राजेन्द्र यादव के प्रसिद्ध उपन्यास 'सारा आकाश' में नायक समर और उसकी पत्नी प्रभा के बीच का मनोमालिन्य और मनमुटाव अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे परिस्थितिय
सारा आकाश में समर और प्रभा के बीच की दूरी कैसे खत्म हुई? | पूरा विश्लेषण
राजेन्द्र यादव के प्रसिद्ध उपन्यास 'सारा आकाश' में नायक समर और उसकी पत्नी प्रभा के बीच का मनोमालिन्य और मनमुटाव अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे परिस्थितियों, आपसी अहसास और संवादहीनता (मौन) टूटने के बाद दूर होता है।
प्रभा एक दिन छत पर बैठकर धूप में दाल बीन रही थी। बाबूजी ने देखा ओर फटकार लगाई, उस दिन धूप में सिर धोया गया था, मुन्नी ने सिफ़ारिश करके बचा लिया था।
अम्मा ने कटाक्ष किया,"सबसे बचकर अकेली अगर छत पर नहीं बैठी रहे, तो पड़ोसियों से नैना कैसे लड़ें? और भाग-भाग कर छत पर जाती क्यों है?"
प्रभा अब तक सिर झुकाए बिना कुछ बोले सुन रही थी। अम्मा की बात सुनकर उसने अपना सिर झटक कर ऊँचा किया और एक बार तीखी निगाहों से अम्मा की ओर देखा। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। पांडेजी की लड़की की तरह उन्हें उसके भाग जाने की चिन्ता थी। भाभी ने भी नमक मिर्च छिड़का, "ये पढ़ी-लिखी लड़कियाँ जो न कर लें सो थोड़ा है, अम्माजी !"
अम्मा ने प्रभा को चेतावनी दी कि अब वह कभी छत पर पैर न रखे। अम्मा जली-कटी सुनाने में कम नहीं रहीं, उन्होंने यहाँ तक कह दिया-
"इन्हीं लक्खनों के मारे खसम देखता तक नहीं और बहूरानी को चढ़ी है जवानी। लड़का बिचारा सूख-सूखकर लकड़ी हुआ जा रहा है "अम्मा प्रभा के कोस रहीं थीं कि यह मरे तो वे समर की दूसरी शादी करें।
समर जब सिनेमा देखकर लौटा तब उसने देखा उस दिन उसका खाना ओर पानी कमरे में नहीं रखा था। पानी छत पर रखा रहता था। प्यास लगने पर समर छत पर गया। काफ़ी ओस पड़ रही थी। पानी की ओर जाते हुए उसने देखा कि दीवार से लगा कोई रो रहा है। दो कदम आगे बढ़ा तो देखा प्रभा थी। उसने सोचा रात के बारह बजे इस भयंकर ओस में अकेली बैठी यह क्या कर रही है। वह सिसकियाँ भर रही थी।
पानी पीकर चुपचाप लौट कर समर बिस्तर पर लेट गया। नींद कहाँ आती? लेटे-लेटे करवटें ही बदलता रहा। वह समझ नहीं पा रहा था कि वह छत पर, वह भी आधी रात में, यों अकेले में बैठी क्यों रो रही है। बड़ी-बड़ी बातें हो जाने पर भी किसी ने उसे रोते नहीं देखा। आज क्या हो गया जो रो रही है?
समर ने अपना ध्यान सिनेमा की घटनाओं की ओर लगाया। पर उसे केवल दो ही आवाजें सुनाई दे रहीं थीं। पहली जैसे शहतीर के नीचे दबी मुन्नी चिल्ला-चिल्लाकर कह रही है- भैया, भाभी से बोलो।" दूसरी आवाज़ अपनी थी जो किसी घुटी जगह से आ रही थी, "नहीं, अभी तो वह अपने घर है। जब आएगी तो ज़रूर मिलाऊँगा।" उसे इस सब शोर के अलावा एक घरे की आवाज़ सुनाई दे रही थी कि बाहर ओस में, रात के बारह बजे एकांत में कोई बैठकर रो रहा है। वह इस सब को भूलकर सोना चाहता था पर उसे ऐसा लग रहा था जैसे कोई मकड़ा उसकी छाती पर पंजे गड़ाए जमा बैठा हो। वह उसे उठाकर दूर फेंकना चाहता था पर वह सम्भव नहीं था। समर उठा और बाहर निकल आया। उस समय वह झिझक रहा था। सीधे उसके सामने जाने की हिम्मत नहीं थी। फिर पानी की तरफ़ गया। घंटा भर हो गया था पर उसका रोना बन्द नहीं हुआ था। बिना प्यास के समर ने थोड़ा सा पानी पिया और फिर लौट आया। प्रभा के सामने जाकर थोड़ा रुका। उसे देखकर शायद प्रभा चौंके। पर वह बैठी-बैठी बेखबर रोती रही। वह समझ नहीं पा रहा था क्या करे। वह लौटने लगा पर पैर मन-मन के हो गये थे। आखिर वह फिर मुड़ा और ठीक उसके सामने जाकर कहा “आधी रात को यहाँ बैठकर क्या कर रही हो?"
उसने सिर उठाकर ऊपर देखा और धोती के आँचल में मुँह छिपा लिया। रुलाई का वेग बढ़ गया। वहाँ खड़ा रहना समर को अपमानजनक लगने लगा। पर उसने उससे कहा कि वह सुबह रो ले। ओस में तबीयत खराब हो जायेगी। प्रभा ने उत्तर दिया, "आपको क्या है? आप जाकर सोइए न!" एक साल से जब उसके जीने-मरने की चिन्ता नहीं की तो अब ऐसी क्या खास ज़रूरत आ पड़ी ! उसने सीधे समर को आँखों में देखकर कहा कि वह जाकर सो जाए। उसकी आँखों में आँसू खौल रहे थे। समर को लगा जैसे उसकी सारी शक्ति किसी ने मंत्र द्वारा खींचकर बाहर निकाल ली हो। उसने डरते-डरते प्रभा के कंधे पर हाथ रखकर कहा, "प्रभा, तुम मुझसे नाराज़ हो ?"
प्रभा समर के कंधे पकड़ कर उन्मत्त आवेश में झंझोड़ती हुई बोली, "मुझे बताओ, मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? क्या कसूर किया है मैंने तुम्हारा? मैं तुम्हारे लायक नहीं हूँ, मैं तुम्हें पसंद नहीं हूँ तो अपने हाथों से मेरा गला घोंट दो, मैं चूँ नहीं करूँगी, तुम शौक से दूसरी शादी कर लो, लेकिन मुझे लेकिन मुझे बताओ तो सही वह रो रही थी । सिसकियों से उसका सारा शरीर काँप रहा था। समर भी उससे भी प्रबल वेग से रोने लगा। इतने दिनों के दबे भाव आँसू बन कर बह रहे थे। एक दूसरे से लिपटे वे दोनों बेहोश, बेसुध, बस रोते जा रहे थे।
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समर को जैसे ही ध्यान आता कि उसने किसी की लाड़-प्यार से पाली गई इकलौती लड़की को लाकर क्या-क्या अत्याचार नहीं किए, कौन कौन से कहर उस पर नहीं तोड़े, उसे कितनी यातनाएँ दी, उसकी रुलाई दुगुनी-चौगुनी हो जाती। आँसू, सिसकी, तड़प किसी में भी ऐसी शक्ति नहीं थी कि हृदय के पश्चात्ताप और मन की बैचैनी को, इस छटपटाहट और पीड़ा को बाहर निकाल सके।
समर को यह एहसास हुआ कि उसने एक पल के लिए भी नहीं सोचा कि प्रभा में भी जान है। उसे भी दुख होता होगा, पीड़ा होती होगी। उसकी भी कुछ आकांक्षाएँ हैं, अभिलाषाएँ हैं। वह किसके कारण वहाँ गुलामों की तरह रात-दिन काम करती है? उस दिन की मार याद आते ही उसने प्रभा के गाल पर हाथ फेरा। वह आज भी पाँचों अगुलियों के कारण दहक रहा था। समर प्रभा के अर्द्धचेतन शरीर को बाहों में उठाकर कमरे में ले आया था। दोनों सारी रात रोते रहे। न एक दूसरे को देखा ओर न कुछ बोले। पूरे साल का गुबार आँसुओं के माध्यम से निकल जाना चाहता था। आज प्रभा का रोना सकारात्मक प्रतिफल लेकर आया। किसी के भी उठने से पहले वह बाहर चली गई। उसने कहा "हमें एक पोस्टकार्ड दे दीजिए, मैं बहुत दिनों से माँ को लिखना चाह रही थी- पैसे नहीं थे।"
इस प्रकार छत पर दाल बीनना, बाबूजी की फटकार, अम्मा की जली-कटी वाणी, भाभी का नमक-मिर्च लगाना प्रभा के लिए अच्छा रहा। अम्मा ने यदि उसके चरित्र पर कालिमा न लगाई होती तो वह पहले की तरह सिर नीचा करके सुनती रहती। वह उज्ज्वल चरित्र की नारी थी। यह आक्षेप नहीं सह सकी। उस दिन उसका ध्यान समर के लिए खाना-पीना रखने में भी नहीं था। छत पर कोई नहीं था अतः वह एकान्त में जी भर कर रोना चाहती थी।
जिस प्रकार अँधेरी रात के बाद रोशनी की किरण दिखाई देती है, उसी प्रकार अत्याचारों की हद पार हो जाने पर प्रभा के भी दुख-दर्द को समर ने समझा। दोनों के मिलकर रोने से उनका मनोमालिन्य मिट गया तथा उनके जीवन में नया सूर्योदय हुआ।समर और प्रभा का संबंध-विच्छेद मुख्य रूप से संवादहीनता और अहं की वजह से था। जब समर ने अपने अहंकार को छोड़कर प्रभा के त्याग, आत्मसम्मान और पीड़ा को समझा, तब उनके बीच का मनोमालिन्य दूर हुआ और वे एक-दूसरे के वास्तविक जीवन-साथी बन सके।


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