आदिकाल वीरगाथा काल : रासो साहित्य, चारण परंपरा और ऐतिहासिकता

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आदिकाल वीरगाथा काल : रासो साहित्य, चारण परंपरा और ऐतिहासिकता जहाँ इतिहास और कल्पना, तथ्य और आस्था आपस में इस प्रकार गुंथे हुए हैं

आदिकाल वीरगाथा काल : रासो साहित्य, चारण परंपरा और ऐतिहासिकता


हिंदी साहित्य के इतिहास में सबसे प्राचीन काल को आदिकाल कहा जाता है, जिसकी समय-सीमा विद्वानों ने प्रायः संवत् १०५० से १३७५ (सन् ९९३ ईस्वी से १३१८ ईस्वी) के बीच मानी है। यह वह युग था जब अपभ्रंश से आधुनिक भारतीय भाषाओं, विशेषकर हिंदी, का उदय हो रहा था और साहित्य की दृष्टि से यह संक्रमण काल कहा जा सकता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ "हिंदी साहित्य का इतिहास" में इस काल को "वीरगाथा काल" नाम दिया, क्योंकि उनके अनुसार इस समय की अधिकांश रचनाएँ वीर रस से ओतप्रोत थीं और राजाओं तथा सामंतों की वीरता, शौर्य एवं युद्धों का बखान करती थीं।शुक्ल जी ने इस काल की प्रमुख रचनाओं को रासो ग्रंथों के रूप में चिह्नित किया और इन्हें चारण कवियों की देन बताया। हालांकि बाद के विद्वानों ने इस नामकरण और इसके भीतर निहित मान्यताओं पर गंभीर प्रश्न उठाए, जिससे यह काल आज भी हिंदी साहित्य के इतिहासलेखन में विवाद और शोध का विषय बना हुआ है।

रासो साहित्य की प्रकृति और स्वरूप

आदिकाल वीरगाथा काल : रासो साहित्य, चारण परंपरा और ऐतिहासिकता
रासो शब्द की व्युत्पत्ति को लेकर विद्वानों में मतभेद रहा है। कुछ विद्वान इसे संस्कृत के "रसायण" शब्द से जोड़ते हैं तो कुछ इसे "रास" अर्थात नृत्य-गीत की परंपरा से संबद्ध मानते हैं, जबकि कुछ अन्य इसे "रहस्य" या "राजस्थानी" शब्दों से व्युत्पन्न बताते हैं। रासो काव्य मूलतः वीर रस प्रधान प्रबंध काव्य हैं, जिनमें किसी राजा या सामंत के जीवन, उसके युद्धों, विजयों तथा कभी-कभी उसके प्रणय-प्रसंगों का वर्णन मिलता है। इनकी भाषा डिंगल और पिंगल के मिश्रण से बनी अपभ्रंशयुक्त पुरानी राजस्थानी-हिंदी है, जिसमें ओज और प्रवाह की प्रधानता है।

इस काल के प्रमुख रासो ग्रंथों में सबसे अधिक चर्चित और विवादास्पद है चंदबरदाई कृत "पृथ्वीराज रासो", जिसमें दिल्ली के अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के जीवन और उनके मुहम्मद गोरी के साथ हुए युद्धों का विस्तृत वर्णन है। इसके अतिरिक्त नरपति नाल्ह कृत "बीसलदेव रासो" है, जो एक विरह-प्रधान काव्य है और इसमें अजमेर के राजा बीसलदेव तथा उनकी रानी राजमती की प्रेम-विरह गाथा वर्णित है। जगनिक कृत "परमाल रासो" या "आल्हखंड" महोबा के चंदेल राजाओं तथा उनके वीर सेनापतियों आल्हा-ऊदल की वीरता का बखान करता है, और यह रचना लोक-कंठ में आज भी जीवित है। इसी प्रकार "खुमान रासो", "हम्मीर रासो" और "विजयपाल रासो" जैसी रचनाएँ भी इसी परंपरा की देन मानी जाती हैं। इन सभी रासो ग्रंथों की एक सामान्य विशेषता यह है कि इनमें इतिहास और कल्पना का घालमेल है, अतिशयोक्ति और चमत्कारपूर्ण वर्णनों की भरमार है, और घटनाओं का कालक्रम प्रायः अव्यवस्थित तथा असंगत है।

चारण परंपरा और इसकी सामाजिक भूमिका

चारण कवि राजस्थान और उससे सटे क्षेत्रों में राजदरबारों से जुड़े हुए एक विशिष्ट कवि-वर्ग थे, जिनका मूल कार्य राजाओं और सामंतों की वंशावली सुरक्षित रखना, उनकी वीरता का गुणगान करना तथा युद्धों के समय सैनिकों में उत्साह भरना था। चारण केवल कवि ही नहीं बल्कि राजनीतिक सलाहकार, इतिहास के संरक्षक और कभी-कभी राजदूत की भूमिका भी निभाते थे। उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा इतनी अधिक थी कि उन्हें अवध्य माना जाता था और युद्ध के मैदान में भी उन पर आक्रमण करना अनुचित समझा जाता था। चारण अपनी काव्य-रचनाओं के माध्यम से आश्रयदाता राजा को अतिमानवीय गुणों से विभूषित कर प्रस्तुत करते थे, जिससे उसकी कीर्ति बढ़े और शत्रु पक्ष में भय उत्पन्न हो।

इसी आश्रयदाता-प्रधान प्रवृत्ति के कारण रासो साहित्य में यथातथ्य इतिहास लेखन की अपेक्षा प्रशस्ति और स्तुति का पुट अधिक मिलता है। चारण कवि अपने पोषक राजा को केवल एक शासक के रूप में नहीं बल्कि लगभग दैवीय शक्ति संपन्न नायक के रूप में चित्रित करते थे, जिसके कारण इन काव्यों में यथार्थ और कल्पना के बीच की रेखा प्रायः धुंधली हो जाती थी। यह परंपरा मौखिक रूप से भी फलती-फूलती रही और पीढ़ी-दर-पीढ़ी गायकों तथा भाटों के माध्यम से इसका प्रचार-प्रसार होता रहा, जिससे मूल पाठ में समय के साथ अनेक प्रक्षेप और परिवर्तन होते गए।

ऐतिहासिकता का प्रश्न और विद्वानों के मतभेद

रासो साहित्य की ऐतिहासिक प्रामाणिकता हिंदी साहित्य के इतिहासलेखन का सबसे विवादास्पद प्रश्न रहा है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने यद्यपि इन ग्रंथों को वीरगाथा काल के अंतर्गत महत्व दिया, तथापि उन्होंने भी स्वीकार किया कि पृथ्वीराज रासो का उपलब्ध रूप बहुत बाद में प्रक्षिप्त और परिवर्धित है और इसका मूल पाठ कहीं खो चुका है। डॉ॰ दशरथ शर्मा, डॉ॰ हरप्रसाद शास्त्री और मोहम्मद हबीब जैसे इतिहासकारों ने पृथ्वीराज रासो की घटनाओं की तुलना समकालीन शिलालेखों, ताम्रपत्रों और फारसी इतिहास ग्रंथों से की तो अनेक विसंगतियाँ सामने आईं। रासो में वर्णित अनेक युद्ध, विवाह-संबंध और यहाँ तक कि पृथ्वीराज तथा जयचंद की शत्रुता का प्रसिद्ध प्रसंग भी ऐतिहासिक स्रोतों से पुष्ट नहीं होता। इसी आधार पर कई विद्वानों ने यह निष्कर्ष निकाला कि पृथ्वीराज रासो का वर्तमान स्वरूप चंदबरदाई की मूल रचना न होकर सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दी के आसपास किसी अन्यत्र कवि या कवियों द्वारा रचा या बहुत अधिक बढ़ाया गया ग्रंथ है।

डॉ॰ रामकुमार वर्मा और कुछ अन्य आलोचकों ने वीरगाथा काल नामकरण पर ही आपत्ति जताई और तर्क दिया कि इस काल की सभी रचनाएँ वीर रस प्रधान नहीं हैं; बीसलदेव रासो जैसी कृतियाँ तो श्रृंगार और विरह प्रधान हैं। इसीलिए कुछ विद्वानों ने इस काल को "आदिकाल" नाम देना अधिक उपयुक्त समझा, जो केवल कालानुक्रमिक स्थिति को इंगित करता है, किसी रस-विशेष को नहीं। डॉ॰ हजारीप्रसाद द्विवेदी ने तो इससे भी आगे बढ़कर यह मत प्रतिपादित किया कि इस काल का साहित्य केवल दरबारी रासो काव्य तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सिद्ध और नाथ साहित्य, जैन साहित्य तथा लोक साहित्य की धाराएँ भी सम्मिलित हैं, जिन्हें शुक्ल जी ने पर्याप्त महत्व नहीं दिया था। द्विवेदी जी के अनुसार आदिकाल का साहित्य बहुधर्मी और बहुभाषी था, जिसमें अपभ्रंश, प्राकृत और प्रारंभिक हिंदी की विभिन्न शैलियाँ एक साथ प्रवाहित हो रही थीं।

इस प्रकार जब हम रासो साहित्य को पढ़ते हैं तो हमें इसे प्रामाणिक इतिहास के दस्तावेज़ के रूप में नहीं बल्कि एक ऐसी साहित्यिक-सांस्कृतिक निर्मिति के रूप में देखना चाहिए जिसमें चारण परंपरा की भावनात्मक निष्ठा, वीर आदर्शों का महिमामंडन और मध्यकालीन राजपूत समाज की मूल्य-व्यवस्था प्रतिबिंबित होती है। इसकी ऐतिहासिक अशुद्धियों के बावजूद इसका सांस्कृतिक महत्व कम नहीं होता, क्योंकि यह हमें उस युग की मानसिकता, वीरता के आदर्शों, राजपूत अस्मिता और लोक-चेतना को समझने का एक अमूल्य साधन प्रदान करता है। यही कारण है कि आधुनिक इतिहासकार और साहित्य के विद्यार्थी इन ग्रंथों को ऐतिहासिक तथ्य की कसौटी पर नहीं बल्कि सांस्कृतिक स्रोत सामग्री के रूप में अध्ययन का विषय मानते हैं, जहाँ इतिहास और कल्पना, तथ्य और आस्था आपस में इस प्रकार गुंथे हुए हैं कि उन्हें पूर्णतः अलग करना संभव नहीं।

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