किशोरावस्था की चुनौतियाँ, भटकाव और समाधान: एक विस्तृत विवेचन भटकाव के बजाय राष्ट्र और समाज के नवनिर्माण की सकारात्मक ऊर्जा में बदला जा सकता है।
अमृत को विष होने से रोकने के उपाय
आधुनिक समाज के एक अत्यंत संवेदनशील और विचारणीय विषय पर प्रकाश डालना समय की सबसे बड़ी मांग है, जिसे किशोरावस्था के नाम से जाना जाता है। किशोरावस्था जीवन की वह अमूल्य ऊर्जा और अमृत की भाँति पवित्र अवस्था है, जिसमें असीम क्षमताएँ, अदम्य साहस और नया रचने का उत्साह होता है। आज के किशोरों में समझ, विवेक और ऊर्जा की कोई कमी नहीं है; वे अपने समय और परिवेश को बहुत सूक्ष्मता से समझ रहे हैं। परंतु यदि इस संवेदनशील दौर में सही मार्गदर्शन और नियंत्रण न मिले, तो यही 'अमृत' रूपी ऊर्जा भटककर 'विष' बनने में देर नहीं लगाती। आज के इस तीव्र तकनीकी और बाजारवादी युग में किशोर मानस किस प्रकार के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक बदलावों से गुजर रहा है, इसकी सूक्ष्म व्याख्या करना अनिवार्य है। यह लेख किशोरावस्था की इस क्षमता को सही दिशा देने और उसकी ऊर्जा को विष बनने से रोकने के व्यावहारिक, सामाजिक और सांस्कृतिक उपायों का एक व्यापक और विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
किशोरावस्था जीवन का एक ऐसा पड़ाव है जो बहुत ही अल्हड़ और बहुत ही जोशीला होता है। इस उम्र में ऊर्जा का प्रवाह अत्यंत तीव्र होता है, परंतु उसके साथ ही एक गहरा असमंजस और अपरिपक्वता भी जुड़ी होती है। इस अवस्था के पीछे के जैविक और वैज्ञानिक कारणों को स्पष्ट करने के लिए फेसबुक पर स्कंद शुक्ला जी द्वारा प्रस्तुत एक मिले-जुले अध्ययन का संदर्भ लिया जा सकता है। इस अध्ययन के अनुसार, किशोरावस्था में होने वाले तीव्र मस्तिष्क और शारीरिक परिवर्तनों का मुख्य कारण एड्रेनल हार्मोन्स का स्राव होता है। चिकित्सा विज्ञान में इस विशिष्ट समयावधि को एड्रीनार्की कालखंड के अंतर्गत समझा और विश्लेषित किया जाता है। इस कालखंड में होने वाले हार्मोन्स के तीव्र उतार-चढ़ाव के कारण किशोरों के व्यवहार में अप्रत्याशित बदलाव आते हैं, जो कभी-कभी उनके भीतर एक विशेष नशे जैसी मानसिक स्थिति का निर्माण कर देते हैं।
इस उम्र का एक सबसे बड़ा व्यावहारिक और कड़वा सच यह है कि किशोरों के लिए उनके अपने माता-पिता की बातें गौण हो जाती हैं और बाहरी दुनिया या उनके मित्रों की राय सर्वोपरि हो जाती है। उदाहरण स्वरूप, राहुल अपने मम्मी-पापा की बात कम सुनता है लेकिन दोस्तों की अधिक सुनता है। यह प्रवृत्ति किशोरों को धीरे-धीरे अपने परिवार से दूर करती चली जाती है। वे अपने मन के भीतर एक स्वप्निल संसार या काल्पनिक दुनिया का निर्माण कर लेते हैं। इस काल्पनिक दुनिया और समाज या माता-पिता के वास्तविक संसार के बीच कोई तालमेल नहीं बैठ पाता। नतीजतन, वे अपनी समस्याओं, इच्छाओं, विचारों और भविष्य की योजनाओं को अपने माता-पिता से छिपाने लगते हैं और गलत दिशा में आगे बढ़ जाते हैं।
हार्मोन्स के इस प्रभाव और स्वप्निल संसार में लगातार जीने के कारण, किशोरों में बिना सोचे-विचारे किसी भी काम को करने की एक आत्मघाती आदत पनपने लगती है। फैशन का अंधानुकरण करना और जो भी मन में आए उसे बिना किसी परिणाम की परवाह किए कर डालना इस उम्र की मुख्य विशेषता बन जाती है। इसके कारण वे कई तरह की विभीषिकाओं में फंस जाते हैं। बिना किसी आय या आर्थिक समझ के, किशोर अत्यधिक और असीमित खर्च करने की आदत पाल लेते हैं। सही और गलत की पहचान न होने के कारण, वे कई बार ऐसे कदम उठा लेते हैं जो निहायत ही अपरिपक्व होते हैं और सीधे तौर पर अपराध की श्रेणी या उसके बिल्कुल करीब होते हैं। इस गंभीर भूल का अपराध-बोध उन्हें बहुत बाद में जाकर होता है, जब समय हाथ से निकल चुका होता है।
माता-पिता जिन बच्चों को मोती की तरह हर समय अपनी आँखों में पालते हैं, उनके उन लाड़लों को जब कोई भी, किसी भी कारण से बहलाता, फुसलाता और भटकाता है, तब परिवार को जो असीम पीड़ा होती है, वह शब्दों में बयान नहीं की जा सकती। ऐसे भटकाने वाले तत्वों और परिस्थितियों की रोकथाम के लिए, हर मामले के गुण-दोष के आधार पर, सामाजिक, कानूनी और व्यावहारिक उपाय और अधिक पुख्ता तथा सख्त होने चाहिए। यही वह नाजुक उम्र होती है जब किशोर दूसरों के बहकावे, फुसलावे, लालच और दाने के चुगे को देखकर शिकारी के जाल में आसानी से फंस जाते हैं। गलत संगति या असामाजिक तत्वों के झांसे में आकर वे गलत कदम उठा लेते हैं और अपनों से दूरी बना लेते हैं। एक बहुत ही व्यावहारिक बात यह है कि कुछ किशोर तो समय रहते चोट खाने पर या झूठ को समझ जाने पर संभल जाते हैं, लेकिन एक बड़ी संख्या ऐसी भी है जो सही समय पर संभल नहीं पाती और उसी दलदल में हमेशा के लिए डूबकर रह जाती है।
आज के इस आधुनिक दौर में किशोरावस्था की इन समस्याओं को कई गुना बढ़ाने का काम मोबाइल और तकनीक ने किया है। एल्डस हक्सले ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ब्रेव न्यू वर्ल्ड में बहुत वर्षों पहले यह कल्पना की थी कि यांत्रिक प्रगति से बच्चों का दिमाग तो बड़ा हो जाएगा, परंतु वे छोटी उम्र में ही बुजुर्गों की तरह मानसिक रूप से थके हुए हो जाएंगे। मोबाइल ने इस कल्पना को आज एक विकट दुविधा के रूप में हमारे सामने ला खड़ा किया है। इसके प्रभाव के कारण आज के बच्चों की स्वाभाविक रुचि कहानियों और पारंपरिक बचपने से कहीं आगे निकल चुकी है और उनके लिए स्वतंत्रता का मतलब अब स्वच्छंदता यानी बिना किसी नियंत्रण के जीना बन चुका है। बच्चे एक तरह से ऑटो-पायलट मोड में आ चुके हैं, जहाँ वे स्वयं को ही सर्वज्ञाता और स्वयं सिद्ध वैलिडेट मान चुके हैं। वे किसी बड़े या समाज की स्वीकृति की परवाह नहीं करते, बल्कि दूसरों के वैलिडेशन की जिम्मेदारी खुद लेने लगते हैं। महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने कभी पूछा था कि क्या यह मशीन मनुष्य के हितों के विरुद्ध तो काम नहीं करेगी, और आज किशोरों की स्थिति देखकर लगता है कि तकनीक सचमुच उनके मानसिक और सामाजिक विकास के विरुद्ध काम कर रही है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि डिग्रियां लेकर भी युवा आज नौकरियों के लिए इधर-उधर भटक रहे हैं, क्योंकि उनका व्यावहारिक और मानसिक विकास शून्य हो चुका है।
उन स्पष्ट प्रवृत्तियों को भी उजागर करना आवश्यक है जो किसी भी किशोर और उसके परिवार के लिए स्पष्ट रूप से विनाशकारी संकेत हैं और जिनसे हर हाल में बचना अनिवार्य है। अपनी ही बात मनवाने की जिद करना, असीमित खर्च करना, अपनी क्षमताओं से परे अति-महत्वाकांक्षी होना, झूठ बोलना, चमत्कारों में विश्वास करना और गंडा-ताबीज जैसे अंधविश्वासों या निकम्मेपन की ओर आकर्षित होना, पार्टी और क्लबों में अत्यधिक समय बर्बाद करना तथा परिवार की स्थापित व्यवस्था को भंग करने के लिए तरह-तरह के झूठे बहाने गढ़ना स्वयं और परिवार के विनाश के सूचक हैं। ये सभी प्रवृत्तियां शेक्सपियर के नाटकों के पात्रों, जैसे ओथैलो या मैकबेथ की पत्नी की तरह व्यक्ति को अपने ही हितों के विरुद्ध काम करने पर मजबूर कर देती हैं, जो अंततः संपूर्ण विनाश का कारण बनती हैं।
असली चुनौती अभिभावकों और समाज के बड़ों के सामने है—उनकी इस प्रचंड क्षमता और ऊर्जा का सही तरीके से सदुपयोग कैसे किया जाए। जीवन की सबसे बड़ी सारनीति यही है कि मनुष्य को अपने सुख की कामना किसी और को दुख देकर, उस दुख के मूल्य पर कभी नहीं खोजनी चाहिए। किशोरावस्था रूपी इस अमृत को विष होने से बचाने का मार्ग भी अत्यंत स्पष्ट है। जब समाज और परिवार का संगठन संवादहीनता के कारण दूषित होने लगे, तो किशोरों को भटकाव से बचाने के लिए दो बातें बेहद जरूरी हो जाती हैं, और वे हैं आपसी विश्वास और सम्मान। इसके साथ ही, अकेलेपन या खाली समय के सदुपयोग के लिए किशोरों में उत्तम पुस्तकों के अध्ययन की आदत डालनी चाहिए। श्यामची आई जैसी भावना प्रधान पुस्तकें, थॉमस कारलाइल की हीरो एंड हीरो वर्शिप और फ्रांसिस बेकन के निबंध, जैसे ऑफ स्टडीज और एडवांसमेंट ऑफ लर्निंग, किशोरों को भटकाव से दूर कर उनके मस्तिष्क को सही दिशा, तार्किकता और आत्म-सम्मान से भर सकते हैं। किशोरावस्था के इस नाजुक दौर को यदि बड़ों के समझदारी भरे मार्गदर्शन, माता-पिता के धैर्यपूर्ण संवाद, समाज की पुख्ता कानूनी व सामाजिक व्यवस्था और अच्छी पुस्तकों के ज्ञान से सींचा जाए, तो एड्रीनार्की के इस कठिन कालखंड को भटकाव के बजाय राष्ट्र और समाज के नवनिर्माण की सकारात्मक ऊर्जा में बदला जा सकता है।
- क्षेत्रपाल शर्मा,
19/17 ,शान्तिपुरम,सासनी गेट ,आगरा रोड , अलीगढ़ 202001
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