेश्वरी देवी की प्रसिद्धि एक नाचने-गाने वाली तवायफ के रूप में दूर-दूर तक व्याप्त है । वह चाहती है कि उसकी पुत्री भी अपने खानदानी व्यवसाय को अपनाकर अपार सम्पत्ति अर्जित करे किन्तु कनक राजकुमार से प्रेम करने लगती है जो एक कॉलेज में हिन्दी का प्रोफेसर है और शौकिया नाट्यकर्मी है। कनक की रक्षा एक अंग्रेज हैमिल्टन से राजकुमार ने की और उन दोनों का परिचय हुआ । तत्पश्चात् राजकुमार के लिखे शकुंतला नाटक का मंचन कोहेनूर थियेटर में किया गया जिसमें राजकुमार ने दुष्यंत का तथा कनक ने शकुंतला का पार्ट-प्ले किया । पुलिस ने हैमिल्टन के कहने पर नाटक से निकलते ही राजकुमार को गिरफ्तार करवा दिया किन्तु कनक ने अपने प्रयासों से राजकुमार को रिहा करवा दिया। राजकुमार का एक मित्र चंदन लखनऊ में किसानों को संगठन करते समय गिरफ्तार हो गया था जब यह समाचार राजकुमार को मिला तब स्मरण उसे यह हो आया कि उसने चन्दन के साथ प्रतिज्ञा की थी कि वे देश सेवा का कार्य करेंगे, भोग विलास से दूर रहेंगे । अब कनक का साथ पाकर उसे अपनी प्रतिज्ञा टूटती जान पड़ी। वह कनक को नाराज कर भाग गया।

चंदन की भाभी ने तारा के घर जाकर चन्दन की विप्लवी किताबों को हटा दिया तथा तारा को उसके मायके भेज दिया। कनक ने उसे तारा के साथ देखकर यह समझा कि यह राजकुमार की प्रेयसी है अत: वह उधर से निराश होकर विजयपुर में होने वाली महफिल में गाने को तैयार हो गयी । तारा के मायके के पास ही विजयपुर स्टेट था । राजकुमार की भेंट कनक से यहीं हुई तथा चंदन की सहायता से कनक राजा साहब के चुंगल से मुक्त हुई और तारा के घर उसे आश्रय मिला अन्ततः तारा ने सारी बात जानकर राजकुमार एवं तारा को विवाह बंधन में बाँध दिया। इससे पूर्व उसने कनक के जला दिया, रोज उससे शिवपूजा करने की प्रतिज्ञा करवाई। पुलिस चंदन को राजकुमार समझकर गिरफ्तार कर ले गयी।
 
इस संक्षिप्त कथानक में रोचकता, कौतूहल एवं उत्सुकता जैसे गुण विद्यमान हैं। कथानक घटना प्रधान है, सप्तस्त घटनाएँ कार्य-कारण श्रृंखला से जुड़ी हुई हैं। चंदन की कथा को प्रासंगिक कथा माना जा सकता है जो मुख्य कथा से जुड़ी है । तत्कालीन राजा-रजवाड़ों एवं अंग्रेज शासन की झलक भी उपन्यास की कथा से बखूबी मिल जाती है । निष्कर्ष रूप में कह सकते हैं कि कथावस्तु की दृष्टि से अप्सरा एक सफल उपन्यास है ।

पात्र और चरित्र चित्रण

अप्सरा उपन्यास के पुरुष पात्र हैं— राजकुमार, चंदन सिंह, नंदन सिंह, हरपाल सिंह, हैमिल्टन, कुँवर प्रताप सिंह आदि तथा प्रमुख स्त्री पात्र हैं। कनक, सर्वेश्वरी, तारा, कैथरीन, तारा की सास, तारा की माँ एवं अन्य छोटे-मोटे पात्र । जो पात्र उपन्यास की कथा का केन्द्र बिन्दु होता है । प्रमुख पात्रों से किसी-न-किसी रूप में सम्बद्ध होता है जो अन्तिम फल का भोक्ता होता है उसे उपन्यास का नायक कहा जाता है । अप्सरा उपन्यास का नायक राजकुमार वर्मा है । वह उच्च शिक्षित है, सिटी कॉलेज में हिन्दी का प्रोफेसर है, रंगकर्मी है, शौकिया अभिनेता है, शकुंतला नाटक को रंगमंच के लिए उसी ने लिखा था तथा कोहेनूर थियेटर में जब यह नाटक मंचित हुआ तब उसने ही दुष्यंत का अभिनय किया था। वह धीर-वीर निर्भीक पुरुष है । इडेन गार्डेन में कनक को हैमिल्टन से उसने ही बचाया था। भोग विलास से दूर रहने की प्रतिज्ञा के कारण वह कनक से दूर भाग गया। यद्यपि वह मन ही मन कनक से प्रेम करता था । चंदन सिंह उसका मित्र है। चंदन सिंह की विप्लवी किताबों को वह अपने घर ले गया तथा तारा को उसके मायके में इसलिए पहुँचा दिया कि कहीं पुलिस उसे तंग न करे । देश-सेवा की भावना उसके हृदय में है। वह संगीत कला-प्रेमी व्यक्ति है तथा चरित्रवान युवक है। स्त्रियों का आदर करता है तथा हर प्रकार से नायक होने योग्य है । अन्त में तारा के सहयोग से उसका विवाह कनक से हो जाता है।

अप्सरा उपन्यास की नायिका कनक अपूर्व सुन्दरी है । निराला जी ने उसके सौन्दर्य को ही अप्सरा के समान मानकर इस उपन्यास का शीर्षक 'अप्सरा' रखा है। कनक का अंग-अंग सुन्दर है । वह संगीत, कला, अभिनय, गीत आदि में पारंगत है । अवसर के अनुकूल गीत गाने में वह कुशल है । वह गंधर्व कुमारिका है । गाना बजाना ही उसकी जीविका है जिसके बल पर उसकी माँ ने अपार सम्पत्ति अर्जित की है वह राजकुमार से प्रेम करती है और राजकुमार द्वारा अपनी अवहेलना से रुष्ट हो उठती है। राजकुमार भी उससे प्रेम करता है और उसे अपनी कविता कहता है । इस प्रेम के कारण ही वह महफिलों में गाना पसंद नहीं करती किन्तु राजकुमार से उपेक्षित होकर विजयपुर के कुँवर साहब के राजतिलक के अवसर पर आयोजित महफिल में गाना गाने के लिए तैयार हो जाती है । वहाँ से राजकुमार के मित्र चंदन सिंह की सहायता से राजा साहब के चंगुल से मुक्त होकर तारा के सहयोग से राजकुमार को पति रूप में प्राप्त कर लेती है।

अन्य पात्रों में चंदन सिंह के चरित्र को ही उजागर करने का प्रयास उपन्यासकार ने किया है। शेष पात्रों को गौण पात्र कहा जा सकता है । संक्षेप में यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पात्र और चरित्रांकन की दृष्टि से यह एक सफल उपन्यास है । चरित्र-चित्रण के लिए उपन्यासकार ने प्रत्यक्ष एवं परोक्ष दोनों शैलियों का सहारा लिया है । कहीं तो घटना के माध्यम से चारित्रिक गुण को उजागर किया है— जैसे ईडेन गार्डन में राजकुमार द्वारा हैमिल्टन को परास्त करने से राजकुमार की वीरता एवं स्त्री सम्मान का गुण उजागर हुआ है तो कहीं दो पात्र पारस्परिक वार्तालाप से चारित्रिक गुणों को उजागर करते हैं । पात्र की मानसिक मनोदशा का चित्रण उसके अन्तर्द्वन्द्व द्वारा व्यक्त किया गया है; यथा- "कनक घबरा उठी, क्या करे, कुछ समझ में नहीं आ रहा था । राजकुमार के बारे में जितना ही सोचती हैं, चिन्ताओं की छोटी-बड़ी अनेक तरंगों, आवर्तों से मन मथ जाता है।"
 

देशकाल और वातावरण

अप्सरा उपन्यास की रचना 1931 ई. में हुई थी । यह वह समय था जब देश के नौजवान स्वतन्त्रता आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी हेतु अपना सब कुछ न्योछावर करने को तत्पर थे । निराला जी ने यद्यपि इस उपन्यास में स्पष्ट रूप से आन्दोलन का उल्लेख तो नहीं किया है तथापि चंदन सिंह का किसान संगठन आन्दोलन में गिरफ्तार होना, स्वातंत्र्य चेतना वाले विप्लवी साहित्य के आधार पर नौजवानों को पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लेना, अंग्रेजों द्वारा महिलाओं के साथ छेड़खानी करना तथा राजा-रजवाड़ों की विलासी प्रवृत्ति का उल्लेख इसमें बखूबी मिलता है । यह वह समय था जब राजा-रजवाड़े संगीत की महफिलें सजाते थे जिनमें पानी की तरह पैसा बहाया जाता था और गंधर्व कुमारिकाएँ संगीत की महफिलों में शामिल होकर हजारों रुपये अर्जित करती थीं। सर्वेश्वरी देवी एक ऐसी ही तवायफ थीं जिन्होंने अपार सम्पत्ति अर्जित कर कलकत्ते में बहू बाजार में आलीशान मकान बनवा लिया था और अब यह आकांक्षा करती थीं कि उनकी पुत्री कनक भी अपने सौन्दर्य के बल पर सम्पत्ति का अर्जन करे। वे कनक को बार-बार यह समझाती थीं कि हमारे पेशे में किसी को मन से प्यार नहीं किया जाता केवल प्यार का दिखावा किया जाता है।

दूसरी ओर राजकुमार है जिसने युवावस्था में कॉलेज के दिनों में ही देश की तत्कालीन परिस्थितियों के चलते देश सेवा का व्रत लिया था । अपने मित्र चंदन सिंह के साथ उसने यह प्रतिज्ञा की थी कि वे सदैव भोगविलास से दूर रहेंगे और देश सेवा कें लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर देंगे तथा बड़े से बड़ा त्याग करने एवं कष्ट सहने को तत्पर रहेंगे । कनक के घर पर जब समाचार-पत्र में राजकुमार ने चंदन सिंह की गिरफ्तारी की खबर पढ़ी तब उसे अपनी प्रतिज्ञा स्मरण हो आई और वह कनक का तिरस्कार कर वहाँ से चला आया और चंदन के घर जा पहुँचा जहाँ से उसने सभी विप्लवी किताबें हटा दी थी। यह सोचकर कि यदि पुलिस का छापा पड़ा तो चंदन सिंह के घरवालों पर विशेषकर उसकी भाभी तारा पर विपत्ति आयेगी । वह उन किताबों को अपने घर ले गया तथा तारा को उसके मायके पहुँचा दिया । विजयपुर स्टेट के विलासी राजा कुँवर प्रताप सिंह के चंगुल से कनक को छुड़ाने की घटना भी तत्कालीन देशकाल एवं परिस्थितियों को उजागर करती है ।
 

संवाद अथवा कथोपकथन

संवाद एवं कथोपकथन नाटक के लिए अनिवार्य होते हैं किन्तु उपन्यासों एवं कहानियों में भी संवाद की आवश्यकता बराबर अनुभव की जाती है । संवादों से कथा-वस्तु में नाटकीयता आती है साथ ही रोचकता भी उत्पन्न होती है । यही नहीं अपितु संवाद कथा को गति प्रदान करते हैं और पात्रों के चरित्र पर भी प्रकाश डालते हैं । संवाद छोटे-छोटे और सरल होने चाहिए तभी वे वांछित प्रभाव उत्पन्न कर पाते हैं । अप्सरा उपन्यास में भी उपन्यासकार ने अनेक स्थलों पर संवाद-योजना की है । एक उदाहरण दृष्टव्य है— 
फिर युवती से पूछा- "आपको कहाँ जाना है ?" 
"मेरी मोटर सड़क पर खड़ी है । उस पर मेरा ड्राइवर और बूढ़ा अर्दली बैठा होगा । मैं हवाखोरी के लिए आई थी। आपने मेरी रक्षा की, मैं सदैव-सदैव अपनी कृतज्ञ रहूँगी।" 
युवक ने सिर झुका लिया । "आपका शुभ नाम" युवती ने पूछा । 
"नाम बतलाना अनावश्यक समझता हूँ । आप जल्द यहाँ से चली जाएँ ।" 
युवक को कृतज्ञता की सजल दृष्टि से देखती हुई युवती चल दी । रुककर कुछ कहना चाहा, पर कह न सकी । 

उक्त अवतरण में संवाद कथा के बीच में पोती की तरह जुड़े हुए हैं । ये संवाद कथा के नायक राजकुमार एवं कथा नायिका कनक के बीच के हैं और उपन्यास के प्रारम्भ में प्रथम परिच्छेद से लिए गये हैं । इन संवादों से पता चलात है कि युवक ने युवती की रक्षा की है जिसके लिए युवती कृतज्ञता व्यक्त करती है और अपने ऊपर उपकार करने वाले उस युवक का नाम जानना चाहती है, चिन्तु युवक ने यह कार्य कर्त्तव्य भावना से प्रेरित किया था, किसी पुरस्कार के लालच में नहीं अतः वह अपना नाम बताना आवश्यक नहीं समझता । इस संवाद योजना में कथा में रोचकता, नाटकीयता का समावेश भी किया गया है साथ ही संवादों की भाषा सरल, सहज एवं प्रवाहपूर्ण भी है, अत: हम कह सकते हैं कि संवाद योजना की दृष्टि से यह नाटक सफल है।
 

भाषा शैली

एक अच्छे उपन्यास की भाषा सरल, सहज एवं प्रवाहपूर्ण होती है तथा उसमें अर्थ व्यक्त करने की पूर्ण क्षमता भी रहती है । निराला का यह पहला उपन्यास है अतः उसमें प्रेमचंद जैसी भाषा की रवानगी तो नहीं है, किन्तु वे अपनी बात कह सकने में सफल अवश्य हुए हैं। कहीं-कहीं उनकी भाषा में संस्कृतनिष्ठता भी आ गयी है। उदाहरण के लिए अग्र पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं- 
"इस तरह वह शुभ्र स्वच्छ निर्झरिणी विधा के ज्योत्स्ना-लोक के भीतर से मुखर शब्द-कलरव करती हुई ज्ञान के समुद्र की ओर अबाध बह चली । हिन्दी के अध्यापक उसे पढ़ाते हुए अपनी अर्थ-प्राप्ति की कलुषित कामना पर पश्चाताप करते, कुशाग्र बुद्धि शिष्या के भविष्य का पंक्ति चित्र खींचते हुए मन ही मन सोचते—इसकी पढ़ाई ऊसर वर्षा है—तलवार में ज्ञान, नागिन का दूध पीना है ।" 
निराला जी ने अपनी भाषा में संस्कृत, उर्दू एवं अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों का भी प्रयोग यथास्थान किया है । इस प्रकार के कुछ शब्द जो इस उपन्यास में प्रयुक्त हुए हैं, इस प्रकार हैं- 
अंग्रेजी शब्द- इडेन गार्डन, बेंच, कॉलर, कोट, बाक्सिंग, मोटर, फील्ड, ड्राइवर, थियेटर, एक्ट्रेस, टिकट आदि । 
उर्दू शब्द — आदमियों, कब्जे, मुराद, बेहोश, हवाखोरी, साहब, तलाश, आलीशान, खास, तवायफों, रईसों, पेशबाज, इन्तजाम, फुर्सत, कमजोरी, बुनियाद, रूखी सूरत, तारीफ आदि । 
संस्कृत शब्द- आपाद मस्तक, अलौकिक सौन्दर्य, विद्युल्लता, वृन्त, निश्छल, ज्योत्स्ना, सौन्दर्योज्ज्वल, पारिजात, गंधर्व-कुमारिका, तन्वी, कवयित्री, दिनचर्या, आमरण, नैसर्गिक निर्झरिणी, एकाग्रता, पुष्टिकारक, अप्रतिहत आदि । 
निराला मूलतः कवि थे अतः उनके उपन्यासों की भाषा में भी कहीं-कहीं काव्यात्मकता का संचार हो गया है। 

एक उदाहरण प्रस्तुत -
"अपार लौकिक सौन्दर्य एकान्त में कभी-कभी अपनी मनोहर रागिनी सुना जाता । वह कान लगा उसके अमृत स्वर को सुनती पान किया करती । अज्ञात एक अपूर्व आनन्द का प्रवाह अंगों को आपाद मस्तष्क नहला जाता । स्नेह की विद्युल्लता काँप उठती । उस अपरिचित कारण की तलाश में विस्मय से आकाश की ओर ताक कर रह जाती ।" 

उक्त विवेचन के आधार पर यह कहना तर्कसंगत होगा कि भाषा की कसौटी पर कसने पर यह उपन्यास ठीक ठीक कहा जा सकता है। कहीं-कहीं वाक्य रचना शिथिल हो गयी है तथा संस्कृत शब्दों के प्रति अनावश्यक मोह प्रदर्शित करने के कारण भाषा कहीं-कहीं बोझिल हो गयी है । अर्थ व्यक्त करने में भी कहीं-कहीं निराला जी को सफलता नहीं मिल सकी है, पर ऐसा कुछ ही स्थलों पर है अन्यत्र भाषा की रचना भी देखते ही बनती है; यथा— 
"युवती ने झरोखे से लड़कों को एक बार देखा। फिर राजकुमार की तरफ मुँह करके कहा—अच्छा हो, अगर आज स्टेशन पर कनक से मिला जाये। पूरब से एक ही गाड़ी चार बजे आती है।'
 

उद्देश्य

उपन्यास एक सोद्देश्य रचना है । उपन्यासकार किसी विशिष्ट उद्देश्य को ध्यान में रखकर उपन्यास की कथावस्तु का नियोजन करता है । वास्तविकता तो यह है कि उपन्यास के अन्य सारे तत्त्व उद्देश्य की ओर ही अग्रसर होते हैं। अप्सरा उपन्यास किसी विशेष उद्देश्य से निराला जी नहीं लिखा तथापि इसमें प्रासंगिक काव्य, दर्शन, समाज, राजनीति आदि का समावेश यथास्थान हो गया है। निराला जी ने 'अप्सरा' के वक्तव्य में इस पर प्रकाश डालते हुए लिखा है- 
"मैंने किसी विचार से अप्सरा नहीं लिखी, किसी उद्देश्य की पुष्टि भी इसमें नहीं । अप्सरा स्वयं मुझको जिस-जिस ओर ले गयी, दीपक-पतंग की तरह मैं उसके साथ रहा । इच्छा न रहने पर भी प्रासंगिक काव्य, दर्शन, समाज, राजनीति आदि की कुछ बातें चरित्रों के साथ व्यावहारिक जीवन की समस्या की तरह आ पड़ी हैं, वे अप्सरा के ही रूप-रुचि के अनुकूल हैं। उनसे पाठकों को शिक्षा के तौर जो पर कुछ मिलता हो, अच्छी बात है, न मिलता हो, उसे रहने दें।"
 
वस्तुतः उपन्यास का एक उद्देश्य मनोरंजन है, तो दूसरा उद्देश्य है उससे सकारात्मक शिक्षा प्राप्त करना । निराला जी ने इस उपन्यास की रचना शुद्ध मनोरंजन के लिए भले ही की हो, किन्तु चाहे अनचाहे उसमें अनेक उद्देश्यों का समावेश हो गया है; यथा- 
(1) इस उपन्यास के माध्यम से तत्कालीन अंग्रेजों की हठधर्मिता, विलासिता एवं हिन्दुस्तानियों को हेय समझने की मनोवृत्ति उजागर होती है। हैमिल्टन जैसे लम्पट कनक जैसी रमणियों के साथ जो व्यवहार इडेन गार्डन में करते हैं, वह इस बात का प्रतीक है कि अंग्रेज अधिकारी भारतीय रमणियों को भोग्या मात्र मानते थे और उनका सम्मान करना नहीं जानते थे । 
(2) अंग्रेज सरकार के विरुद्ध भारतीय नौजवानों के मन में आक्रोश था और वे बहादुरी से उनका प्रतिरोध करते थे । राजकुमार द्वारा हैमिल्टन की पिटाई करते हुए कनक को उसके चंगुल से मुक्त कराना इसका प्रभाव है । 
(3) अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय नौजवान अपने तरीके से स्वतन्त्रता आन्दोलन में कूद पड़े थे । चंदन और राजकुमार ने देश-हित में भोग-विलास में न फँसने की प्रतिज्ञा की थी । चंदन लखनऊ में किसान संगठन का आन्दोलन करते हुए गिरफ्तार भी हुआ था ।
(4) तत्कालीन राजे-रजवाड़े भोग-विलास में कण्ठ में डूबे हुए थे । वे नृत्य संगीत की महफिलें सजाते थे, जिनमें अंग्रेज हुक्मरानों को भी आमन्त्रित करते थे । विजयपुर स्टेट के कुँवर प्रताप सिंह ने अपने राजतिलक के अवसर पर आयोजित संगीत की महफिल में प्रसिद्ध तवायफों को बुलाया था और इस उत्सव का आनन्द लेने के लिए चौबीस परगना के एस. पी. हैमिल्टन को भी अपने अन्य मित्रों के साथ आमन्त्रित किया था । 
(5) राजा-रजवाड़े प्रजा के धन को भोग-विलास पर उड़ाते थे । कुँवर प्रताप सिंह को स्टेट की ओर से छः हजार की मोटी रकम प्रतिमास जेब खर्च के लिए मिलती थी । 
(6) राजा लोग आकण्ठ विलास में डूबे हुए थे। राजा प्रताप सिंह कनक का दैहिक शोषण करना चाहते थे । कनक अपनी होशियारी एवं राजकुमार तथा चंदन सिंह के सफल प्रयास से राजा साहब के चंगुल से बच सकी । 
उपन्यास की उक्त घटनाएँ तत्कालीन सामाजिक एवं राजनीतिक स्थिति का निरूपण करती हैं, जिसे प्रकाश में लाना उपन्यासकार का परोक्ष उद्देश्य माना जा सकता है ।

निराला जी ने विभिन्न पात्रों के माध्यम से जो विचार यहाँ व्यक्त किये हैं, वे भी कवि के उद्देश्य पर प्रकाश डालते हैं; यथा-
1. कनक कला के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहती है- "मुझे कला को एक सीमा में परिणत रखना अच्छा लगता है। ज्यादा विस्तार से वह कलुषित हो जाती है, जैसे बहाव का पानी । उसमें गंदगी डालकर भी लोग उसे पवित्र मानते हैं, पर कुएँ के लिए यह बात सार्थक नहीं है ।" 
2. राजकुमार हिन्दी के नाटकों के सम्बन्ध में अपने विचार इन शब्दों में व्यक्त करता है— "हिन्दी के स्टेज पर लोग ठीक-ठीक हिन्दी-उचारण नहीं करते, उर्दू के उच्चारण की नकल करते हैं, इससे हिन्दी का उच्चारण बिगड़ जाता है । हिन्दी के उच्चारण में जीभ की स्वतन्त्र गति होती है ।" 

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि उपन्यास कला के तत्त्वों के आधार पर अप्सरा उपन्यास पूर्णत: खरा उतरता है और एक सफल उपन्यास की श्रेणी में आता है । निराला जी की उपन्यास कला भले ही प्रेमचंद के समकक्ष न हो, किन्तु इतना अवश्य कहा जा सकता है कि 'अप्सरा' उपन्यास पाठकों को बाँधकर रखने में सफल है। उपन्यास को एक बार पढ़ना प्रारम्भ करने के बाद इसे अंत तक पढ़े बिना पाठक को चैन नहीं पड़ता है, अत: इसे रोचक एवं कौतूहलपूर्ण उपन्यास कहना युक्ति संगत है।

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